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प्रतिघात / Pratighat PDF Download Free Hindi Book by Santosh Pathak

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥प्रतिघात / Pratighat
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 6.2 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖258
Last UpdatedApril 8, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category, ,

अंकुर रोहिल्ला दौलतमंद, आशिक मिजाज, बदनीयत शख्स था। उसकी निगाहें अपने ही किरायेदार की नाबालिग बेटी अफसाना पर टिकी हुई थीं। फिर एक रात लड़की अपने कमरे से गायब हो गयी। बाप को शक था कि बेटी के गायब होने में अंकुर का कोई न कोई हाथ जरूर था। वह फरियाद लेकर महा करप्ट पुलिसिये निरंकुश राठी के पास पहुंचा। राठी ने उसकी बेटी को खोजने के लिए उंगली भी नहीं हिलाई होती, अगरचे कि कंप्लेन एक दौलतमंद शख्स के खिलाफ नहीं होती। फिर क्या था निरंकुश राठी एक बार फिर अपने सपनों को साकार करने की कोशिश में जुट गया। उसे तो एहसास तक नहीं था कि आगे उसका पाला एक ऐसे शख्स से पड़ने वाला था जिसके बारे में कोई नहीं जानता कि वह कब क्या कर गुजरेगा?

पुस्तक का कुछ अंश

प्रतिघात

दोपहर के दो बजने को थे। अंकुर रोहिल्ला उस वक्त अपने कमरे में बेड पर अधलेटा सा हुआ मोबाईल पर नजरें गड़ाए बैठा था। वह अक्सर डेढ़ से ढाई बजे तक का वक्त ऑफिस की बजाय उसी बिल्डिंग के फर्स्ट फ्लोर पर स्थित अपने बेडरूम में गुजारता था।
अपने आदमियों को उसकी खास ताकीद थी कि उस एक घंटे के वक्त में उसे बिल्कुल भी डिस्टर्ब न किया जाये। आज तक उसमें कोई व्यवधान नहीं आया था, मगर आज आया। अभी कमरे में पहुंचे उसे आधा घंटा ही बीता था कि किसी ने बाहर से दरवाजा खटखटा दिया।
“कौन?” उसने तनिक उच्च स्वर में पूछा।
“भाई मैं हूं निन्नी।”
“आ जा, दरवाजा खुला है।”
तत्काल एक खूब लंबा चौड़ा युवक दरवाजे को धकेलता हुआ भीतर दाखिल हो गया।
“क्या हो गया?” अंकुर ने चुभती निगाहों से उसे देखा।
“स्वाति मैडम आई हैं।”
‘ओह स्वाति आई है।’ उसके चेहरे पर अचानक उभर आये सख्ती के भाव एकदम से गायब हो गये।
“आप नीचे आयेंगे या मैं उन्हें यहीं भेज दूं?”
अंकुर ने कुछ क्षण उसकी बात पर विचार किया फिर बोला, “यहीं भेज दे।”
“ठीक है भाई।” कहकर निन्नी वापिस लौट गया।
अंकुर उठकर बाथरूम में पहुंचा, मुंह को रगड़-रगड़ कर धोने के बाद उसने तौलिये से सुखाया, बालों पर उंगलियों से कंघी की, फिर आईने में अपना चौखटा निहारने के बाद वापिस बेड पर जाकर पहले की तरह पसर गया।
तभी कमरे का दरवाजा खोलकर स्वाति भीतर आ गई। वह औसत कद-बुत की बेहद खूबसूरत लड़की थी, नैन-नक्श तीखे थे, चेहरा अंडाकार और बाल कंधों से बस जरा ही नीचे पहुंच रहे थे। इस वक्त वह स्किन टाईट जींस की पैंट और टॉप पहने थी, टॉप के ऊपर उसने डेनिम की ब्लैक जैकेट डाल रखी थी, जो सामने से एकदम खुला हुआ था।
“हाय हैंडसम।” अंकुर पर निगाह पड़ते ही वह चहककर बोली।
“हाय सेक्सी।” - कहता हुआ अंकुर रोहिल्ला अपनी जगह से उठा, आगे बढ़कर उसने लड़की को बाहों में भरा फिर अपने होंठ उसके पतले गुलाबी होंठों पर रख दिये। लंबा लिप लॉक चला, फिर अंकुर ने उसके साथ बेड पर जा बैठा, और घसीटकर सिरहाने तक पहुंचाता हुआ बोला – “आने से पहले फोन तो कर लिया होता, क्या पता मैं इस वक्त कहां होता?”

“क्या फर्क पड़ता? मैं घर से निकल कर तुमसे मिलने थोड़े ही आई हूं। कॉलेज जा रही थी, सामने सड़क से गुजरने लगी तो मन में तुम्हारा ख्याल आ गया। बस ऑटो से नीचे उतर गई। नहीं मिलते तो कॉलेज निकल जाती।”
“जो कि मेरे लिए भारी नुकसान की बात होती।”
“हुई तो नहीं।” वह हंसती हुई बोली।
“शुक्र है नहीं हुई।” - कहकर उसने लड़की की कमर में हाथ डालकर अपने करीब खींच लिया – “इस बात का भी शुक्र है कि मैं इस वक्त नीचे ऑफिस में नहीं हूं।”
लड़की फिर हंसी।
“यहां अकेले पड़े क्या कर रहे थे?”
“तुम्हें ही याद कर रहा था, जिस दिन से तुमसे मिला हूं बस हर वक्त तुम्हारे ही बारे में सोचता रहता हूं। तुम कोई काला जादू तो नहीं जानती हो?”
“झूठे कहीं के।”
“अरे मैं सच कह रहा हूं, नशा सा कर दिया है तुमने मुझपर। बल्कि मैं तो कहता हूं तुम हेरोईन हो....”
“तुम्हारा मतलब है हीरोईन?”
“नहीं हेरोईन, चरस, बल्कि एलएडी हो, जिसकी आदत पड़ जाये तो छोड़ते नहीं बनता। तुम्हारी खूबसूरती मेरे लिए किसी भयंकर नशे से कम नहीं है! गिरफ्त से बाहर निकल पाना आसान नहीं होगा, क्योंकि मैं निकलना ही नहीं चाहता।”
“तो फिर शादी क्यों नहीं कर लेते मुझसे?”
“वो तो खैर करूंगा ही, मगर वैसा फौरन तो नहीं किया जा सकता। तब तक तो मुझे तुम्हारे बिछोह की पीड़ा झेलनी ही पड़ेगी। क्या कोई ऐसा रास्ता नहीं है जिससे तुम रोज मुझसे मिलने आ जाया करो।”
“पागल” - वह खिलखिला कर हंस पड़ी – “रोज कॉलेज से बंक मारा तो फेल हो जाऊंगी, वैसे भी एग्जाम सिर पर हैं। आने वाले दिनों में तो सप्ताह में एक रोज तुमसे मिलने आ जाऊं वही बहुत बड़ी बात होगी।”
“तुम तो दिल तोड़े दे रही हो जान।”
स्वाति फिर से खिलखिला उठी।
ठीक तभी उसकी निगाह बेड के साईड टेबल पर रखी एक फ्रेम जड़ित तस्वीर पर पड़ी, “ये कौन है?”
उसने हाथ बढ़ाकर तस्वीर उठा ली।

