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शेयर मार्केट के सक्सेस मंत्रा / Share Market ke Success Mantra PDF Download Free by Saurabh Mukherjea (Stock Market Investing Books Hindi)

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥शेयर मार्केट के सक्सेस मंत्रा / Share Market ke Success Mantra
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 2 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖160
Last UpdatedMarch 13, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category,

मैं कैसे स्टॉक मार्केट में निवेश करूँ?
किन कंपनियों में मुझे निवेश करना चाहिए?
मुझे शेयर कब खरीदने चाहिए? कब उन्हें बेचना चाहिए?
कैसे मैं महसूस कर पाऊँगा कि स्टॉक के दाम चढ़ेंगे या गिरेंगे?
जीवन के जैसा ही, स्टॉक मार्केट का भी हाल है, सफलता के लिए कोई शॉर्ट-कट नहीं है।
स्टॉक मार्केट से नियमित फायदा कमाने के लिए वर्षों का अनुभव और दिमाग की एक खास बनावट जरूरी होती है। देश के टॉप विश्लेषकों में शुमार सौरभ मुखर्जी ने सात निवेशकों से बात की, जो पिछले दो दशक से लंबे निवेश पर फायदा कमाने की कला में सिद्धहस्त हो चुके हैं। उन्होंने इन विशेषज्ञों की यात्रा का इतिहास खँगाला, जिसमें पता चला कि ये शौकिया निवेशक के तौर पर आगे बढ़े और आगे चलकर पेशेवर मैनेजर के रूप में विशाल रकम को सँभालने का हुनर दिखाया। सौरभ ने उनके दिमाग को पढ़ने और समझने का प्रयास किया और उस खास फिलॉसफी को भाँपा, जिसकी मदद से उन्होंने अपनी निवेश रणनीति को ताकत प्रदान की और उन्होंने अपने ज्ञान का इस्तेमाल इस पुस्तक को लिखने में किया, जो देश में निवेश की राह बताती है।

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<h3 class="has-text-color-white has-vivid-green-cyan-background-color has-background joli-heading" id="h-description-of-book"><strong>पुस्तक का कुछ अंश</strong></h3>

प्रस्तावना

भारत का स्टॉक मार्केट, जिसे दूसरे शब्दों में हम शेयर बाजार भी कहते हैं, अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग मायने रखता है। किस्मतवाले जहाँ इसके रोमांच और वादे का लाभ पाते हैं, वहीं ज्यादातर मामलों में लोग इसके जोखिमों को समझ पाने में विफल साबित होते हैं, जो कि इसके ऐतिहासिक सफर के पारितोषिक के साथ ही दौड़ रहे होते हैं। बहुतों के लिए, बाजार और इसकी कार्यप्रणाली तार्किकता पर आधारित और उस पर महारत हासिल करने की कवायद है। एक ओर जहाँ स्टॉक मार्केट में शामिल सभी हिस्सेदार इसके असमान बेहतरीन प्रदर्शन की ताक में रहते हैं, वहीं शेयर बाजार में सफल होने की थाह पाना चुनिंदा लोगों को ही नसीब होता है, वह भी केवल उन्हें, जो येनकेन प्रकारेण बाजार का गणित समझने की जुगत में लगे होते हैं।
छह साल पहले, सौरभ मुखर्जी यू.के. से भारत आए। भारत आने से पहले मुखर्जी ने यू.के. में अपनी हाई रेटिंगवाली लंदन आधारित इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज रिसर्च फ्रेंचाइजी बेच दी थी, जिसे उन्होंने अपने जीवन के दूसरे दशक के मध्य में शुरू किया था और वह उसके सह संस्थापक थे। उन दिनों भारतीय शेयर बाजार में उच्च गुणवत्तावाले शोध का बेहद अभाव था और थोड़ा-बहुत शोध चुनिंदा ब्रोकर ही किया करते थे। मुझे सौरभ का साथ मिला और उन्होंने ऐंबिट की इक्विटी फ्रेंचाइजी तैयार करने में मेरी मदद की। आज हमारा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज का कारोबार इस क्षेत्र के कुछ सम्मानित नामों में शुमार है और इसकी फ्रेंचाइजी उच्च गुणवत्ता, उच्च एकीकृत शोध के इर्द-गिर्द केंद्रित करके तैयार की गई है।
सौरभ का पूरा जुनूनी ध्यान उच्च गुणवत्ता पर आधारित रिसर्च पर होता है, जिसने उनको यह किताब लिखने के लिए प्रेरित किया है। सोच की स्पष्टता, जो कि उनका हॉलमार्क भी है, उसके जरिए उन्होंने पाठक को एक स्पष्ट सोच दी है कि सफलतापूर्वक निवेश के अगुवा बनने के लिए जरूरी तत्त्व क्या हैं। एक दशक से अधिक का शेयर बाजार का अनुभव, जिसमें भारत और यू.के. शामिल हैं, सौरभ ने न केवल उनकी सीखों को अपनी पुस्तक में शामिल किया है, बल्कि भारत के उच्च वर्ग के निवेशकों के छोटे से समूह की सामूहिक विद्वत्ता का भी उल्लेख किया है। लंबी अवधि के जबरदस्त सफलतम निवेशकों में से हर एक ने बाजार को लेकर खुद के लिए एक जहीन नैविगेशन टूल बना रखा है, बल्कि खास नजरिया और सोच भी अख्तियार कर रखी है। इस पुस्तक में इन निवेशकों के विस्तृत साक्षात्कार समाहित हैं, जिसमें निवेशकों ने उन्मुक्त रूप से अपने जुनून, सपनों, आशंकाओं और कमियों का जिक्र किया है। इस प्रकार एक ऐसी दुनिया, जो रहस्यमयी तरीके से व्यवहार करती है, उसके बारे में पाठक हैरतअंगेज अंदरूनी जानकारियाँ हासिल कर सकेंगे।
यह किताब शोध की गहराइयों पर आधारित है, जिसमें कठोरतम विश्लेषण और फॉरेंसिक एकाउंटिंग तकनीक समाहित की गई है, जो कि ऐंबिट में हर कारोबार का मार्गदर्शक सिद्धांत बन चुका है। सौरभ उन चीजों पर विशेष जोर देते हैं कि कंपनियों के प्रदर्शन में कितनी आसानी से चमकती गलतियों या कमियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है और किस तरह इनको आसानी से पकड़ा जा सकता है और वह भी आधारभूत नंबर क्रंचिंग टूल के बल पर। उन्होंने और भी गहराई में जाकर चतुराईपूर्ण तकनीकों की शृंखला तैयार की है, जिससे गंभीर एकाउंटिंग मामलों या कॉरपोरेट गवर्नेंस मामलों का खुलासा किया जा सकता है। इन मामलों को कंपनियाँ छिपाने का प्रयास करती हैं।
