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तीसरा नेत्र – १ / Teesara Netra – 1 PDF Download Free Hindi Book by Arun Kumar Sharma

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Nameतीसरा नेत्र - १ / Teesara Netra - 1
लेखक / Author
आकार / Size73.9 MB
कुल पृष्ठ / Pages356
Last UpdatedMarch 26, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category,

वर्तमान समय में स्व.म.म.डॉ. गोपीनाथ कविराज के पश्चात पिताश्री पं. अरूण कुमार शर्मा आध्यात्म चिंतक और तत्व दृष्टा के रूप में सर्वत्र प्रसिद्ध है। परम सौभाग्य की बात तो यह है कि वे अभी हम सब लोगों के बीच अपनी भौतिक सत्ता में विद्यमान हैं। अपने निवास पर प्रबुद्ध एवं आध्यात्मिक वर्ग के लोगों से प्रायः नित्य सायंकाल योग और तंत्र के गूढ़ और गोपनीय विषयों पर चर्चा किया करते हैं वह आध्यत्मिक विशेषकर योग के प्रति मेरी शुरू से ही रूचि रही है, इसलिए कभी कदा अवसर प्राप्त होने पर सत्संग में भी अपनी जिज्ञासाओं के निमित्त उपस्थित हो जाया करता हूँ। एक दिन प्रसंगवश मैंने अपनी जिज्ञासा प्रकट की "योग" द्वारा मनुष्य का आत्मिक विकास कैसे सम्भव है?


पुस्तक का कुछ अंश

मेरी इस जिज्ञासा के समाधान में पिताश्री ने कहा मनुष्य की जितनी भी अवस्थाएं हैं उनमें "योग" सर्वोच्च अवस्था है। वह अवस्था अति दुर्लभ हैं। जिसे प्राप्त करने के लिए देवगण भी लालायित रहते हैं। वास्तव में योग ऐसी अवस्था है जिसे प्राप्त कर मनुष्य असम्भव से असम्भव कार्य कर सकने में समर्थ होता हैं। एक परम उच्च अवस्था प्राप्त सिद्ध योगी के लिए कुछ भी सम्भव नहीं हैं। क्योंकि वह ईश्वर से अभिन्न होता है। जैसे ईश्वर की शक्ति माया है, उसी प्रकार एक सिद्ध योगी की भी अपनी शक्ति होती है और वह उसी शक्ति का आश्रय लेकर असम्भव का सम्भव करता है। जो जितना ईश्वर का आदर्श प्राप्त करने में समर्थ है, वह उतना ही बड़ा योगी है। साधक और योगी में क्या अन्तर है?
इस प्रश्न के उत्तर में पिताश्री ने कहा जब तक वह माया को नियन्त्रित नहीं कर पाता तब तक साधक है। माया को नियन्त्रित कर उस पर अधिकार प्राप्त कर लेने के पश्चात् वह योगी है। इसी को वीर भाव और दिव्य भाव कहते हैं। साधक वीर भावापन्न है जबकि योगी हैं दिव्य भवापन्न |
इस प्रकार जब कभी मुझे अवसर उपलब्ध होता है मैं अपनी योग संबंधी कौतूहलों, जिज्ञासाओं और प्रश्नों को निस्संकोच पिताश्री के सम्मुख रख देता, और वे बड़ो ही सहज भाव से इनका निराकरण और समाधान कर देते। यहां यह भी बतला देना आवश्यक न होगा कि अपनी संस्कारजन्य आध्यात्मिक लालसा के वशीभूत होकर बाल्यावस्था में ही कई बार पिताश्री के साथ कठिन और दुर्गम यात्रायें की हैं पर्वतीय और वन प्रदेश की मैंने।
हम उन दिनों कलिम्पांग में रहे। एक दिन सहसा पिताश्री ने मुझसे कहा - तुम कुंग फू सीखो। बड़ी अच्छी कला हैं। सफलता मिलेगी तुमको। इसके गर्भ में योग-दर्शन का बहुत बड़ा गम्भीर रहस्य छिपा हुआ है।


