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शर्ट का तीसरा बटन | Shirt Ka Teesra Button Book PDF Download Free : Hindi Novels by Manav Kaul

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥शर्ट का तीसरा बटन । Shirt Ka Teesra Button
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 53 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖359
Last UpdatedJuly 24, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category

मैं अपने घर में थी जब मैंने ‘अपराध और दंड’ पढ़ी थी और घर छोड़ते ही मैंने ‘चित्रलेखा’ पढ़ना शुरू किया था। बहुत कोशिश के बाद भी मैं ‘अपराध और दंड’ को छोड़ नहीं पाई। मैंने उसे अपने बैग में रख लिया। बीच-बीच में ‘चित्रलेखा’ पढ़ते हुए मैं ‘अपराध और दंड’ के कुछ हिस्सों को टटोलने लगती। और तब कुछ अलग पढ़ने का मन करता, और लगता कि काश अगर चित्रलेखा एक ख़त रस्कोलनिकोव को लिख दे तो मैं इस वक़्त उस ख़त को पढ़ना चाहूँगी। मैं उस पुल पर देर तक टहलना चाहती थी जिससे ये दो अलग दुनिया जुड़ सकती थीं। (उपन्यास की भूमिका से)

 

पुस्तक का कुछ अंश

भूमिका
ऐसा कहते हैं कि एक लड़का हुआ करता था जिसका नाम अतीत था। वो जब ट्रेन में बैठकर, बहुत पहले छूट चुके, अपने घर की तरफ़ जा रहा था तो उसका बार-बार सो जाने का जी कर रहा था। वो आँखें बंद करता और उसे लगता कि वो एक खाई के किनारे खड़ा है। कुछ ही देर में उस खाई में गिर जाने की इच्छा-सा स्वाद उसके मुँह में आता, उसके होंठों के बग़ल से लार टपकने लगती। वो तुरंत अपनी आँखें खोल लेता।
ट्रेन किसी छोटे स्टेशन पर रुकी हुई थी। उसके सामने जो बूढ़े सज्जन बैठे थे वो जा चुके थे। नए यात्रियों के आने का शोर चारों तरफ़ था। उसने फिर अपनी आँखें बंद कर ली। इस बार लार टपकने के ठीक पहले, अपने मुँह पर हाथ फेरते हुए उसने अपनी आँखें खोली।
वो खिड़की वाली सीट पर बैठा था और सामने वाली खिड़की पर उसे एक लड़की बैठी दिखी जो किताब पढ़ रही थी। उसके बग़ल में एक हरे रंग का बैग रखा हुआ था जिसमें से एक मोटी किताब झाँक रही थी। उसकी इच्छा उस किताब को देखने की हुई जिसे वो लड़की इस वक्त पढ़ रही थी। उसने थोड़ा आगे बढ़कर देखने की कोशिश की, पर किताब लड़की ने अपनी गोद में रखी हुई थी और अक्षर बहुत छोटे थे इस वजह से वो पढ़ नहीं पाया। जो मोटी किताब उसके बैग में रखी हुई थी वो दोस्तोयेवस्की का उपन्यास ‘अपराध और दंड (क्राइम एंड पनिशमेंट’) थी।
पुल पार हो चुका था। ट्रेन की धड़धड़ाहट शांत हो गई थी। वो सोचने लगा कि उसे कितने कम लोग आजकल किताब हाथ में लिए हुए दिखते हैं, उसने स्वयं कब से कोई किताब नहीं पढ़ी। एक वक्त था जब उसके हाथों में किताब नहीं होती थी तो वो नंगा महसूस करता था। उसकी इच्छा हुई कि वो उस लड़की से बैग में रखी उसकी किताब माँगकर उसे सूँघ ले। या वो ‘अपराध और दंड’ के अपने सबसे पसंदीदा हिस्सों को एक बार फिर से पढ़े। बहुत पहले छूट चुके जिस घर की तरफ़ वो जा रहा था ये उपन्यास उसने वहीं पढ़ा था, और उस वक़्त उसे लगता था कि असल में वो ही रस्कोलनिकोव है। तभी सामने की सीट पर बैठी लड़की ने, अपनी गोद में रखे उपन्यास को थोड़ा ऊपर उठाया और उसे उस उपन्यास का शीर्षक नज़र आया। अनायास ही उसके मुँह से ‘चित्रलेखा’ निकला।
“जी?” लड़की की आँखें किताब से निकलकर उसकी तरफ़ मुख़ातिब हुईं। जिस तरह लड़की ने ‘जी’ कहा, अतीत को लगा था मानो उस लड़की का नाम चित्रलेखा है।
“आप ‘चित्रलेखा’ पढ़ रही हैं?” बेहद शर्मिंदा होते हुए अतीत ने पूछा।
“जी।”
“किस हिस्से पर हैं आप?”
“आपने पढ़ा है ये उपन्यास?” लड़की ने पूछा।
“जी।”
“इस वक़्त चित्रलेखा बहस कर रही है और पूरा दरबार उसे सुन रहा है।”
“ये मेरा सबसे पसंदीदा हिस्सा है उपन्यास का।”
लड़की वापस किताब पढ़ने लगी। वो पूछना चाहता था कि क्या उसने ‘अपराध और दंड’ पढ़ लिया है। क्या वो उस किताब में ख़ुद का बीता हुआ वापस तलाश सकता है। लेकिन किताब पढ़ती हुई वो लड़की इतनी ख़ूबसूरत लग रही थी कि वो इस चित्र को अपनी फूहड़ बातों से बिगाड़ना नहीं चाहता था।
कुछ देर में वो ट्रेन के दरवाज़े पर जाकर खड़ा हो गया। ट्रेन की यात्राओं में ये जगह उसके लिए हमेशा ख़ास रहती आई थी। यहाँ खड़े हुए उसे लगता कि वो जीवन में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और दुनिया पीछे छूटती जा रही है। पर अब वो जिस उम्र में था, पीछे छूटी चीज़ों का पहाड़ इतना बड़ा होता जा रहा था कि सूरज की रोशनी उस पहाड़ के पीछे छुपी रहती थी। भविष्य उसे सामने दिखता, पर वो पहाड़ की छाया तले होता। भविष्य को सूरज की रोशनी की ज़रूरत थी, पर सूरज अतीत के पहाड़ के पीछे छिपा रहता। क्या बढ़ती उम्र के साथ हर आदमी का नाम अतीत हो जाता है!
“क्या आपके पास सिगरेट होगी?”
पीछे आवाज़ आई, वो पलटा तो देखा चित्रलेखा खड़ी थी।
“आपको कैसे पता मैं सिगरेट पीता हूँ?” अतीत ने पूछा।
“मैं ट्रेन के दरवाज़ों पर खड़े रहने वाले लड़कों को पहचानती हूँ।”
उसने इस जवाब की उम्मीद नहीं की थी। उसने चित्रलेखा के यहाँ आने की उम्मीद भी नहीं की थी। उसकी उम्मीदें होने वाली घटनाओं से कम ही रहती थीं। उसने अपनी जेब से निकालकर सिगरेट दे दी।
“अरे इसमें तो एक ही सिगरेट है!”
“जी, मैं सिगरेट छोड़ चुका हूँ। इस एक सिगरेट को तसल्ली के लिए पास रखता हूँ।”
सिगरेट जलाते ही वो दरवाज़े पर खड़ी हो गई और अतीत उससे थोड़ा पीछे खड़ा हो गया। उसने दो लंबे कश लिए। जिस दिशा में ट्रेन जा रही थी वो उस दिशा में देखने लगी। उसके बाल हवा में उड़ रहे थे, आँखें बार-बार बंद हो रही थीं। अतीत जब दरवाज़े पर खड़ा था तो वो दूसरी तरफ़ देख रहा था, पीछे छूटते जा रहे दृश्य को।
उसकी सिगरेट ख़त्म हो चुकी थी।
“जब मैं दरवाज़े पर खड़ा था तो मैं रस्कोलनिकोव के बारे में सोच रहा था।” अतीत ने कहा।
“अच्छा! और मैं चित्रलेखा के बारे में सोच रही हूँ।”
उसने एक बार अतीत को पलटकर देखा। अतीत को लगा कि सच में चित्रलेखा ने अपने उपन्यास से झाँककर उसे देखा। रस्कोलनिकोव के साथ-साथ वो अपने अतीत में कूद जाने के बारे में भी सोच रहा था, ये उसने चित्रलेखा को नहीं बताया। फिर उसे लगा कि वो अगले स्टेशन पर उतर जाएगा और मन में ये टीस रह जाएगी कि उसे चित्रलेखा मिली थी और उसने उससे भी आधा सच ही कहा।
चित्रलेखा दरवाज़े पर बैठ गई और अतीत को इशारे से उसके बग़ल में बैठने के लिए कहा। अतीत उसके बग़ल में बैठ गया।
“सामने देखते हुए ऐसा लगता है जैसे किसी ने जीवन का फ़ास्ट फ़ॉर्वर्ड बटन दबा दिया है। सारा जिया हुआ हमारे सामने से भागता हुआ निकलता जा रहा है और हम किसी भी चीज़ को छू नहीं पा रहे हैं।” अतीत ने कहा।
जब कुछ देर तक चित्रलेखा ने कुछ भी नहीं कहा तो उसे शक होने लगा कि उसने ये कहा था या महज़ सोचा था।
“और मुझे लगता है कि सारा दिलचस्प भागता हुआ हमारी तरफ़ आ रहा है और हम वहीं रुकेंगे जिसे हम जीना चाहते हैं, जिसके लिए हम अपने घर से निकले थे।” चित्रलेखा ने कहा।
“हम किस तरफ़ देख रहे हैं ये बात इस पर निर्भर करती है।” अतीत ने कहा।
“शायद तुम इसलिए ऐसा सोच रहे हो क्योंकि मैंने तुम्हारी तसल्ली छीन ली है।”
“मतलब?”