जबकि आधुनिक रिसर्च तकनीकों की तकनीकी जानकारी होना जरूरी है, फिर भी शेयर बाजार में सफलता के लिए सिर्फ यही एकमात्र स्थिति काफी नहीं है। इस जानकारी को कार्य की नैतिक मजबूती, चरित्र की ताकत, विनम्रता और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण, दूसरों से अलग सोच सकने की काबिलीयत के सम्मिश्रण की भी जरूरत होती है। इस आखिरी पहलू पर विशेष फोकस करते हुए, किताब इस बात पर जोर देती है कि किस तरह चरित्र की ताकत गहरे ज्ञान के साथ मिलकर एक ऐसा आधार तैयार करती है, जिससे अंतर पैदा करनेवाली सोच तैयार होती है और जो बदले में शानदार दीर्घकालीन निवेश से रिटर्न दिलाने में मददगार साबित होती है। विडंबना ही है कि जो लोग चरित्र की ताकत के इस सम्मिश्रण से लैस होते हैं, वे शायद ही पैसे या लालच से वशीभूत होते हैं; उनका एकमात्र उद्देश्य यह होता है कि वे शेयर बाजार से इतर खुद का ज्यादा-से-ज्यादा विस्तार करें और इसका नतीजा यह होता है कि वे बिना जुनून के निवेश करते हैं और सफलता हासिल करते जाते हैं।
‘कोलाहल के गुरु’ भी इसलिए, ऐसी ही एक विलक्षण सोच पर प्रकाश डालती है, जो कि उच्च वर्ग के निवेशकों की एक खास मनःस्थिति पर फोकस करती है। यह पुस्तक उन लोगों की क्वालिटी बताती है कि किस तरह उन्होंने लगातार बेहतरीन प्रदर्शन किया है, भले ही भारतीय शेयर बाजार की स्थितियाँ चाहे जैसी भी रही हों। मैं इस पुस्तक को लेकर न केवल निवेशकों को, बल्कि हर किसी को पढ़ने की सलाह दूँगा, जो इस मुक्त बाजारवाली अर्थव्यवस्था में सफल होना चाहता है। भारत धीरे-धीरे उस दिशा में अग्रसर है। धीरज, विनम्रता, साहस और तार्किक सोच, दिखने में पुरातन लगनेवाले मूल्यों का शेयर बाजार के अंदर और बाहर अब भी सम्मान है और हम सब अब भी निवेश गुरुओं से प्रेरणा ले सकते हैं, जिन्होंने पिछले 20 सालों में अपनी उन ताकतों का प्रदर्शन किया है। मैं उम्मीद करता हूँ कि ‘कोलाहल के गुरु’ से आप जितनी अधिक-से-अधिक प्रेरणा ग्रहण करेंगे, उतना ही आनंद भी पाएँगे जैसा कि मुझे प्राप्त हुआ।
—अशोक वाधवा
ग्रुप सी.ई.ओ., ऐंबिट होल्डिंग्स मुंबई

आमुख

हाई नून ऑफ इंडियन कैपिटलिजम
कोलकाता की खाली सड़कों पर पुरानी एंबेसडर कार चलती चली जा रही थी, लेकिन धुंध थी कि छँटने का नाम नहीं ले रही थी। वह जनवरी की कड़ाके की ठंड भरी सुबह थी और अपने पाँच महीने के बच्चे और पत्नी के साथ मैं एयरपोर्ट की तरफ बढ़ा चला जा रहा था। मुझे लंदन की फ्लाइट पकड़नी थी और मैं यहाँ एक पारिवारिक समारोह में शामिल होने के लिए अपने पैतृक घर आया हुआ था। वह साल 2008 था। बसों और ट्राम में लोगों को काम पर जाते हुए मैं देख रहा था कि तभी टैक्सी ड्राइवर ने मुझसे हिंदी में सवाल किया, रिलायंस पावर...सर क्या लगता? कंपनी कैसी है? जब मैंने उसे जवाब में कहा कि मैं भारत में नहीं रहता, मैं रिलायंस पावर के बारे में नहीं जानता, तो ड्राइवर को लगा कि वह मेरी कुछ मदद कर सकता है। ड्राइवर ने कहा कि रिस्क कम है और सिक्योरिटी ज्यादा है। मुझे अफसोस हुआ अपनी बुद्धि पर कि ड्राइवर मुझसे रिलायंस पावर के इनिशियल पब्लिक इश्यू (आई.पी.ओ.), जो कि उस समय देश का सबसे बड़ा आई.पी.ओ. था, के बारे में बात कर रहा था और इतनी सी बात मैं समझ नहीं पाया। उस आई.पी.ओ. के जरिए कंपनी सार्वजनिक शेयर जारी कर 100 खरब रुपए जुटाना चाह रही थी।
तब तक, ठंड भरे कुहरे और मेरे बेटे की जरूरतों पर ध्यान देने की अपेक्षाओं के बीच, मैं कौतूहल से भर उठा। आखिरकार मैं कोलकाता में था, जो कि राज्य की राजधानी थी और जिस पर कम्युनिस्ट पार्टी ने 30 साल तक राज किया था। यह वह शहर था, जिसे विद्वानों और व्यंजनों के लिए जाना जाता था, न कि इसके जोखिम लेने की भूख के लिए इसे जाना जाता था और तब भी हर दूसरा व्यक्ति, जिससे मैं पिछले हफ्ते मिला, वह आई.पी.ओ. के बारे में ही बातें करता था। पिछली शाम, डिनर टेबल पर मैंने बुजुर्ग रिश्तेदारों, वकील, वास्तुकार, अकाउंटेंट, अधिकारियों को यह चर्चा करते हुए सुना कि वे सब अगले हफ्ते आनेवाले रिलायंस पावर के आई.पी.ओ. को हासिल करने के लिए कितने लालायित हैं। मेरे बंगाली रिश्तेदारों ने पहले ऐसा जुनून न तो शेयर बाजार के लिए और न मुक्त अर्थव्यवस्थावाली इकाई को लेकर कभी दिखाया था। यह मेरे लिए सुखद आश्चर्य था, लेकिन मैं ज्यादा प्रभावित इस बात से था कि वामपंथी विचारों के गढ़ में किस तरह बदलाव की बयार चलने लगी थी।
मैंने ड्राइवर से कुछ सवाल किए ताकि मैं उसकी योजना को समझ सकूँ कि वह आई.पी.ओ. में कितना निवेश करने की सोच रहा है। वह ड्राइवर बिहार से यहाँ आया था और सालाना एक लाख रुपए कमा लेता था। उसे उम्मीद थी कि आई.पी.ओ. में वह 20 हजार रुपए निवेश तो कर ही सकता है। यह वह बचत थी, जिसे उसने पिछले कुछ सालों में जमा किया था। उसकी पिछली बचत गाँव में पानी का पंप लगवाने में खर्च हो गई थी। गाँव में ही उसके बच्चे और बीवी रहते थे और उसका वहाँ बड़ा परिवार था। उसने राष्ट्रीय स्तर की एक ब्रोकरेज फर्म की स्थानीय इकाई (सब ब्रोकरेज) के यहाँ अपना खाता खुलवा रखा था। उस स्थानीय ब्रोकर ने निवेशकों को यह बता रखा था कि यह आई.पी.ओ. किस्मतवाले निवेशकों को उनके शेयरों के बदले कम-से-कम 40 फीसद सालाना की दर से रिटर्न देने जा रहा है।
कुछ हफ्तों बाद, 11 फरवरी, 2008 को रिलायंस पावर का आई.पी.ओ. खुला। मुझे यह तो नहीं पता कि वह टैक्सी ड्राइवर खुशनसीब रहा या नहीं, जो रिलायंस पावर के आई.पी.ओ. में शेयर खरीद सका। मेरे रिश्तेदारों में से भी काफी ने आई.पी.ओ. में निवेश किया था। वे अब भी यह नहीं समझ सके हैं कि किस चीज ने उन्हें चोट पहुँचाई। एक निवेशक, जिसने आई.पी.ओ. में रिलायंस पावर में एक लाख रुपए के शेयर खरीदे थे, उसकी कीमत अगस्त 2014 में महज 32 हजार रुपए रह गई थी। इसका मतलब यह हुआ कि उन्हें सालाना 17 फीसद की दर से नकारात्मक रिटर्न हासिल हुआ और वह भी साढ़े छह साल की समय अवधि में।
कुल मिलाकर देखा जाए तो 103 खरब रुपए जनता के उस आई.पी.ओ. में निवेश हुए थे। छह साल बाद वह 103 खरब रुपए महज 33 खरब रुपए की कीमत के रह गए थे। सवाल यह है कि आखिर बाकी के 70 खरब रुपए कहाँ गए? आखिरकार यह एक प्रदर्शन करनेवाली कंपनी है, जिसने जनता के पैसे को बिजलीघर तैयार करने में निवेश करने का वादा किया था। क्या वे निवेश वास्तव में धरातल पर उतर सके या सरकार ने योजना बदल दी और अवसरवादिता में शामिल हो गई या दूसरे कारक भी वहाँ खेल में मौजूद थे, जो रिलायंस पावर के सब-पार पोस्ट आई.पी.ओ. प्रदर्शन के बारे में विस्तार से जानते थे?
