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द पावर ऑफ हॅबिट / The Power of Habit PDF Download Free Hindi Book by Charles Duhigg

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Nameद पावर ऑफ हॅबिट / The Power of Habit
लेखक / Author
आकार / Size4.6 MB
कुल पृष्ठ / Pages308
Last UpdatedMarch 30, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category, ,

आदतों की शक्ति (The Power of Habit) के जरिए न्यूयॉर्क टाइम्स के पुरस्कार विजेता बिजनेस रिपोर्टर चार्ल्स डुहिग हमें आदतों के वैज्ञानिक अध्ययन की एक ऐसी दुनिया में ले जाते हैं, जो न सिर्फ रोमांचकारी है बल्कि बेहद आश्चर्यजनक भी है।

वे यह पता लगाते हैं कि कुछ लोगों और कंपनियों को सालों की कोशिशों के बाद भी बदलाव के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है, जबकि अन्य लोग बड़ी आसानी से रातोंरात बदलाव लाने में सफल हो जाते हैं। चार्ल्स उन प्रयोगशालाओं में भी जाते हैं, जहाँ न्यूरोसाइंटिस्ट इस बात का पता लगाते हैं कि आदतें कैसे काम करती हैं और उनका जन्म हमारे मस्तिष्क के किस हिस्से में होता है। चार्ल्स हमारे सामने यह राज़ भी उजागर करते हैं कि ओलंपिक तैराक माइकल फेल्प्स, स्टारबक्स के सीईओ हॉवर्ड शुल्ज और नागरिक अधिकारों के प्रणेता मार्टिन लूथर किंग जूनियर जैसी शख्सियतों की सफलता में उनकी आदतों की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका रही हइससे एक सम्मोहक, तार्किक परिणाम सामने आता है : नियमित व्यायाम करना, वजन घटाना, अपने बच्चों को सर्वश्रेष्ठ परवरिश देना, अधिक उत्पादक बनना और यहाँ तक कि क्रांतिकारी सफलता हासिल करनेवाली कंपनियाँ खड़ी करना, हमारी इस समझ पर निर्भर करता है कि आदतें कैसे काम करती हैं। इस नए विज्ञान में निपुण बनकर हम अपने व्यापार, अपने समुदाय और अपने जीवन को रूपांतरित कर सकते हैं।

‘एक तीखी, उत्तेजक और बेहद उपयोगी पुस्तक... जिसकी सबसे बड़ी खासियत है इसकी सुरुचिपूर्ण सरलता।’-जिम कॉलिन्स

पुस्तक का कुछ अंश

वह वैज्ञानिकों की पसंदीदा प्रतिभागी थी।
चौंतीस वर्षीय लीसा एलन की फाइल के अनुसार, उसने सोलह साल की उम्र में ही शराब और धूम्रपान करना शुरू कर दिया था और उसके जीवन का ज़्यादातर हिस्सा मोटापे से जूझते हुए बीता था। जब वह 25 साल की थी, तो उसके जीवन में एक ऐसा दौर आया, जब उस पर दस हज़ार डॉलर्स का कर्ज हो गया था। कर्ज वसूलनेवाली एजेंसियाँ हाथ धोकर उसके पीछे पड़ी हुई थीं। अपने जीवन में आज तक लीसा कभी किसी नौकरी में लंबे समय तक नहीं टिकी थी। उसके बायोडाटा के अनुसार उसका सबसे लंबा कार्यकाल एक साल से भी कम का था।
पर आज शोधकर्ताओं के सामने जो महिला बैठी थी, वह एक दुबले-पतले पर तंदुरुस्त शरीरवाली महिला थी, जिसके पैर किसी धावक जितने मज़बूत थे। चार्ट में उसकी जो तस्वीरें लगी थीं, उनकी तुलना में आज वह दस साल छोटी नज़र आ रही थी और उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि वह उस कमरे में बैठे सभी लोगों को व्यायाम के मामले में आसानी से पछाड़ सकती है। उसकी फाइल में जोड़ी गई सबसे ताजा रिपोर्ट के अनुसार अब लीसा पर कोई कर्ज नहीं था, वह शराब पीना छोड़ चुकी थी और पिछले 39 महीनों से सफलतापूर्वक एक ग्राफिक डिजाइन कंपनी में काम कर रही थी।
‘आपने आखिरी बार सिगरेट कब पी थी?’ सवालों की एक लंबी सूची सामने रखकर एक डॉक्टर ने लीसा से पूछा। अमेरिका के मैरीलैंड के बेथस्डा में स्थित इस प्रयोगशाला में आकर लीसा हर बार इन सवालों के जवाब देती थी।
लीसा ने डॉक्टर के सवाल के जवाब में कहा, ‘लगभग चार साल पहले। तब से मैं अपना 60 पाउंड वज़न घटा चुकी हूँ और अब तो मैं मैराथन में भी दौड़ती हूँ।’ उसने मास्टर्स की डिग्री लेने के लिए पढ़ाई शुरू कर दी थी और साथ ही अपने लिए एक घर भी खरीद लिया था। यह लीसा के जीवन का सबसे रोमांचक समय था।

