भगवान शिव ने लंकापति रावण को जो तंत्र ज्ञान दिया, उसमें सात्विक साधनाओं के साथ ही तामसी साधनाओं का भी समावेश है। परोक्ष रूप से इनका उद्देश्य तमोगुण की उपेक्षा करते हुए उसका परिष्कार करना है।

ये साधनाएं जहां शीघ्र सिद्धि प्रदान करने वाली हैं, वहीं इनकी प्रक्रिया भी सरल-सुगम है। जटिलता न होने के कारण इनकी साधना सामान्य साधक भी कर सकता है। तंत्र शास्त्र की इस विधा में बिना किसी परिश्रम के प्राप्त होने वाली जड़ी-बूटियों एवं सामग्री के प्रयोग का भी विधान है, जिससे सुनिश्चित रूप से इष्ट की सिद्धि होती है।

यह ज्ञान आप सब पाठकों की कामनापूर्ति में भी सहायक हो, इसी उद्देश्य से इस ग्रंथ को मूल संस्कृत सहित सरल हिंदी भाषा में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसका प्रयोग जनहित के लिए ही करना श्रेयस्कर है, इस बात का विशेष ध्यान रखें।

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