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पुरुष क्यों नहीं सुनते और महिलाएँ क्यों नहीं समझती / Purush Kyun Nahi Sunte aur Mahilayen Kyun Nahi Samajhti PDF Download Free Hindi Book by Allen Pease


पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Nameपुरुष क्यों नहीं सुनते और महिलाएँ क्यों नहीं समझती / Purush Kyun Nahi Sunte aur Mahilayen Kyun Nahi Samajhti 
लेखक / Author
आकार / Size10.5 MB
कुल पृष्ठ / Pages239
Last UpdatedMarch 12, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category

पुरुष क्यों नहीं सुनते और महिलाएँ क्यों नहीं समझती ... ऐलन और बारबरा पीज़ की दुनिया भर में 2.5 करोड़ से अधिक पुस्तकें बिक चुकी हैं I वे पुरुषों और महिलाओँ की मानसिकता, प्रवृति व् आदतों में पाई जाने वाली असमानताओं का विस्तृत तथा जानकारीपरक विवरण दे रहे हैं I यह एक व्यवहारिक, हास्यप्रद व् सरल पुस्तक है, जो स्त्री पुरुषों के बारे में तथ्यों को समझने में आपकी सहायता करेंगी और यह भी बताएगी कि संबंधों को बेहतर बनाने के लिए क्या करना चाहिए I इस पुस्तक में बताया गया है :

  • क्यों पुरुष एक समय में एक से अधिक काम नहीं कर पाते
  • क्यों महिलाएँ गाड़ियों की रिवर्स पार्किंग में इतनी गड़बड़ करती हैं
  • क्यों पुरुषों को महिलाएँ से झूठ नहीं बोलना चाहिए
  • क्यों महिलाएँ ज़्यादा बात करती हैं और पुरुष बहुत कम
  • क्यों पुरुषों को कामोत्तेजक छवियाँ पसंद आती हैं और महिलाओँ को नहीं
  • क्यों महिलाएँ हर मसले पर बात करना पसंद करती हैं
  • क्यों पुरुष समाधान तो बता सकते हैं लेकिन सलाह लेना पसंद नहीं करते
  • क्यों पुरुषों की ख़ामोशी महिलाओँ की हताश करती है
  • क्यों पुरुषों को सेक्स चाहिए? और महिलाओँ को प्रेम?

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पुस्तक का कुछ अंश

विषय-सूची

परिचय
1. समान प्रजातियाँ, अलग-अलग दुनिया
2. सही मायने समझना
3. सब कुछ हमारे दिमाग़ में है
4. बात करना और सुनना
5. स्थानिक क्षमता: मानचित्र, लक्ष्य और समानांतर पार्किंग
6. विचार, रवैये, भावनाएँ और अन्य अनर्थकारी स्थितियाँ
7. हमारा केमिकल कॉकटेल
8. लड़के तो लड़के रहेंगे, लेकिन हमेशा नहीं
9. स्त्री-पुरुष और सेक्स
10. विवाह, प्रेम और रोमांस
11. एक अलग भविष्य की ओर

परिचय

रविवार को गाड़ी की सवारी
रविवार की धूप भरी दोपहर थी और बॉब व सू अपनी तीन किशोर बेटियों के साथ समुद्र तट की ओर मस्ती भरी ड्राइव पर निकल पड़े। बॉब गाड़ी चला रहे थे और सू उनकी बगल में बैठी थी, बीच-बीच में वे अपनी बेटियों के बीच चल रही बातचीत में हिस्सा लेने के लिए पीछे की ओर मुड़ रही थीं। बॉब को लग रहा था कि वे सभी एक साथ बात कर रही थी। लगातार आवाज़ें आ रही थीं, जिनका सिर-पैर समझना बॉब के लिए मुश्किल हो रहा था। आख़िरकार उनके सब्र का बाँध टूट गया।