उस कमरे में बैठे वैज्ञानिकों में न्यूरोलॉजिस्ट (तंत्रिका विज्ञानी), साइकोलॉजिस्ट (मनोवैज्ञानिक) जेनेटिसिस्ट (अनुवांशिकी विज्ञानी) और सोशियोलॉजिस्ट (समाज विज्ञानी) शामिल थे। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ से मिलनेवाली राशि की मदद से ये वैज्ञानिक पिछले तीन सालों से लीसा और उसके जैसे दो दर्जन से अधिक लोगों से सवाल-जवाब कर रहे हैं। इसमें धूम्रपान की लत से ग्रस्त रह चुके लोगों के साथ-साथ अत्याधिक खाने, शराब और अत्याधिक खरीदारी जैसी अन्य लतों से ग्रस्त लोग भी शामिल थे। इन सभी प्रतिभागियों में एक बात समान थी कि उन्होंने अपेक्षाकृत बहुत ही कम समय में अपने जीवन को एक नई दिशा दी थी। शोधकर्ता उनकी इस सफलता का कारण जानना चाहते थे। इसलिए उन्होंने इन लोगों के वाइटल साइन्स (जीवनसूचक लक्षणों) का मूल्यांकन किया, उनकी दिनचर्या जानने के लिए उनके घरों में कैमरे लगाए और उनके डीएनए के कुछ भागों को एक क्रम में रख दिया। फिर उन्होंने प्रयोग के दौरान प्रतिभागियों को स्वादिष्ट भोजन और सिगरेट के धुएँ की तेज महक जैसे लालच दिए व ठीक उसी समय तकनीकी सहायता से उनके सिर के अंदर झाँका और मस्तिष्क में संचालित रक्त और विद्युत आवेगों पर गौर किया। शोधकर्ता यह समझना चाहते थे कि न्यूरोलॉजिकल लेवल यानी तंत्रिक स्तर पर ये आदतें कैसे काम करती हैं और इन्हें परिवर्तित करने के लिए क्या करना होगा।
सवालों की एक सूची सामने रखते हुए एक डॉक्टर ने लीसा से पूछा, ‘तुमने यह कहानी कई बार दोहराई है, लेकिन मेरे कई सहकर्मियों ने तुम्हारी कहानी तुम्हारे मुँह से नहीं सुनी है। अगर तुम्हें एतराज़ न हो, तो क्या तुम हमें बता सकती हो कि तुमने धूम्रपान की आदत कैसे छोड़ी?’
‘इसकी शुरुआत मिस्र की राजधानी, कायरो में हुई थी,’ लीसा ने बताया। उसके अनुसार वहाँ छुट्टियाँ मनाने का निर्णय जल्दबाजी में लिया गया था। कुछ महीनों पहले ही एक दिन लीसा का पति जब काम से घर लौटा तो उसने लीसा को बताया कि वह किसी और से प्रेम करता है और इसलिए वह लीसा को तलाक दे रहा है। लीसा को अपने पति से मिले धोखे और तलाक को स्वीकार करने में काफी समय लग गया। पहले कुछ दिनों तक वह बहुत दुःखी रही। फिर वह पति की जासूसी से लेकर उसकी प्रेमिका का पूरे शहर में पीछा करने और आधी रात को उसे फोन करके बिना कुछ बोले फोन काट देने जैसी हरकतें करती रही। फिर एक शाम नशे में धुत होकर वह अपने पति की प्रेमिका के घर पहुँच गई और उसका दरवाजा पीटते हुए ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर उसका घर जलाने की धमकी देने लगी।