अंकुर सकपकाया, हड़बड़ाया, फिर संभलता हुआ बोला, “कोई नहीं है।”
“कोई नहीं है तो इसकी तस्वीर क्यों सजाये बैठे हो, वैसे है बड़ी खूबसूरत!” - उसकी आंखों में संदेह उतर आया – “कहीं ये तुम्हारी कोई नई गर्लफ्रेंड तो नहीं है?”
अंकुर ने यूं उसकी बात पर ठहाका लगाकर दिखाया जैसे स्वाति ने कोई भारी मजाक की बात कह दी हो।
“बात को हंसी में मत उड़ाओ।” - स्वाति का लहजा संजीदा हो उठा – “साफ-साफ बताओ, ये तुम्हारी कोई नई गर्लफ्रेंड है?”
“कैसी बात करती हो, तुम्हें मुझपर यकीन नहीं?”
“इस मामले में तो नहीं है, लड़कों का क्या भरोसा, आज मैं तो कल कोई और! सहेली बदलते देर थोड़े ही लगती है।”
“पागल, ऐसा कुछ नहीं है।” कहकर उसने स्वाति को अपनी बाहों में भरने की कोशिश की तो वह छिटक कर अलग हो गयी।
“कबूल करो कि तस्वीर वाली लड़की तुम्हारी गर्लफ्रेंड है।”
“है नहीं!” - वह फरमाईशी आह भरकर बोला – “लेकिन कभी थी।”
“सच कह रहे हो?”
“और क्या मैं तुमसे झूठ बोलूंगा?” - कहकर उसने जबरन हंसने की कोशिश की – “इसका चैप्टर तो सालों पहले क्लोज हो चुका है। अब इस दुनिया में नहीं है।”
“ओह! सॉरी, नाम क्या था इसका?”
“तबस्सुम।”
“क्या हुआ था इसके साथ?”
“कत्ल हो गया, एक रोज कॉलेज से लौटते वक्त कुछ लड़कों ने सरेराह इसे उठा लिया, फिर अपनी मनमानी करने के बाद गला घोंट कर हत्या कर दी थी। अगले रोज लाश इधर के जंगलों में पड़ी पाई गई, जिसे हत्यारों ने पेट्रोल छिड़क कर जलाने के बाद जमीन के भीतर गाड़ दिया था, मगर जानवरों को उसकी सूंघ लग गई और खोद कर बाहर निकाल लिया। जिस वक्त लाश मिली उसकी हालत यूं हो चुकी थी कि शक्ल तक पहचान में नहीं आ रही थी।”
“गिरफ्तार नहीं हुए वे लोग?”
“नहीं, साफ बच निकले।”
“अंजान लोग थे?”
“नहीं असल गुनहगार बहुत दिनों से इसके पीछे पड़ा हुआ था, इसकी नजदीकियां हासिल करना चाहता था, मगर तबस्सुम को उसकी चाहत की परवाह नहीं थी। तब लड़के ने जबरन इसे हासिल करने की कोशिश की और आखिरकार कामयाब हो गया। पूरे सात लोगों ने मिलकर गैंगरेप किया था इसके साथ।”
“ओह बहुत बुरा हुआ।”

“बेशक बुरा हुआ।”
“तुमने कोई कोशिश नहीं की इसके हत्यारों को सजा दिलाने की?”
“की क्यों नहीं, यहां तक उनको कानून की पकड़ से दूर होता देखकर, मैंने खुद अपने हाथों से सजा देने की कसम खा ली, मगर सब के सब यूं गायब हुए कि आज तक ढूंढे नहीं मिले।”
“हे भगवान! कैसे-कैसे कमीने रहते हैं इस धरती पर।”
“छोड़ो उस बात को, मैं भी क्या किस्सा ले बैठा।” कहकर उसने स्वाति को अपनी गोद में खींच लिया और धीरे-धीरे उसके शरीर के साथ खिलवाड़ करने लगा, लड़की ने विरोध जताने की कोई कोशिश नहीं की, उल्टा बढ़-चढ़कर उसका साथ देने लगी।
☐☐☐
उस वक्त शाम के छह बजे।
फरवरी का महीना होने के कारण तब तक वातावरण में अंधेरा घिर आया था। हल्की सर्दी भी महसूस हो रही थी, मगर इतनी नहीं जितनी कि अमूमन फरवरी के महीने में पड़नी शुरू हो जाती थी।
विशाल सक्सेना उस वक्त दिल्ली के एसएन मार्केट में संजना के साथ विचर रहा था। बल्कि जबरन उसके साथ इधर-उधर भटक रहा था। जबकि संजना शॉपिंग कर रही थी और इस बात से खास उल्लासित थी कि विशाल उसके साथ था।
मगर वह साथ यूं ही नहीं बन गया था।
बड़ी मुश्किल से संजना उसे अपने साथ मार्केट तक लाने में कामयाब हो पाई थी। जिसमें पूरा-पूरा हाथ विशाल की मां का था, जिसने एक तरह से जबरन उसे संजना के साथ भेज दिया था। वरना तो वह लैपटॉप पर मूवी देखता, घर में बैठकर ही खुश था।
“मुझे भीड़-भाड़ वाली जगहें जरा भी पसंद नहीं हैं।” वह भुनभुनाया।
“बस आधा घंटा और प्राणनाथ!” - वह मुस्करा कर बोली – “फिर लौट चलेंगे, प्रॉमिस।”
“ऐसा तुम अभी आधे घंटे पहले भी कह कर हटी थी।”
“देख लो वादे की कितनी पक्की हूं, वह वक्फा गुजरते ही तुमसे फिर से आधा घंटा मांग लिया, वरना चाहती तो खामोश बनी रह सकती थी।”
“जैसे बहुत बड़ा एहसान कर दिया मुझपर।”
“अरे क्यों तिलमिला रहे हो यार! एन्जॉय करो, मेरी तरफ देखते शर्म आती है, तो यहां विचरती दूसरी लड़कियों को ताड़ना शुरू कर दो, सब एक से बढ़कर एक सेक्सी, हॉट और मॉर्डन हैं, देखना वक्त का पता भी नहीं लगेगा।”
“शटअप।”
“जो हुक्म मेरे सरताज।” कहकर उसने विशाल का हाथ थामा और एक दुकान में घुस गई। बड़ी मुश्किल से उसने अपना हाथ उसकी पकड़ से अलग किया और एक कदम दूर होकर खड़ा हो गया।
“जल्दी करो, एक ही सामान के लिए दस दुकानों का चक्कर काटने का क्या फायदा? जब मन पसंद चीज पहली ही दुकान पर मौजूद हो।”
“मजा आता है, फिर कई दुकानों का फेरा लगाकर ये तसल्ली हो जाती है कि हर जगह रेट एक ही है, कोई हमें ठगे नहीं ले रहा। यानि कोई चीज हमने सौ रूपये की खरीदी है तो दूसरों को भी वह सौ में ही मिलने वाली है।”
“असल में डर तुम लड़कियों को इस बात का होता है कि कहीं कोई दूसरा शख्स वही सामान सस्ते में न हासिल कर ले।”
“हां यही बात है।” - वह तनिक चिढ़कर बोली – “कोई ऐतराज है तुम्हें?”
“होगा तो क्या मुझे चले जाने को कह दोगी?”
“नहीं बस और आधे घंटे की जिद करने लगूंगी।”
“फिर तो ऐतराज का कोई फायदा नहीं, करो जो करना चाहती हो। उतनी देर मैं झेल लूंगा किसी तरह।”
“थैंक्यू!” - कहकर वह विशाल के करीब खिसक आई, फिर धीरे से फुसफुसाती हुई बोली – “देखना बदले में मैं तुम्हें खुश कर दूंगी।”
विशाल हड़बड़ाया।
“कल रात मैं तुम्हारे घर आऊंगी।”
“कोशिश भी मत करना, मम्मी कल वाराणसी जाने वाली हैं।”
“तभी तो आऊंगी, आंटी के रहते वहां आने का क्या फायदा।”
सुनकर बुरी तरह तिलमिलाता विशाल दुकान से बाहर निकल कर खड़ा हो गया। संजना ने उसके पीछे जाने की कोशिश नहीं की, उसे यकीन था कि गुस्सा चाहे वह कितना भी दिखा ले मगर उसे छोड़कर वापिस नहीं लौट जायेगा।
आधे घंटे बाद वह सचमुच शॉपिंग से फारिग हो गई।
फरीदाबाद से वहां तक दोनों संजना की स्कूटी से पहुंचे थे। पार्किंग में पहुंचकर विशाल ने ड्राईविंग संभाली तो संजना उसके पीछे दोनों तरफ पैर लटका कर बैठ गई। बैठकर अपने हाथ उसकी कमर में पिरो दिये।
स्कूटी रिंग रोड पर पहुंची तो विशाल ने उसे सड़क के किनारे लगाकर रोक दिया।
“क्या हुआ?” संजना ने पूछा।
“तुम ढंग से नहीं बैठ सकती? मेरी कमर में हाथ डालकर पीठ से चिपक कर बैठना जरूरी है क्या?”
“हां जरूरी है।”
“तो फिर तुम ड्राईव करो।”