“तुम्हारी तसल्ली की एक सिगरेट जो पी चुकी हूँ।”
अतीत हँसने लगा।
“मैं ख़ुद को रस्कोलनिकोव मानता था। ऐसा सोचना उसी वक़्त से चिपका हुआ है मेरे साथ।”
तभी एक चिड़िया ने सामने दिख रहे खेतों से उड़ान भरी और वो ट्रेन के साथ-साथ उड़ने लगी। कितनी देर वो इस ट्रेन के साथ उड़ सकती थी! वो दोनों थोड़ी देर तक तो उस चिड़िया का तेज़ी से उड़ना निहारते रहे फिर उन्हें उस चिड़िया का उड़ना त्रासदी-सा लगने लगा। वो अपनी क्षमता के बाहर जाकर पूरी ताक़त से उड़ रही थी। धीरे-धीरे ट्रेन आगे बढ़ती जा रही थी और वो चिड़िया पीछे छूटती जा रही थी। अतीत उठकर खड़ा हो गया। वो उस चिड़िया को आख़िर तक देखते रहना चाहता था। वो यह देखना चाहता था कि चिड़िया कब हारकर उड़ना त्यागती है। कुछ देर में चित्रलेखा भी खड़ी हो गई और उसने अपना हाथ अतीत की आँखों पर रख दिया। अतीत ने उसे रोका नहीं।
“मैं अपने घर में थी जब मैंने ‘अपराध और दंड’ पढ़ी थी और घर छोड़ते ही मैंने ‘चित्रलेखा’ पढ़ना शुरू किया था। बहुत कोशिश के बाद भी मैं ‘अपराध और दंड’ को छोड़ नहीं पाई। मैंने उसे अपने बैग में रख लिया। बीच-बीच में ‘चित्रलेखा’ पढ़ते हुए मैं ‘अपराध और दंड’ के कुछ हिस्सों को टटोलने लगती। और तब कुछ अलग पढ़ने का मन करता, और लगता कि काश अगर चित्रलेखा एक ख़त रस्कोलनिकोव को लिख दे तो मैं इस वक़्त उस ख़त को पढ़ना चाहूँगी। मैं उस पुल पर देर तक टहलना चाहती थी जिससे ये दो अलग दुनिया जुड़ सकती थीं।”
चित्रलेखा पीछे की तरफ़ खड़ी थी और अतीत दरवाज़े पर खड़ा होकर उसे सुन रहा था।
“क्या चित्रलेखा के ख़त का जवाब रस्कोलनिकोव देता?”
“बात पुल की कल्पना की है। एक बार पुल तैयार हो गया तो आवाजाही तो बनी रहेगी।”
“‘अपराध और दंड’ पढ़ने के बाद मैं बहुत वक़्त तक एक त्रासदी का इंतज़ार करता रहा। एक उम्र होती है जिसमें लगता है कि कोई बहुत बड़ी त्रासदी घटेगी और तब मैं जीवन जीना शुरू करूँगा। उस बड़ी त्रासदी के पहले का जीवन उसकी प्रतीक्षा में घिसट रहा होता है। बड़ी त्रासदियाँ घटती नहीं हैं, और हम छोटी त्रासदियों को, जो हमारे अग़ल-बग़ल में घट रही होती हैं, इतना तुच्छ मानते हैं कि हमें लगता है इनसे जूझना हमें एक साधारण इंसान बना देगा। फिर एक उम्र आती है जब बड़ी त्रासदी का इंतज़ार दम तोड़ चुका होता है और हमें वो सारी छोटी त्रासदियाँ याद आती हैं। हम हमेशा से कितने साधारण थे! तब आप तेज़ रफ़्तार से उन छोटी त्रासदियों को वापस बटोरने की असफल कोशिश में निकल पड़ते हो।”
ट्रेन तेज़ रफ़्तार से अतीत के बहुत पहले छूट चुके घर की तरफ़ बढ़ रही थी। सामने सतपुड़ा के घने जंगलों का विस्तार था।
“क्या तुम अभी पुल पर हो?” चित्रलेखा ने पूछा।
“पुल आने वाला है।” अतीत ने जवाब दिया।
“अगर रस्कोलनिकोव चित्रलेखा को ख़त लिखता तो वो कुछ ऐसा ही सुनाई देता।”
अतीत ने पलटकर चित्रलेखा को देखा। उसे चित्रलेखा के बजाय एक त्रासदी नज़र आई। छोटी त्रासदी जिसे वो बटोरने से कतराता रहा था।
“मेरा गाँव आने वाला है।” अतीत ने उससे कहा और पलटकर बाहर की तरफ़ देखने लगा। चित्रलेखा दरवाज़े के क़रीब आकर खड़ी हो गई थी।
“ठीक इस वक़्त तुम क्या चाहते हो?” चित्रलेखा ने पूछा।
“त्रासदी!” वो फुसफुसाया।
“कैसी त्रासदी?” चित्रलेखा ने उसकी शर्ट को पकड़ते हुए सवाल किया।
अतीत को उसके गाँव की सरहद दिखने लगी थी। ट्रेन घूम रही थी और अब कुछ ही देर में पुल पर चढ़ने वाली थी। अतीत ने चित्रलेखा को देखा और चित्रलेखा उसकी शर्ट छोड़कर कुछ क़दम पीछे हट गई।
पुल पर पहुँचते ही ट्रेन की रफ़्तार तेज़ हो गई थी। नीचे नदी अपने उफान पर बह रही थी। अतीत ने ट्रेन के दरवाज़े पर खड़े होकर दोनों हाथ अपनी जेब में डाल लिए थे और पलटकर चित्रलेखा को देखने लगा था। चित्रलेखा ने उसे धक्का दिया। एक थड़ की आवाज़ आई। चित्रलेखा ने दरवाज़े से बाहर झाँका, पर उसे अतीत कहीं नज़र नहीं आया।
ट्रेन पुल पार करके वर्तमान में दाख़िल हो गई थी।
सुनहरी पीली-सी रोशनी पूरे गाँव पर पड़ रही थी। तेज़ हवा में बरगद और पीपल के पत्ते खेलते हुए नज़र आ रहे थे। उनके खेलने में पत्तों से हँसी की ध्वनि फूट रही थी। मैं बेहद ख़ुश था, बिना किसी कारण के। जब भी मुझे बहुत ख़ुशी होती, ख़ासकर बिना कारण, तो इच्छा जागती कि कैसे इस ख़ुशी को बरक़रार रखा जाए। ऐसे में मैं भागकर नदी किनारे चला जाता। पर नदी किनारे ख़ुशी कभी रुकती नहीं थी। नदी अपने साथ हर चीज़ बहा ले जाती थी। मैं बग़ैर किसी कारण के बेहद ख़ुश था और लगा कि इस ख़ुशी को मैं अपने दोस्तों को बता दूँ तो शायद वो उनके होने में बरक़रार रहे। पर क्या कहूँगा कि मैं बहुत ख़ुश हूँ, पर मेरे पास इसका कोई कारण नहीं है? मेरे पास महज़ एक बेहद ख़ूबसूरत शाम के चित्र थे, ख़ुशबू थी, पत्तों की किलकारियाँ थीं। इन्हें कैसे बयान किया जाता था, मुझे पता नहीं था।
इच्छा हुई कि स्कूल जाकर अपनी छठी क्लास की डेस्क में इस ख़ुशी को छुपा दूँ, जहाँ मैं बाक़ी छोटी चीज़ें छुपाया करता था। जब भी इच्छा होगी, इस ख़ुशी को निकालकर इससे थोड़ा खेल लिया करूँगा। पर अगर मुझे इस ख़ुशी की ज़रूरत रात में पड़ी तब? स्कूल तो बंद होंगे। मैं ख़ुद को गाँव की गलियों में दौड़ता हुआ देख सकता था। पर मुझे अपने गाँव में कहीं भी वो जगह नहीं दिख रही थी, जहाँ मैं इस बेवजह की ख़ुशी को सँभालकर रख सकता। मैंने देखा, शाम कुछ ही क्षणों में गहरी रात में तब्दील होने लगी। मैं गाँव की गलियों से निकलकर अपने घर की तरफ़ भागने लगा। जैसे ही मैं अपने घर की गली में घुसने लगा तो पलटकर देखा, दुख की गहरी परछाई मेरे पीछे भाग रही है। मैंने उस बेवजह की ख़ुशी को अपनी शर्ट की जेब में डाला और अपने घर की तरफ़ भागने की गति बढ़ा दी। मैंने अपने घर के बरामदे की सीढ़ियों पर पैर रखा, पर मैं आगे नहीं बढ़ पा रहा था। मैं बार-बार पीछे दुख की परछाई को अपनी तरफ़ बढ़ता हुआ देख रहा था और भागे जा रहा था, पर मैं अपने घर के दरवाज़े को छू नहीं पा रहा था। तभी दुख की परछाई के लंबे हाथ मेरी तरफ़ बढ़े और उन्होंने मुझे झँझोड़ दिया। मेरी बेवजह की ख़ुशी मेरी शर्ट की जेब से छलककर टूट गई।
मैं अपनी बेवजह की ख़ुशी को अपने घर लाने की कोशिश कर ही रहा था कि मुझे, बहुत सुबह, किसी ने झँझोड़कर उठा दिया। मेरी आँखें जल रही थीं। मैं आधी नींद में बरामदे में बैठा हुआ था। मैंने देखा, गली के दूसरी तरफ़ चोटी और राधे, मेरे पक्के दोस्त, मुझे घूर रहे थे। वो वहाँ क्यों खड़े हैं? और मुझे घूर क्यों रहे हैं? मैं कहाँ हूँ? यह क्या हो रहा है? मेरे घर में इतने सारे लोग क्यों घूम रहे हैं? क्या मैं अभी भी सो रहा हूँ?