‘वह मेरे जीवन का सबसे बुरा समय था,’ लीसा ने बताया। ‘मैं हमेशा से मिस्र के पिरामिड देखना चाहती थी, लेकिन तब तक मेरे क्रेडिट कार्डस् की अधिकतम सीमा समाप्त हो चुकी थी...।’
मिस्र की राजधानी कायरो में पहले दिन सुबह-सुबह लीसा की नींद पास की एक मस्ज़िद से आती अजान की आवाज़ से खुली। उसके होटल के कमरे में अंधेरा था। हवाई जहाज की यात्रा से थकी हुई लीसा अंधेरे में ही सिगरेट ढ़ूँढ़ने लगी।
उस समय वह मानसिक रूप से इतनी अस्थिर थी कि जब उसे प्लास्टिक जलने की बदबू आई, तब जाकर उसे एहसास हुआ कि वह सिगरेट की जगह पेन जला रही है। पिछले चार महीनों में लीसा कई बार रोई थी। वह मन बहलाने के लिए दिन-रात खाती थी और ठीक से सो नहीं पाती थी। इस दौरान वह बहुत शर्मिंदा, असहाय, उदास और क्रोधित महसूस करती थी। ये सब सोचकर बिस्तर पर लेटे-लेटे ही उसे रोना आ गया। वह बुरी तरह से टूट चुकी थी। लीसा कहती है, ‘मुझ पर उदासी की लहर सी छा गई थी। जीवन में मैंने जो कुछ भी चाहा, वह सब टूटकर बिखर चुका था। मेरी हालत इतनी खराब थी कि मैं ढंग से एक सिगरेट तक नहीं जला पा रही थी।’
लीसा आगे बताती है, ‘फिर मैं अपने पूर्व पति के बारे में सोचने लगी। मुझे लगा कि वापस जाकर अपने लिए नई नौकरी ढ़ूँढ़ना कितना कठिन होगा और मुझे जो काम मिलेगा, वह मुझे कितना नापसंद होगा। मैं हर वक्त खुद को अस्वस्थ महसूस करती हूँ। इन्हीं सब विचारों में गुम मैं बिस्तर से उठी और अचानक बिस्तर के पास की मेज़ पर रखे पानी के जग को मेरा हाथ लगा और वह जमीन पर गिरकर टूट गया; यह देखकर मैं और भी ज़्यादा रोने लगी। मुझे बहुत बेचैनी और निराशा महसूस होने लगी। मुझे लगा कि मुझे अपनी जिंदगी को बदलना होगा या कम से कम अपनी एक ऐसी चीज़ को तो बदलना ही होगा, जो मेरे नियंत्रण में हो।’
लीसा नहा-धोकर उस होटल से बाहर निकली। कायरो की गड्ढों से भरी कच्ची सड़कों पर चलते हुए लीसा ने एक टैक्सी पकड़ी, जो कुछ ही देर में एक पथरीली सड़क पर पहुँच गई। स्फिक्स, गीज़ा के पिरामिड और उस विशाल, अंतहीन रेगिस्तान से गुज़रती लीसा को पलभर के लिए खुद पर ही तरस आ गया। उसे महसूस हुआ कि उसे जीवन में एक निश्चित लक्ष्य बनाने की ज़रूरत है। कोई ऐसा लक्ष्य जिसे हासिल करने के लिए उसे सचमुच काम करना पड़े।
उस टैक्सी के अंदर बैठे-बैठे ही लीसा ने निर्णय लिया कि वह एक बार फिर मिस्र वापस आएगी और इस रेगिस्तान की ट्रेकिंग (पैदल यात्रा) करेगी।