कुंग फू क्या है? मेरे इस प्रश्न के उत्तर में पिताश्री ने बतलाया कि चीन और जापान ने मिलकर लाओत्से के सिद्धान्त के आधार पर कई प्रकार की युद्ध कलाओं को विकसित किया, उन्हीं कलाओं में एक कला है कुंग फू भी। उन दोनों देशों की युद्ध कला का यही रहस्य है कि प्रतिरोध मत करो। कुंग फू यही है। वह कहता है कि प्रतिरोध मत करो। झुक जाओ। कोई तुमको अपनी पूरी शक्ति से मारे तो तुम उस मार की चोट से अपनी रक्षा की चेष्टा मत करो उस आघात को, यानी उस चोट को आत्मसात कर लो। स्वीकार कर लो। तब तुम देखोगे कि जिसने तुमको मारा है वह कराह रहा है दर्द से।
कुंग फू की कला कहती है कि यदि तुम प्रतिरोध मत करो तो तुम सदैव विजयी रहोगे। इसलिए जो लोग इस कला के मर्मज्ञ हैं, उनसे कोई पहलवानी करे तो वह निश्चय ही पराजित हो जायेगा। अपना हाथ-पैर भी तुड़वा लेगा। लेकिन कुंग फू जानने वाला व्यक्ति इसके ठीक विपरीत पहलवान द्वारा किये गये प्रहार को यानी आघात को पी जायेगा, स्वीकार कर लेगा और आत्मसात कर लेगा हँसकर उसकी अपनी शक्ति जरा सा भी नष्ट न होगी, बल्कि और बढ़ जायेगी।
इस संबंध में तुमको और कुछ समझाना पड़ेगा, तभी इस कला के मर्म में प्रवेश कर सकोगे। कुंग फू की गहरी कला यह है जब कोई तुमको मारता है तो तुम उसे शान्ति से स्वीकार कर लो। किसी भी प्रकार का विरोध मत करो। इससे एक लाभ यह होगा कि मारने वाले की सारी ऊर्जा तुमको अपनी आप उपलब्ध हो जायेगी। उसके मारने में जितनी शक्ति व्यय हुई उतनी शक्ति तुम्हारे शरीर में रूपान्तरित हो जायेगी अपने आप मारने वाला थक कर गिर जायेगा। अपने में शिथिलता का अनुभव करेगा बाद में।
वास्तव में कुंग फू एक कला है युद्ध की। यह युद्ध कला ऐसी है कि इसमें शक्ति की कोई आवश्यकता ही नहीं है। यही इसकी विशेषता है। एक साधारण सा बालक भी बड़े से बड़े पहलवान से लड़कर उसे पराजित कर सकता है। इस कला में शक्ति का प्रश्न नहीं है, प्रश्न है झुकने का स्वीकार करने का और आत्मसात करने का प्रतिरोध नहीं करना है। यदि प्रतिरोध करोगे तो पराजय निश्चित है। यह कला तो तुमको झुकना सिखायेगी। झुकने में सुरक्षा निहित है।


तुमको यह बात ठीक से समझ लेना चाहिए कि ऊपर उठने की कामना और इच्छा नीचे गिरे होने का प्रबल प्रमाण है। जो कभी नहीं नीचे गिरा है, वह कभी भी ऊपर उठने की कामना या इच्छा नहीं करेगा। जो स्वयं आश्वस्त हैं वह किसी को भी आश्वासन नहीं देगा जिसको स्वयं अपने आप पर पूर्ण विश्वास है वह अन्य किसी को पराजित करने की इच्छा कभी नहीं करेगा। किसी को वह अपना प्रतिद्वन्दी नहीं समझेगा मनुष्य संघर्ष करता हैं कुछ प्राप्त करने के लिए, और कुछ सिद्ध करने के लिए लोग लड़ते क्यों है? युद्ध क्यों करते हैं? इसलिए कि वे अपने आपको कुछ सिद्ध करना चाहते है। ऐसे लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि वह स्वयं कुछ नहीं हैं, लेकिन कुछ होना चाहते हैं और यही कुछ होने का भाव उन्हें युद्ध के लिए प्रेरित करता हैं।
इसी प्रसंग में मैं एक और महत्वपूर्ण बिन्दु पर विचार करूंगा। छोटे बालक प्राय: गिरते रहते हैं, लेकिन उनको चोट नहीं लगती। वे गिरते हैं और फिर उठकर खेलने लग जाते है। इसका क्या रहस्य है? वास्तव में बालकों को पता नहीं होता कि वे गिर रहे है। वे झुक जाते हैं। वे गिरने के लिए स्वयं तैयार हो जाते है। कोई व्यक्ति गिरता है तो होश में गिरता है। वह अपने गिरने का विरोध करता है कि वह न गिरे। लेकिन पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण तीव्रता से उसे अपनी ओर खींचता है और इसी खींचातानी में व्यक्ति को चोट लग जाती हैं। यदि व्यक्ति गिरते समय विरोध न करें तो पहले उसे चोट नहीं लगेगी, यदि लगेगी भी तो साधारण-सी लगेगी। बालक को गिरते समय यह पता ही नहीं होता कि वह गिर रहा है। बस वह झुक जाता हैं इसलिए उसे चोट नहीं लगती समझे न। योगी-साधक और सन्त-महात्मा इसी को पूर्ण चैतन्य अवस्था में करते है जिसे बालक अनजाने में करते हैं। योगी और बालक में बस यही अन्तर है।