“ये तो और भी अच्छी बात है, तब मैं हर दस कदम पर स्कूटी को जोर से ब्रेक लगाऊंगी और तुम मुझसे आ चिपकोगे, यही चाहते हो न?”
“बकवास मत करो।”
“तो फिर चुपचाप ड्राईव करो, पता नहीं किस मिट्टी के बने हो तुम, वरना तो मेरे सारे ब्वायफ्रेंड मुझे अपनी बाईक पर बैठाने के बाद मौका ढूंढते हैं कि कम कोई ब्रेकर आये, या एकदम से कोई गाड़ी आगे आ जाये, ताकि उन्हें जोर से ब्रेक लगाने का मौका मिल जाये। और मैं उनकी पीठ से छिपकली की तरह चिपकने को मजबूर हो जाऊं।”
“कैसे-कैसे बेहूदे लोगों से दोस्ती है तुम्हारी।” पनौती झुंझलाकर बोला और स्कूटी आगे बढ़ा दी।
“लो इसमें बेहूदा होने जैसी क्या बात है? जिस जिंदगी में एन्जॉयमेंट न हो उसका फायदा क्या है? फिर शरीर के चिपकने से किसी का कुछ बिगड़ थोड़े ही जाता है। उल्टा कुछ देर के लिए हम आनंद के समुंदर में डूबने उतराने लगते हैं, ऐसे आनंद में जिसके सामने सबकुछ फीका जान पड़ता है।”
“हाथ नहीं हटा सकती कोई बात नहीं, कम से कम अपनी कतरनी को तो लगाम दो।”
“कहो तो तुम्हें भी कुछ महसूस कराऊं?”
“संजना।”
“बोलो मेरी जान।”
“अपने मुंह से घटिया बातें निकालना बंद करो वरना मैं स्कूटी से उतरकर किसी बस में सवार हो जाऊंगा।”
“लो तुम तो गुस्सा होने लगे।”
“बिल्कुल हो रहा हूं।”
“प्लीज शांत हो जाओ, तुम नाराज हो गये तो मेरे कल रात वाले प्रोग्राम का क्या होगा?”
“कौन सा प्रोग्राम?”
“तुम्हारे घर आने का, तब जबकि आंटी जा चुकी होंगी।”
“कोशिश भी मत करना।”
“मैं तो करूंगी।”
“बेरंग लौटना पड़ेगा, मैं दरवाजा नहीं खोलने वाला।”
ठीक तभी पीछे चली आ रही एक होंडा सिटी ने स्कूटी को टक्कर मार दी। अलबत्ता ट्रैफिक की वजह से स्पीड बहुत कम थी इसलिए वह स्कूटी को संभालने में कामयाब हो गया, लेकिन संजना फिसल कर नीचे जा गिरी।
उस वक्त दोनों साउथ एक्स का फ्लाईओवर उतर रहे थे, जब वह हादसा हो गया।
विशाल ने स्कूटी रोककर संजना को सहारा देकर खड़ा कर दिया, “चोट तो नहीं लगी?”
“नहीं मैं ठीक हूं।”