लीसा जानती थी कि यह एक सनक भरा विचार था। उसका वजन बहुत ज़्यादा और शरीर भारी-भरकम था। उसका बैंक खाता भी खाली हो चुका था। उसे तो यह भी नहीं पता था कि जो रेगिस्तान उसकी आँखों के सामने है, उसका नाम क्या है और उसकी पैदल यात्रा संभव भी है या नहीं। हालाँकि लीसा के लिए इनमें से कोई भी बात महत्वपूर्ण नहीं थी। क्योंकि उसे तो बस कुछ ऐसा चाहिए था, जिस पर वह अपना ध्यान केंद्रित कर सके। लीसा ने खुद को इसकी तैयारी करने के लिए एक वर्ष का समय दिया। लीसा जानती थी कि इस कठिन अभियान को पूरा करने के लिए उसे त्याग करना होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात! कि उसे धूम्रपान छोड़ना होगा।
इस घटना के ग्यारह महीनों बाद लीसा उस रेगिस्तान की यात्रा पर थी। हालाँकि यह यात्रा छह लोगों के साथ एक एअर कंडिशन गाड़ी में की गई थी और हाँ, उनकी गाड़ी में इतना सामान था, जैसे पानी, खाना, टेंट, नक्शे, जीपीएस और टू-वे रेडियो वगैरह कि उसमें सिगरेट का एक डिब्बा रख देने से कोई फर्क नहीं पड़नेवाला था।
लेकिन टैक्सी में बैठी लीसा को यह सब नहीं पता था। प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों के लिए भी लीसा की इस यात्रा की विस्तृत जानकारी महत्वपूर्ण नहीं थी। क्योंकि उनकी दिलचस्पी तो बस लीसा की आदतों में थी और अब धीरे-धीरे वे समझने लगे थे कि उस दिन कायरो में धूम्रपान छोड़ने का निर्णय लेकर लीसा अपने स्वभाव में ऐसा बदलाव लाने में सफल हो गई, जिससे उसके जीवन में परिवर्तनों का एक सिलसिला शुरू हो गया। जिनका सकारात्मक प्रभाव उसके जीवन के हर पहलू में स्पष्ट नज़र आने लगा। अगले छह महीनों में लीसा की धूम्रपान की आदत का स्थान रोज सुबह की जॉगिंग ने लिया। जिससे उसकी खाने-पीने, नींद और काम से जुड़ी आदतें भी बदल गईं। अब तो लीसा पैसों की बचत भी करने लगी थी। वह हर रोज अपनी एक कार्य-योजना भी बनाती थी और साथ ही अपना भविष्य सुनियोजित करने की योजनाएँ भी बनाने लगी थी। इसके बाद लीसा ने पहले हाफ-मैराथन में हिस्सा लिया और फिर वह फुल-मैराथन में भी दौड़ने लगी। उसने अपनी उच्च शिक्षा पूरी करके अपने लिए एक घर भी खरीद लिया और फिर एक अच्छे लड़के से उसकी सगाई भी हो गई। आखिरकार उसे वैज्ञानिकों के अभ्यास के लिए चुना गया। शोधकर्ताओं ने लीसा के दिमाग की छवियों का परीक्षण किया, तो उन्हें कुछ उल्लेखनीय बातें दिखाई दी : उसके न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका संबंधी) पैटर्न्स यानी उसकी पुरानी आदतों की जगह कुछ नए किस्म के पैटर्न्स यानी नई आदतों ने ले ली थी। वे अब भी उसकी पुरानी आदतों की न्यूरल एक्टिविटीज (तंत्रिका संबंधी गतिविधियाँ) देख सकते थे। पर अब उसकी पुरानी इंपल्सेज (मनोवेगों) पर नए अर्जेस (आवेग) हावी थे। जैसे-जैसे लीसा की आदतें बदलीं, उसका मस्तिष्क भी बदल गया।

वैज्ञानिकों का मानना था कि लीसा में आए इस बदलाव का कारण कायरो की वह यात्रा नहीं थी और न ही इसका संबंध लीसा के तलाक या रेगिस्तान की यात्रा से था। लीसा ने सबसे पहले धूम्रपान की आदत बदलने पर ध्यान केंद्रित किया और यही उसके अंदर आए बदलाव का मुख्य कारण था। इस अभ्यास में हिस्सा लेनेवाले अन्य प्रतिभागी भी ठीक इसी प्रकार की प्रक्रिया से गुज़रे थे। अपने सिर्फ एक पैटर्न - जिसे ‘प्रधान आदत’ कहा जाता है - पर ध्यान केंद्रित करके लीसा अपने जीवन के अन्य रूटीन्स यानी तयशुदा आदतों को बदलना भी सीख गई थी।
ऐसा नहीं है कि ऐसे बदलाव केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही संभव हैं। अगर कोई संगठन भी अपनी आदतें बदलने पर ध्यान केंद्रित करता है, तो उसमें बदलाव संभव है। प्रॉक्टर एंड गैंबल, स्टारबक्स, एल्कोआ और टारगेट जैसी कंपनियों ने इस अंतर्दृष्टि को अच्छी तरह समझा है। इसीलिए अब ये कंपनियाँ अपने ग्राहकों व कर्मचारियों की हर तरह की आदतों को प्रभावित करने में सक्षम हो गई हैं, जैसे काम कैसे पूरा हो, कर्मचारियों से संवाद कैसे हो और ग्राहक को पता चले बिना उनकी खरीदारी को प्रभावित कैसे किया जाए वगैरह।
‘मैं आपको आपका हाल ही में लिया गया स्कैन दिखाना चाहता हूँ,’ लीसा के परीक्षण के अंत में एक शोधकर्ता ने उससे कहा। उसने कंप्यूटर स्क्रीन पर लीसा को उसके मस्तिष्क की छवियाँ दिखाईं और मस्तिष्क के मध्यवाले हिस्से की ओर इशारा करते हुए बताया, ‘यह आपके दिमाग का वह हिस्सा है, जो भूख और तृष्णा से संबंधित है और अब भी सक्रिय है। आपका मस्तिष्क अब भी ऐसी इच्छाएँ पैदा करता रहता है, जो आपको बार-बार अत्यधिक खाने के लिए प्रेरित करते हैं।’