चोटी ने दूर से हाथ हिलाया पर राधे ने उसे रोक दिया। तभी भीतर से रोने की आवाज़ें आने लगीं। सारी आवाज़ों के ऊपर माँ की आवाज़ थी। मेरी इच्छा हुई कि मैं अपने कानों पर हाथ रख दूँ, पर मैं ऐसा कर नहीं सकता था। मैं माँ के पास जाना चाहता था, पर भीतर उन्हें इतनी औरतों ने इस वक़्त घेरा हुआ था कि उन तक पहुँचना असंभव था। मैं चोटी को देखकर मुस्कुराने वाला ही था कि मुझे याद आया कि मुझे तो असल में दुखी दिखना है। मैं अपना सिर नीचे करके दुख महसूस करने लगा। मैंने रात का अपना सपना भी याद किया जिसमें दुख की परछाई मेरा पीछा कर रही थी और मैं घर नहीं पहुँच पा रहा था। बहुत कोशिशों के बाद भी मैं उस तीव्रता से दुख महसूस नहीं कर पा रहा था कि वो दिखने लगे। दुखी कैसे दिखा जाता है?
आज बहुत सुबह माताजी (मेरी नानी) नहीं रही थीं। राधे के दादा की जब मृत्यु हुई थी तो वो फूट-फूटकर रोया था। हमारे सारे दोस्तों में उसकी इज़्ज़त बहुत बढ़ गई थी। मैं जानता था कि दुख दोस्तों को क़रीब ले आता है, अगर क़रीब नहीं भी लाता तो भी दुखी रहते वक़्त आपकी इज़्ज़त दोस्तों के बीच काफ़ी बढ़ जाती है। मैं इज़्ज़त के मामले में अपने दोस्तों के बीच आख़ि‍री पायदान पर पड़ा हुआ था। मुझे इज़्ज़त की बहुत ज़रूरत थी। मैंने अपनी आँखों को बहुत तेज़ी से दबाया ताकि उनमें कहीं पानी भर जाए, कम-से-कम किनारे से ही कहीं झाँकता हुआ थोड़ा दिख जाए, पर सब कुछ सूखा ही पड़ा रहा। मेरी आँखें इस वक़्त अपनी नींद पूरी करने की गुहार लगा रही थीं, उन्हें आँसुओं में कोई दिलचस्पी नहीं थी। माँ के विलाप में उनके आस-पास बैठी सारी औरतों ने अपने रोने की आवाज़ मिला ली थी। बाहर आते-आते वो आवाज़ें संगीत-सी सुनाई दे रही थीं। मैं डर गया, कहीं मैं रोने के बजाय हँसने न लगूँ। मैं बाहर घूम रहे पुरुषों को देखने लगा, जो मृत्यु बाद की कार्यवाही में ऐसे तेज़-तेज़ चल रहे थे, मानो वो इस दिन का इंतज़ार सालों से कर रहे थे। मेरे करने के लिए कुछ भी नहीं था, पर हर गुज़रता आदमी मुझे एक घड़ी देखता, रुकता और कुछ सोचकर आगे बढ़ जाता। ठीक वक़्त पर रो देना एक कला है और किसी भी तरह की कला से मेरा रिश्ता कभी अच्छा नहीं था। क्योंकि मैं रो नहीं रहा था इसलिए किसी भी व्यक्ति की मुझमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। मैं अपनी हँसी से बचने के लिए चोटी और राधे के पास चला गया।
“वो दाढ़ी वाला आदमी कौन है?” चोटी ने पूछा।
“माँ के भाई हैं, टार्ज़न।” मैंने कहा।
यह कहने में मैं भूल गया था कि मुझे अपनी आवाज़ में दुख बनाए रखना था।
“टार्ज़न!” चोटी की हँसी निकल गई। जिस पर राधे ने उसे एक चपत लगा दी। उसकी हँसी में मैं भी शामिल होना चाहता था, पर राधे की वजह से मैं भी चोटी को घूरकर देखने लगा।
“बस एक ही भाई हैं?” इस बार राधे ने पूछा। मैंने हाँ में सिर हिला दिया।
“तेरी आँखें सूजी हुई क्यों हैं?” चोटी ने पूछा।
“रोया होगा बहुत।” राधे ने चोटी की बात का जवाब दिया। मैंने धीरे से कहा, “मैं बाथरूम में जाकर रो लिया था। सबके सामने रोना मुझे छिछला लगता है।”
दोनों ने ‘हम्म’ कहा। मैं अपनी गर्दन खुजाने लगा। मैं जब भी झूठ बोलता था तो मेरी गर्दन के पीछे के हिस्से में, ठीक बालों के नीचे खुजली होने लगती थी। यह बात सिर्फ़ मेरी माँ को पता थी कि मैं झूठ बोलते ही अपनी गर्दन खुजाने लगता हूँ। तभी चोटी मेरे पास खिसक आया और उसने अपनी कोहनी के इशारे से मुझे कहा कि उधर देख। मैंने देखा, पीछे की तरफ़ दीवार से सटी हुई ग़ज़ल खड़ी हुई है।
ग़ज़ल हमारे स्कूल की बहुत ख़ूबसूरत लड़कियों में से एक थी। उसके लंबे बाल, बड़ी आँखें, सीधा तना हुआ शरीर और उस शरीर के तराशे हुए सारे उभार, हमारे जैसे साधारण दिखने वाले लड़कों को डरा देते थे। ख़ूबसूरती से अजीब क़िस्म का डर था, पर ख़ूबसूरती के अलावा भी कुछ था ग़ज़ल में, एक रहस्य जैसा कुछ जो हमें उसकी तरफ़ आकर्षित करता था, उसके रहस्य के घेरे के क़रीब से मैं कई बार गुज़रा था, पर वो घेरा कुछ भी ज़ाहिर नहीं होने देता था।
मेरी आँखों में राधे ने ग़ज़ल की तरफ़ बढ़ना देखा। उसने मेरे हाथों को कसकर पकड़ लिया।
“मत जा, अपने बस के बाहर की है वो।” राधे ने कहा और चोटी ने हाँ में सिर हिला दिया।
“कोई मुसलमान लड़की मरे में क्यों आएगी? पूछना तो पड़ेगा न?” मैंने कहा।
“जैसे आई है वैसे ही चली जाएगी। वो बहुत ख़ूबसूरत है भाई, उसका कहीं भी जाने का हक़ है।” चोटी ने कहा।
“अपने को क्या करना! अपने को जितनी देर वो देखने को मिल रही है उतना बहुत है।” राधे ने आगे जोड़ा।
“अरे वो इधर ही देख रही है।” चोटी ने कहा और अपनी आँखें नीचे कर ली।
“इधर नहीं, वो तुझे देख रही है।” राधे ने कहा और वो भी इधर-उधर देखने लगा। मैंने चोटी को देखा, उसकी आँखों में आँसू थे। और वो भरी हुई आँखों से ग़ज़ल को देख रहा था। क्यों चोटी सारी कलाओं में पारंगत था? मुझे चोटी से घनघोर जलन महसूस हुई।
“वो तुझे बुला रही है, जा भई, जल्दी जा।” चोटी ने रुआँसी आवाज़ में कहा।
हम सब फुसफुसा रहे थे। मैंने बहुत हल्के क़दमों से उस फुसफुसाहट को पीछे छोड़ा और ग़ज़ल के बग़ल में आकर खड़ा हो गया। मैं उसके रहस्यों के घेरे की परिधि पर खड़ा था।
“कब हुआ?” ग़ज़ल ने पूछा।
“आज सुबह।”
“सुबह?”
“नहीं, शायद देर रात!”
“तुम्हें पता नहीं है?” यह उसने मेरी तरफ़ मुड़कर पूछा।
“क्यों नहीं पता, पता है मुझे, पर प्राण कब निकलते हैं–यह ठीक-ठीक कौन कह सकता है?”