“कोई गुम चोट न आ गई हो?”
“नहीं ऐसा नहीं है, मैं ठीक हूं।”
विशाल ने एक निगाह पीछे होंडा सिटी पर डाली, फिर उसे नजरअंदाज कर के एक बार फिर अपनी स्कूटी पर सवार हो गया, संजना पहले की तरह उसकी कमर में हाथ डालकर पीछे बैठ गई, तभी होंडा सिटी के ड्राईवर ने गाड़ी को दाईं तरफ काटा और उनके बगल में लाकर खड़ा कर दिया। भीतर ड्राईवर के अलावा बस एक शख्स मौजूद था जो कि उस वक्त पैसेंजर सीट पर बैठा हुआ था।
उसने विंडो ग्लास नीचे सरकाया फिर सहानुभूति भरे लहजे में बोला, “चोट तो नहीं आई मैडम?”
“नहीं।” - जवाब स्कूटी स्टार्ट करते विशाल ने दिया – “थैंक्स फॉर ऑस्किंग।”
“अचानक ब्रेक लगाना हो तो पहले पीछे देख लिया करो भाई, हमारी गाड़ी स्पीड में होती तो जाने क्या हो जाता? और गलती तुम्हारी होते हुए भी भुगतना हमें पड़ता।”
पनौती का दिमाग सटक गया।
उसने स्कूटी पर बैठे ही बैठे कार की खिड़की के भीतर हाथ डालकर उसका गिरहबान थाम लिया, “अपनी गलती मानना नहीं सीखा? ना तो मैंने ब्रेक लगाया था ना ही स्पीड अचानक कम की थी, इसके बावजूद मैंने आपसे कुछ नहीं कहा, फिर उपदेश क्यों झाड़ रहे हो?”
“कॉलर छोड़ मेरा।”
“स्कूटी संभालना जरा।” विशाल ने संजना से कहा और नीचे उतर कर कार के करीब खड़ा हो गया।
“छोड़ो जाने दो।” वह बड़ी मुश्किल से स्कूटी संभालती हुई बोली।
“अब तो पुलिस के आने के बाद ही जाने दूंगा, नीचे उतरो तुम दोनों।”
“पहले कॉलर छोड़ मेरा।”
तभी ड्राईवर ने पॉवर विंडो बंद करना शुरू कर दिया। विशाल को उस बात का एहसास हुआ तो उसने हाथ में थमें गिरेबान को जोर से अपनी तरफ खींच लिया। नतीजा ये हुआ कि उस शख्स का आधा सिर बंद होते शीशे के ऊपर जा पहुंचा, “अब बंद कर के दिखा।”
जवाब में ड्राईवर ने हड़बड़ाकर ग्लास फिर से नीचे खिसका दिया और पनौती की तरफ देखता हुआ बड़े ही प्यार से बोला, “सॉरी भाई गलती मेरी थी, क्योंकि ड्राईव मैं कर रहा था, इसे पीटकर या पुलिस बुलाकर आपको क्या मिलेगा?”
“कुछ नहीं, मैंने तो तुम लोगों से गलती मानने को भी नहीं कहा था, मगर ये तो जैसे साबित करने पर तुला था कि जो हुआ वह मेरी मिस्टेक की वजह से हुआ।”
“अब जो बात जुबान से निकल गई उसे वापिस तो नहीं लौटाया जा सकता भाई, समझ लीजिये इसकी तरफ से मैं आपसे माफी मांगता हूं। जो हुआ उसका मुझे पूरा-पूरा अफसोस है, इसके बड़बोलेपन का भी और अपनी बेध्यानी का भी।”

“फिर ठीक है, अब जा सकते हैं आप लोग।” कहकर उसने अपना हाथ वापिस खींच लिया।
होंडा सिटी फौरन आगे बढ़ गई, मगर आंखों से ओझल होने से पहले विशाल उसकी नंबर प्लेट की एक फोटो खींचने में कामयाब हो गया।
तब तक वहां कई बाईक सवार आ खड़े हुए थे। कार वालों का हश्र देखकर उनमें से कुछ ने ठहाके भी लगाये, फिर होंडा सिटी के आगे बढ़ते ही सब अपनी राह हो लिये।
कार की ड्राईविंग सीट पर इलियास हिंदोस्तानी बैठा हुआ था, और जिस शख्स से विशाल उलझा था वह मनीष ओजस्वी था। कार आगे बढ़ाते ही इलियास जोर-जोर से ठहाके लगाने लगा।
“अपना मुंह बंद कर।” - ओजस्वी भुनभुनाया – “साले ने बीच सड़क पर इज्जत का कचरा कर दिया।”
“जैसे वहां तुझे कोई पहचानता ही था।”
“ना सही मगर बेइज्जती तो फिर भी हुई। देखा नहीं वहां आ खड़े हुए लोगों ने किस कदर दांत चियार कर दिखाया था, और तू साला डरपोक, मेरा साथ देने की बजाय उससे माफियां मांग रहा था। ये नहीं हुआ कि नीचे उतरकर दो-चार कसकर जमा देता उसे।”
“पहली बात तो ये कि गलती सरासर मेरी थी, मुझे लग रहा था कि कार का अगला हिस्सा स्कूटी से जा टकरायेगा मगर मैंने ब्रेक नहीं लगाया। दूसरी और बड़ी गलती तूने की, वह तो चुपचाप जा रहा था, तू ही खामख्वाह उसके गले पड़ने लगा।”
“मुझे क्या मालूम था साला टेंटुआ ही पकड़ लेगा।”
“पकड़ता भी नहीं, वह तो पीछे लड़की बैठी हुई थी तभी तैश में आ गया। इसलिए भूल जा उसे। ये सोचकर भूल जा कि हम चाहते तो वहीं उसका हुलिया बिगाड़ सकते थे। ना कि इसलिए चुप हो गये कि उससे कमजोर थे, या डर गये थे।”
“भूल तो मैं नहीं सकता। साला यूं सड़क पर चलता कोई भी ऐरा-गैरा हमपर हावी होने लगा तो एक दिन डांगे साहब खुद अपने हाथों से गोली मार देंगे हमें। इसलिए मजा तो मैं इसे चखाकर रहूंगा।”
“बेमतलब की बात मत कर, ये कोई ऐसी बात नहीं जिसे तू अपनी नाक का सवाल बना ले।”
“बनाकर रहूंगा, साले को मजा नहीं चखाया तो मेरा नाम मनीष ओजस्वी नहीं।”
“ढूंढेगा कैसे?”
“स्कूटी का नंबर याद कर लिया है, नोट भी कर लेता हूं, वरना दिमाग से उतर जायेगा। और कुछ नहीं तो बहन... का वह हाथ तो तोड़ ही डालूंगा, जिससे उसने मेरा गिरेबान थामा था।”
“बायां या दांया?”