इसके बाद उसने लीसा के माथे के करीब स्थित एक हिस्से की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘लेकिन इस स्थान पर नई गतिविधियाँ नज़र आ रही हैं। हमारा मानना है कि यहाँ व्यवहार-नियंत्रण और आत्म-अनुशासन की आदतों का निर्माण होता है। जबसे आप इस प्रयोगशाला में आने लगी हैं, तब से आपकी ये गतिविधियाँ और अधिक स्पष्ट हो गई हैं।’
लीसा वैज्ञानिकों की प्रिय प्रतिभागी थी क्योंकि उसके मस्तिष्क की छवियाँ यह समझने में बहुत उपयोगी थीं कि इंसानी व्यवहार से जुड़े पैटर्न्स या आदतों का निर्माण मस्तिष्क के किस हिस्से में होता है। डॉक्टर ने उसे बताया, ‘इस तरह आप यह समझने में हमारी मदद कर रही हैं कि कोई एक निर्णय इंसान का स्वचालित व्यवहार कैसे बनता है।’
उस कमरे में बैठे हर व्यक्ति को यह महसूस होने लगा था कि वे एक बहुत ही महत्वपूर्ण खोज की कगार पर है खड़े हैं; और वे सही थे।
***
आज सुबह उठकर आपने सबसे पहले क्या किया? क्या आप सबसे पहले नहाने गए या फिर पहले अपने ई-मेल देखे या फिर रसोईघर में घुसकर कुछ खाने को ले आए? आपने अपने दाँत नहाने से पहले साफ किए या बाद में। जूते पहनते समय आपने दांया जूता पहले पहना या बांया? घर से निकलते समय अपने बच्चों से आपने क्या कहा? आपने ऑफिस जाने के लिए कौन सा रास्ता चुना? ऑफिस में अपने केबिन में पहुँचकर आपने सबसे पहले अपने ई-मेल देखे, सहकर्मी से बात की या सीधे दिनभर के कार्यों की सूची बनाने में लग गए? दोपहर के खाने में आपने सलाद खाया या हैम्बर्गर? शाम को वापस घर पहुँचने के बाद आप अपने स्पोर्ट्स शूज पहनकर दौड़ने निकल गए या टी.वी. के सामने बैठकर खाना खाने लगे?

1892 में विलियम जेम्स् ने लिखा था कि ‘हमारा संपूर्ण जीवन केवल आदतों का परिणाम है।’ दिनभर में हम जो भी चुनाव करते हैं, उनमें से ज़्यादातर सोच-समझकर लिए गए निर्णय लग सकते हैं, पर असल में ऐसा नहीं है। वे बस हमारी आदतें हैं। हम क्या खाते-पीते हैं... रात को सोने से पहले अपने बच्चों से क्या कहते हैं... पैसे खर्च करते हैं या बचाते हैं... कितना व्यायाम करते हैं... और अपने विचारों व काम से जुड़ी तयशुदा आदतों को कैसे नियोजित करते हैं... ये सब शुरुआत में छोटी-मोटी आदतें लग सकती हैं लेकिन समय के साथ इन छोटी आदतों का हमारे स्वास्थ्य, उत्पादकता, आर्थिक स्थिरता और आनंद पर गहरा प्रभाव पड़ता है। 2006 में ड्यूक विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता द्वारा प्रकाशित शोध में बताया गया कि लोग दिनभर में जितने कार्य करते हैं, उनमें से 40 प्रतिशत कार्य उनके निर्णयों द्वारा नहीं बल्कि उनकी रोज़मर्रा की आदतों के कारण होते हैं।
अरस्तू से लेकर ओपेरा विन्फ्रे जैसे अनेकों लोगों की तरह ही विलियम जेम्स ने भी अपने जीवन का लंबा समय यह समझने में लगा दिया कि आदतों का अस्तित्व क्यों होता है। हालाँकि पिछले दो दशकों से ही वैज्ञानिकों और विक्रेताओं को यह समझ में आना शुरू हुआ है कि आदतें कैसे काम करती हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात कि आदतों को कैसे बदला जा सकता है।


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