“बहुत दुख हुआ।” उसने कहा।
“मैं बाथरूम में जाकर ख़ूब रोया।” मैंने कहा और वो पलटकर वापस घर की तरफ़ देखने लगी।
मैंने तुरंत रोने वाली बात कह दी। कहीं उसे ये न लगे कि मुझे तो इस वक़्त रोना चाहिए था।
मुझे जब बहुत सुबह झँझोड़कर उठाया गया था तब मैं सीधा बाथरूम में चला गया था। मुँह पर पानी मारते वक़्त कोई पीछे माताजी की मृत्यु की बात कह रहा था और दूर से माँ के रोने की आवाज़ तेज़ होती जा रही थी। मैंने अंदाज़ा लगाया कि शायद वो नहीं रहीं। उनकी मृत्यु का इंतज़ार तो कब से चल रहा था। कुछ हफ़्तों से लोगों का घर में ताँता लगा हुआ था। किचन में कौन खाना बना रहा था? घर में कौन सफ़ाई कर रहा था? इसका मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था। माँ से बात किए हुए भी बहुत वक़्त हो चुका था। एक दिन, देर रात, पुष्पा की बाई, जो बाड़े में माँ की सबसे अच्छी सहेली थे, ने मुझे माँ के पास बिठा दिया और कहा कि ‘यह कुछ खा नहीं रही है, इससे कह कि कुछ तो खा ले, कम-से-कम चाय ही पी ले’, और वह चाय बग़ल में रखकर चली गई। मुझे लगा यह बात तो माँ ने भी सुन ली होगी तो मैं अब क्या कहूँ? मैं माँ के इस बग़ल में चुपचाप बैठा रहा और उनके दूसरे बग़ल में चाय रखी रही। सामने माताजी ज़मीन पर बिना किसी हरकत के लेटी हुई थीं। तभी मैंने आँखें उठाईं तो देखा, दरवाज़े से सटी हुई पुष्पा की बाई मुझे इशारा कर रही थीं कि बोल उन्हें! यूँ माँ और मेरे बीच संबंध बहुत सहज था, पर जब से माताजी की तबीयत बहुत बिगड़ गई थी तब से पता नहीं माँ एक चुप्पी के पिंजरे में जाकर बैठ गई थीं। मैं पिंजरे के बाहर से जब भी उन्हें देखता तो लगता कि ये मेरी माँ जैसी दिखने वाली कोई बेहद चुप महिला है।
“माँ, चाय पी लो।” मैंने बहुत धीरे कहा। इससे कहीं ज़्यादा बुलंद आवाज़ में तो पुष्पा की बाई कह चुकी थी। मैंने गला साफ़ करके फिर कहा। मैं चाहता था कि पुष्पा की बाई भी सुन ले कि मैं कह रहा हूँ माँ से कि चाय पी लो।
“जब तेरी माँ ऐसे पड़ी होगी तो देखती हूँ तू कैसे पी पाता है चाय!”
माँ ने अपने पिंजरे के भीतर से, अपनी गहरी चुप्पी में बने हुए फुँफकारा। मैं सन्न रह गया। वो क्यों पड़ी होंगी ऐसे? मैंने माताजी को देखा। किसी सूख चुके बहुत बूढ़े पेड़ के तने-सी, झुर्रियों से लदी हुईं, बिना हरकत के हम दोनों के सामने पड़ी हुई थीं। मेरी ठीक उसी वक़्त चाय पीने की इच्छा हुई। मुझे चाय चाहिए थी, पर माँ वाली नहीं, दूसरी, शक्कर वाली। गर्म चाय।
“मैं एक बार उन्हें देखना चाहती हूँ।” ग़ज़ल ने कहा।
“किन्हें?” मैंने पूछा।
“माताजी को।”
“तुम मुसलमान हो, तुम अंदर नहीं जा सकती।”
मेरे मुँह से निकल गया। मैं ये कहना नहीं चाह रहा था। मैं ख़ुद को कोसने लगा। इच्छा हुई कि जैसे-तैसे यह वाक्य वापस मेरे भीतर घुस जाए और मैं फिर से कुछ दूसरा कुछ कह सकूँ। दूसरा वाक्य मैं बुदबुदाने ही वाला था कि ग़ज़ल ने पलटकर मेरी तरफ़ देखा।
“मैं समझती हूँ, पर इस वक़्त तुम्हारी माँ हमारे-तुम्हारे धर्म से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हैं।”
“माँ को क्या हुआ है?” मैंने पूछा।
“तुम बताओ।” उसने कहा।
“माँ तो...” मैं नई ग़लती नहीं करना चाहता था तो आधे वाक्य को बाहर गिरने से पहले ही रोक लिया।
ग़ज़ल ने अपना दुपट्टा सिर पर ओढ़ा और भीतर चली गई। मैंने तुरंत चोटी और राधे को देखा, दोनों ने इशारे से पूछा कि क्या हुआ? मैं ग़ज़ल के पीछे जाना चाहता था, पर राधे और चोटी दोनों ही मुझे उनके पास आने का इशारा कर रहे थे। मैंने ग़ज़ल को जाने दिया और राधे और चोटी के पास चला गया।
“क्या कह रही थी?” चोटी ने पूछा।
“पूछ रही थी क्या मैं अंदर जाऊँ?” मैंने हिचकिचाते हुए बोला।
“तूने क्या बोला?” राधे ने पूछा।
“मैंने बोला, बिल्कुल तुम्हें जाना चाहिए।” मैंने कहा।
“फिर?” चोटी ने पूछा।
“वो कहने लगी कि, पर मैं तो मुसलमान हूँ कैसे जा सकती हूँ?”
“तूने क्या जवाब दिया?” चोटी ने फिर पूछा।
“मैंने कहा, मैं समझता हूँ। पर इस वक़्त मेरी माँ, हमारे-तुम्हारे धर्म से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हैं।” मैंने अपनी गर्दन खुजाते हुए कहा।
“भाई क्या मुँहतोड़ जवाब दिया है!” चोटी ने कहा।
“फिर वो क्या बोली?” राधे ने पूछा।
“क्या बोलती, सकपका गई।” मैंने कहा।
चोटी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, पर राधे मुझे घूरता रहा। उसकी आँखों में मेरे प्रति गहरा अविश्वास था। मैं असहज होने लगा।
“सच बोल?” राधे ने कहा।
“मैं देखकर आता हूँ, वो अंदर क्या कर रही है।” मैंने कहा और वहाँ से खिसक लिया।
भीतर का माहौल बदल चुका था। माताजी को कमरे के बाहर बाड़े में, दो बाँस पर बाँध दिया गया था। वो किसी पेड़ की सूख चुकी एक फाँक लग रही थीं जो अपने पेड़ से जुदा हो चुकी थी। माँ इस वक़्त रो नहीं रही थीं, वो लोगों को इस तरह देख रही थीं, मानो उन्हें किसी ने जबरदस्ती किसी दूसरे के घर में बिठा दिया हो, और उस घर के लोग किसी विदेशी भाषा में बात कर रहे हों। माँ हतप्रभ थीं–अपने आस-पास से। ग़ज़ल उनका हाथ पकड़े उनके बग़ल में बैठी हुई थी। कुछ देर में माँ ग़ज़ल से लिपटकर रोने लगी थीं। मैं भीड़ को अलग करता हुआ माँ के पास पहुँचा और उनकी दूसरी तरफ़ से उनसे लिपट गया, कुछ जबरदस्ती-सा। लग रहा था कि, माँ ग़ज़ल के गले लगी हैं और मैं उनकी पीठ पर एक बोझ-सा लिपटा हुआ हूँ। ग़ज़ल ने अपना चेहरा मेरी तरफ़ घुमाया। मैंने देखा, उसकी आँखों से आँसू की धार बह रही है। वो क्यों रो रही थी? मेरी समझ नहीं आया। उसका चेहरा मेरे चेहरे के बहुत क़रीब था।
“अपनी माँ का ख़याल रखना।” उसने सीधा मुझसे कहा, मैंने दो-तीन बार अपनी आँखें दबाईं कि मुझे रोना आ जाए, पर कुछ नहीं हुआ।
“आंटी, इतना नहीं रोते, मैं हूँ आपके पास। चुप हो जाओ।” माँ से लिपटकर उसने कहा।
“हाँ बेटा, हाँ।” माँ ने कहा।
“माँ, इतना नहीं रोते, चुप हो जाओ।” मैंने भी रुआँसी आवाज़ में कहा। माँ चुप रहीं। ग़ज़ल ने इशारे से मुझे चुप रहने को कहा। मैं कहना चाहता था कि माँ मैं भी हूँ आपके पास, पर फिर मैं चुप ही रहा।
कुछ देर में ग़ज़ल उठकर चली गई। मैं माँ के बग़ल में ठंडी पड़ गई चाय-सा पड़ा रहा। माताजी को उठाते वक़्त माँ चीख़ रही थीं, लेकिन मैं बस उनके बग़ल में पड़ा रहा। उस वक़्त अपनी ही माँ को छूने की मेरी हिम्मत नहीं हुई।
माताजी को घाट ले जाते वक़्त मेरे भीतर ग़ुस्सा भरता जा रहा था कि ग़ज़ल कौन होती है–मुझे कहने वाली कि अपनी माँ का ख़याल रखो! मेरी नानी मरी थीं, उसे मेरी माँ से लिपटकर रोने की क्या ज़रूरत थी? माताजी की अर्थी के पीछे लगभग पूरा गाँव था। राधे के पिता, ग़ज़ल के अब्बू, चोटी के अब्बू, राजू पान वाला और उसकी टपरी पर टल्ले खाते सारे लोग। उस भीड़ और घाट की चिलचिलाती धूप में मैं अपने दिमाग़ में ग़ज़ल से ही लड़ रहा था। तभी मैंने देखा कि माताजी को लकड़ियों पर रख दिया गया है और टार्ज़न दादा उन्हें अग्नि देने जा रहे हैं। यह कैसे हो सकता है? मैंने तो ठीक से माताजी का चेहरा भी नहीं देखा था। मुझे उन्हें एक बार जी भरकर देखना था। मैं टार्ज़न दादा को रोकने भागा, पर तब तक मुझे लोगों ने पकड़ लिया। मैं चिल्ला रहा था, मैं टार्ज़न दादा को रोकने की कोशिश कर रहा था, पर मेरी बात किसी ने नहीं सुनी। आग के भभकों के बीच मुझे मेरी नानी का जर्जर शरीर जलता हुआ दिखाई दिया।
तीन दिनों तक घर में लोगों का आना-जाना लगा रहा। मैं बीच-बीच में माँ के पास जाकर बैठ जाता, पर अभी भी उन्हें छूने की हिम्मत नहीं थी। मैं माँ से पूछना चाहता था कि जब नानी को जलाया जा रहा था तो वह वहाँ क्यों नहीं थीं? अगर वो वहाँ होतीं तो शायद मैं नानी को एक बार अच्छे से देख पाता। तभी टार्ज़न दादा बरामदे में बैठे हुए लोगों को बता रहे थे कि मैं उन्हें रोकते हुए क्या कह रहा था। मुझे लगा टार्ज़न दादा झूठ बोल रहे हैं। मैं तो बस एक बार माताजी का चेहरा देखना चाहता था, पर टार्ज़न दादा लोगों से कह रहे थे कि मैं चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था, “धूप बहुत तेज़ है, इसमें आग क्यों जलाना? हम बाद में, शाम को ठंड में भी आग लगा सकते हैं। इतनी तेज़ धूप में माताजी को क्यों जलाना?”
