सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya Hindi Book PDF Download | Yoga Hindi Book PDF Download

सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya PDF Download Free in this Post from Google Drive Link and Telegram Link , राजीव जैन त्रिलोक / Rajiv Jain Trilok all Hindi PDF Books Download Free, yoga file pdf in hindi, 84 yoga asanas pdf download, hindi books free download, पतंजलि योग बुक इन हिंदी पीडीएफ, सम्पूर्ण योग विद्या pdf download, सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya Summary, सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya book Review

पुस्तक का विवरण (Description of Book सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya PDF Download) :-

नाम : सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya Book PDF Download
लेखक :
आकार : 23.5 MB
कुल पृष्ठ : 667
श्रेणी : स्वास्थ्य / Healthयोग | Yoga
भाषा : हिंदी | Hindi
Download Link Working

[adinserter block=”1″]
यह पुस्तक न सिर्फ योग किन्तु सम्पूर्ण स्वास्थ्य पाने के तरीक़े सिखाती है। इन योग क्रियाओं द्वारा महिलाएँ, बच्चे, बुजु़र्ग तथा युवा वर्ग लाभान्वित होंगे। पुस्तक में सभी योग क्रियाओं को विस्तार से और वैज्ञानिक विश्लेषण सहित दिया गया है, जो कि पुस्तक की विशेषता है।
This book not only teaches yoga but also the methods of attaining complete health. Women, children, elderly and youth will be benefited by these yoga activities. All yogic practices are given in the book in detail and with scientific analysis, which is the specialty of the book.

सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya PDF Download Free in this Post from Telegram Link and Google Drive Link , राजीव जैन त्रिलोक / Rajiv Jain Trilok all Hindi PDF Books Download Free, सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya PDF in Hindi, सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya Summary, सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya book Review

[adinserter block=”1″]

पुस्तक का कुछ अंश (सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya PDF Download)

योग क्या करता है?

यह बता पाना मुश्किल है कि योग क्या-क्या करता है। यह तो इसका प्रयोग करने पर ही मालूम हो सकता है। फिर भी हमने कुछ शब्दों में इस बात को बताने की कोशिश की है।
योग साधना के मार्ग में प्रवृत्त होने पर उदरप्रदेश के रोग जैसे अपच, अरुचि, अजीर्ण, क़ब्ज़, गैस, खट्टी डकार आदि में लाभ मिलता है। योग में बताए आहार से रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग जैसी घातक बीमारियों से बचा जा सकता है। शांति एवं संतोष की भावना स्वभाविक रूप से जीवन में समाहित हो जाती है। छल-कपट, झूठ, चोरी एवं चरित्रहीनता से साधक दूर ही रहता है। जिस कारण व्यक्तिगत एवं सामाजिक, दोनों स्तरों पर नैतिकता का विकास होता है।
योग हमें शारीरिक संपन्नता के साथ मानसिक शक्ति भी प्रदान करता है। जिससे मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है। योग निद्रा, एवं ध्यान के द्वारा हम अपनी स्मृति क्षमता को भी बढ़ा सकते हैं। योग हमारी कार्यकुशलता एवं कार्यक्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि करता है।
योग से हमारे शरीर के परिसंचरण-तंत्र, पाचन-तंत्र, श्वसन-तंत्र एवं उत्सर्जन-तंत्र क्रियाशील हो जाते हैं। वैज्ञानिक परीक्षणों से यह सिद्ध हो गया है कि आयु बढ़ने के साथ-साथ होने वाली शारीरिक शिथिलता एवं वैचारिक अस्थिरता का निदान योगाभ्यास के द्वारा किया जा सकता है। योग द्वारा हम अपनी नकारात्मकता को दूर कर सकते हैं एवं अपनी रोगनाशक शक्ति का विकास कर सकते हैं।
इस प्रकार यह निर्विवाद सत्य है कि योग एक वैज्ञानिक पद्धति है, न कि केवल शारीरिक व्यायाम। इसके आसन व षट्कर्म जहाँ शरीर को निरोग एवं मानसिक एकाग्रता, शारीरिक ओज-तेज को भी बढ़ाते हैं।
लगभग सभी भारतीय दर्शनों ने इसे स्वीकारा है। जब तक मनुष्य का चित्त या अंत:करण निर्मल नहीं होता, कषाएँ मंद नहीं होतीं, तब तक उसे सम्यक दर्शन और सम्यक् ज्ञान का बोध नहीं हो सकता। आत्म उत्थान के लिए योग सर्वोत्तम साधन है। इससे शरीर और मन की शुद्धि होती है।[adinserter block=”1″]