तुमको ज्ञात होना चाहिए कि जीवन के आधार के कई ऐसे गहन सूत्र हैं यदि उन पर हम विचार न करे तो हम कितना ही उनको सिद्धान्तो की तरह स्वीकार कर लें हम ठीक उनके विपरीत व्यवहार बराबर करते चले जाते हैं। सुरक्षा का अर्थ है झुक जाना। लेकिन यह कार्य है अति कठिन। एक क्रोध को ही लो। क्रोध न करना बहुत कठिन प्रतीक होता हैं। यदि विजय प्राप्त करना होता हैं तो पराजित हो जाओं सम्मान प्राप्त करना है तो सम्मान प्राप्त करने की इच्छा ही मत करो। सारांश यह कि जीवन के सभी सूत्र विपरीत हैं। यदि हम उन्हें अच्छी तरह से समझ ले तो जीवन नर्क न बन कर स्वर्ग बन जायेगा। कहने की आवश्यकता नही मैंने उसी समय से कुंग फू का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया। जो आगे चल कर मेरे लिए वरदान सिद्ध हुआ। जहाँ तक मेरी धारणा है शुरू से ही पिताश्री के जीवन में दो प्रकार की साधना की धारा प्रवाहित रही है पहली आध्यात्मिक साधना की धारा और दूसरी साहित्य साधना की धारा पहली धारा सदैव गुप्त और प्रच्छन्न रही हैं। अपनी साधना के विषय में वे कभी किसी को स्पष्ट रूप से कुछ नहीं बतलाते। अब रही दूसरी धारा की बात उनकी साहित्य साधना और उस साधना की गम्भीरता से भला कौन परिचित नहीं है। पिछले पांच दशक की कालावधि में उन्होंने जो लिखा और जिन विषयों पर लिखा, वह निश्चत ही भारत की अमूल्य आध्यात्मिक सम्पत्ति मानी जायेगी, इसमें सन्देह नहीं। आप ही ऐसे प्रथम व्यक्ति हैं जिन्होनें योग तंत्र के गूढ़ गोपनीय रहस्यों को कथा शैली के रूप में प्रस्तुत करने की एक नयी परम्परा स्थापित की जो हिन्दी साहित्य जगत में देन समझी जायेगी।


एक मौलिक एक बार पिताश्री गम्भीर रूप से अस्वस्थ हुए। जीवन दीप बुझता सा प्रतीत हुआ। मैं उनके अत्यन्त निकट रहा हूँ, सम्भवतः इसीलिए मुझे अपने निकट बुला कर मन्द स्वर में बोले- मुझे मृत्यु का भय नहीं कई बार अनुभव कर चुका हूँ मैं मृत्यु का जीने की लालसा भी अब समाप्त हो चुकी है। यदि कोई लालसा और कोई कामना है तो बस यही कि जो कुछ सोचा था लिखने के लिए उसे पूर्ण कर देता। सच पूछो तो अभी लिखा ही क्या है मैंने बस थोड़ा और समय दे देती महामाया तो यह अन्तिम कामना भी पूर्ण हो जाती मेरी।
सम्भवतः महामाया ने पिताश्री की याचना सुन ली और स्वस्थ हो गये। उनके स्वस्थ होने के पश्चात मेरे मन में एक विचार कौंध सा गया। क्यों न उनकी अब तक की प्रकाशित अप्रकाशित रचनाओं, दुर्लभ कृतियों और यत्र-तत्र बिखरी हुई पाण्डुलिपियों को संकलित किया जाय। मैं अकेला था और मेरा कार्य भी यह नहीं था, लेकिन संकलन और संग्रह का कार्य शुरू कर दिया मैंने अपनी कथाओं में घटना के माध्यम से भूत-प्रेत और तंत्र-मंत्र के गूढ़ रहस्यों और गोपनीय तथ्यों को प्रकाश में लाने की चेष्टा की हैं पिताश्री ने अतः सर्वप्रथम मैंने उनकी सारी कथाओं का संकलन किया जिनमें बहुत सी कथाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी थीं। अब उन संकलानों को "कथा-संग्रह" के रूप प्रकाशित करने की योजना बनायी जा रही हैं।