मैं माँ के बग़ल में बैठे हुए रोना चाह रहा था, पर ठीक उसी वक़्त मेरी गर्दन के पिछले हिस्से में खुजली होने लगी। मैं माँ के बग़ल में बैठे हुए अपनी गर्दन नहीं खुजाना चाहता था। पर खुजली क्यों आ रही थी? क्या आपका सोचना भी झूठ हो सकता है?
तभी पूरे घर में एक खलबली-सी मच गई। हर आदमी धीरे-धीरे सरकता हुआ बरामदे की तरफ़ बढ़ रहा था। किसी ने माँ के कान में आकर कुछ कहा और वो भी रेंगती हुई बाहर की तरफ़ चली गईं। मैं जब तक बाहर आया तो एक घेरा बना हुआ था जिसके बीच में साफ़ सफ़ेद कपड़े पहने हुए एक बहुत बूढ़े आदमी बैठे थे। सभी उनके आस-पास चुपचाप खड़े थे। उन्होंने गहरे अधिकार से टार्ज़न दादा से कहा कि पानी ले आओ। वह भागते हुए गए और एक गिलास पानी भर लाए। पुष्पा की बाई ने माँ का हाथ पकड़कर उन्हें उस बूढ़े आदमी के बग़ल में खड़ा कर दिया और कहा, “ये आशा है, पता है आपको?” उस बूढ़े आदमी ने हाँ में सिर हिलाया, पर माँ की तरफ़ देखा नहीं। तभी पता नहीं क्या हुआ पुष्पा की बाई को, वह उस बूढ़े आदमी पर बरस पड़ी।
“कहाँ थे आप आज तक? और ये टार्ज़न भी भाग लिया था। ये अकेली थी और तुम सबने कभी सुध तक नहीं ली?”
मुझे, टार्ज़न दादा भाग लिए थे, सुनते ही हँसी आने लगी। मैं उन्हें छोटी-सी चड्ढी पहने पेड़ों पर उछलते-कूदते-भागते हुए देख सकता था। और ऊपर से पुष्पा की बाई के मुँह से टार्ज़न शब्द अजीब-सा सुनाई दिया, मानो उन्होंने ‘गर्जन’ कहा हो। काश चोटी और राधे होते तो हम तीनों अभी सबके सामने फूट पड़ते। मैंने अपना सिर नीचे कर लिया। पुष्पा की बाई की बातों में सभी हाँ में हाँ मिला रहे थे, पर उस बूढ़े आदमी पर इसका कोई असर नहीं हो रहा था। बीच डाँट में उन्होंने चाय माँगी जो फिर टार्ज़न दादा तुरंत जाकर बना लाए। बीच में उन्होंने कुछ लोगों को नमस्कार भी किया, लोगों ने उसका जवाब भी नमस्कार में दिया। मुझे शक हुआ कि शायद उन्हें पता नहीं है कि डाँट असल में उन्हें ही पड़ रही है। पुष्पा की बाई एक तरह का नुक्कड़ नाटक वाला अभिनय कर रही थी जिसमें सभी लोगों की दिलचस्पी उस बूढ़े में थी जो बीच में बैठा था और जो बेमन से नाटक देखने आए दर्शकों जैसा बरताव कर रहा था। तभी माँ उनके सामने से हटीं और घेरा तोड़ती हुई सड़क की तरफ़ चल दीं। पुष्पा की बाई ने उन्हें रोकना चाहा, पर वो नहीं रुकीं। पुष्पा की बाई ने मुझे इशारा किया कि मैं उनके साथ जाऊँ। मैं ऐसी भागीदारी से बहुत घबराता था, मैं मना करना चाहता था, पर पुष्पा की बाई की आँखें लाल थीं। मैंने पहली बार उन्हें इतना ग़ुस्से में देखा था, सो मैं चुपचाप माँ के पीछे हो लिया।
मुझे हमेशा लगता था कि मैं पूरा नहीं हूँ। मेरे भीतर का वो पक्ष हमेशा नदारद रहता था जिसे होना चाहिए कि कौन-सी स्थिति में क्या करना है? जैसे ग़ज़ल को पता था कि कब माँ के पास जाना है, कब रोना है। मैं हर स्थिति में किसी तरह के आदेश की प्रतीक्षा में ख़ुद को पाता था। शायद सन्न हो जाना इसे ही कहते हैं। मैं इंतज़ार करता था कि कोई मुझे बता दे कि इस वक़्त मुझे क्या करना है और मैं चुपचाप उस काम को अंजाम दे दूँ। पर मेरे इंतज़ार में भी मैं पूरा नहीं था। इंतज़ार कितनी देर किया जा सकता है, इसे भी बताने वाला मेरा दूसरा हिस्सा हमेशा ग़ायब ही रहता था।
मैं माँ के पीछे-पीछे चल रहा था। उनका पल्लू बार-बार गिरे जा रहा था। उनकी साड़ी में इतनी सलवटें थीं कि लग रहा था उन्होंने कई दिनों से कपड़े नहीं बदले हैं। मैं उनका पल्लू सँभालने उनके पास जाने ही वाला था कि माँ ने अपने पल्लू को अपने चारों तरफ़ कसकर लपेट लिया। वो सहम गई थीं क्योंकि हम अपनी गली से निकलकर गाँव की मुख्य सड़क पर चलने लगे थे। माँ बाज़ार में पानी की टपरी के सामने से गुज़र रही थीं। उस टपरी पर खड़े लोग उन्हें घूर रहे थे, पर किसी ने उनसे कुछ कहा नहीं। तभी माँ गाँव की मुख्य सड़क से मुड़ीं और मेरे स्कूल की तरफ़ जाने लगीं। मैं माँ के क़रीब आ गया था, फिर भी एक क़दम पीछे ही था। माँ जिस ग़ुस्से और विश्वास से घर से निकली थीं, अभी वो उतनी ही असहज लग रही थीं। उनकी चाल में रास्ते के जल्दी से ख़त्म हो जाने की गुहार थी। मुझे लगा कि यह कितनी अजीब बात है कि मैंने अभी तक अपनी माँ को कभी घर से बाहर यूँ अकेले चलते नहीं देखा था। वह सड़क पर अकेले कैसी दिखती होंगी इसकी कभी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। उनकी चाल को देखकर लग रहा था कि जैसे वह बिना कपड़ों के चल रही हों। मैं एक क़दम पीछे से उछलकर उनके साथ चलने लगा। मैं चाहता था उन्हें पता चले कि मैं उनके साथ हूँ। मैंने धीरे से उनका हाथ पकड़ा। उन्होंने मेरे हाथ को इतनी जल्दी थाम लिया, मानो उनके हाथ कब से कुछ पकड़ना चाह रहे थे। धीरे-धीरे माँ अपनी सहजता पर आने लगी थीं। उनके हाथ की पकड़ भी कुछ हल्की होती जा रही थी। हम हमारे स्कूल के सामने से निकले जो एक मंदिर में लगा करता था। विवेकानंद उच्चतर माध्यमिक विद्यालय। मेरी छठवीं कक्षा की परीक्षाएँ शुरू होने वाली थीं और घर में किसी को इसकी कोई चिंता नहीं थी। शायद इसीलिए पहली बार परीक्षा को लेकर मेरी चिंता बढ़ती जा रही थी। इसी स्कूल की आठवीं कक्षा में ग़ज़ल पढ़ती थी।
मैं और माँ खिड़किया घाट की टूटी हुई सीढ़ी पर बैठे थे। मैं नदी के पानी में मछली के दिख जाने के आश्चर्य का इंतज़ार कर रहा था और माँ नदी के दूसरे किनारे पर बने बिना देवता के मंदिर को ताक रही थीं। हम दोनों की परछाइयाँ नदी के ऊपर तैर रही थीं। कुछ देर में मैंने अपना सिर उनकी गोदी में रख लिया। माँ की उँगलियाँ उनके बिना जाने मेरे बालों से खेलने लगीं। माँ के पास से एक ख़ुशबू आती थी जिसे मैं कभी ठीक-ठीक समझ नहीं पाया कि ये क्या ख़ुशबू है? उनकी साड़ियों में भी वो हमेशा बसी रहती थी। मैं हर बार उस ख़ुशबू को सूँघता और मेरा दिमाग़ उस शब्द को तलाशने में व्यस्त हो जाता कि मैं इस बेहद अपनेपन की ख़ुशबू को क्या कहूँ? ठीक इस वक़्त एक इच्छा भी भीतर फड़क रही थी कि काश अभी ग़ज़ल हमें देख ले। उसे पता चले कि मैं इस वक़्त अपनी माँ के कितने क़रीब हूँ।
“तुझे पता है कि वो बूढ़े आदमी कौन हैं?” माँ ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
“नहीं।”
“वो मेरे पिता हैं।” माँ ने कहा।
मैं अचानक उनकी गोदी से उठ बैठा, “आपके पापा?”