रिलायंस पावर को लेकर हुआ मामला चुनिंदा मामलों में चरम स्तर की तरह था, जिसने भारतीय बाजार में निवेश को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया। भारत में निवेश के अवसर कुछ इस कदर ज्यादा थे कि लगभग सभी अखबार पढ़नेवाले उनसे वाकिफ रहते थे और फिर भी भारतीय कंपनियों की अभिभूत करनेवाली संख्या भी उन अवसरों को हकीकत में बदल पाने और अपने शेयरधारकों के लिए दो अंकों का रिटर्न दिला पाने में नाकाम साबित हो रही थी। दरअसल, पिछले 20 सालों में, 80 फीसद सूचीबद्ध भारतीय कंपनियाँ अपने शेयर पर ऐसा रिटर्न दे पाने में विफल रहीं, जो मुद्रास्फीति की दर (जो कि अमूमन 7 फीसद पर रही है) से आगे जा सका हो। फिर भी, जबकि बहुसंख्यक कंपनियाँ, जहाँ अपने शेयरधारकों को दोहरे अंकों में रिटर्न नहीं दिला पाईं, वहीं बाकी बची अल्पसंख्यक कंपनियों ने या तो जी.डी.पी. वृद्धि दर के बराबर या उससे कहीं बेहतर (जो कि पिछले दो दशक में न्यूनतम 14 फीसद के आस-पास रहा है) रिटर्न दिलाया।
इन चुनौतियों का सीधा-सीधा मतलब यह है कि भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों का बहुत छोटा तबका ही ऐसा है, जो बाजार में लंबे समय तक टिका रहा और संतोषजनक रिटर्न दे पाने में सफल हुआ। अच्छा रिटर्न हासिल करने के लिए उन निवेशकों को अपनी प्रतिभा का जबरदस्त नमूना पेश करते हुए उन अल्पसंख्यक कंपनियों का चयन किया होगा, जिन्होंने पिछले 20 सालों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूत प्रदर्शन किया और लाभ कमाने में सक्षम रहीं।
मैं जब से लंदन से भारतीय शेयर बाजार में काम करने के लिए लौटा, तभी से निवेशकों के इस उच्चवर्ग के समूह की सफलता ने मुझे आकर्षित किया है। किसी कंपनी की संभावनाओं को लेकर जब जन आकांक्षा उबाल मार रही थी, तब उस दशा में उन्होंने खुद पर कैसे काबू रखा और शांतचित्त बने रहे, वे कैसे यह समझ पाने में सफल हुए कि कौन सी कंपनी राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों से बेहतरीन तरीके से सौदा करेगी और फिर भी अपने शेयरधारकों को अच्छा रिटर्न देगी, ज्यादातर कंपनियों की अकाउंटिंग तिकड़म के बीच वे कैसे निवेश लायक उन अल्पसंख्यक भारतीय कंपनियों का पता लगा सके, जो वास्तव में अच्छा काम कर रही थीं?
यह पुस्तक उन पहलुओं पर प्रकाश डालने का प्रयास करेगी कि किस तरह कोलाहल के गुरुओं ने भारतीय शेयर बाजार में अपना पोर्टफोलियो बनाया और महत्त्वपूर्ण यह कि कैसे वे दशकों तक उथल-पुथल से भरे बाजार में खुद को पल्लवित और पोषित कर सफलता के पायदान चढ़ते गए। एक ऐसे बाजार में उनका टिके रहना वाकई प्रेरणास्पद है, जहाँ अप्रशिक्षित आँखों को बाजार का चरित्र इनाम नहीं, बल्कि जोखिम भरा ज्यादा नजर आता है।

आभार

हममें से ज्यादातर लोग मध्यवर्गीय भारतीय परिवारों में पले-बढ़े हैं और हमने अपने अभिभावकों को जीवनयापन के लिए पिसते हुए देखा है। यहाँ तक कि इस संकटग्रस्त परिवेश में, मैं मानता हूँ कि मेरे अभिभावकों ने भारत और यू.के. में बहुत सारे लोगों की अपेक्षा ज्यादा झंझावात झेले हैं, ताकि मुझे और मेरी बहन को बेहतरीन तरीके से पाला-पोसा जा सके। उन्होंने जो शिक्षा मुझे प्रदान की, उसके लिए मैं उनका ऋणी हूँ और मेरा मानना है कि जीवन एक बड़े बैंक बैलेंस से कहीं बढ़कर है। मेरे पेशेवर जीवन में, मैं तीन लोगों का ऋणी रहा हूँ और उनका आभार जताना मेरी जिम्मेदारी बनती है। जॉन के, जिनकी फर्म—लंदन इकोनॉमिक्स मेरी पहली नियोक्ता थी, जहाँ मैंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से ग्रेजुएशन करने के बाद नौकरी शुरू की, ने मुझे अपने बारे में सोचने का फायदा सिखाया, बजाय पुरातन परंपरागत बुद्धिमत्ता में भरोसा करने के। स्टीव नॉर्टन, एसेंचर में मेरे मैनेजमेंट कंसल्टेंट रहने के दौरान मेरे मैनेजरों में से एक, जिन्होंने मुझे वह ढाँचागत तरीका सिखाया, जिसके जरिए मुझे लिखना और सोचना आया, निक पॉल्सन-एलिस ने मुझे स्टॉकब्रोकिंग की दुनिया में कदम रखने का मौका दिया, जब उन्होंने दक्षिण लंदन स्थित अपने फ्लैट से क्लियर कैपिटल शुरू किया और मुझे सह संस्थापक बनने का मौका दिया।
भारतीय स्टॉक मार्केट में काम करने के कुछ वर्षों में ही मैंने इस किताब के लिए फंड मैनेजरों का इंटरव्यू करने के दौरान काफी कुछ गहनता से सीखा। इस किताब में उल्लिखित तमाम गुरुओं से परे भी तीन फंड मैनेजर हैं, जिनके प्रति मैं आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया और फंड मैनेजमेंट के तमाम पहलुओं से वाकिफ कराया—केनेथ एंद्रादे, जहीर सिताबखान और सौमेंद्र नाथ लाहिड़ी। इसी तरह से महत्त्वपूर्ण, प्रायोगिक सीख मुझे अपने दोस्तों आलोक वाजपेई और अनिरुद्ध दत्ता से मिली और मैं भारतीय स्टॉक मार्केट के महासागर में तैरने की कला सीख पाया।
पश्चिमी फंड मैनेजरों की तमाम अच्छी किताबें मशहूर हैं, लेकिन वे पश्चिमी देशों के बाहर उतनी चर्चित नहीं हैं। अतः उभरते मार्केट फंड मैनेजरों पर एक अच्छी सामग्री का यहाँ नितांत अभाव है। इस परिप्रेक्ष्य में, मुझे दो पब्लिकेशंस बेहद लाभप्रद लगे। पहला तो भारतीय फंड मैनेजरों के इंटरव्यू पर आधारित 2005 में पहला सेट लॉञ्च हुआ और उसे एक किताब में समाहित करते हुए एक किताब इंडियाज मनी मोनार्क्स लिखी चेतन पारीख ने, जो कि खुद जाने-माने मनी मैनेजर थे। दूसरा था—आउटलुक प्रॉफिट का विशेष संस्करण। यह अंक 19 मार्च, 2010 को प्रकाशित हुआ था और इस मैग्जीन में तमाम भारतीय फंड मैनेजरों के इंटरव्यू थे, जो बेहद गहनता से तैयार किए गए थे और उनकी बातों में स्टॉक मार्केट को लेकर काफी अंदरूनी जानकारियाँ निहित थीं।
मेरे नियोक्ता, ऐंबिट कैपिटल ने मुझे किताब लिखने की अनुमति प्रदान की और वह भी यह जानते हुए कि इससे मेरा ध्यान बँट सकता है और संस्था का काम प्रभावित हो सकता है। राहुल गुप्ता और अशोक वाधवा का शुक्रिया, जिन्होंने मेरी भावना को समझा और उसकी कद्र की।