“मजाक मत कर, वह लेफ्टी नहीं था, तूने खूब देखा था।”
“छोड़ ना यार, नई उम्र का लड़का है, उससे तेरी क्या बराबरी?”
“नहीं छोड़ सकता। सबक दिये बिना तो हरगिज भी नहीं।”
“ठीक है भाई।” - इलियास गहरी सांस लेकर बोला – “जैसी तेरी मर्जी।”
कहकर उसने कार की रफ्तार बढ़ाने की कोशिश की ही थी कि जोर का धमाका सुनाई दिया। गाड़ी ने तेजी से बाईं तरफ को झोल खाया, मगर इलियास ने उसे कंट्रोल से बाहर नहीं जाने दिया।
“क्या हुआ?” ओजस्वी ने पूछा।
“पिछला पहिया बैठ गया।”
“कमाल है, टायर तो एकदम नये हैं।”
“समझ ले अल्लाह ने तेरी ज्यादती की सजा दी है।”
“खामख्वाह! जबकि असल में ज्यादती उसने की थी, सरेराह मेरा गिरेबान थाम लिया था।”
सुनकर इलियास हंस पड़ा।
हैवी ट्रैफिक के बीच बड़ी मुश्किल से वह कार को सड़क किनारे पहुंचाने में कामयाब हुआ। फिर स्टेपनी निकाल कर दोनों कार का पहिया बदलने लगे।
उस काम में पूरे पंद्रह मिनट जाया हो गये।
तत्पश्चात इलियास एक बार फिर ड्राईविंग सीट पर जा बैठा।
आगे उनकी मंजिल लाजपत नगर फोर के इलाके में स्थित दयानंद कॉलोनी थी, जहां बाप की मौत के बाद अवनी सक्सेना आजकल अकेली रह रही थी।
☐☐☐
संजना को उसके घर छोड़ने के बाद पनौती फरीदाबाद बाईपास रोड की तरफ चल पड़ा, जहां से उसका इरादा किसी सवारी ढोने वाले ऑटो में सवार होने का था। हालांकि संजना ने कई बार कहा कि पहले वह अपने घर चले जहां उसे ड्रॉप करने के बाद वह अकेली भी अपने घर जा सकती थी, क्योंकि दोनों घरों के बीच मुश्किल से पांच-छह किलोमीटर का डिस्टेंस था। मगर वह नहीं माना। तब अपने घर पहुंचकर उसने विशाल को स्कूटी ले जाने को कहा, वह उस बात के लिए भी तैयार नहीं हुआ और पैदल आगे बढ़ चला।
अभी वह बाईपास वाली सड़क पर पहुंचा ही था कि उसे एक अनोखा नजारा दिखाई दिया। पांच लोग मिलकर एक लड़के की पिटाई कर रहे थे और आस-पास खड़े वाहन चालक तमाशा देखने में व्यस्त थे। तीन टैंपो भी वहां खड़े थे जिसमें सवारियां तो मौजूद थीं मगर ड्राईवर तीनों के ही गायब थे।
मार खाता लड़का मुश्किल से बीस-बाईस साल का रहा होगा, जो लगातार उनके आगे गिड़गिड़ाये जा रहा था। मगर उन पांचों पर उस बात का कोई असर होता दिखाई नहीं दिया। तभी उनमें से एक वहां खड़े टैंपो के पास पहुंचा और सीट के नीचे से एक सरिया निकाल लाया।
पनौती को उसका मकसद समझते एक पल भी नहीं लगा, वह तेजी से उसकी तरफ बढ़ा, तभी उसने सरिया वाला हाथ हवा में उठाया और जमीन पर पड़े लड़के की कमर पर चल दिया।

उसी वक्त विशाल ने उसका हाथ हवा में लपक लिया, और इससे पहले कि वह कुछ कर पाता सरिया उसके हाथ से छीनकर दूर उछाल दिया, “अब क्या इसे मार ही डालोगे, किया क्या है इसने?”
“पंद्रह रूपये के बदले दस रूपये किराया दे रहा था, मैंने पांच और मांगे तो बहन...पुलिस में कंप्लेन करने की धमकी देने लगा।”
“गाली नहीं देते भाई, गाली देना बुरी बात होती है।”
“तू है कौन बे?” - उसका दूसरा साथी बोला – “रिश्तेदार है इसका?”
“नहीं।”
“फिर जाता क्यों नहीं यहां से, क्यों चौधरी बन रहा है?”
“भाई पांच रूपये की ही तो बात है, मैं दिये देता हूं, जाने दो इसे, पहले ही बहुत मार खा चुका है।”
“ऐसे कैसे जाने दें?” - तीसरा बोला – “स्साले को पता तो लगे कि हम ड्राईवर भाइयों में कितनी यूनिटी है।”
“वह तो पहले ही पता लग चुका है, अब छोड़ो इसे। और हां अभी-अभी बताकर हटा हूं कि गाली देना बुरी बात होती है।”
“तेरे लिये होती होगी, हमारे लिये नहीं, अब दफा हो यहां से साले वर...।”
विशाल ने इतने जोर से उसके मुंह पर पंच मारा कि बाकी के शब्द उसके हलक में जा घुसे। जबड़ा टूटता हुआ सा जान पड़ा और उछलकर तीन-चार फीट दूर जा गिरा, “समझ में नहीं आता? गाली देना बुरी बात होती है।”
उस बात पर वहां इकट्ठे दुपहिया चालकों ने जोर से ठहाका लगाया।
बाकी के चारों पल भर को सकपका कर रह गये, फिर अपने साथी को उठाने की बजाय गुस्से से तमतमाये हुए विशाल की तरफ बढ़े।
इससे पहले कि उनमें से कोई उसपर हमला कर पाता, विशाल वहां से भाग खड़ा हुआ।
चारों उसके पीछे दौड़े।
“रूक साले भागता कहां है?”
विशाल नहीं रूका।
भागमभाग चलती रही। करीब एक किलोमीटर तक उसके पीछे दौड़ते रहने के बाद चारों का दम फूलने लगा, मगर हार मानने को तैयार नहीं थे।
भागते-भागते विशाल ने पीछे मुड़कर देखा तो बीच का फासला बढ़ गया देखकर अपनी रफ्तार थोड़ी कम कर दी।
यूं उन लोगों ने आधा किलोमीटर तक और उसका पीछा किया, फिर रूककर बुरी तरह हांफने लगे।
पनौती वापिस लौटा।
“क्या हुआ भाई लोग?”

“ठहर जा साले।” कहकर एक ने उसपर घूंसा चला दिया।
विशाल को उनसे इतनी फुर्ती की उम्मीद नहीं रह गई थी, नतीजा ये हुआ कि जोर से चलाया गया मुक्का चेहरा बचाने की कोशिश में उसकी गर्दन से टकराया। तभी विशाल ने उसका हाथ पकड़ लिया। पकड़कर तेजी से अपनी तरफ खींचा और अगले ही पल अपना घुटना मोड़कर उसके पेट में दे मारा, “गाली नहीं देते भाई।” कहकर उसने एक कसकर थप्पड़ उसके गाल पर जमा दिया, और इससे पहले कि बाकी के तीनों उसपर टूट पड़ते। विशाल एक बार फिर वहां से भाग खड़ा हुआ।
बुरी तरह तिलमिलाते चारों उसके पीछे दौड़े। करीब आधा किलोमीटर आगे जाने के बाद पनौती यूं ठिठक गया जैसे तेज रफ्तार कार को एकदम से ब्रेक लगा दिया गया हो। जबकि पीछा कर रहे लोग उससे दस कदम पीछे थे।
चारों ने उसे रूकता देखा तो जहां के तहां ठिठक कर लंबी-लंबी सांसे लेने लगे।
रूकते के साथ ही विशाल फिरकिनी की तरह घूमा और पूरी ताकत से, किसी पगलाये सांड की तरह उनकी तरफ को दौड़ता हुआ चिल्लाया, “अब बचकर दिखाओ भाई लोग।”
सुनते के साथ ही चारों एकदम से तन कर खड़े हो गये। मुट्ठियां भिंच सी गईं जबकि चेहरे पर क्रोध के भाव तो पहले ही स्थाई ठिकाना बनाये हुए थे।
दुर्त गति से दौड़ता पनौती करीब पहुंचा तो चारों ने एक साथ उसपर झपटने की कोशिश की, तभी वह दाईं तरफ को गच्चा दे गया। और रूककर उनसे मुकाबला करने की बजाय उधर को भाग खड़ा हुआ जिधर से वहां तक पहुंचा था।
टैंपो के पास पहुंचा तो पाया कि उनमें से सवारियां गायब हो चुकी थीं। मार खाता लड़का भी वहां से जा चुका था। तमाशबीनों की भीड़ भी नदारद थी। बस इकलौता वह शख्स मौजूद दिखाई दिया, जिसपर हमला कर के विशाल वहां से भागा था।
“कैसे हो पहलवान?”
उसने हैरानी से पनौती की तरफ देखा, मगर बोला कुछ नहीं।
“तुम्हारा टैंपो कौन सा है?”
“सबसे आगे वाला।” उसके मुंह से निकला।
“पल्ला तक छोड़ दो प्लीज।” कहकर वह टैंपो की पिछली सीट पर सवार हो गया।
ड्राईवर हिचकिचाया, उसके मन में संदेह उतर आया। मन के चोर ने उसे ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि लड़का आगे कहीं ले जाकर उसकी मरम्मत के मंसूबे बांध रहा है। वह इस बात पर भी हैरान था कि उसके पीछे गये उसके चारों साथी वापिस नहीं लौटे थे।
“चलो भाई।” - विशाल तनिक उच्च स्वर में बोला – “पहले ही बहुत देर हो चुकी है।”
“मेरे साथी कहां हैं, जो तुम्हारे पीछे गये थे?”