“हाँ, वो कभी हमारे साथ नहीं रहे।”
“तो अभी कैसे आए? उन्हें किसने बुलाया?” मैंने पूछा।
माँ चुप हो गईं। उन्होंने नदी के पानी से अपने मुँह पर छींटे मार लिए। फिर अपने पल्लू से अपने चेहरे को पोंछा। मैं अपने जवाब के इंतज़ार में उन्हें ताकता रहा। वो वापस अपनी जगह पर बैठ गईं।
“वो नदी के उस पार मंदिर देख रहे हो। माँ हमेशा मुझे वहाँ ले जाती थी, जब भी उसे अपने मन की बात कहनी होती थी। मैं सोच रही थी कि अगर अभी माँ होती तो उनके आने पर क्या करती? वो ज़रूर मुझसे कहती कि चलो बिना देवता के मंदिर होकर आते हैं। वो क्या कहती मुझसे?”
माँ बिना देवता के मंदिर को ताक रही थीं। मेरी इच्छा हुई कि मैं उनसे अपने पिता के बारे में पूछूँ। क्यों उनकी एक भी तस्वीर घर में नहीं है? वो कौन थे? क्या हमारा पूरा परिवार छूटे हुए लोगों से बना है?
“उस मंदिर तक कैसे जाते हैं?” मैंने पूछा।
“जब कोई बात नदी के इस तरफ़ रहकर नहीं की जा सकती तो डोंगी (छोटी नाव) में मैं और माँ उस पार चले जाते थे। तुम्हें पता है उस मंदिर में कोई मूर्ति भी नहीं है, न ही कोई उसका पुजारी है। मैंने माताजी को किसी दूसरे मंदिर में जाते नहीं देखा कभी।”
माँ की आवाज़ इस वक़्त बदली हुई थी। यह वो माँ नहीं थीं जिन्हें मैं जानता था। उनके पास से वो ख़ुशबू भी नहीं आ रही थी जिसके शब्द मैं कभी पकड़ नहीं पाया था।
“माताजी कितना थक गई थीं–अंत-अंत में। उन्होंने मुझसे कहा था कि मैं अब जाना चाहती हूँ, पर ये मुआ शरीर अभी भी जीना चाहता है। मैंने उनसे पूछा, क्या अंत में ही सही आप वह जीवन जी पाईं जिसकी उम्मीद आपने मेरी उमर में कभी की थी?”
माँ चुप हो गईं। वो इस वक़्त मंदिर को भी नहीं देख रही थीं। उनकी आँखें पानी की चंचलता में कुछ खोज रही थीं।
“तो क्या बोली थीं माताजी?”
मेरे सवाल पर माँ ने मुझे देखा। उनकी आँखों में मेरे प्रति दया थी। उन्होंने धीरे से मेरे सिर को सहलाया और वापस नदी के पानी के छींटे अपने मुँह पर मारने लगीं। ज़िम्मेदारी से जिया हुआ जीवन किसी को खो जाने पर कितना ख़ाली लगता है! मृत्यु का ज़िम्मेदार कौन होता है? कौन तय करता है कि अब माताजी कभी भी माँ और मेरे बीच नहीं होंगी? इतनी गहरी चुप्पी में माँ क्या सोच रही होंगी? क्या वो उन दिनों को याद कर रही होंगी जब वो माताजी के साथ इस तरह नदी किनारे बैठा करती थीं? क्या जब माँ की मृत्यु होगी तो मैं भी इसी तरह नदी किनारे आकर बैठूँगा? उस वक़्त मेरे बग़ल में कौन बैठा होगा?
जब हम वापस आ रहे थे तो मुझे लगा माँ पता नहीं क्या नदी में सिरा आई थीं कि उनकी चाल में बेहद हल्कापन था। मैं हल्का नहीं था। मुझे अपना होना इस वक़्त बहुत भारी लग रहा था। क्योंकि मेरे दिमाग़ में माँ की बातें गूँज रही थीं। इसलिए मैं हमेशा से बिदकता था कुछ भी जानने से। क्योंकि आप कितना भी जान लें, हमेशा उससे कहीं ज़्यादा जानना बचा रह जाता है। मैं जितना जानता था उसका क्या करूँ, मुझे यही समझ नहीं आता था। और वैसे भी सब कुछ कैसे जाना जा सकता है? और सारा कुछ कैसे बताया भी जा सकता है? मैं एक सवाल अपने दिमाग़ में रखकर भूगोल की किताब खोलता हूँ। कुछ देर में उसका जवाब तो मिल जाता है, पर जाने कितने और सवाल उस जवाब के साथ चिपके चले आते हैं। इसका कोई अंत नहीं है। क्या बिना कुछ जाने आगे नहीं बढ़ा जा सकता है? क्या बिना पढ़े छठवीं कक्षा से सातवीं कक्षा में छलाँग नहीं लगाई जा सकती? क्या पूरा जीवन छठवीं कक्षा में ही नहीं गुज़ारा जा सकता है? क्यों जीवन की हर परीक्षा में पास होते रहना ज़रूरी है, वो भी अच्छे नंबरों से?
चलते-चलते मेरी निगाह बार-बार माँ की गर्दन पर चली जाती, भीतर एक रिरियाती-सी इच्छा जागती कि काश इस वक़्त माँ अपनी गर्दन खुजाना शुरू कर दें और मुझे पता चले कि जो भी बातें उन्होंने नदी किनारे कही थीं, वो सब की सब झूठ थीं।
कुछ ही दिनों में दीवार पर माताजी की माला टँगी तस्वीर लटक गई थी। वो इस तस्वीर में बेहद चुप दिखाई दे रही थीं। मतलब वो जितना चुप रहती थीं, उससे कहीं ज़्यादा चुप नज़र आ रही थीं। गाँव में तस्वीरें खिंचवाना एक प्रयास हुआ करता था जो हमारे घर में किसी ने कभी नहीं किया। फिर यह तस्वीर कहाँ से आई? कब माताजी तस्वीर वाली दुकान पर गई होंगी और उन्होंने कहा होगा कि मेरी एक तस्वीर खींच दो? क्या एक तस्वीर हर आदमी की हर घर में होती है? क्या इसे ख़ुद खिंचवाना होता है? या कोई आपको ले जाता है ताकि मरने के बाद वो तस्वीर टाँगी जा सके? क्या माँ की भी कोई तस्वीर है कहीं? इसी घर में छुपी हुई? मेरी अभी तक कोई तस्वीर नहीं खिंची थी।
माताजी का नाम सावित्री था, उनकी तस्वीर के नीचे की तरफ़ लिखा हुआ था। उनका नाम सावित्री है, यह बात मुझे पता थी और नहीं भी पता थी। दिमाग़ में शायद एक कोना होता है, जहाँ सारा कुछ धुँधला-सा पड़ा रहता है। सावित्री नाम उसी जगह कहीं रखा हुआ था अभी तक। मैं उनके नाम को देर तक देखता रहा। हर नाम अपने साथ एक चेहरा घसीट लाता है। सावित्री कहते ही मुझे माताजी की शक्ल नहीं दिख रही थी। मैंने फिर कहा–सावित्री। एक लड़की की धुँधली-सी आकृति दिखी। मैं उस लड़की का चेहरा देखने की लालसा में लगातार सावित्री नाम बुदबुदाता रहा। तभी उस धुँधलके से एक चेहरा उभरा जिसकी शक्ल ग़ज़ल से मिलती थी। मैंने नाम लेना बंद कर दिया।
बाथरूम जाकर मैं देर तक आईने के सामने खड़े होकर चेहरे बनाता रहा। मैं अपने उस चेहरे को पकड़ना चाहता था जिसकी तस्वीर मेरी मृत्यु के बाद घर में लगाई जा सके। मृत्यु के बाद की तस्वीरें अजीब-सी निर्जीव होती हैं। मैं निर्जीव चेहरा बनाते-बनाते रह जा रहा था। हारकर मैंने अपने मुँह पर पानी मारा और बाथरूम से बाहर आ गया।