योग-विज्ञान जीवनयापन का सच्चा पथ प्रदर्शक है। ज्ञान का जीवन से सीधा संबंध होने के कारण प्रत्येक क्षेत्र में प्रयोगात्मक, क्रियात्मक विज्ञान की आवश्यकता रही है। योग पूर्णतः प्रायोगिक मनोविज्ञान है। इस प्रकार योग मानव का चहुँमुखी विकास करता है। योग विज्ञान होने के साथ-साथ एक उत्तम जीवन जीने की कला भी सिखाता है।
योग क्या है?
यदि हम अंग्रेज़ी वर्णमाला YOGA के चार वणाँ के आधार पर विचार करें तो हमें यह स्पष्ट नज़र आएगा कि इन चार वणों को अलग-अलग करने पर क्या अर्थ निकलता है।

Yield (योग व्यक्ति को कौन से परिणाम प्रदान करता है?)
साँस के नियंत्रण को शारीरिक रूप से पुष्ट रखता है।
ध्यान मानसिक स्थिरता प्रदान करता है। संवेगात्मक संतुलन बनाने में सहायक होता है – सुख-दु:ख में मान-अपमान की चिंता नहीं रह जाती।
मनोवैज्ञानिक रूप से अच्छा महसूस करना, जीवन प्रसन्नचित्त होना, समाज के साथ अच्छे से जुड़ना, कल्याणकारी कार्यों के साथ संतुष्टि का आभास होना।
सभी शाश्वत–मूल्य, सत्य, धर्म, शाति, प्रेम तथा अहिंसा हमारे जीवन को सदैव सुखमय बनाते हैं तथा इन्हीं के पालन से आध्यात्मिकता को महसूस किया जाता है।[adinserter block=”1″]

Obtains (योग से व्यक्ति को कौन सी नई उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं)
इसके द्वारा उद्देश्यपूर्ण जीवन का निर्माण होता है तथा जीवन की दिशा का निर्धारण होता है।
इसके द्वारा व्यक्ति में जागृति, चेतनता, सजगता बनी रहती है। जिससे उसे अपने द्वारा किए गए कमाँ, विचारों आदि की जानकारी होती है, वह एक होशपूर्ण, सैद्धांतिक और अच्छे इंसान की तरह जीता है।
इससे व्यक्ति गहन ध्यान के माध्यम से एकाग्रचित होता है तथा वह सर्व शक्तिमान के समक्ष स्वयं को समर्पित करके अहम् का परित्याग करता है।
इससे व्यक्ति में व्यवस्थित एवं योजनाबद्ध तरीके से काम करने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।
व्यक्ति में सकारात्मकता, रचनात्मकता तथा विरक्ति का भाव पैदा होता है।
Give up (योग द्वारा व्यक्ति क्या-क्या छोड़ सकता है?)
व्यक्ति में बुरी आदतें, गलत प्रवृत्तियाँ, मादक पदार्थों का सेवन, विखण्डित व्यक्तित्व के कारण उत्पन्न समस्याएँ – जो भी उसे नुक़सान पहुँचाते हैं, वह उन सभी को छोड़ देता है।
उसकी नकारात्मक एवं विध्वंसात्मक सोच धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है और उसे अपने बारे में सम्यक् ज्ञान होने लगता है।
सांसारिक पदार्थों में आसक्ति, धन लोलुपता, मान-सम्मान की इच्छा, आवश्यकताओं की पूर्ति की चिंता आदि में धीरे-धीरे कमी आती है।[adinserter block=”1″]