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‘क्या आप सभी अपना मुँह बंद रखेंगी!’ बॉब चिल्लाए।
वहाँ हैरानी भरी ख़ामोशी छा गई थी।
‘क्यों?’ सू ने पूछा।
‘क्योंकि मैं गाड़ी चलाने की कोशिश कर रहा हूँ!’ उन्होंने चिढ़कर कहा।
उनकी पत्नी और बेटियों ने एक-दूसरे की तरफ़ असमंजस भरी नज़रों से देखा। ‘गाड़ी चलाने की कोशिश?’ वे बुदबुदाईं।
उन्हें अपनी बातचीत और बॉब के गाड़ी चलाने के बीच कोई संबंध नहीं दिखाई दिया। उधर बॉब यह बात नहीं समझ पाए कि वे सभी लगातार बोले जा रही थीं, वह भी अलग-अलग विषयों पर और लग रहा था कि कोई भी दूसरे की बात नहीं सुन रहा।
वे सब चुपचाप क्यों नहीं बैठ सकती और उन्हें गाड़ी चलाने पर ध्यान केंद्रित नहीं करने दे सकती? उनकी बातचीत के कारण पहले ही हाईवे का पिछला मोड़ उनसे छूट गया था।
यहाँ बुनियादी समस्या बहुत सीधी-सादी है: पुरुष व महिलाएँ एक-दूसरे से अलग हैं। बेहतर या बदतर नहीं, बस वे अलग हैं। वैज्ञानिक, मानवविज्ञानी और सामाजिक व्यवहार का अध्ययन करने वाले जीवविज्ञानी कई वर्षों से इस बात से परिचित हैं, लेकिन वे इस बात से भी अच्छी तरह वाकिफ़ हैं कि पॉलिटिकली करेक्ट यानी राजनीतिक रूप से सही बात करने वाली इस दुनिया में अपने इस ज्ञान को सार्वजनिक तौर पर व्यक्त करने पर उन्हें समाज से निष्कासित करने का जोख़िम उठाना पड़ेगा। आज का समाज इस बात को लेकर बहुत दृढ़ निश्चयी है कि पुरुष व स्त्रियों में बिल्कुल एक समान कौशल, योग्यताएँ व क्षमताएँ होती हैं, ठीक वैसे ही जैसे विज्ञान विडंबनापूर्वक यह साबित करने लगा है कि वे दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं।
तो फिर इसके बाद क्या बचा? समाज के रूप में हम बहुत कमज़ोर ज़मीन पर खड़े हैं। स्त्री-पुरुषों के बीच के अंतर को समझकर ही हम अपनी सामूहिक शक्तियों पर अपने समाज को खड़ा कर सकते हैं, न कि अपनी-अपनी कमज़ोरियों पर ध्यान केंद्रित कर। इस पुस्तक में हाल ही में मानव विकास विज्ञान में हुई महान प्रगति को दृष्टि में रखते हुए हम यह दिखा रहे हैं कि सीखे गए सबकों को कैसे स्त्री-पुरुष संबंधों में लागू किया जा सकता है। हम जिन निष्कर्षों तक पहुँचे हैं, वे विवादास्पद हैं। वे टकराव भरे हैं। कई बार वे बहुत अशांति भरे भी होते हैं। लेकिन वे सभी हमें स्त्री-पुरुषों के बीच होने वाली अजीबोग़रीब चीज़ों की ठोस एवं पूरी समझ प्रदान करते हैं। काश, बॉब और सू ने घर से निकलने से पहले इसे पढ़ा होता…

