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The चिरकुट्स / The Chirkuts by Alok Kumar Download Free PDF

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥द चिरकुट्स / The Chirkuts
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 1 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖107
Last UpdatedApril 10, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category

“कालेज कुछ और दे न दे जिंदगी भर के लिए कुछ दोस्त जरूर दे देता है।”

यह कहानी ऐसे ही चार दोस्तों की है जो प्यार के बारे में अलग-अलग राय रखते हैं। आखिरकार जब उन्हें सच में प्यार होता है तब उन्हें यह पता चलता है कि कालेज का संसार और बाहर की दुनिया दो अलग-अलग चीजें हैं। और तब उनका संघर्ष शुरु होता है- यह संघर्ष है प्यार का, प्रैक्टिकल्स का, असाइनमेंट्स का, प्रोफेसर्स का और इस समाज का।
ये दोस्त साथ मिलकर प्यार को जीने और उसे पाने की जो कोशिशें करते हैं वो इन्हें ‘The चिरकुट्स’ बना देती हैं।

पुस्तक का कुछ अंश

... तो होंठों को कर के गोल, सीटी बजा के बोल, आल इज वेल.....

"हैलो!"

"अबे अभी तक सो रहा है। जल्दी से मेरे कमरे पर पहुँच, तुझे कुछ बताना है। बहुत

urgent है।

“अब क्या हो गया? फिर कुछ problem हुई है क्या?"

"नहीं यार चिन्ता की कोई बात नहीं है। बस तू जल्दी से आ जा। "

“ठीक है, मैं अभी पहुँचता हूँ। "

"और हाँ, एक बात और, रिंगटोन बड़ी अच्छी है। motivating है। कब लगाई?" "बस यार, इतना सब होने के बाद सोचा कि अब motivation की जरूरत है तो यह रिंगटोन लगा ली। चल अब फोन रख, मैं फटाफट निकलता हूँ।

इतना कहकर अमित ने फोन रख दिया। मैंने भी सामने रखी नाश्ते की प्लेट पर नजर दौड़ाई। आज नाश्ते में हलवा-पूड़ी थी। मैं जानता था कि माला जब खुश होती है, तब हलवा पूड़ी बनाती है। कल रात को जब पहली बार घर से फोन आया था, तब से माला बहुत खुश थी। खुशी तो मुझे भी थी, लेकिन उसकी खुशी का लेवल अलग ही था। वह सुबह जल्दी उठकर मंदिर भी गई थी। शायद वह भगवान को शुक्रिया कहने गई हो, क्योंकि पिछले कुछ दिनों में जो भी हुआ था, वह तो किसी ने भी नहीं सोचा होगा। मेरा मन भी आज बहुत हल्का लग रहा था। कई दिनों बाद आज मुझे नाश्ता करने का मन कर रहा था। ऐसा लग रहा था कि बहुत दिलें से मैंने कुछ भी नहीं खाया है। पिछले कुछ दिनों में तो मैं बस इसलिए खा रहा था कि जो कुछ भी हो रहा है, उसे झेलने की थोड़ी ताकत मिल सके। में यह भी जानता था कि माला तो उतना भी नहीं खाती है। वह तो बस मेरा मन रखने के लिए थोड़ा-बहुत कुछ मुँह में डाल लेती थी। हमने जो कुछ भी किया था, उसका उसे बहुत अफसोस था। मुझे माला मेरे सामने खड़ी थी। मैंने एक निवाला तोड़कर अपने मुंह में डाल लिया। आज मुझे नाश्ता बहुत अच्छा लग रहा था। ऐसा लग रहा था कि कई दिनों की भूख आज पूरी हो रही है। माला के चेहरे पर भी निश्चिंतता के भाव थे। मुझे तसल्ली से खाता हुआ देखकर वह मेरी बगल में बैठ गई। मैंने भी उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया। उसके होंठ मुस्करा रहे थे, पर उसकी आँखों से लग रहा था कि वह अभी थोड़ी देर पहले ही रो रही थी। वह यह जानती थी कि जब भी मैं उसे रोता हुआ देखता हूँ, तो मुझे ऐसा लगता है कि मैंने जो कुछ भी किया वह गलत किया। इसलिए उसे जब भी रोने का मन होता था, वह बाथरूम में छुपकर रोती थी। अपने कॉलेज के दिनों में जब मैं किसी मूवी में हीरोइन को बाथरूम में रोते हुए देखता था, तब मुझे यह एक बेवकूफी लगती थी। पर अब में इसका मतलब समझने लगा था। शायद मैं बहुत सारी बातें समझने लगा था।

माला मेरी बगल में बैठी हुई थी। उसने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया था। शायद वह अपनी आँखें मुझसे छुपाना चाहती थी, जो बहुत अधिक रोने के कारण लाल हो गई थीं। मैंने उसके बालों को सहलाते हुए पूछा- “अब क्यों रो रही थी? अब तो सबकुछ खत्म होने वाला है। "

"ये खुशी के आँसू हैं। " उसने अपना सिर मेरे कंधे पर से उठाया और मेरी आँखों में देखकर कहा।

मैं नाश्ता खत्म कर चुका था। माला प्लेट लेकर किचन में चली गई और मैं बैग में से लैपटॉप निकालकर उसे ऑन कर रहा था कि तभी माला मेरे पास आई और बोली- मैं जरा बाहर से आती हूँ। कुछ काम है। "

इससे पहले कि मैं कुछ पूछता, वह दरवाजा खोलकर बाहर निकल गई।

"थोड़ी देर बाद अमित मेरे सामने बैठा था। वह परेशान लग रहा था। शायद वह यह सोच रहा था कि फिर से कुछ नया घटा है और कोई समस्या खड़ी हो गई है। अब उसे फिर से कोई नया प्लान बनाना होगा। वैसे पिछले कुछ दिनों में मैंने जो कुछ भी किया था, उसने सबको परेशान करके रख दिया था। पर सच बताऊँ में अपने दोस्तों का एहसानमंद था, क्योंकि उन्होंने मेरा साथ तब दिया, जब मेरे अपनों ने किनारा कर लिया।

अमित ने मुझ से पूछा- "क्या बात है, बता, कुछ सीरियस तो नहीं है?" "हम घर जा रहे हैं। मैंने कहा।

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