अवांछित तथा अताकिक कायाँ तथा विचारों से, जिनसे स्वयं का अहित तो होता ही है तथा समाज का परिवेश भी बिगड़ता है, को वह छोड़ देता है। अत: योग करने से मन की निर्मलता बढ़ती है।
Attains (योग से व्यक्ति अंतत: क्या प्राप्त करता है?)
सर्वागीण स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है, शरीर पुष्ट रहता है, मन शांत रहता है, सभी ओर से खुशियाँ मिलती हैं और आध्यात्म की प्राप्ति होती है।
जीवन में कौशल का विकास होता है, जीवन गुणवत्तामय बनता है, अच्छे परिवेश मोहक होता है, जीवन लय एवं रसपूर्ण होता है, संपूर्णता की कामना होती है, जीवन प्रेम से परिपूर्ण होता है।
चित्त प्रसन्न रहता है, हर प्राणी में जीवन दिखाई देता है, जीवन जीने का आनंद आता है, भावनाओं का आदान-प्रदान होता है।
सभी नकारात्मकताओं से चिंता मिटती है, आराम का अनुभव होता है, शांति का एहसास होता है, मन एवं हृदय शून्य में चले जाते हैं, उठा-पटक एवं द्वन्दों का अंत होता है, शारीरिक विकारों का विनाश होता है और व्यक्ति को शांति प्राप्त होती है।
इन सबके साथ ही व्यक्ति अपने को सफल महसूस करता है और उसे जीतने का एहसास होता है। उसे अपनी आत्मा के सही मूल्य का ज्ञान होता है।[adinserter block=”1″]

योग द्वारा जीवन जीने की कला

संभवतः लोगों ने योग का अर्थ केवल व्यायाम, योगासन, प्राणायाम या शारीरिक क्रिया को समझ रखा है। लेकिन अगर हम योग को गहराई से समझ सकते और उसका वास्तविक अर्थ निकाल सकते तो हम इसे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बना लेते। योग से हम मात्र शारीरिक, मानसिक व भौतिक उच्चता ही प्राप्त नहीं करते हैं वरन् अपने जीवन की राह को सुखी और समृद्ध कर पूरे परिवार को संपूर्ण लक्ष्य दे सकते हैं एवं अध्यात्मिकता के चरम शिखर को भी छू सकते हैं।
मैं जब भी कोई योग शिविर लगाता हूँ, तो सभी शिविरार्थियों को योग के साथ-साथ उनके जीवन के उत्थान के लिए भी प्रेरित करता हूँ। अपने वक्तव्य में मैं योग के साथ जीने की कला भी सिखाता हूँ, ताकि साधक इसे आत्मसात् कर सकें।
यह एक नियम है कि हम जैसा सोचते हैं, शरीर में वैसा ही घटित होता है। उदाहरण के तौर पर हम देखते हैं कि जैसे ही हमें क्रोध आता है, हमारे हाव-भाव वैसे ही होने लगते हैं। भौंहें तन जाती हैं, रक्त संचार बढ़ जाता है। माँसपेशियाँ खिच जाती हैं। शरीर में एकत्रित ऊर्जा अनावश्यक रूप से नष्ट होती है, जिससे मानसिक तनाव बढ़ जाता है। हमारे आस-पास का परिवेश, वातावरण भी खराब हो जाता है। हमारी छवि बिगड़ जाती है और नकारात्मकता का प्रवेश हो जाता है। शरीर में एक प्रकार के विष का निर्माण होता है जो नुक़सानदायक होता है। हमेशा क्रोध करते रहने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, जिससे शरीर जल्द ही कमज़ोर हो जाता है और आसानी से रोगग्रस्त होने लगता है। जीवन में हमारे साथ कई बातें घटित होती हैं। हम शारीरिक एवं मानसिक रोग से ग्रसित व आर्थिक रूप से भी कमज़ोर हो जाते हैं। तो हमारे मित्र भी वैसे ही बनते हैं। कई बार गलत आदतें भी पड़ जाती हैं, जैसे नशे की लत। इससे दमकते चेहरे भी मुरझा जाते हैं। हम आहार लेते हैं, लेकिन शरीर पर उसका सकारात्मक असर नहीं दिखता। दिनों-दिन हालत बदतर होती जाती है। परिवार टूट जाते हैं, बच्चे संस्कारवान नहीं बन पाते। समाज तिरस्कार भरी दृष्टि से देखने लगता है। इससे हम उपेक्षाओं के शिकार हो जाते हैं। संसार से ऊब जाते हैं और जीवन अर्थहीन लगने लगता है। सुबह से शाम तक चिंता सताती है तथा रात्रि में नींद भी नहीं आती। जीवन दवाइयों के सहारे चलता है। चारों ओर निराशा नज़र आती है। तो क्या हम इसलिए पैदा हुए हैं? तो क्या हम बाक़ी ज़िदगी में कुछ नहीं कर पाएँगे ?
कौन कहता है कि अब तुम कुछ नहीं कर पाओगे? कौन कहता है कि तुम कुछ नहीं हो ?
नहीं, तुम बहुत कुछ हो।[adinserter block=”1″]