“उन्हें तो पुलिस पकड़ कर ले गई, अब जल्दी से निकल चलो यहां से, वरना तुम्हारा मुकाम भी हवालात में ही होगा।”
सुनकर सकपकाया हुआ सा वह दो कदम उसकी तरफ बढ़ा, फिर जाने क्या सोचकर एकदम से बाईं तरफ को दौड़ लगा दी।
विशाल ने उसके पीछे जाने की कोशिश नहीं की। वह टैंपो से नीचे उतरा और वहां से गुजरते एक दूसरे टैंपो में सवार हो गया।
तब तक बाकी के लोग वापिस नहीं लौटे थे।
दस मिनट बाद वह पल्ला पुलिया के सामने उतरा और पैदल चलता हुआ अपने घर पहुंचा।
“संजना कहां है?” मां ने पूछा।
“घर छोड़कर आया हूं उसे।”
“पहले यहां लेकर आना था।”
“लाता तो आधी रात तक आप दोनों की बातें ही खत्म नहीं होतीं, भुगतना मुझे पड़ता, क्योंकि अकेली तो उसे आप जाने नहीं देतीं यहां से।”
“बहू है, रात को अकेले कैसे भेज देती?”
“अभी हुई नहीं है मां।”
“जिसकी वजह सिर्फ और सिर्फ तू है, मैं पूछती हूं खराबी क्या है उसमें?”
“एक हो तो गिनाऊं।”
“चुपकर, पता नहीं क्या-क्या बोलता रहता है। अच्छा हाथ मुंह धो ले मैं खाना लगा देती हूं।”
“ठीक है मां।”
पांच मिनट बाद वह अपने बेडरूम में बैठा डिनर कर रहा था। सामने टीवी पर न्यूज चैनल लगा हुआ था। जिसपर उस वक्त प्रमुख खबरों की हेडिंग दिखाई और सुनाई जा रही थी।
एंकर की आवाज उसके कानों में पड़ी, ‘.... पार्टी के नेता का बयान, कहा पार्टी में इकट्ठी हो रही है चोरों की जमात।’
‘हिजबुल के तीन आतंकी ढेर, रेलवे स्टेशन को उड़ाने की थी साजिश।’
‘अस्पताल से चुराई गई लड़की की लाश, चोरों का अभी तक पता नहीं लगा पाई पुलिस।’
‘उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हुई खुलेआम गुंडागर्दी, बीच सड़क पर एक युवक को पीट-पीट कर मार डाला गया।’
‘असम के सिलचर इलाके में चार किलो हेरोईन के साथ दो शख्स गिरफ्तार, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सोलह करोड़ बताई जाती है कीमत।’
‘फरीदाबाद के सेक्टर बीस इलाके में पुलिस ने फाड़े पुलिस के कपड़े, लोगों ने सोशल मीडिया पर अपलोड की फोटो और वीडियो।’
पनौती ने हकबका कर स्क्रीन पर निगाहें गड़ा दीं। सेक्टर बीस का इलाका उस थाने के अंतर्गत आता था, जहां इंस्पेक्टर सतपाल सिंह तैनात था।
डिनर के बाद विशाल ने उसे फोन लगाया।
“कैसे हो सक्सेना साहब?”

“मैं तो बढ़िया हूं, लेकिन अभी अभी टीवी पर तुम्हारी बाबत एक न्यूज देखी है, अपना ना सही कम से कम वर्दी का तो ख्याल किया होता, इतने गैरजिम्मेदार कब से हो गये तुम?”
“क्या कह रहा है भाई, कैसी न्यूज?”
“यही कि तुमने अपने ही किसी कलीग के कपड़े फाड़ डाले।”
“दूसरी न्यूज नहीं देखी?”
“कौन सी?”
“वही जिसमें दिखाया जा रहा है कि इंस्पेक्टर सतपाल सिंह ने विशाल सक्सेना नाम के एक लड़के को उस वक्त गोली मार दी जब वह उसका मजाक उड़ाने की कोशिश कर रहा था।”
“जबकि तुम मुझे अपना दोस्त कहते हो?”
“दोस्तों के ये लक्षण होते हैं?”
“अरे मैंने तो वही पूछा है जो टीवी पर दिखाया जा रहा है।”
“बकवास मत कर यार! पहले ही डीसीपी साहब तमाम अफसरों को लताड़ कर गये हैं। जैसे यहां तैनात हर सिपाही और हवलदार की जिम्मेदारी उससे ऊपर के रैंक वालों की ही बनती है।”
“बनती तो है सतपाल साहब चाहे तुम कबूल करो या मत करो। वैसे हुआ क्या था?”
“मति मारी गई थी, बेरोजगार होना बदा था किस्मत में। रिश्वत की कमाई को लेकर भिड़ंत हो गई, वह भी बीच सड़क पर। डीसीपी साहब ने फौरन सस्पेंड कर दिया, आगे नौकरी जाने की आशंका भी बराबर दिखाई दे रही है।”
“मैं तो पहले ही कहता था कि कोई दूसरी नौकरी तलाशना शुरू कर दो, फास्ट फूड की रेहड़ी का आईडिया भी दिया था, देख लो आज जरूरत पड़ ही गई।”
जवाब में सतपाल ने कुछ कहने की बजाय कॉल डिस्कनैक्ट कर दी।
☐☐☐
अंडाकार चेहरा, बड़ी-बड़ी आंखें, सुतवां नाक, गुलाबी होंठ, ऊपर से खूब गोरी रंगत! कयामत ढाते प्रतीत हो रहे थे। कद उसका साढ़े पांच फीट से कम तो क्या रहा होगा, जिसकी वजह से अपने भरे-भरे बदन के बावजूद छरहरी दिखाई दे रही थी। इस वक्त वह ऐसा क्रॉप टॉप पहने थी, जिसके एक तरफ, कंधे से नीचे झूल रहे हिस्से से उसकी छाती का काफी सारा हिस्सा खुला दिखाई दे रहा था।
एक नजर देखने पर वह कोई मॉडल या फिल्म अभिनेत्री जान पड़ती थी, जबकि हकीकत में वह स्टूडेंट थी, दिल्ली के टॉप क्रिमिनल लॉयर की बेटी थी, ऐसे लॉयर की जिसे पिछले दिनों सरेराह पुलिस हिरासत में गोली मार दी गई थी।