इस पुस्तक को लिखना इतना कठिन क्यों था
इस किताब को लिखने में हमें तीन साल लगे और हमने इस दौरान 400,000 किलोमीटर की यात्रा की। इसके लिए अपने शोध के दौरान हमने शोधपत्रों का अध्ययन किया, विशेषज्ञों से बातचीत की और ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, सिंगापुर, थाईलैंड, हांगकांग, मलेशिया, इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, आयरलैंड, इटली, यूनान, जर्मनी, हॉलैंड, स्पेन, तुर्की, अमेरिका, दक्षिण अफ़्रीका, बोत्स्वाना, ज़िम्बाब्वे, ज़ाम्बिया, नामीबिया, अंगोला, स्विटज़रलैंड, ऑस्ट्रिया, फ़िनलैंड, इंडोनेशिया, बुल्गारिया, सऊदी अरब, पोलैंड, हंगरी, बोर्नियो, रूस, बेल्जियम, फ़्रांस, जापान और कैनेडा में सेमिनार आयोजित किए।

सार्वजनिक एवं निजी संगठनों को तथ्यों पर अपनी राय देने के लिए राज़ी करना एक सबसे मुश्किल काम था। उदाहरण के लिए, कमर्शियल एयरलाइन पायलटों का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा महिलाओं का है। जब हमने एयरलाइन अधिकारियों से इस बात पर चर्चा करने की कोशिश की, तो कई अधिकारी अपनी राय देने के मामले में इस बात से भयभीत थे कहीं उन पर लैंगिकवादी या महिला विरोधी होने का आरोप न लग जाए। कई संगठनों ने ‘कोई टिप्पणी नहीं’ कहा, जबकि कुछ ने हमें धमकी दी कि इस किताब में उनके नाम का उल्लेख न किया जाए। महिला अधिकारी सामान्यता अधिक उदार थीं, हालाँकि उनमें से कई ने इस शोध को लेकर रक्षात्मक स्थिति अपना ली और यह जाने बिना कि आख़िर हम किस बात की चर्चा कर रहे हैं, उन्होंने इस शोध को नारीवाद पर हमले के रूप में देखा। हमारे द्वारा प्रस्तुत कुछ प्रामाणिक विचारों को हमने कॉर्पोरेट एक्ज़ीक्यूटिव्स और यूनिवर्सिटी प्रोफ़ेसरों से धुँधली रोशनी वाले कमरों में बंद दरवाज़ों के पीछे ‘ऑफ़ रिकॉर्ड’ प्राप्त किया, उन लोगों ने हमसे यह गारंटी माँगी कि उन्हें उनके नाम के साथ उद्धृत नहीं किया जाएगा और उनके संगठनों के नाम का भी उल्लेख नहीं किया जाएगा। कई लोगों की दो राय थी, एक थी जो राजनीतिक रूप से सही थी और दूसरी उनकी असली राय थी, जिसे ‘उद्धृत नहीं’ किया जाना था।