तुम आज भी वैसे हो। तुम अनंत शक्तियों के पुज हो। तुम्हारी आत्मा में कोई अवगुण नहीं है। जो भी अवगुण आए थे, वे सब बाहर से ही आए थे और बाहर ही छूट जाएँगे। तुम्हारे अंदर अनंत ज्ञान है। तुम सच्चे इंसान हो, तुम्हारे अंदर बहुत सारी क्षमताएँ हैं, उन्हें विकसित करो। तुम्हारे अंदर सुख का भंडार है। उठो, अभी! पूरे जोश के साथ उठो, अच्छा करने लगी, मत देखी ज़माने की। ज़माना तुम्हारा साथ तब देगा, जब तुम उनको विश्वास में ले लोगे।
अकेले ही संघर्ष करो। तुम्हारे साथ अदृश्य शक्तियाँ हैं। तुम्हारे पूर्वजों की किरणें हैं। ‘नियम ले ली’ अभी से तुम्हारे अंदर नई चेतना का प्रादुर्भाव होगा।
क़सम खा लो कि आज से मैं नए जीवन की शुरुआत करूंगा, क्रोध नहीं करूंगा, माँसाहार का सेवन नहीं करूंगा, नशा नहीं करूंगा, अपशब्द नहीं बोलेंगा। कहो कि मैं अहंकार का त्याग करता हूँ, माया से मुक्ति चाहता हूँ और लोभ को छोड़ता हूँ।
अब मैं अपनी शुद्धता के साथ ही विचरण करूंगा।
मैं सबसे प्रेम करूंगा, सबको स्नेह दूँगा। किसी से कोई अपेक्षा नहीं करूंगा, सबको वात्सल्य दूँगा। ऐसा करने पर आप देखेंगे कि आपके चारों ओर शांति ही शांति है, शुद्ध वातावरण है। आपका मान-सम्मान बढ़ गया है। आप मुस्कुराते हैं तो आपको देखकर पूरा विश्व मुस्कराता है।[adinserter block=”1″]

कुछ दिनों बाद आप देखेंगे कि आपका शरीर पहले से अच्छा हो गया है, मानसिक रूप से आप अधिक स्वस्थ हो गए हैं। आप स्वयं की, और दूसरों की नज़रों में भी ऊपर उठ गए हैं। आप हर प्रकार से अच्छे हो गए हैं।
यह छोटा सा उदाहरण देने का हमारा उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि हम जैसा सोचते हैं, हमारे इस शरीर में वैसे ही रासायनिक तत्वों का निर्माण होने लगता है। हमारी सोच अच्छी होगी तो ऐसे रसायनों का निर्माण होगा जो अमृततुल्य होंगे जो कि हमें इस समय से लेकर मृत्यु पर्यन्त हर प्रकार की पोषकता प्रदान करेंगे। तो क्यों न हम आज से ही सब कुछ बदल लें और यम, नियम को अपने जीवन में अपना लें।
उपनिषद् में लिखा है कि ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्मांडे’ इस छोटे से वाक्य में अनगिनत बातें छिपी हैं। हमारा यह शरीर तो ब्रह्मांड की अभिव्यक्ति है। जो तत्व एवं शक्तियाँ इस ब्रह्मांड का निर्माण करती हैं, वही हमारे शरीर, मस्तिष्क और सूक्ष्म शरीर का भी निर्माण करती है। आप और हम देखते हैं कि प्रकृति का वातावरण असंतुलित हो रहा है। जिस कारण से हमारा ब्रह्मांड भी बीमार हो गया है एवं जहाँ-तहाँ प्राकृतिक विपदाएँ ही दिखाई दे रही हैं। इसी प्रकार यदि हमारा खान-पान, रहन-सहन भी असंतुलित होगा तो यह शरीर तथा मस्तिष्क भी रोगयुक्त हो जाएगा। हम पराधीन हो जाएँगे। इसलिए संतुलित जीवन जिएँ, बेफ़िक्र हो जाएँ। इस प्रकार हमें अपने जीवन जीने का अंदाज बदल कर और योग को आत्मसात् कर हम इस जीवन को सफल एवं सुंदरतम् बना सकते हैं।[adinserter block=”1″]