तमाम सहयोगियों ने इस किताब के रिसर्चवाले हिस्से को पूरा करने में मेरी मदद की। मैं विशेष तौर पर करण खन्ना, गौरव मेहता, प्रतीक सिंघानिया, परिता अशार, रक्षित रंजन, रितिका मांकड़ मुखर्जी, पंकज अग्रवाल, नितिन भसीन, भार्गव बुद्धदेव, दयानंद मित्तल और अश्विन शेट्टी का उनके सहयोग के लिए शुक्रिया अदा करता हूँ। मैं अंकुर रुद्र का भी शुक्रिया अदा करता हूँ, जिन्होंने मेरे साथ एक दशक तक काम किया।
मैं अब अपने गृह नगर की तरफ आता हूँ, जहाँ तीन लोगों ने मेरे वहाँ होने के मौके को जमकर भुनाया। उस दौरान मैं अपने लैपटॉप पर किताब का काम कर रहा था। मेरे बच्चे—जीत और मालिनी और मेरी पत्नी सर्बानी ने मेरे तमाम नाटक और त्योरियों को झेला, जब मैं अध्यायों को लेकर खीझ जाता था। उनके स्नेह और सहयोग के बिना मेरे लिए इस किताब को पूरा कर पाना संभव नहीं था और न ही स्टॉक मार्केट में मैं इतने लंबे समय तक झंझावातों को ही झेल पाता। मैंने यह किताब उन्हें ही समर्पित की है और वादा किया है कि साल भर से पहले अगली किताब शुरू नहीं करूँगा।
यह किताब बगैर अरुंधती दासगुप्ता की बिजनेस स्टैंडर्ड बुक्स के बगैर पूरी नहीं होती और उन्होंने मुझे प्रेरित न किया होता तो तीन साल के दौरान यह किताब शायद पूरी न हो पाती। मैं उनका शुक्रिया अदा करता हूँ, जिन्होंने मुझे इस किताब को लेकर पूरी तरह फोकस्ड रखा और मैं बीयर मार्केट में ब्रोकरेज के लिए भारी संघर्ष के दबाव से मुक्त हो सका।
और अंत में मैं विशेष शुक्रिया अदा करना चाहूँगा ऐंबिट के अपने स्टाफ का। मुझे पेय पदार्थ देनेवाले से लेकर उन लोगों तक का, जिन्होंने ऑफिस का माहौल बेहद सौम्य बनाए रखा और उन लोगों का भी, जो रोज सुबह ऐंबिट हाउस की छत पर तिरंगा फहराते हैं। इन सबका सहयोग हमारे दैनिक जीवन को हमेशा खास और आनंदमय बनाए रहा और इस तरह इस किताब से प्राप्त होनेवाली रॉयल्टी ओदिती फाउंडेशन को जाएगी, जो ऐंबिट की तरफ से बनाई गई एक गैर लाभकारी संस्था है, जो इस संस्था के स्टाफ की मदद के लिए है।

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10,000 घंटे
हैदराबाद—पावर, इंफ्रास्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन का स्वर्ग
मैं और मेरा परिवार 2008 की गरमियों में भारत लौटा था। यह वह दौर था, जब इंडियन प्रीमियर लीग का पहला सीजन समाप्ति की ओर था। हालाँकि शेयर बाजार जनवरी 2008 में चरम पर पहुँच चुका था, लेकिन अर्थव्यवस्था को लेकर यही महसूस किया जा रहा था कि पिछले चार साल से द्रुतगति से दौड़ रही सुपरचार्ज आर्थिक वृद्धि अभी और ऊपर जाएगी। लंदन-आधारित इक्विटी रिसर्च बिजनेस को बेचकर, जिसे मैंने कहीं बड़े ब्रिटिश ब्रोकरेज फर्म के साथ मिलकर खड़ा किया था, मैं अपने नए मालिकों द्वारा मुंबई भेज दिया गया, ताकि उनका भारतीय कारोबार खड़ा कर सकूँ। मैंने तय किया कि मैं कुछ महीने हर क्षेत्र में काम कर रहीं भारतीय कंपनियों के दिग्गजों से भेंट-मुलाकात करूँगा। इसी क्रम में अगस्त 2008 के गरमी से भरे एक दिन मैंने हैदराबाद की फ्लाइट पकड़ी।
देश की दिग्गज पावर और कंस्ट्रक्शन कंपनियों में से एक के चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर (सी.एफ.ओ.) से मिलने के लिए मैं मुंबई से हैदराबाद के लिए उड़ा। मेरे साथ मेरे सहकर्मी थे, जो पावर सेक्टर के विशेषज्ञ थे। उस पूरी यात्रा के दौरान हम उस कंपनी की बैलेंस शीट को समझने की नाकाम कोशिश करते रहे, जिसमें कर्ज के कॉलम में बेहद भारी आँकड़ा दर्ज था और यह बैलेंस शीट के असेट यानी संपत्ति और लाइबिलिटीज यानी जिम्मेदारी के दोनों ओर दर्ज था। कंपनी ने उतना ही लोन ले रखा था, जितना कि उसे शेयरधारकों से रकम मिली हुई थी। यही नहीं, एक और दिलचस्प बात, कंपनी ने अपने शेयरधारकों से मिली रकम का दो गुना पैसा उधार भी दे रखा था। आखिर यह कंपनी इतना ज्यादा पैसा उधार क्यों दे रही थी और कौन था, जिसे यह उधार दिया गया?
तीन घंटे बाद, हमें तब जवाब मिला, जब हमने सी.एफ.ओ. से इस बाबत सवाल किया; पहले तो लंच पर विनम्र तरीके से और उसके बाद उनके ऑफिस में बेहद गंभीर और गहन पूछताछ के बाद। लिस्टेड कंपनी (काल्पनिक नाम लिस्टको रख लेते हैं) ने तमाम शेल कंपनियों (छिपी कंपनियाँ) को उधार दे रखा था। उन शेल कंपनियों ने उन पावर प्लांट्स में शेयर खरीद रखे थे, जिनके टेंडर लिस्टको कंपनी ने खरीद रखे थे। इन पावर प्लांट्स में से प्रत्येक का मैनेजमेंट एक विशेष उद्देश्य साधन यानी स्पेशल परपज वेहिकल (एस.पी.वी.) के माध्यम से सँभाला जाता था, जो बदले में लिस्टको कंपनी को कंस्ट्रक्शन का ऑर्डर देता था। इस तरह लिस्टको कंपनी द्वारा जारी लोन कंपनी के प्रॉफिट ऐंड लॉस अकाउंट (पी ऐंड एल) में आमदनी और अंततः लाभ के रूप में नजर आने लगते थे। सरल तौर पर, लिस्टको कंपनी ने बैंक से उधार लिया, फिर उसने खुद को उधार दिया और फिर उसे लाभ के तौर पर भी दिखा दिया।
यह लाभ, जिसे लिस्टको अपने पी एंड एल में दिखा रही थी, वह वास्तव में शेयरहोल्डरों की इक्विटी को बढ़ा रहा था। इसका नतीजा यह हुआ कि लिस्टको को बैंकों से और उधार मिलने की राह आसान हो गई, जिससे और अधिक पावर प्लांटों के निर्माण के लिए वित्त की व्यवस्था आसान हो गई (जिसके लिए कंस्ट्रक्शन लिस्टको के पास ही जाना तय था)। इस तरह यह अपवित्र गठजोड़ जारी रहा। (मुझे बाद में पता चला यह कंपनी, दरअसल अकाउंटिंग स्टैंडर्ड 21 का उल्लंघन कर रही थी।)
मुझे कुछ महीने और लगे और मैं अकाउंटिंग के महारथियों का पूरा खेल समझने लगा था। मैं न केवल संदेह के दायरे में आई कंपनी का खेल समझ रहा था, बल्कि यूटिलिटीज, इंफ्रास्ट्रक्चर, कंस्ट्रक्शन और भारत के रियल स्टेट सेक्टर में चल रही धाँधली को भी पकड़ पा रहा था। आनेवाले वर्षों में, जिन निवेशकों ने मेरी बात मानी और मेरे विचारों का समर्थन किया, उनका तो कंपनियों के फाइनेंशियल स्टेटमेंट और बिजनेस मॉडल से ही भरोसा उठ गया और अंततः उन कंपनियों के शेयरों के दाम भी जमीन पर आ गए। साल 2008 में शेयर बाजार के चरम के दौरान इन चार सेक्टरों में ही केवल भारतीय शेयर बाजार का 20 फीसद (या 14.5 ट्रिलियन रुपए) का मार्केट कैपिटलाइजेशन यानी बाजार पूँजीकरण हुआ पड़ा था। अब अगस्त 2014 में यह आँकड़ा घटकर महज 10 फीसद (या 9.3 ट्रिलियन रुपए) पर आ गया, जिसका मतलब यह हुआ कि जिन्होंने साल 2008 में उपर्युक्त सेक्टरों में शेयर खरीद रखे थे, उन्होंने पाँच ट्रिलियन रुपए (लगभग 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर) की अपनी संपत्ति गँवा दी थी।