चोटी के अब्बू की आँखें बेहद छोटी थीं। लगता था कि उनकी आँखों पर दो काजू रखे हुए हैं। उनका क़द छोटा था, वो बहुत गोरे थे और अभी भी उनकी पूरी दाढ़ी नहीं आती थी। चेहरे से सफ़ेद बाल यहाँ-वहाँ ऐसे झाँकते, मानो शरमा रहे हों। मुझे लगता था कि जब वो खुलकर हँसते होंगे तो उन्हें दिखना बंद हो जाता होगा। बाज़ार में उनकी टेलरिंग की दुकान थी। वह किसी भी कपड़े को पलक झपकते ही पैंट और शर्ट में तब्दील कर देते थे। उनके गले में हमेशा एक इंची-टेप लटका होता और हाथों में नीले रंग की चाक का टुकड़ा। पान की उपस्थिति उनके मुँह में हमेशा रहती थी, इसलिए उनका मुँह हमेशा लाल रहता था और उनके पास से हमेशा क़िमाम की ख़ुशबू आती रहती। उनकी दुकान की छत पर हमारा अड्डा था। राधे, मैं और चोटी वहीं बैठा करते थे। उस छत के बड़े फ़ायदे थे, यहाँ से पूरा बाज़ार दिखता था; पर सामने लगे पेड़ की वजह से लोग बाज़ार से हमें नहीं देख पाते थे। कभी-कभी जब चोटी के अब्बू बहुत ख़ुश होते तो हम तीनों के लिए ऊपर चाय भी भिजवा दिया करते थे। चोटी के ऊपर दुकान की एक ज़िम्मेदारी थी। उसे स्कूल के अलावा दिन में दो शर्ट सिलनी होती थी। हमारी बातचीत के बीच कब वो नीचे जाता और अपना काम पूरा कर लेता, हमें इसकी कभी भनक भी नहीं लगती थी। चोटी कपड़े से शर्ट बना लेता है, इस बात पर मुझे बहुत आश्चर्य होता था।
“तूने बाल नहीं दिए?” राधे ने पूछा।
माताजी की मृत्यु के बाद ये हमारी पहली मुलाक़ात थी। हम तीनों अभी दुकान की छत पर बैठे ही थे कि राधे ने पूछ लिया।
“माँ ने मना कर दिया।” मैंने कहा।
“अबे देना चाहिए था, बहुत सवाब मिलता है।” चोटी ने कहा।
“अरे मैं कैसे कहता कि बाल उड़ा दो! घर में इतनी भीड़ थी, कुछ समझ नहीं आ रहा था मुझे।”
जब तक तेरह दिन नहीं बीत जाते आप किसी बाहर वाले से नहीं मिल सकते, ऐसा टार्ज़न दादा ने कहा था। पर यह दोनों मेरे दोस्त थे, इन्होंने कहा कि चल बुड्ढों की बात कौन सुनता है। मैं भागकर इनसे मिलने चला आया था।
“सब लोग चले गए?” राधे ने पूछा।
“कल तेरहवीं है।” मैंने कहा।
“ग़ज़ल क्या कह रही थी?” चोटी ने पूछा।
“कुछ नहीं।” मैंने तपाक से कहा, मानो मुझे पहले ही पता था कि ये सवाल आने वाला है।
“मैं कह रहा था न, यह नहीं बताएगा कुछ भी। अबे लड़की से बात करते ही सब बदल जाता है।” राधे ने कहा।
“अबे कुछ कहा ही नहीं उसने तो...” मैं थोड़ा चिढ़ गया।
“मैंने देखा था दीवार से सटकर बहुत देर खुसुर-फुसुर कर रहे थे, कैसे कुछ नहीं कहा?” राधे बोला।
“अबे जाने दे न, जब वो बोल रहा है कुछ नहीं बोला तो नहीं बोला होगा।” चोटी ये राज़ की बातों का सिलसिला रोकना चाहता था।
“हाँ हमारी आँखें ही ख़राब हैं।” राधे बोलकर चुप हो गया।
एक दिन मैंने माँ की अलमारी से पाँच रुपए चुराए थे। उसे चुराने के बाद कई दिनों तक उसे जेब में रखे-रखे घूमता रहा। ये पाँच का नोट साँप के मुँह में छछुंदर की तरह हो गया था, न निगला जाए न ही उगला जाए। इस गाँव की किसी भी दुकान पर अगर मैंने अकेले जाकर पाँच का नोट दिखाया तो माँ को अगले दिन ही ख़बर लग जानी थी। सो मैंने एक दिन अपनी चोरी की बात चोटी और राधे को बता दी। लेकिन ये राज़ एक राज़ ही रहे इसके लिए राधे ने सुझाया, “हम दोनों भी अपना एक-एक राज़ तुझे बताएँगे ताकि कोई किसी को कभी धोखा नहीं दे पाए।” इस काम के लिए हमने घंटी वाले की कचौरी-समोसे की दुकान चुनी। पूरे पाँच रुपए की जलेबी और कचौरी मँगवाई गई। जलेबी खाते हुए चोटी ने कहा, “हमने अब तेरा चोरी का नमक खाया है, हम क्यों बताएँगे किसी को; ये तो नमकहरामी होगी!”
मैं और राधे नहीं माने। मेरे भीतर माँ की पिटाई का डर था और राधे चाहता था कि आगे भी इस कचौरी-जलेबी का सिलसिला चलता रहे। अंत में राधे ने पहल की और उसने कहा, “नदी पर नहाते हुए मैंने अपनी गुबरेले टीचर मैडम के स्तन देखे हैं।”
हम दोनों की जलेबी मुँह से गिर पड़ी थी। यह बात साबित करने के लिए राधे ने पेंसिल से पेपर पर गुबरेले मैडम के स्तन बनाए जिसे चोटी और मैंने जी भरकर देखा। बाद में हमने, पकड़े जाने के डर से, उस पेपर के छोटे-छोटे टुकड़े कर दिए थे। अब बारी चोटी की थी। चोटी ने एक गहरी साँस भीतर लेकर कहा, “मैंने पिछली बार कंचे खेलते वक़्त घपला किया था और तुम दोनों से चीटिंग से जीता था।”
हम दोनों ने उसको चपत लगाई। राधे ने कहा, “मैं गुबरेले मैडम के स्तन की बात कर रहा हूँ और हम इसकी चोरी के पैसों से जलेबी चटखा रहे हैं और तेरा ये राज़ है?”
चोटी थोड़ी देर इधर-उधर देखता रहा।
“और वैसे भी ये बात हमें पता है कि तू कंचे में चीटिंग करता है।” मैंने कहा।
फिर उसने एक और गहरी साँस भीतर ली और कहा, “जब मुझे रात में बहुत डर लगता है तो मेरी अम्मी मेरे बग़ल में आकर बैठ जाती हैं, पर रात को उनका चेहरा तवे जैसा हो जाता है।”
“ना, ये तो राज़ नहीं है, ये डरावनी कहानी है।” मैंने कहा। हमें पता था, उसकी अम्मी नहीं थीं।
“हाँ, ये कहानी नहीं चलेगी।” राधे ने जोड़ा।
“मैं कभी-कभी नमाज़ पढ़ते वक़्त लकड़ियों के बारे में सोचता हूँ।”
हम दोनों हँस पड़े, पर माने नहीं। हमें नहीं समझ आ रहा था और चोटी असहज होता जा रहा था। हमारी कचौरी और जलेबी ख़त्म हो चुकी थी और सामने चाय आ चुकी थी। चाय पीने तक का समय अभी भी था हमारे पास। कभी-कभी दोस्ती में हमें पता नहीं चलता कि कब हम एक अच्छी हँसी के लिए क्रूर हो जाते हैं। हम दोनों उसके पीछे पड़े रहे। वो मना करता रहा और हम मानने का नाम नहीं ले रहे थे, तभी अचानक चोटी ने चिल्लाकर कहा, “रात को मेरे चचा मेरी चड्ढी में हाथ डालकर सोते हैं।”
चोटी की आँखों में आँसू थे और पूरी दुकान में सन्नाटा छा गया था। राधे और मैं सकपका गए। कुछ देर बाद, बात को सँभालने के लिए हम दोनों को झूठा हँसना पड़ा। पर चोटी हँस नहीं रहा था। उसके बाद हम अपनी-अपनी चाय की अगली घूँट नहीं पी पाए थे। मैंने उसके बाद कभी चोरी नहीं की और हमने इस बारे में फिर कभी बात नहीं की।
चोटी के अब्बू दुकान की छत पर आए और क़िमाम की ख़ुशबू पूरी छत पर फैल गई।
“क्यों, चाय पीओगे?”