आपको यह किताब कभी चुनौतीपूर्ण तो कभी हैरतअंगेज़ लगेगी, लेकिन दोनों ही स्थितियों में यह आपको दिलचस्प लगेगी। जहाँ एक ओर यह ठोस वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित है, वहीं हमने पढ़ने में इसे दिलचस्प बनाने के लिए रोज़मर्रा की बातचीत, मान्यताओं और परिदृश्यों का भी उपयोग किया है, जो हास्यप्रद होने से लेकर बहुत मज़ेदार भी हैं, जिससे इन्हें पढ़ना दिलचस्प हो सकता है। हमने कोशिश की है कि सभी तथ्यों को सबसे सरल व्याख्याओं में व्यक्त किया जाए, लेकिन साथ में यह भी ध्यान रखा है कि चीज़ों का अतिसरलीकरण न हो जाए। इस तरीक़े से अधिकतर लोगों तक जानकारी आसानी से पहुँच पाती है, लेकिन विज्ञान की दुनिया के उन लोगों को इससे खीझ होती है, जो विज्ञान पत्रिका पढ़ना ज़्यादा पसंद करते हैं। इस पुस्तक को लिखने के पीछे हमारा उद्देश्य आपको स्वयं को और विपरीत लिंग के व्यक्ति को अधिक समझने में मदद करना है, ताकि रिश्ते ज़्यादा भरे-पूरे, आनंददायक और संतोषजनक हों।
एक ड्राइविंग संगठन ने रिवर्स पार्किंग की क्षमता में स्त्री-पुरुषों के बीच अंतर को नापा और कई देशों में इसकी तुलना की। उनके नतीजे इतने चौंकाने वाले थे कि जब रिपोर्ट जारी हुई, तो उस संगठन में जैसे शिकायतों की बाढ़ सी आ गई कि वे लैंगिकवादी और नस्लवादी हैं। रिपोर्ट को तुरंत वापस ले लिया गया और बंद करके रख दिया, उसे फिर कभी नहीं देखा गया, क्योंकि स्पष्ट था कि वह कामकाज के लिए सही नहीं थी। हमने उस अध्ययन की एक प्रति प्राप्त की और उसके परिणामों पर हम चर्चा करेंगे, लेकिन कानूनी व नैतिक कारणों की वजह से हम स्रोत का नाम नहीं बता सकते।
यह किताब उन स्त्री-पुरुषों को समर्पित है, जिन्होंने कभी सुबह दो बजे उठकर अपने जीवनसाथियों से बहस करते हुए यह कहते हुए अपने बाल नोचे होंगे, ‘लेकिन तुम समझते क्यों नहीं?’ रिश्ते नाकाम रहते हैं, क्योंकि पुरुष कभी यह नहीं समझ पाते कि महिलाएँ क्यों पुरुषों की तरह नहीं होती और महिलाएँ अपने पुरुषों से यह उम्मीद करती हैं कि वे बिल्कुल उनकी तरह बर्ताव करें। यह पुस्तक न केवल विपरीत लिंग पर आपकी पकड़ मज़बूत करने में मदद करेगी, बल्कि स्वयं को समझने में भी आपकी मदद करेगी। यह भी बताएगी कि आख़िरकार आप दोनों कैसे ज़्यादा ख़ुशियों भरी, अधिक स्वास्थ्यप्रद और अधिक सामंजस्यपूर्ण जीवन जी पाएँगे।
बारबरा और ऐलन पीज़