योगासनों से लाभ के वैज्ञानिक कारण

यौगिक सूक्ष्म व्यायाम, यौगिक स्थूल व्यायाम, पवन मुक्तासब्ज समूह, वायु निरोधक एवं शक्ति बंध की क्रियाओं से लाभ – सुबह के समय शरीर में कड़ापन होता है। उच्च अभ्यास के लिए शरीर एकदम से तैयार नहीं रहता। अत: हल्के व्यायाम करने से अंगों-उपांगों में लोच, लचीलापन आ जाता है। हल्के व्यायाम से हमारे सन्धि संस्थान व पूरे शरीर के जोड़ खुल जाते हैं। रक्त संचार पर्याप्त मात्रा में होने लगता है और आगे के योगासनों में समस्या नहीं होती।
पूरे शरीर में तीव्रता आ जाती है। शरीर हल्का हो जाता है। शरीर में स्फूर्ति आ जाती है। सन्धि जोड़ खुल जाने के कारण उनमें फेंसी हुई वायु रक्त संचार की तीव्रता के कारण वहाँ से निकल जाती है। पूरे शरीर को एक प्रकार की नई ताज़गी, चेतनता प्राप्त होती है। मस्तिष्क में रक्त का प्रवाह तीव्र होने से उसे क्रियाशील बनाता है। इस प्रकार हमारे पैर के अँगूठे से लेकर टखना, पिंडली, घुटना, जंघा, नितंब, उपस्थ, कमर, उदर, पीठ, मेरुदण्ड, फेफड़े, हाथ की अंगुलियाँ, कुहनी, स्कध, ग्रीवा, आँख, सिर, पाचनतंत्र के अंग आदि सभी भाग क्रियाशील हो जाते हैं और उनके विकार दूर होकर हमें निरोगी काया प्रदान करते हैं।[adinserter block=”1″]

पदमासन एवं ध्यान से संबंधित आसनों से लाभ : पद्मासन एवं इनसे संबंधित आसनों को करने से हमारे कुण्डलिनी चक्र की ऊर्जा उध्र्वमुखी होती है अतः मूलाधार से लेकर सहस्त्रधार चक्र की ऊर्जा को हम आत्मसात् कर उनसे होने वाले सभी लाभ प्राप्त कर सकते हैं। जीवन में नई चेतना का प्रादुर्भाव होता ̈है। इस अवस्था में बैठकर ध्यान करने से हम आत्म साक्षात्कार प्राप्त कर सकते हैं। पद्मासन में बैठने से हमारा मेरुदण्ड स्थिरता को प्राप्त करता है; अतः बुढ़ापे में झुकने की समस्या नहीं होती। पद्मासन में बैठने से ध्यान और धारणाओं के द्वारा हम अपनी स्मरण शक्ति को तेज़ कर सकते हैं।
वज्रासन से संबंधित आसनों से लाभ : जब हम वज्रासन में बैठते हैं, तो यह हमारे श्रोणी प्रदेश, प्रजनन अंग और पाचनतंत्रों के अंगों में रक्त संचार को सुचारु कर उन्हें सुदृढ़ बनाता है। प्रजनन अंग के कई अन्य रोगों को लाभ प्रदान करता है। जैसे हर्निया, शिथिलता, शुक्राणु का न बनना, बवासीर, अण्डकोश ग्रन्थि की वृद्धि, हाइड्रोसिल आदि एवं महिलाओं के मासिक स्त्राव की गड़बड़ी को दूर करता है।
खड़े होकर किए जाने वाले आसनों से लाभ : इस प्रकार के आसनों से पिंडली एवं जंघाओं की माँसपेशियों में मज़बूती आती है जिस कारण उनमें होने वाले रोग जैसे गठिया, कपवात, पिंडलियों का दर्द, घुटने की समस्या आदि रोगों से छुटकारा मिल जाता है। खड़े होकर करने वाले आसनों से पीठ की पेशियों में भी खिचाव आता है, जिससे वे व्यवस्थित होती हैं।
पीछे की ओर झुककर किए जाने वाले आसनों से लाभ : पीछे की ओर झुककर किये जाने वाले आसनों से हमारे फेफड़े, फुफ्फुस फैलते हैं, जिस कारण वे ऑक्सीजन की अधिक मात्रा संग्रहित कर हमारे शरीर को नवयौवनता प्रदान करते हैं। पीछे झुकने से उदर प्रदेश की पेशियाँ तनती हैं। जिस कारण पाचन की अच्छी मालिश भी हो जाती है।[adinserter block=”1″]