भारतीय संस्कृति और साधना की मूल भित्ति एक मात्र योग और तंत्र है। योग तपश्चर्या है और तंत्र है साधना योग के अट्ठारह है, जिनका प्रतिनिधित्व गीता का अट्ठारह अध्याय करता है, लेकिन एक ऐसा भी 'योग' है, जो सर्वोपरि और अपने आपमें स्वतंत्र है और वह 'योग' है 'कुण्डलिनी योग' । कुण्डलिनी योग में सभी अट्ठारह प्रकार के योगों का समावेश है इसीलिए उसे परम योग और महायोग भी कहते हैं। कुण्डलिनी योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें तंत्र के गुह्य आयामों का सामन्जस्य है और यही कारण है कि कुण्डलिनी योग साधना अपने विकास की ऊँचाइयों में योग के अनेक आयामों को और विभिन्न प्रक्रियाओं को अपने में समाहित कर लेती है। इसलिए इस साधना को सिद्ध योग भी कहते हैं। वास्तव में कुण्डलिनी योग मनुष्य के आन्तरिक रूपान्तरण व जागरण की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। कहने की आवश्यकता नहीं, १६४५ ई० में जब मैंने योग तंत्र पर व्यक्तिगत रूप से शोध एवं अन्वेषण करना चाहा तो गुरूदेव महामहोपाध्याय डॉ० गोपीनाथ जी कविराज के संकेत पर मैंने कुण्डलिनी योग का ही चयन किया। और उसी आधार पर दो महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना भी की कुण्डलिनी शक्ति और मारण पात्र। दोनों ग्रंथ प्रकाशित है।


किसी भी विषय पर शोध और अन्वेषण एक प्रकार से सत्य की खोज और उसकी उपलब्धि है। लेकिन आजकल शोध एवं अनुसंधान विश्वास का परिपन्थी माना जाता है। मगर बात ऐसी है नहीं, शोध एवं अनुसंधान का मतलब है कि जो जैसा दिखाई दे रहा है उसे वैसा ही नहीं मान लेना चाहिए। संसार की वास्तविकता को उसकी गहरायी में जाकर खोजने की आवश्यकता है, जो कुछ जैसा दीख रहा है, उसका वही स्वरूप नहीं भी हो सकता है। प्रत्येक वस्तु को तर्क की कसौटी पर कस कर देख लेना आवश्यक है। वास्तविक शोध एवं अनुसंधान की चपेट में न धर्म बच सकता है न आत्मा, न ईश्वर न योग और न तो भक्ति। धर्म और उसके विभिन्न अंगों के रहस्य को वही जानता है और उसके वास्तविक स्वरूप से वही परिचित होता है, जो तर्क और जिज्ञासा का आश्रय लेकर अनुसंधान करता है। कहने की आवश्यकता नहीं, मेरे शोध और अनुसंधान के समस्त विषय शुरू से लेकर अन्त तक पुष्ट तर्कों और पुष्ट-जिज्ञासाओं पर ही आधारित रहे हैं, इसमें सन्देह नहीं। यहाँ यह भी कहना अप्रासंगिक न होगा कि १६४५ से १६७५ यानी पूरे तीस वर्षों के अपने शोध एवं अनुसंधान काल में जहां मैंने प्रच्छन्न और अप्रच्छन्न भाव से संचरण विचरण करने वाले तथा गुप्त रूप से निवास करने वाले उच्च कोटि के योगियों, साधको और सन्त महात्माओं की खोज में पूरे भारत का जहां भ्रमण किया वहीं हिमालय के दुर्गम स्थानों के अतिरिक्त योगी और तांत्रिकों के रहस्यमय देश तिब्बत की भी जीवन मरणदायिनी हिम यात्रा की मैंने इस सिलसिले में मेरे जीवन में ऐसी-ऐसी विलक्षण और चमत्कार पूर्ण घटनाएं घटी और ऐसे-ऐसे अलौकिक और रहस्यमय अनुभव हुए मुझे, जिन पर सहसा कोई विश्वास न कर सकेगा इस युग में कभी-कभी तो मैं स्वयं सोचने लगता हूँ कि क्या वे तमाम विलक्षण और चमत्कारपूर्ण घटनाएं मेरे ही जीवन में घटी थी? क्या वे सारे अलौकिक और रहस्यमय अनुभव मुझे ही हुए थे। सब कुछ सपना, सपना सा लगता है अब "अस्तु"।

कहने की आवश्यकता नहीं तीसरा नेत्र उसी का परिणाम है, जिसमें प्रासंगिक रूप से उपदिष्ट हुए योग तांत्रिक विषयों का लाभ सुविज्ञ पाठकों को तो होगा ही इसके अतिरिक्त उनसे संबंधित मेरे जीवन में घटी अलौकिक घटनाओं और रहस्यमय अनुभवों की चमत्कारपूर्ण कथा भी उन्हें पढ़ने को उपलब्ध होगी। आशा है तीसरा नेत्र आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए ज्ञान वर्धक और उपादेय सिद्ध होगा, इसमें सन्देह नहीं।


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