 

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1
समान प्रजातियाँ, अलग-अलग दुनिया

एक शानदार प्राणी का क्रमिक विकास
पुरुष एवं महिलाएँ एक-दूसरे से अलग हैं। बेहतर या बदतर नहीं, बल्कि अलग हैं। सिर्फ़ एक बात दोनों के बीच समान है और वह है कि दोनों एक ही प्रजाति के हैं। वे एक-दूसरे से अलग दुनिया में जीते हैं, उनकी मान्यताएँ अलग हैं और दोनों ही अपने-अपने नियमों के अनुसार ज़िंदगी बिताते हैं। हर कोई यह बात जानता है, लेकिन बहुत कम लोग, ख़ासकर पुरुष, इस बात को स्वीकार करने को तैयार होते हैं। लेकिन सच्चाई सबके सामने है। साक्ष्यों को देखें। पश्चिमी देशों में लगभग 50 फ़ीसदी शादियों का अंत तलाक़ में होता है और अधिकतर गंभीर रिश्ते लंबे समय तक नहीं टिक पाते। हर संस्कृति, मत और नस्ल के स्त्री-पुरुष अपने साथी की राय, बर्ताव, रवैये और मान्यताओं को लेकर लगातार बहस करते रहते हैं।
कुछ बातें बिल्कुल स्पष्ट हैं
जब कोई पुरुष शौचालय जाता है, तो अक्सर उसका एक ही कारण होता है। महिलाएँ शौचालय का इस्तेमाल एक सामाजिक और उपचार कक्ष के रूप में करती हैं। शौचालय में अजनबी के रूप में घुसने वाली महिलाएँ एक-दूसरे की सबसे अच्छी दोस्त और आजीवन मित्र बनकर बाहर निकलती हैं। अगर कोई पुरुष किसी दूसरे को कहे, ‘फ़्रैंक, मैं टॉयलेट जा रहा हूँ। तुम मेरे साथ चलोगे?’ तो आसपास के लोग उन्हें शक्की निगाहों से देखने लगेंगे।
टीवी रिमोट कंट्रोल पर पुरुषों का कब्ज़ा रहता है और वे चैनल बदलते रहते हैं, जबकि महिलाओं को विज्ञापन देखने में कोई आपत्ति नहीं होती। दबाव में आने पर पुरुष शराब पीते हैं, अन्य देशों पर हमला करते हैं; जबकि महिलाएँ चॉकलेट पर टूट पड़ती हैं और ख़रीदारी करती हैं।
महिलाएँ पुरुषों की आलोचना करती हैं कि वे कठोर, बेपरवाह होते हैं, बात नहीं सुनते, स्नेहिल नहीं होते, बातचीत नहीं करते, पर्याप्त प्रेम नहीं करते, रिश्तों को लेकर प्रतिबद्ध नहीं होते, प्रेम क्रीड़ा करने के बजाय यौन संबंध बनाने में ज़्यादा दिलचस्पी लेते हैं, वातानुकूलन का तापमान कम करते हैं और टॉयलेट सीट को उठा हुआ छोड़ देते हैं।
पुरुष महिलाओं के गाड़ी चलाने, उनके द्वारा सड़कों की दिशाएँ न पढ़ पाने, मानचित्रों को उलटा पकड़ने, दिशाबोध न होने, मुद्दे पर पहुँचने के बजाय ज़रूरत से ज़्यादा बातें करने, ज़्यादातर यौन संपर्क की शुरुआत न करने, वातानुकूलन का तापमान बढ़ाने और टॉयलेट सीट नीचे करने की आलोचना करते हैं। पुरुष कभी अपनी जुराबें नहीं खोज पाते, जबकि उनकी सीडी बिल्कुल सही वर्णानुक्रम से रखी जाती हैं। महिलाएँ हमेशा कार की चाबी खोज लेती हैं, लेकिन अपने गंतव्य स्थान का सीधा रास्ता शायद ही कभी ढूँढ पाती हों। पुरुषों को लगता है कि वे सबसे विवेकपूर्ण हैं। महिलाएँ जानती हैं कि वे वास्तव में ऐसी हैं।
टॉयलेट पेपर के एक रोल को बदलने में कितने पुरुषों की ज़रूरत पड़ती है? कोई नहीं जानता। ऐसा कभी हुआ ही नहीं।
पुरुषों को हैरानी होती है कि कैसे लोगों से भरे हुए किसी कमरे में घुसते हुए कोई महिला हर किसी पर तुरंत टिप्पणी दे सकती है; महिलाएँ यकीन नहीं कर पाती कि पुरुष कैसे किसी चीज़ पर ध्यान नहीं दे पाते। पुरुष इस बात से आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि महिलाएँ कैसे कार के डैशबोर्ड पर चमकती हुई लाल लाइट को नहीं देख पाती, लेकिन 50 मीटर दूरी पर मौज़ूद किसी अँधेरे कोने में पड़ी गंदी जुराब को देख सकती हैं। महिलाएँ यह देखकर हक्की-बक्की रह जाती हैं कि पुरुष कैसे कार के पीछे के शीशे का इस्तेमाल करते हुए किसी तंग जगह में कार को पार्क कर सकते हैं, लेकिन कभी जी-स्पॉट का पता नहीं लगा सकते।
अगर कोई महिला गाड़ी चलाते हुए खो जाए, तो वह रुककर किसी से दिशा के बारे में पूछेगी। पुरुष के लिए यह कमज़ोरी की निशानी है। वह घंटों गोल-गोल घूमता रहेगा और साथ में बुदबुदाता रहेगा, ‘मुझे वहाँ पहुँचने का नया रास्ता मिल गया है’ या ‘मैं सार्वजनिक जगह में हूँ’ और ‘मुझे वह पेट्रोल स्टेशन याद है!’

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