पावर, इंफ्रास्ट्रक्चर, कंस्ट्रक्शन और रियल स्टेट कंपिनयों के अकाउंटिंग के महारथियों से बढ़कर, जो चीज ज्यादा दिलचस्प थी, वह यह कि उस दौर में ज्यादातर निवेशक भी खोजबीन करना उचित नहीं समझते थे। वास्तव में ज्यादातर फंड मैनेजर इन कंपनियों के संदिग्ध खातों को बखूबी समझते थे; फिर भी वे जोर देते थे कि लोग इन कंपनियों के शेयर ज्यादा-से-ज्यादा संख्या में खरीदें।
हालाँकि 2007 से 2010 के बीच भारत जिस मोह के चरम पर फँसा हुआ था, निवेशकों का एक छोटा समूह ऐसा भी था, जिसने खुद को इन सेक्टरों के शेयरों से बिल्कुल स्पष्ट तौर पर दूर रखा हुआ था। मेरे जैसे लोगों के लिए, जिन्होंने अभी-अभी भारत में कदम ही रखा था, कुछ चीजों ने निवेशकों का एक छोटा समूह बना दिया, जिनकी इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि उन्होंने एक ऐसे समय में उन हॉट सेक्टरों से दूरी बनाए रखने में भलाई समझी जब—
 इन सेक्टरों के सी.ई.ओ. को बिजनेस मैग्जीनों के कवर पेज पर तराशा जा रहा था;
 औसत फंड मैनेजर इन सेक्टरों से पैसा पीट रहे थे (और उन निवेशों से छोटी अवधि का इनाम हासिल कर रहे थे) और
• तमाम फंड मैनेजमेंट हाउसों के मार्केटिंग डिपार्टमेंटों में धड़ाधड़ इंडिया इंफ्रास्ट्रक्चर फंड लॉञ्च करने की होड़ मची हुई थी।
दुनिया के तमाम उभरते हुए बाजारों में इस तरह की अंधी दौड़ आमतौर पर कई दशकों तक देखी जा सकती है, जिसमें भ्रामक अकाउंटिंग, कई तरह के भ्रष्टाचार और निम्न तरलता (दुनिया के 15 बड़े शेयर बाजारों में भारत सबसे कम तरलतावाला देश माना जाता है1) कुछ चुनिंदा गुणों के रूप में विद्यमान रहते ही हैं। यह किताब कुछ ऐसे ही लोगों की मनःस्थितियों के ऊपर भी केंद्रित है। यह उनके मनोविज्ञान, उनके कॅरियर और उनके सफल दीर्घकालिक निवेशक बनने के पीछे की कहानी पर ज्यादा बात करती है।
इसके अंतिम अध्याय में, यह किताब आपसे सवाल करेगी कि क्या आप और मैं उस प्रकार निवेश कर पाए, जिस प्रकार से उन अल्पसंख्यक निवेशकों ने निवेश किया और सफलता भी हासिल की।
हैदराबाद के सूत्र वर्ली से पकड़ में आए।
मुंबई में एक दौर था, जब सिंथेटिक कपड़ों की कंपनी निर्लान की तूती बोलती थी। 1970 और 1980 की शुरुआत में तब लाइसेंस राज अपने चरम पर था, निर्लान नाइलॉन पॉलिस्टर और नाइलॉन टायरकॉर्ड का उत्पादन करती थी। व्यवसाय से होनेवाली जबरदस्त आय को कंपनी ने कहीं निवेश करने की योजना बनाई। कंपनी ने वर्ली में ऑफिस के उद्देश्य को लेकर बहुमंजिली इमारत बनवाई, जिसका नाम था ‘निर्लान हाउस’। दुर्भाग्य से, 1980 के उत्तरार्ध से, निर्लान की किस्मत ने ऐसी पलटी खाई कि भारत में 1991 के बाद से लाइसेंस राज की समाप्ति के चलते माँग से अधिक सिंथेटिक कपड़ों का उत्पादन होने लगा। 1988 में निर्लान को आधिकारिक रूप से बीमार कंपनी घोषित करना पड़ा और यह स्थिति 2006 तक बनी रही।
हालाँकि 80 के दशक में भले ही निर्लान की किस्मत खराब होनी शुरू हुई हो, लेकिन निर्लान हाउस के रूप में एक अच्छी कंपनी का उदय भी हुआ। 1988 में, वर्ली की इस कम चर्चित बिल्डिंग में, क्रिसिल का जन्म हुआ। हालाँकि क्रिसिल भारत में क्रेडिट रेटिंग देनेवाली अग्रणी कंपनी है और अब उसका हेडक्वार्टर भले ही वहाँ से 20 मील दूर पवई में खूबसूरत और विशेषीकृत रूप से तैयार ऑफिस में स्थानांतरित हो गया हो, लेकिन 1980 के उत्तरार्ध में निर्लान हाउस में उस फर्म के पहले प्रबंध निदेशक प्रदीप शाह ने इस ऐतिहासिक संस्थान की नींव रखी थी। ऐसा करके उन्होंने भारत में आधुनिक क्रेडिट रिसर्च की शुरुआत कराई और इसका प्रभाव यह हुआ कि भारत में कॉर्पोरेट बॉण्ड मार्केट की सक्रिय रचना हुई।
श्री शाह, जो कि एक पावरहाउस थे, ने आधुनिक दौर के तमाम वित्तीय पेशेवरों को प्रभावित किया, अकेले नहीं रह गए; 1980 के उत्तरार्ध और 1990 की शुरुआत में, तमाम असाधारण महिलाओं और पुरुषों ने क्रिसिल का साथ पकड़ा और वे लोग देश के पहले ऐसे पेशेवर बने, जिन्होंने वित्तीय दस्तावेजों का पेशेवराना विश्लेषण करना और कंपनियों को रेटिंग देने की कला सीखी। ऐसे ही युवा प्रतिभावानों में से एक थे संजय भट्टाचार्य, जिन्होंने वर्ष 2000 में एच.डी.एफ.सी. असेट मैनेजमेंट की स्थापना कराई और कंपनी के संस्थापक चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर बने। यह कंपनी अब भारत का सबसे बड़ी म्यूचुअल फंड हाउस है, जिसके अंतर्गत एक ट्रिलियन रुपए का प्रबंधन किया जाता है।
क्रिसिल में शामिल होने से पहले, संजय पहले ही चार साल का अनुभव मार्केट रिसर्च कंपनी मार्ग (MARG), जो कि मार्केट रिसर्च में एक जाना माना नाम है, में ले चुके थे। उन्होंने आई.आई.एम. अहमदाबाद से एम.बी.ए. कर रखा था, लेकिन यह क्रिसिल ही थी, जिसमें 1988 में संजय को उनके गुरु मिले और यहाँ से उनकी जिंदगी बदल गई। क्रिसिल छोड़ने के बीस साल बाद भी, संजय ने मुझे बताया कि प्रदीप शाह ने उनके जीवन को किस प्रकार मूल्यवान् बना दिया।
जब उनसे पूछा कि एक युवा आई.आई.एम. ग्रेजुएट को किस चीज ने बेहद प्रभावित किया, तो संजय ने कहा, ‘‘वह (प्रदीप शाह) कहते थे कि आप लोग अपनी गलतियों से सीखें, क्योंकि आप लोग, जो गलतियाँ करेंगे, उनसे मुझे कोई दिक्कत नहीं है। सिर्फ इतना करें कि उन्हें दोहराने से बचें।’’ क्रिसिल में हम सबको उनके इस रवैये से काफी मदद मिली। किसी कंपनी को लेकर कई दिन तक अध्ययन करने के बाद मैं सोचता था कि मैंने काफी कुछ सीख लिया है। फिर मैं प्रदीप से मिलता और उनसे अपने निष्कर्षों पर चर्चा करता और तब हम लोग उन चीजों पर आकर सहमत होते कि हमें कंपनी के मालिकान से क्या बात करनी है। प्रदीप से मेरी बातचीत 15 मिनट होती और तब वे मुझसे तीन सवाल करते, जो इसे स्वाभाविक बना देता, उनकी तुलना के अनुसार, मैं कंपनी के बारे में वाकई नहीं जानता। संजय जोर देकर कहते कि क्रिसिल में बिताए सालों ने उनकी विश्लेषणात्मक क्षमताओं को आकार दिया। कठोर मेहनत, विस्तृत होना और बिजनेस डाटा के आकलन करने के दौरान संशय बनाए रखने की महत्ता उन्होंने वहीं सीखी। क्रिसिल में रहने के दौरान संजय कंपनियों के प्रमोटरों के साथ मीटिंग करने में व्यस्त रहते और जो वित्तीय लेखा-जोखा उन्हें दिया जाता, उसका विश्लेषण करते रहते, जिससे उनकी एक तरह से फाइनेंस की ट्रेनिंग ही होती रहती और जिसे पैसे से नहीं पाया जा सकता।