बाप की तरह वह वकील तो नहीं थी, मगर बेहद शार्प माइंडेड थी, क्रिमिनल्स और क्रिमिनोलॉजी में खासा इंट्रेस्ट रखती थी। बाप के बड़ा लॉयर रहा होने के कारण अपराधियों की मानसिकता और पुलिस की कार्य प्रणाली के बारे बहुत उम्दा नॉलेज रखती थी।
इसके अलावा वह हंसमुख थी, बेबाक थी, हाजिरजवाब थी। दोस्तों में लड़कियों की बजाय लड़कों के नाम अधिक शुमार थे। कभी कभार ड्रग्स लेना, सप्ताह में दो-चार बार ड्रिंक करना, क्लब डिस्टोथेक की रेग्युलर हाजिरी भरना जैसे काम कल तक बेशक उसकी जिंदगी का अहम हिस्सा बने हुए थे, मगर बाप की मौत के बाद तकरीबन व्यसनों से उसने खुद को दूर कर लिया था। अलबत्ता सिगरेट और बीयर दो ऐसी चीजें थीं जिनसे अलग हो जाना उसने जरूरी नहीं समझा था।
उसका नाम अवनी सक्सेना था, उम्र मुश्किल से चौबीस साल रही होगी, वह बिंदास लाईफ में यकीन करने वाली वह ऐसी लड़की थी, जिसे किसी भी तरह का बंधन कबूल नहीं था। वह लाईफ को अपनी शर्तों पर जीने की आदी थी और क्या खूब जी रही थी।
मां बचपन में ही साथ छोड़ गई थी, जबकि बाप जिस अंजाम को पहुंचा उसके लिए बहुत हद तक वह खुद जिम्मेदार थी। बाप की मौत का अफसोस उसे बराबर था, मगर अपने किये पर क्या मजाल जो वह एक क्षण के लिए भी शर्मिंदा हुई हो।
उस वक्त शाम के सात बज रहे थे, जब बाहर गेट पर मौजूद गार्ड ने इंटरकॉम पर उसे बताया कि दो लोग उससे मिलने के लिए आये हुए हैं।
अवनी ने नाम पता जानने की कोशिश किये बिना उन्हें भीतर भेजने को कह दिया और खुद कमरे से निकलकर ड्राईंग रूम में पहुंची और टांग पर टांग चढ़ाकर सोफे पर बैठ गयी।
थोड़ी देर बात जिन दो युवकों ने भीतर कदम रखा उन्हें देखकर अवनी के माथे पर बल पड़ गये। असल में उसने घबरा जाना चाहिये था, मगर वैसे कोई भाव अवनी के चेहरे पर आते नहीं दिखाई दिये।
“यहां क्यों आये हो?” उसने सीधा सवाल किया।
“आपसे कुछ बात करनी है मैडम, ऐसी बात जिसमें आपकी ही भलाई छिपी हुई है।”
“बैठो।” कहकर उसने अपने सामने, सेंट्रल टेबल के उस पार रखे सोफे की तरफ इशारा कर दिया।
इलियास और ओजस्वी असल में ‘दिल्ली का डॉन’ के नाम से मशहूर संदीप डांगे के खास आदमी थे। दोनों हद से ज्यादा खतरनाक, ऐसे आदमी थे जिन्हें किसी की जान लेने से पहले क्षण भर के लिए भी सोचना गवारा नहीं था। खासतौर से अगर डांगे का हुक्म हो तो वह पलक झपकते किसी का भी सफाया कर सकते थे, बिना ये सोचे कि उसका अंजाम क्या होगा? कहीं दोनों धर तो नहीं लिये जायेंगे।
“आपने हमें पहचाना नहीं?”
“डांगे अंकल के आदमी हो, पहचानूंगी कैसे नहीं।”
“उसके अलावा भी हमारी एक पहचान है, लगता है उस रात आपने हमारी सूरत ढंग से नहीं देखी थी, नहीं ही देखी होगी, अंधेरा भी तो बहुत था।”
“किस रात?”
“आपके अपहरण वाली रात, जब हमने आपको गीता पार्क से निश्चित मौत के कगार से निकाला था, याद आया कुछ?”
“वो दोनों तुम थे?” वह हैरानी से बोली और सीधी होकर बैठ गयी।
“बेशक हम ही थे, और किसी को भला उस बात की खबर कैसे हो सकती है?”
“थैंक्यू, अभी ये बताओ कि यहां कैसे आना हुआ, मेरा शुक्रिया सुनने तो नहीं आये होगे?”
“नहीं वह तो आपने उसी रात बोल दिया था।”
“मुझे वहां तक जबरन ले जाने वाले लोग थे कौन?”
“गुफरान के आदमी थे।”