पीछे झुकने से हमारे मेरुदण्ड की तंत्रिकाएँ पुष्ट होती हैं। पूरा शरीर इनसे जुड़ा हुआ होता है। अत: उनके संतुलन को ठीक कर उनसे होने वाली बीमारियाँ जैसे, स्लिप डिस्क, साइटिका, स्पॉण्डिलाइटिस एवं मेरुदण्ड के कई रोग आदि को ठीक करता है।
आगे झुककर किए जाने वाले आसनों से लाभ : इस प्रकार के आसन से उदर प्रदेश में संकुचन होता है, जिस कारण उसमें अधिक दबाव पड़ता है। पीठ की कशेरूकाएँ फैलती हैं और माँसपेशियाँ उदीप्त होती हैं। मेरुदण्ड की ओर रक्त संचार पर्याप्त मात्रा में होता है। जिससे वह अपने काम को सुव्यवस्थित रूप से करता है। उदर प्रदेश में संकुचन और दबाव पड़ने के कारण उदर प्रदेश के अंगों की अच्छी मालिश हो जाती है। जिस कारण पाचन तंत्र के रोग नष्ट होते हैं व गुदा, यकृत, अग्नाशय आदि अंग मज़बूत होकर निरोग रहते हैं।
मेरुदण्ड मोड़कर किए जाने वाले आसनों से लाभ : हमारे शरीर का स्तम्भ मेरुदण्ड यदि स्वस्थ है तो हमारा शरीर वृक्ष के तने की तरह सुगठित दिखेगा। इसको मोड़कर किए जाने से हमारे भीतरी अंगों की अच्छी मालिश हो जाती है। माँसपेशियों का अच्छा व्यायाम हो जाता है। मेरुदण्ड अधिक लोचदार व लचीलापन लिए रहता हैं। मेरुदण्ड को मोड़कर किए जाने वाले आसनों से पाचनतंत्रों के अंगों का भी अच्छा व्यायाम हो जाता है, अतः ये अंग उद्दीप्त होकर सुचारु ढंग से कार्य करते हैं।
सिर के बल किए जाने वाले आसनों से लाभ : सिर के बल किए जाने वाले आसन से मस्तिष्क में रक्त संचार बढ़ जाता है, जिससे सिर को संपूर्ण पोषण मिलता है। पीयूष ग्रंथि की कार्यप्रणाली बेहतर होती है। अत: हमारे सोचने-समझने की शक्ति का विकास होता है। हमारे पूरे शरीर में रक्त संचार तीव्र हो जाता है। जिस कारण हृदयप्रदेश सुव्यवस्थित होकर हमारे रक्त की शुद्धता को बढ़ाता है। उदर प्रदेश के भीतरी अंग, पीठ आदि की कार्यपद्धति बेहतर ढंग से कार्य करने लगती है। हमारे मानसिक रोग हों, झड़ते बाल हों, चेहरे की सुंदरता हो या हम कह सकते हैं कि सिर, कधे के बल किए जाने वाले आसन कायाकल्प का काम करते हैं।सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya PDF Download Free in this Post from Telegram Link and Google Drive Link , राजीव जैन त्रिलोक / Rajiv Jain Trilok all Hindi PDF Books Download Free, सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya PDF in Hindi, सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya Book Summary, सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya book Review

[adinserter block=”1″]

हमने सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya PDF Book Free में डाउनलोड करने के लिए Google Drive की link नीचे दिया है , जहाँ से आप आसानी से PDF अपने मोबाइल और कंप्यूटर में Save कर सकते है। इस क़िताब का साइज 23.5 MB है और कुल पेजों की संख्या 667 है। इस PDF की भाषा हिंदी है। इस पुस्तक के लेखक राजीव जैन त्रिलोक / Rajiv Jain Trilok हैं। यह बिलकुल मुफ्त है और आपको इसे डाउनलोड करने के लिए कोई भी चार्ज नहीं देना होगा। यह किताब PDF में अच्छी quality में है जिससे आपको पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। आशा करते है कि आपको हमारी यह कोशिश पसंद आएगी और आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya की PDF को जरूर शेयर करेंगे।

Q. सम्पूर्ण योग विद्या | Sampoorna Yog Vidhya किताब के लेखक कौन है?
 

Answer.

[adinserter block=”1″]

Download
[adinserter block=”1″]

Read Online
[adinserter block=”1″]

 


आप इस किताब को 5 Stars में कितने Star देंगे? कृपया नीचे Rating देकर अपनी पसंद/नापसंदगी ज़ाहिर करें। साथ ही कमेंट करके जरूर बताएँ कि आपको यह किताब कैसी लगी?

4.8/5 - (2200 votes)

Leave a Comment