अपने कॅरियर के शुरुआती दिनों में इस तरह का असाधारण प्रयोग और वह भी ऐसे गुरुओं की देखरेख में सीखना या गुणोत्तर प्रगति करनेवाले संगठन की चारदीवारी में सीखना, उन दिनों एक सामान्य प्रक्रिया थी और ऐसे बहुत से महारथी निवेश गुरुओं का इस किताब में लगातार जिक्र है। दरअसल, एक अमेरिकी लेखक मैल्कम ग्लैडवेल और ब्रिटिश टेबल टेनिस चैंपियन कम लेखक मैथ्यू सईद ने एक पैटर्न बनाकर दिखाया कि इन ज्ञानी गुरुओं द्वारा, जो अलग-अलग क्षेत्रों में सफलता के झंडे गाड़ रखे थे, दिया जानेवाला दीर्घकालीन उद्देश्यपरक प्रशिक्षण आप पर एक हॉलमार्क की तरह है। अपनी विचारोत्तेजक किताब—‘आउटलायर्स : द स्टोरी ऑफ सक्सेस’, में लेखक ग्लैडवेल ने सफलता को लेकर हमारे परंपरागत विचारों को बिल्कुल उलटकर रख दिया, जिसमें हम यह मानते थे कि सफलता अमूमन जन्मजात प्रतिभावानों के हिस्से में आती है और ऐसे लोग महामानव की श्रेणी में आते हैं। विपरीत उदाहरणों का प्रयोग करके जैसे बिल गेट्स, द बीटल्स, कनाडियन आइस हॉकी खिलाडि़यों और न्यूयॉर्क में यहूदी वकीलों के माध्यम से ग्लैडवेल ने निष्कर्ष निकाला कि सफलता कुछ गहन प्रयोगों का अनूठा मिश्रण है। साधारणतया, कई हजार घंटों का अभ्यास और सामाजिक हालात, उदाहरण के लिए, उचित समय पर, उचित जगह और उचित अभिभावकों के यहाँ जन्म लेना भी मायने रखता है। मैथ्यू सईद ने इसी आधार के विचारों को खेल में भी प्रयोग किया।
अपनी प्रेरणास्पद किताब, ‘बाउंस—द मिथ ऑफ टैलेंट ऐंड द पावर ऑफ प्रैक्टिस’, में मैथ्यू सईद ने गैलडवेल की सोच और उठाया तथा उसे विस्तार दिया। यू.के. के नंबर एक टेबल टेनिस खिलाड़ी सईद ने उपलब्धियाँ हासिल करनेवाले प्रतिभावान महामानवों को लेकर हमारी बहुत सारी मिथ्या सोच पर पानी फेर दिया। सईद ने सफलता दिलानेवाली बातों को प्रमुखता से बताया—
10 हजार घंटे अभ्यास : ‘...विज्ञान की कला के दृष्टिकोण से, बोर्ड गेम से तथा टेनिस के दृष्टिकोण से यह पाया गया है कि न्यूनतम दस साल चाहिए होते हैं किसी भी पेचीदा काम में दक्ष होने में...आउटलायर्स (किताब) में...मैल्कम ग्लैडवेल ने इस ओर इशारा किया है कि उल्लेखनीय प्रदर्शन करनेवाले सालाना एक हजार घंटे अभ्यास करते हैं। इस आधार पर उन्होंने इसे पुनः व्याख्यायित किया कि दस साल में दस हजार घंटे का अभ्यास आपको उच्च स्तर का खिलाड़ी बना सकता है।2
कोचों और संस्थानों का मार्गदर्शन : जो कि उद्देश्यपरक अभ्यास के लिए प्रेरित करता हो। सीखने और विकास करने की पूरी प्रक्रिया ज्यादा प्रभावी हो जाती है, अगर यह अभ्यास विशेषज्ञों की निगरानी में किया जाए, जो उभरते सितारे की गलतियों को पकड़ सकें और उन्हें न केवल दूर करने के उपाय करें, बल्कि उसकी ताकत का दोहन कर सकें।
 कल के सितारों को ऐसा माहौल प्रदान करना, ताकि कल को उन्हें उपर्युक्त दोनों का लाभ मिल सके। इस माहौल के पनपे बगैर और उन अवसरों के बिना, जो उस माहौल में पनपते हैं, हम सचिन तेंदुलकर, विश्वनाथ आनंद, नारायण मूर्ति और वॉरन बफे जैसे प्रतिभावानों से वंचित रह जाते। इस तरह का माहौल प्रदानकर बहुत से युवा स्त्री और पुरुषों को अगली पीढ़ी का बिल गेट्स, आकियो मोरितास, दीपक पारेख और वीरेंदर सहवाग बनाया जा सकता है।
इस किताब में मैंने इस चीज का प्रयोग भारत में निवेश प्रबंधन के पेशे में करने का प्रयास किया है। मेरे दशकों के स्टॉकब्रोकिंग के अनुभव ने मुझे फंड मैनेजरों के क्रियाकलापों को दो अलग देशों—यू.के. और भारत, खासकर तिमाहियों के समापन के दौरान देखने का अवसर प्रदान किया है और जो कुछ भी मैंने पाया है, उससे मुझे यह तो समझ में आ गया है कि बड़े पैमाने पर पैसे का सफलतापूर्वक प्रबंधन और वह भी लंबे समय तक; यहाँ से आता है—
 एक दशक या उसके आस-पास की बेहद कठिन ट्रेनिंग, जिसमें कंपनियों का विश्लेषण, प्रबंधकीय टीमों से पूछताछ, प्राथमिक डाटा सूत्रों का खनन और बिजनेस साइकल को समझना शामिल है;
 बौद्धिक निष्ठा पर भी काफी कुछ निर्भर करता है और उसका जुनूनी स्तर बरकरार रखना भी चुनौतीपूर्ण है। ऐसा इसलिए, ताकि शोधकार्यों में कंपनी को समझने और तत्परता को लेकर कहीं शॉर्टकट न अपनाया जा सके। खासकर प्रशिक्षण काल का शुरुआती दौर पूरा होने के बाद यह सुनिश्चित करना कि क्लाइंट की संपत्ति संरक्षित है और उच्च स्तर पर सहेजी जा रही है और
 प्रशिक्षण, स्व जागरूकता और विनम्रता के जरिए, जो क्षमता विकसित की गई है, ताकि रोज के लालच और भय से सफलतापूर्वक पार पाया जा सके और ऐसे निवेशकों से दूर रहकर बचा जा सके, जो इन प्राथमिक भावनाओं में आकर गलत राह चुन लेते हैं।
दिलचस्प तौर पर, मैं यहाँ कुछ व्यावहारिक गलतियों की ओर इशारा करना चाहता हूँ, जिन्हें सफल फंड मैनेजर कभी नहीं दरशाते। स्टॉक मार्केट में लंबे समय तक पैसा बनाने का मूल मंत्र कुछ इस तरह है—
 लालच या सुपरिरिच होने की चाह न के बराबर होनी चाहिए। वास्तव में, भले ही यह खुद में विचित्र लगे, लेकिन शेयर बाजार में लोभ के लिए जगह नहीं है और यह विनाशकारी लक्षण माना जाता है।
 वित्तीय ज्ञान के अलावा शेयर बाजार में काम कर रहे शख्स को देश की राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक और संस्कृति के बारे में भी अच्छी जानकारी होनी चाहिए। दरअसल, सर्वश्रेष्ठ फंड मैनेजर बेहद जिज्ञासु और उत्सुकता रखनेवाले लोग होते हैं। ये ऐसे लोग होते हैं, जिन्हें उदाहरण के लिए, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी दिलचस्पी होती है। ये टेस्ट क्रिकेट में भारतीय टीम के प्रदर्शन में गिरावट के कारणों के बारे में भी उतना ही जानते हैं, जितना कि शेयर बाजार में बहुसंख्यक अद्यतन पी/ई (प्राइस/अर्निंग) को समझते हैं।