मैं उन्हें देखकर मुस्कुरा दिया। उन्होंने तीन चाय भिजवाई। राधे और चोटी को पता था कि मैं कभी भी बोलना शुरू कर सकता हूँ सो दोनों अपनी-अपनी चाय पर चुप थे। मुझसे भी रहा नहीं गया।
“ग़ज़ल आजकल शाम को स्कूल के बाद सीधा घर आती है और माँ से देर तक बात करती रहती है। मैं जाता हूँ तो दोनों चुप हो जाते हैं। उस दिन वो मुझसे कह रही थी कि अपनी माँ का ख़याल रखना, अरे वो कौन होती है बोलने वाली?” मैं सब कह चुका था।
“अबे बहुत इस्मार्ट बनती है वो, मैंने उसके हाथों में बड़ी-बड़ी किताबें देखी हैं, वह भी अँग्रेज़ी वाली। अबे आठवीं की किताब नहीं, वो अँग्रेज़ी की गंदी किताबें हैं।” राधे बोला।
“मैं तो कह रहा हूँ कि तू बचकर रहना। वो बहुत तेज़ है भाई।” चोटी ने बोला।
“अरे वो पटर-पटर अँग्रेज़ी में बोलकर अपने टीचरों को डरा देती है।” राधे बोला।
“एक दिन वो अपने मास्साब (टीचर) से लड़ गई थी। अब तू बोल I S L A N D क्या होता है?” चोटी ने पूछा।
मैं सोच में पड़ा रहा, चोटी ही खीझकर बोला, “अरे, इजलेंड, IS इज और LAND लैंड, वो मास्साब से बहस करने लगी कि ना सर, ये तो आइलैंड होता है। अरे पूरा स्कूल उस पर हँस रहा था। फिर भाई कुछ महीने बाद वो मास्साब ग़ायब हो गए। कहते हैं बस स्टॉप पर आजकल पकौड़े तलते हैं वो मास्साब।”
“अबे वो सुंदर है तो बच जाती है। यही हम करते तो होटलों में बर्तन माँज रहे होते।” राधे ने कहा।
हम तीनों ग़ज़ल की बुराई करके बहुत ख़ुश थे। मैं चोटी और राधे को बता नहीं पाया कि ग़ज़ल मेरी तरफ़ ठीक से देखती भी नहीं है। मैं उसके लिए वहाँ होता ही नहीं हूँ। जब भी माँ और उसके बीच मैं बैठने जाता हूँ तो माँ मुझे बाज़ार के किसी काम से भेज देती हैं और ग़ज़ल की आँखें नीचे होती हैं। मुझे पूरा यक़ीन था कि ग़ज़ल नहीं चाहती कि मैं वहाँ आस-पास भी कहीं नज़र आऊँ।
तभी हम तीनों ने समय देखा और सामने वाली गली की तरफ़ टकटकी मारकर देखने लगे। ठीक वक़्त पर झरना सामने की गली से प्रगट हुई और बाज़ार की तरफ़ चलने लगी। हम तीनों का मत था कि इतनी सुंदर लड़की हमने कभी नहीं देखी थी। और पूरे गाँव में सिर्फ़ वही ऐसी लड़की थी जो हमें देखती थी। वो जैसे ही दुकान के सामने से गुज़रती, एक बार छत पर देखकर ज़रूर मुस्कुराती और हम तीनों ज़ाया हो चुके होते। आज भी उसने यही किया। वो जैसे ही ओझल हुई, हम तीनों की हृदय गति आसमान छूकर वापस आई थी। उसकी झटके वाली चाल, उसका भरा-पूरा शरीर, उसके बाल, लगता कि सब एक संगीत पर नाचते हुए चल रहे हैं। उसके जाते ही हम तीनों में बहस छिड़ जाती कि उसकी मुस्कुराहट असल में किसके लिए है।
मैं और राधे जानते थे कि हर लड़की असल में चोटी को देख रही होती थी। उसके नाक-नक़्श, घुँघराले बाल, मासूम मुस्कुराहट पर हर लड़की फिसल जाती थी। उसके पास कुछ ऐसा हुनर था कि वो हर लड़की को हँसा सकता था। हम उससे हमेशा पूछते कि भाई क्या कहता है तू कि लड़कियाँ तेरे अगल-बग़ल हँसती रहती हैं। वो कहता कि मैं तुम दोनों की बातें करता हूँ उनसे। मैं और राधे उसके जवाब पर चुप हो जाते। हम तीनों में सिर्फ़ उसके पास ही लड़कियों के लेटर्स आते थे। राधे अपने आपको हम तीनों में सबसे अच्छा दिखने वाला मानता था। वो कपड़े भी हम तीनों से अच्छे पहनता था, पर लड़कियाँ उसे देखते ही अपनी राह बदल लेती थीं। एक बार चोटी के सान्निध्य में ट्यूशन जाती एक लड़की को रोककर राधे ने बात की थी। जब उस लड़की ने अंत में राधे को लेटर लिखा तो उसमें उसने चोटी से मिलने की बात कही थी। चोटी और मैं इस बात पर बहुत हँसे थे। चोटी ख़ूबसूरत नहीं था, पर उसमें एक अजीब-सा आकर्षण था।
मैंने भी एक बार दोनों से कहा था, “अबे! मैं भी लेटर देना चाहता हूँ यार किसी को।”
मेरी बात सुनते ही सन्नाटा छा गया था। बाद में राधे ने कहा, “अबे जाने दे, तू क्यों फँस रहा इन चक्करों में! तू दूर ही रह।”
र शब्द मुझे हमेशा से ही बेहद पसंद था। जब भी स्कूल में बैठा होता तो यह बात ही इतना सुख देती कि अंत में मैं घर जाऊँगा। चोटी और राधे की बातों के बीच में भी घर के बारे में सोचना मुझे अच्छा लगता था। घर इतनी कमाल चीज़ थी कि अगर उसकी दीवारों में दरार पड़ जाती या कहीं से प्लास्टर झड़ने लगता तब भी वह अपनी सारी कमी लिए पूरा घर होता। तीन लोगों के लिए बने इस छोटे-से घर में अब दो ही लोग बचे थे, तब भी वो पूरा घर था। इसे अपने होने की पूर्णता पर इतना भरोसा था कि मुझे कभी-कभी लगता कि जब माँ नहीं होगी, मैं भी नहीं होऊँगा; तब भी क्या यह घर, हमारा घर ही कहलाएगा!
घर में वापस तीन लोग हो गए थे। तेरहवीं के बाद सभी लोग चले गए थे, पर नाना रुक गए थे। वह इतना चुप रहते थे कि किसी की उनसे पूछने की हिम्मत नहीं हुई थी कि वो कब जाएँगे? मुझे उनके रहने से कोई दिक़्क़त नहीं थी, क्योंकि घर में तीन लोगों की मुझे आदत थी। तीन से चार होते ही इस छोटे-से घर में मुझे भीड़ दिखने लगती थी। शायद माँ को उनका रहना क़तई पसंद नहीं था। उनके कारण माँ स्कूल से वापस देर से आती थीं। माँ को जब भी उनसे कोई बात करनी होती तो वह मुझे बोलतीं और मैं बस पलटकर नाना की तरफ़ देखता क्योंकि वो भी वहीं खड़े होते। फिर जब नाना मुझे देखते हुए माँ से कुछ कहते तो मुझे हँसी आ रही होती। मैंने ये वाला पैंतरा चोटी और राधे पर भी आज़माया था। जब मैं राधे से बात करता तो चोटी को देखता और जब चोटी से बात करता तो राधे को देखता।
“पगला गया है क्या?” राधे और चोटी मुझसे कहते और मैं देर तक अपने ही करतब पर हँसता रहता।
एक दिन नाना की तबीयत बिगड़ गई सो माँ के कहने पर मैं स्कूल नहीं गया। माँ ने मुझसे कहा कि नाना को कह देना कि मुझे स्कूल से छुट्टी नहीं मिल रही है। माँ अँग्रेज़ी स्कूल में हिंदी साहित्य की अध्यापिका थीं। माँ मुझे भी उसी अँग्रेज़ी स्कूल में पढ़ाना चाहती थीं, पर मैं कभी दाख़िले की परीक्षा पास नहीं कर पाया था। पुष्पा की बाई के हिसाब से मैं दिमाग़ से बहुत कमज़ोर बच्चा था। वो हमेशा माँ से सांत्वना भरी आवाज़ में कहती कि ये मंदबुद्धि है, अब क्या करें? माँ भी इस बात को मानने लगी थी।
नाना को मेरे हाथों की चाय बहुत पसंद थी। वह हाथों के इशारे से चाय पीने का मूक अभिनय करते तो मैं समझ जाता कि उन्हें चाय चाहिए। एक दिन मैं चाय बना रहा था और मैंने देखा, नाना हल्के क़दमों से किचन में चले आए। वह दीवारों और लकड़ी के खंभों पर टिकी छत का मुआयना करने लगे थे।
“तुम्हें पता है पहले यहाँ, इस कमरे में ताँगा और घोड़ा बँधता था?” उन्होंने पूछा।
मुझे लगा आवाज़ अमीन सयानी की है और रेडियो से आ रही है। मैं थोड़ा सकपका गया। मैं उनके दूसरे वाक्य का इंतज़ार करता रहा, पर वह वाक्य बहुत देर तक नहीं आया। मैं एक छोटे स्टूल पर खड़े होकर चाय बनाता था, क्योंकि मेरे हाथ चायपत्ती और शक्कर के डिब्बों तक नहीं पहुँचते थे। मैं स्टूल पर हल्के से सँभलते हुए पीछे मुड़ा तो देखा वो पीछे की दीवारों को सूँघ रहे थे।
“अभी भी घोड़े की ख़ुशबू दीवारों में है।”
मुझे आश्चर्य, उनकी बातों से ज़्यादा इस बात का हुआ कि जब आवाज़ इतनी अच्छी है तो वो इतना कम क्यों बोलते हैं!
“अगर घोड़े यहाँ थे तो माँ कहाँ रहती थीं? खाना कहाँ बनता था?” मैंने बिना देखे पूछा।
“उस वक़्त तक आशा (मेरी माँ) ग्वालियर में रहती थी। मेरी माँ के पास।”
“और आप कहाँ थे?”
उन्होंने मेरी बात का जवाब नहीं दिया। आशा नाम सुनते ही लगा कि वह किसी दूसरे के बारे में बात कर रहे हैं। माँ का कोई नाम हो सकता है, यह बात मुझे अजीब लगती थी। स्कूल में भी जब माँ का नाम बताना होता था तो आशा नाम के पीछे माँ का चेहरा कभी भी नहीं उभरता था। आशा नाम लेते ही मैं अपनी गर्दन के पीछे वाला हिस्सा खुजाने लगता।
“यह घर तोताराम बाबू का था। उस ज़माने में उन्होंने ख़ुद का ताँगा ख़रीदा था ताकि घर की औरतें उसी में बैठकर स्कूल जा सकें। जिस कमरे में तुम और आशा सोते हो वहाँ ताँगा चलाने वाला रहता था। सावित्री इसी ताँगे से पढ़ने जाती थी।”
मैं अपने मुँह में ‘तोताराम’ बुदबुदाने लगा। पता नहीं वो बुदबुदाहट कब उन्होंने सुन ली और उनको हँसी आने लगी। उनकी हँसी में मैं भी हँसने लगा। मैंने देखा, उनकी हँसी मेरी माँ की हँसी से मिलती थी। वो अपने हैं, यह बात मेरे भीतर पता नहीं किस तरह के घुमाव पैदा कर रही थी। मैंने उन्हें चाय का कप पकड़ाया और बाहर के कमरे में अपनी किताबें लेकर बैठ गया। वो चाय लेकर माताजी के कमरे में नहीं गए, वो बाहर वाले कमरे की खिड़की के पास रखी कुर्सी पर बैठ गए।
“मुझे तैरना नहीं आता था। मुझे तरबूज़ बहुत पसंद थे। सावित्री मेरे लिए नदी के उस पार तैरकर तरबूज़ लाया करती थी।”
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