ठिठुरता हुआ गणतंत्र | Thithurata Huaa Gantantra Book PDF Download by Harishankar Prasad

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पुस्तक का विवरण (Description of Book ठिठुरता हुआ गणतंत्र | Thithurata Huaa Gantantra PDF Download) :-

नाम : ठिठुरता हुआ गणतंत्र | Thithurata Huaa Gantantra Book PDF Download
लेखक :
आकार : 0.05 MB
कुल पृष्ठ : 2
श्रेणी : व्यंग्य / Vyangyaकहानियाँ / Stories
भाषा : हिंदी | Hindi
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परसाई हँसाने की हड़बड़ी में नहीं होते। वे पढ़नेवाले को देवता नहीं मानते, न ग्राहक, सिर्फ एक नागरिक मानते हैं, वह भी उस देश का जिसका स्वतंत्रता दिवस बारिश के मौसम में पड़ता है और गणतंत्र दिवस कड़ाके की ठंड में। परसाई की निगाह से यह बात नहीं बच सकी तो सि$र्फ इसलिए कि ये दोनों पर्व उनके लिए सिर्फ उत्सव नहीं, सोचने-विचारने के भी दिन हैं। वे नहीं चाहते कि इन दिनों को सिर्फ थोथी राष्ट्र-श्लाघा में व्यर्थ कर दिया जाए, जैसा कि आम तौर पर होता है। देखने का यही नज़रिया परसाई को परसाई बनाता है और हिन्दी व्यंग्य की परम्परा में उन्हें अलग स्थान पर प्रतिष्ठित करता है। प्रचलित, स्वीकृत और उत्सवीकृत की वे बहुत निर्मम ढंग से चीर-फाड़ करते हैं। इसी संग्रह में ‘इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर’ शीर्षक व्यंग्य में वे भारतीय पुलिस की स्थापित सामाजिक सत्ता को ढेर-ढेर कर देते हैं। परसाई को राजनीतिक व्यंग्य के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है लेकिन इस संग्रह में उनके सामाजिक व्यंग्य ज़्यादा रखे गए हैं। इन्हें पढ़कर पाठक सहज ही जान सकता है कि सिर्फ राजनीतिक विडम्बनाएँ ही नहीं, समाज ने जिन दैनिक प्रथाओं और मान्यताओं को अपनी जीवन-शैली माना है, उनकी खाल-परे छिपे पिस्सुओं को भी वे उतने ही कौशल से देखते और झाड़ते हैं। परसाई का अपना एक बड़ा पाठक वर्ग हमेशा से रहा है जो उनकी तीखी बातें सुनकर भी उन्हें पढ़ता रहा है। इस संग्रह की यह प्रस्तुति निश्चय ही उन्हें सुखद लगेगी।[adinserter block=”1″]

Parsai are not in a hurry to laugh. They do not consider the reader as a deity, nor a customer, but only a citizen, that too of a country whose Independence Day falls in the rainy season and Republic Day in the bitter cold. This fact could not escape from the eyes of Parsai only because both these festivals are not just festivals for them, but also days for thinking and thinking. They do not want these days to be wasted in mere national-praise, as is usually the case. This point of view makes Parsai a Parsai and makes him stand out in a different place in the tradition of Hindi satire. They mercilessly rip apart what is popular, accepted and celebrated. In this collection ‘Inspector Matadin Chand Par’ In the titular satire, he tears apart the established social authority of the Indian police. Parsai is particularly known for his political satires but his social satires are more in this collection. By reading these, the reader can easily know that not only the political irony, but the daily practices and beliefs which the society has considered as their way of life, they also see and remove the fleas hidden behind their skin with the same skill. Parsai has always had a large readership of its own, which has been reading him even after listening to his sharp words. They will surely like this presentation of this collection. With equal skill, he sees and removes the fleas hidden under his skin. Parsai has always had a large readership of its own, which has been reading him even after listening to his sharp words. They will surely like this presentation of this collection. With equal skill, he sees and removes the fleas hidden under his skin. Parsai has always had a large readership of its own, which has been reading him even after listening to his sharp words. They will surely like this presentation of this collection.
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पुस्तक का कुछ अंश (ठिठुरता हुआ गणतंत्र | Thithurata Huaa Gantantra PDF Download)