 उन्हें आक्रामकता, अपने व्यक्तित्व का दिखावा और वॉल स्ट्रीट को केंद्र में रखकर बननेवाली हॉलीवुड फिल्मों में आप जिस तरह का व्यवहार देखते हैं, उस तरह का शायद ही आपको इन लोगों में देखने को मिले। यानी ये बेहद सामान्य, सरल और सहज तरीके से अपना काम करते रहते हैं। गुरुओं ने इस किताब में उनके बारे में व्याख्यायित किया है कि वे बेहद सरल प्रोफाइल अपनाते हैं।
हालाँकि उनमें से किसी को भी अंतर्मुखी नहीं कहा जा सकता, फिर भी फंड मैनेजरों में से कुछ ही मीडिया के व्यक्तित्व भी होते हैं। इस किताब का मूल उद्देश्य यह नहीं है कि आप और मैं सुपरस्टार फंड मैनेजर बन सकते हैं या नहीं बन सकते। हमारी कुछ कर गुजरने की क्षमता उससे कुछ कम या ज्यादा नहीं, जिसके बल पर शतरंज ग्रैंडमास्टर्स या पुरस्कार जीतनेवाले लेखक या सेलिब्रिटी शेफ आगे दिखते हैं, बल्कि महारत हासिल करने के लिए हमें लंबे समय तक मेहनत और लगन से उस क्रम में अभ्यास करना होता है, जिसके बारे में इस किताब में उन लोगों का जिक्र किया गया है, जिन्होंने मेहनत के बल पर ऊँचाई हासिल की।
जैसा कि महानतम ब्रिटिश फंड मैनेजर एंथनी बोल्टॉन ने अपनी सेवानिवृत्ति के उपरांत लिखा है, ‘‘अनुभव कीमती है। जैसा कि मार्क ट्वेन ने कहा है, इतिहास खुद को कभी नहीं दोहराता, बल्कि तुकबंदी करता है। एकसमान पैटर्न समय समय पर बार-बार खुद प्रकट होते हैं और एक व्यक्ति तब तक सौम्य निवेशक नहीं बन सकता, जब तक कि उसे पूरे अर्थशास्त्र और शेयर बाजार के चक्र का अनुभव नहीं होता।’’3
इस संबंध में किताबी कीड़ों को एक सफल दीर्घकालीन निवेशक बनने के लिए उसी तरह की यात्रा करनी पड़ती है जैसे कि ज्यादातर सफल उपन्यासकारों ने राह चुनी है। अनुभव, ज्ञान और पहलुओं के बहुत सारे स्तरों को हासिल करने के लिए कोई शॉर्टकट नहीं है, जिसे लगभग एक दशक तक शेयर बाजार की धूल फाँकने के बाद आपको प्राप्त होता है, लेकिन केवल समय ही अकेले काफी नहीं है। आवश्यक रूप से मध्य वर्ग के चरित्र के पहलुओं को देखते हुए, जैसे कि कठोर काम की नीति, विनम्रता, जिज्ञासा; सबकुछ मिलाकर मन की स्वतंत्रता और चरित्र ही सफलता के केंद्र में होता है।
दस साल पहले, जब मैंने इक्विटी विशेषज्ञ के रूप में काम शुरू किया था तो मुझे याद है कि दक्षिण लंदन के छोटे से फ्लैट में बनाए संकुचित से कार्यालय में मैं ब्रिटिश फंड मैनेजरों को बुलाता था, जो छोटे कैपवाले निवेश आइडिया के बारे में सुनते थे। मुझे यह देखकर हैरत होती थी कि यू.के. में छोटे कैप के ज्यादातर निवेशक वे थे, जो मुझसे फोन पर चर्चा करके अपना अच्छा समय बिताते थे, जबकि मैं इक्विटी रिसर्च में प्रशिक्षु लाइसेंस के साथ अपनी राह बनाने में पसीना बहा रहा था, तभी फरवरी 2004 में मेरे पास एक फोन आया, जो एडिनबरा आधारित निवेश कंपनी एबरफोर्थ पार्टनर्स के डेविड रॉस ने किया था। यद्यपि कि मैं उस दौरान नौसिखिया था, लेकिन मैं जानता था कि एबरफोर्थ पार्टनर्स यू.के. का प्रमुख स्मॉल कैप इन्वेस्टमेंट हाउस था और एडिनबरा के छोटे से शहर से ही अनेक बिलियन पाउंड की रकम का प्रबंधन करता था। डेविड रॉस, जो कि उस फर्म में एक पार्टनर थे, उनकी एक विशेषता यह भी थी कि मूल्यों के निवेश की कला के वे बेहद सम्मानित पादरी भी थे।
फंड मैनेजरों को शायद ही कभी ब्रोकर कहा जाता है, ब्रोकर के जीवन का यह एक सत्य है, जो कि उसके करियर में शुरू में ही जुड़ जाता है। मेरे जैसे के लिए, डेविड रॉस सचिन तेंदुलकर की तरह थे, स्कूली छात्र क्रिकेटर। मेरा उत्साह तब तकलीफ में बदल गया, जब डेविड ने कहा कि मैं तुम्हारी रिसर्च पढ़ता रहा हूँ। मैं चाहता था कि तुम्हारे ऑफिस आकर तुमसे मिलूँ। एक सर्वकालिक महानतम निवेशक के इन विचारों से भयाक्रांत, जो कि इस समय लंदन के बिल्कुल गलत हिस्से में बने मेरे फ्लैट के ऑफिस में मौजूद था, मैंने किताब में मौजूद हर चाल से डेविड को आश्वस्त करने का प्रयास किया कि उनका यहाँ आना फिजूल था। अंततः मैंने कहा कि मुझे बेहद खुशी होगी अगर मुझे एडिनबरा के लिए सबसे पहली उड़ान मिल जाए और मैं दौड़कर मेलविले स्ट्रीट पर बने एबरफोर्थ के ऑफिस पहुँच सकूँ। डेविड के पास कुछ नहीं था। वे स्पष्ट तौर पर यह देखना चाहते थे कि हम कौन हैं और हमारे कार्यालय कैसे दिखते हैं। इसलिए, अनिच्छुक होकर, मैंने भी उन्हें अपने पते दे दिए थे।
अंततः, बड़ा दिन आ ही गया, यह कुछ इस तरह लग रहा था मानो पोप स्वयं पधार रहे हों। छोटी सी टीम ने खुद को ठीक-ठाक बनाया और दरवाजे की घंटी बजने का इंतजार करने लगी। डेविड पहुँचे, उन्होंने कॉफी का पहला मग उठाया और फिर बोले कि हमारे काम की ताजगी से उन्होंने समझ लिया है, यह एक स्टार्ट अप है। वह यहाँ तक आए तो महज इसलिए ताकि हमें उत्साहित कर सकें और हमें अपने प्रयासों को और ऊँचा उठाने को प्रेरित कर सके, हमें सुनिश्चित कर सकें कि उनकी फर्म हमारे काम के लिए भुगतान कर सकें और सबसे जरूरी, स्माल कैप इन्वेस्टिंग के तकनीकी पहलुओं से रूबरू कराते हुए इससे पार पाने में हमारा मार्गदर्शन कर सकें। उनको आने की जरूरत नहीं थी; हम स्वयं स्कॉटलैंड जाकर उनसे मिलने में अपार हर्ष महसूस करते। वे यहाँ आए, क्योंकि वे जिज्ञासु थे, वे नए लड़कों से उनके ठिकाने के पिछवाड़े में मिलना चाहते थे और एक टीम को प्रोत्साहित करना चाहते थे, जिसे लेकर वे महसूस करते थे कि आनेवाले वर्षों में वह टीम निवेश के नए तरीके खोजेगी।
व्यवहार का यह विपरीतार्थक पैटर्न कि ज्यादातर दीर्घकालिक सफल निवेशक अकसर ऐसे लोग होते हैं, जो कि नए लोगों से मिलने के प्रति ज्यादा उत्सुक होते हैं, वे ज्यादा-से-ज्यादा नए विचारों को सुनने के इच्छुक होते हैं और वे ज्यादा समय खर्च करते हैं निवेश की कला को लेकर चर्चा करने में। ये सब संकेतात्मक चीजें हैं, जो बताती हैं कि इन लोगों के लंबे समय तक बाजार में टिके रहने का मूल मंत्र क्या है।
दीर्घकालिक निवेशकों पर फोकस क्यों करें?
इससे पहले कि हम किताब के ढाँचे की तह में गोता लगाएँ, मैं चाहता हूँ कि इस बारे में विस्तार से बताऊँ कि मैंने इस किताब में क्यों दीर्घकालीन निवेशकों को लेकर फोकस किया है और जो विरोधाभासी भी है, मान लीजिए, छोटी अवधि के सटोरियों के, जबकि इक्विटी बाजार में निवेश के और भी सफल तरीके मौजूद हैं, ऐसे में उनकी वह क्षमता, जो कि लंबी अवधि में बाजार को पछाड़ते हुए कहीं
ज्यादा रिटर्न देने की कुव्वत रखती है (मान लें कि तीन साल या उससे ज्यादा में) तो यह चीज भारतीय परिपेक्ष्य में अब तक साबित नहीं हुई थी। ज्यादातर परिपक्व बाजारों, जैसे कि अमेरिका के, जहाँ बड़ी मात्रा में तरलता और अधिक पारदर्शिता मौजूद है, वहाँ छोटी अवधि की ट्रेडिंग की जा सकती है और लंबे समय से यह क्रम सफलतापूर्वक चल भी रहा है और महान् अमेरिकी निवेशकों जैसे कि जॉर्ज सोरोस, जूलियन रॉबर्टसन और माइकल स्टेनहार्ट ने इसे साबित भी कर दिखाया है।
हालाँकि भारत के मामले में, जहाँ कम तरलता एक मुद्दा है और यह 15 बड़े इक्विटी बाजारों में सबसे पीछे भी है, केवल एक ही तरीका काम आ सकता है कि निवेशकों का पैसा लंबे समय के लिए बाजार में लाया जा सके। इसलिए यह किताब उन चीजों पर फोकस करती है कि किस तरह भारत में चुनिंदा दीर्घ-कालीन निवेशकों ने अपने दिमाग को अथक प्रयास करके प्रशिक्षित किया है और पिछले बीस सालों में वे निरंतर इंडेक्स को पीछे छोड़ते रहे हैं।
इस किताब के परिणामोत्तेजक अध्यायों में, हमने तीन कठिन पहलुओं को खँगाला है, जिसमें दीर्घकालीन निवेश की सफलता के गुण को उभारा गया है—
 अथक शोध;
 सफल निवेश के लिए सरल थंब रूल और
 धैर्य, चरित्र और विपरीत चलने की कला।
इस किताब का अंतिम अध्याय तब मस्तिष्क विज्ञान और मनोविज्ञान को लेकर अद्यतन शोध (लेटेस्ट रिसर्च) का प्रयोग करते हुए इस सवाल कि क्या आप दीर्घकालीन सफल निवेशक बन सकते हैं, पर अपना मंथन केंद्रित करता है।
इन अध्यायों को ऐसे गुरुओं के साक्षात्कारों से भी लैस किया गया है, जिन्होंने भारतीय बाजार में एक दशक या उससे अधिक समय से सफलता के झंडे गाड़ रखे हैं। दिग्गजों के साक्षात्कारों को देने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि इस किताब में बताई गई बातों और सिद्धांतों को व्यावहारिक तौर पर भी साबित करके दिखाया जा सके।
इस अध्याय के तत्काल बाद हमने संजय भट्टाचार्य से बात की, जिनके बारे में पहले बताया जा चुका है, एच.डी.एफ.सी. असेट मैनेजमेंट जैसे पावरहाउस को खड़ा करने में संजय अहम् भूमिका निभा चुके हैं। दूसरे अध्याय के बाद हमने एलरॉय लोबो से साक्षात्कार किया, जिन्होंने संजय की तरह ही इक्विटी विश्लेषक के शानदार कॅरियर को एक ऊँचाई देने के बाद, कोटक महिंद्रा बैंक के असेट मैनेजमेंट कारोबार को अपने हाथ में लिया। एलरॉय के नेतृत्व में पिछले सात साल से कोटक भारत के टॉप 10 म्युचुअल फंड हाउसों में से एक बन गया है। तीसरे अध्याय के बाद, हम आपकी मुलाकात दो खास निवेशकों-आकाश प्रकाश, जो कि भारत के पहले हाई प्रोफाइल फंड मैनेजरों की श्रेणी में आते हैं और जिन्होंने अपना खुद का फंड मैनेजमेंट हाउस (अमांसा) खड़ा किया और शंकरन नारायण, जो कि आई.सी.आई.सी.आई. प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड के सी.आई.ओ. हैं, से कराएँगे। नारायण देश के एकमात्र सी.आई.ओ. हैं, जिन्हें मैं जानता हूँ और जिन्होंने अपने पिता के पैसे का निवेश करना तब शुरू किया था, जब वे चेन्नई में हाइस्कूल में थे। नारायण ने 2004 में जब आई.सी.आई.सी.आई. प्रूडेंशियल में बतौर फंड मैनेजर ज्वाइन किया, तब तक वे शेयर बाजार में पिछले 15 साल तक निवेश कर चुके थे।
पिछले एक दशक के दौरान, फर्स्ट स्टेट स्टिवर्ट, जो कि फर्स्ट स्टेट इन्वेस्टमेंट्स का ही हिस्सा है, सबसे बड़े संस्थागत निवेशकों में से एक बनकर उभरा है और इसने न केवल भारतीय बाजार, बल्कि सहज रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी सफलता के झंडे गाड़े हैं। ऐसी दुनिया में जहाँ वित्तीय बाजारों को लेकर एक सामान्य सोच यह है कि यहाँ लालच, गैरसिद्धांतवादी पुरुषों का वर्चस्व है, फर्स्ट स्टेट स्टिवर्ट का उदय एक सुखद आश्चर्य के रूप में सामने आया है। यह संस्था उन कारोबारों में व्यापक निवेश के मौके देखती है या निवेश करती है, जो नैतिक प्रबंधकीय टीम के द्वारा संचालित होता है, जहाँ समस्त निवेशकों के हितों का ध्यान रखा जाता है और न केवल शेयरधारकों, बल्कि कर्मचारियों और विस्तारित समुदाय का भी खयाल रखा जाता है। फर्स्ट स्टेट स्टिवर्ट के फंड मैनेजर शशि रेड्डी ने अपने विचारों को अध्याय चार के बाद हमसे साझा किया है।
अंततः अध्याय पाँच के बाद हम दो निवेशकों से मिले, जो संजय भट्टाचार्य के समानांतर, भारत में दीर्घकालीन निवेश के क्षेत्र में अपनी व्यावसायिक पहचान स्थापितकर अपना अहम् योगदान दे रहे थे। बी.एन. मंजूनाथ भी देश के कुछ चुनिंदा फंड मैनेजरों में से एक हैं। उन्होंने लाइसेंस राज के अँधेरे युग में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक की ट्रेजरी टीम के हिस्से के तौर पर शेयरों में निवेश आरंभ किया था। केनरा बैंक के कटोरे से शुरू हुई उनकी यात्रा एशिया के सर्वाधिक सफल हेज फंड, वार्ड फेरी के भरोसेमंद सलाहकार के रूप में उस मुकाम तक पहुँची कि उन पर फिल्म भी बनाई जा सकती है। अंतिम साक्षात्कार उस फंड मैनेजर का है, जो हाल में ही रिटायर हुआ है, लेकिन जब वह सेवा में थे तो एक शानदार फंड मैनेजमेंट हाउस के सी.आई.ओ. के तौर पर उन्होंने मेरी आधे से ज्यादा ठीक-ठाक नेट वर्थ का खयाल रखा। अनाम, इस नाम से मैं उन्हें पुकारता था, क्योंकि उनका नियोक्ता इस कदर शर्मीला था कि वह किसी तरह की पब्लिसिटी नहीं चाहता था। उनकी विशेषता यह है कि इस किताब में, जितने लोगों का साक्षात्कार दिया गया है, उनसे अगर पूछा जाए कि वे अपना पैसा किसे देंगे सँभालने के लिए तो आधे से ज्यादा लोग उन अनाम शख्स को ही चुनेंगे।
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