चार बार मैं गणतंत्र-दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूँ। पाँचवीं बार देखने का साहस नहीं। आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब में गणतंत्र समारोह देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता । छब्बीस जनवरी के पहले ऊपर बर्फ पड़ जाती है। शीत लहर आती है, बादल छा जाते हैं, बूंदाबांदी होती है और सूर्य छिप जाता है। जैसे दिल्ली की अपनी कोई अर्थनीति नहीं है, वैसे ही अपना मौसम भी नहीं है। अर्थनीति जैसे डॉलर, पौंड, रुपया, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष या भारत सहायता क्लब से तय होती है, वैसे ही दिल्ली का मौसम कश्मीर, सिक्किम राजस्थान आदि तय करते हैं। इतना बेवकूफ भी नहीं कि मान लूँ, जिस साल में समारोह देखता हूँ, उसी साल ऐसा मौसम रहता है। हर साल देखने वाले बताते हैं कि हर गणतंत्र दिवस पर मौसम ऐसा ही धूपहीन ठिठुरनवाला होता है। आखिर बात क्या है? रहस्य क्या है? [adinserter block=”1″]
जब कांग्रेस टूटी नहीं थी, तब मैंने एक कांग्रेस मंत्री से पूछा था कि यह क्या बात है कि हर गणतंत्र दिवस को सूर्य छिपा रहता है? सूर्य की किरणों के तले हम उत्सव क्यों नहीं मना सकते? उन्होंने कहा जरा धीरज रखिए। हम कोशिश में हैं कि सूर्य बाहर आ जाए। पर इतने बड़े सूर्य को बाहर निकालना आसान नहीं हैं। वक्त लगेगा। हमें सत्ता के कम से कम सौ वर्ष तो दीजिए दिए। सूर्य को बाहर निकालने के लिए सौ वर्ष दिए. मगर हर साल उसका छोटा-मोटा कोना तो निकलता दिखना चाहिए। सूर्य कोई बच्चा तो है नहीं जो अंतरिक्ष की कोख में अटका है, जिसे आप आपरेशन करके एक दिन में निकाल देंगे। इधर जब कांग्रेस के दो हिस्से हो गए तब मैंने एक इंडिकेटी कांग्रेस से पूछा। उसने कहा हम हर बार सूर्य को बादलों से बाहर निकालने की कोशिश करते थे, पर हर बार सिंडीकेट वाले अड़ंगा डाल देते थे। अब हम वादा करते हैं कि अगले गणतंत्र दिवस पर सूर्य को निकालकर बताएँगे। एक सिंडीकेटी पास खड़ा सुन रहा था। वह बोल पड़ा – ‘यह लेडी (प्रधानमंत्री) कम्युनिस्टों के चक्कर में आ गई है। वही उसे उकसा रहे हैं कि सूर्य को निकालो। उन्हें उम्मीद है कि बादलों के पीछे से उनका प्यारा लाल सूरज निकलेगा। हम कहते हैं कि सूर्य को निकालने की क्या जरूरत है? क्या बादलों को हटाने से काम नहीं चल सकता? में संसोपाई भाई से पूछता हूँ। वह कहता है सूर्य गैर-कांग्रेसवाद पर अमल कर रहा है। उसने डाक्टर लोहिया के कहने पर हमारा पार्टी फार्म दिया था। कांग्रेसी प्रधानमंत्री को सलामी लेते वह कैसे देख सकता है? किसी गैर-कॉंग्रेसी को प्रधानमंत्री बना दो, तो सूर्य क्या उसके अच्छे भी निकल पड़ेंगे जनसंघी भाई से भी पूछा। उसने कहा- सूर्य सेक्युलर होता तो इस सरकार की परेड में निकल आता। इस सरकार से आशा मत करो कि भगवान अंशुमाली को निकाल सकेगी। [adinserter block=”1″]
हमारे राज्य में ही सूर्य निकलेगा। साम्यवादी ने मुझसे साफ कहा यह सब सी.आई.ए. का षडयंत्र है। सातवें बेड़े से बादल दिल्ली भेजे जाते हैं।’ स्वतंत्र पार्टी के नेता ने कहा ‘रूस का पिछलग्गू बनने का और क्या नतीजा होगा? प्रसोपा भाई ने अनमने ढंग से कहा ‘सवाल पेचीदा है। नेशनल कौंसिल की अगली बैठक में इसका फैसला होगा। तब बताऊँगा।’ राजाजी से में मिल न सका । मिलता, तो वह इसके सिवा क्या कहते कि इस राज में तारे निकलते हैं, यही गनीमत है।’ में इंतजार करूँगा, जब भी सूर्य निकले। स्वतंत्रता दिवस भी तो भरी बरसात में होता है। अंग्रेज बहुत चालाक हैं। भरी बरसात में स्वतंत्र करके चले गए। उस कपटी प्रेमी की तरह भागे, जो प्रेमिका का छाता भी ले जाए। वह बेचारी भीगती बस स्टैंड जाती है, तो उसे प्रेमी की नहीं, छाता चोर की याद सताती है। स्वतंत्रता दिवस भीगता है और गणतंत्र दिवस ठिठुरता है में ओवरकोट में हाथ डाले परेड देखता हूँ। प्रधानमंत्री किसी विदेशी मेहमान के साथ खुली गाड़ी में निकलती हैं। रेडियो टिप्पणीकार कहता है घोर करतल ध्वनि हो रही है।’ मैं देख रहा हूँ नहीं हो रही है। हम सब तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं। बाहर निकालने का जी नहीं हो रहा है। हाथ अकड़ जाएँगे। लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं, फिर भी तालियाँ बज रहीं हैं। मैदान में जमीन पर बैठे लोग बजा रहे हैं, जिनके पास हाथ गरमाने के लिए कोट नहीं है। लगता है गणतंत्र ठिठुरते हुए हाथों की तालियों पर टिका है। गणतंत्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलती हैं, जिनके मालिक के
पास हाथ छिपाने के लिए गर्म कपड़ा नहीं है। पर कुछ लोग कहते हैं गरीबी मिटनी चाहिए। तभी दूसरे….
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हमने ठिठुरता हुआ गणतंत्र | Thithurata Huaa Gantantra PDF Book Free में डाउनलोड करने के लिए Google Drive की link नीचे दिया है , जहाँ से आप आसानी से PDF अपने मोबाइल और कंप्यूटर में Save कर सकते है। इस क़िताब का साइज 0.05 MB है और कुल पेजों की संख्या 2 है। इस PDF की भाषा हिंदी है। इस पुस्तक के लेखक हरिशंकर परसाई / Harishankar Prasad हैं। यह बिलकुल मुफ्त है और आपको इसे डाउनलोड करने के लिए कोई भी चार्ज नहीं देना होगा। यह किताब PDF में अच्छी quality में है जिससे आपको पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। आशा करते है कि आपको हमारी यह कोशिश पसंद आएगी और आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ ठिठुरता हुआ गणतंत्र | Thithurata Huaa Gantantra की PDF को जरूर शेयर करेंगे।

Q. ठिठुरता हुआ गणतंत्र | Thithurata Huaa Gantantra किताब के लेखक कौन है?
 

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