“वह कौन है?”
“था कहिये, गुफरान हसीब बाबा का छोटा भाई था, जो आखिरकार हमारे हाथों जहन्नुम पहुंच गया। इसलिए पहुंच गया क्योंकि वह डांगे साहब के खिलाफ जा रहा था। आप तो जानती ही हैं, कम से कम दिल्ली शहर में उनकी मुखाफलत कर के कोई जिंदा नहीं रहा सकता।”
“तुम मुझे धमकाने की कोशिश कर रहे हो?” अवनी के माथे पर बल पड़ गये।
“हां कर रहा हूं।” - ओजस्वी का लहजा अचानक ही कर्कश हो उठा – “एमबी रोड चौकी के चक्कर लगाना बंद कीजिये। अपने बाप के कत्ल की कंप्लेन डांगे साहब के खिलाफ दर्ज कराने कोशिश से बाज आ जाईये, इसी में आपकी भलाई है।”
“और बाज नहीं आई तो?”
“तो बहुत बुरा होगा मैडम, वैसे भी जुबान चलाने में बड़ी तकलीफ महसूस होती है मुझे” - कहकर वह तनिक रूका फिर बोला – “गोली चलाने के मुकाबले। वैसे भी ये समझाने बुझाने वाले काम मैं बार-बार नहीं कर सकता। वह तो डांगे साहब का हुक्म है कि एक बार आपको सही रास्ता दिखाने की कोशिश कर ली जाये, इसलिए कर ली जाये क्योंकि उनके इकलौते बेटे को कभी अपनी जवानी का खूब मजा चखाया था आपने, उस बात की डांगे साहब को पूरी-पूरी कद्र है। इससे पहले की कद्र नाकद्री में बदल जाये, डांगे साहब अपने आदमियों को भूखे कुत्तों की तरह आप पर छोड़ दें! बाज आ जाईये। वरना आपके इस खूबसूरत जिस्म का वह हाल होगा कि कोई थूकना भी पसंद नहीं करेगा। फिर लोग ढूंढते ही रह जायेंगे कि अवनी सक्सेना गई तो कहां गई।”
“ये तुम्हारी दूसरी धमकी है।” अवनी बड़े ही शांत लहजे में बोली।
“ऐसी बात नहीं है मैडम।” - वार्तालाप का सूत्र अपने हाथों में लेता हुआ इलियास हिंदोस्तानी बोला – “आपके पिता ने जो किया उसकी उन्हें सजा मिल गई, ऐसे में आप डांगे साहब के खिलाफ जाने की कोशिश करेंगी तो कैसे बात बनेगी? इसलिए जो हुआ उसपर खाक डालिये। और अपनी लाईफ इंज्वाय कीजिये, बल्कि कोई अच्छा सा लड़का ढूंढकर ब्याह रचा लीजिये, फिर हर दिन होली और हर रात दीवाली का मजा लीजिये। खुद नहीं ढूंढ सकतीं तो डांगे साहब को ये नेक काम करने से कोई ऐतराज नहीं होगा। हमारी बात मान जाईये इसी में आपकी भलाई है और हमारी भी।”
“तुम्हारी कैसे?”
“आप जैसी खूबसूरत, सैक्सी, हॉट गर्ल के भेजे में बुलेट उतारते हुए...” - ओजस्वी फिर बोल पड़ा – “हमें अच्छा थोड़े ही लगेगा। मगर मजबूरन, दिल पर पत्थर रखकर आखिकार तो उस काम को अंजाम देना ही पड़ेगा।”
“लेकिन मुझे बहुत लगेगा, कभी गोली खाकर नहीं देखा मैंने, पता नहीं कैसा महसूस होता होगा। प्लीज शूट करो मुझे, हथियार नहीं है तो मैं दिये देती हूं।” - कहकर वह क्षण भर को सांस लेने को रूकी फिर बोली – “रही बात किसी मुजरिम को सजा देने की, तो उसका हक सिर्फ और सिर्फ देश की अदालत को है, ना कि डांगे अंकल को। तुम्हारी धमकी से डर कर मैं अपने कदम वापिस खींच लूंगी, इसका ख्याल सपने में भी अपने मन में मत आने देना।”
“आपके पिता के साथ जो हुआ वह एक तरह से इंसाफ ही था।”

“उनके कत्ल को इंसाफ मत कहो, इंसाफ वह था जो मैंने किया था। एक पल को भी नहीं सोचा कि मैं जिसके खिलाफ पुलिस को सबूत मुहैया कराने जा रही हूं, जिसपर कातिल होने का आरोप लगा रही हूं वह मेरा बाप है। क्योंकि इस बात में कोई शक नहीं कि उनका गुनाह अक्षम्य था। मगर पुलिस हिरासत में उनको गोली मार देना, इंसाफ नहीं कहा जा सकता। इसलिए तुमसे जो बन पड़े मेरा बिगाड़ लेना। डांगे अंकल के खिलाफ नामजद रिपोर्ट तो मैं दर्ज कराकर रहूंगी, भले ही उसके लिए मुझे कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़े या मीडिया को बुलाकर सारी सच्चाई क्यों न बतानी पड़े।”
“फिर भी बात नहीं बनी तो?”
“तो बहुत बुरा होगा....!”
“बेशक होगा, फिर पहले ही अपने कदम वापिस क्यों नहीं खींच लेतीं?”
“.....डांगे अंकल के लिए।” उसने अपना वाक्य पूरा किया।
दोनों हड़बड़ा कर उसकी शक्ल देखने लगे फिर इलियास बोला, “आप डांगे साहब की सलाहियात को कम कर के आंक रही हैं। जिन जगहों पर आप इंसाफ की गुहार लगाना चाहती हैं, वहां आपसे कहीं ज्यादा मजबूत पकड़ डांगे साहब की है। कोई नहीं सुनने वाला आपकी।”
“हो सकता है, मगर देश का निजाम किसी गुंडे मवाली के इशारों पर नहीं चला करता। ये नहीं हो सकता कि तुम्हारा डांगे साहब पूरे देश की कानून व्यवस्था को अपने काबू में कर ले, इसलिए कोई ना कोई तो मेरी जरूर सुनेगा। बल्कि सबसे पहले अदालत ही सुनेगी।”
“यानि पक्के तौर पर सुसाईड का इरादा बनाये बैठी हैं?”
“जाकर अपने डांगे साहब बोल देना” - उसने जैसे उनकी बात सुनी ही नहीं – “कि वक्त रहते पुलिस स्टेशन पहुंचकर अपना गुनाह कबूल कर लें, वरना जान बचाने के लिए दिल्ली तो क्या पूरी दुनिया छोटी पड़ जायेगी।”
दोनों फिर सकपकाये, तत्पश्चात ओजस्वी बोला, “इससे बड़ा मजाक हमने अपनी जिंदगी में पहले कभी नहीं सुना।”
“आगे सुनने के लिए जिंदा बचे रहना चाहते हो तो एक मिनट है तुम्हारे पास, यहां से तशरीफ ले जाने के लिए। ऐन इकसठवें सेकेंड में मैं तुम दोनों शूट कर दूंगी।” - रिवाल्वर जैसे जादू के जोर से उसके हाथों में दिखाई देने लगी – “अब पचपन बचे हैं।”

दोनों बुरी तरह हड़बड़ा से गये। लड़की का चेहरा चट्टान की तरह सख्त नजर आ रहा था। बेशक दोनों उस वक्त हथियारबंद थे, मगर यूं दिन दहाड़े अवनी का कत्ल कर देने का मतलब उन्हें बखूबी पता था। इसलिए काउंटर निशाना साधने की कोशिश दोनों में से किसी ने नहीं की।
“पैंतालिस।” अवनी उनपर निगाहें गड़ाये हुए बोली।
“ठीक है आप ऐसा चाहती हैं तो यही सही, मगर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहियेगा।”
“चालीस।”
दोनों बुरी तरह से तिलमिलाते हुए उठ खड़े हुए।
ओजस्वी ने जाते-जाते कुछ कहने की कोशिश की तभी!
“अब सिर्फ पैंतीस सेकेंड बचे हैं।”
दोनों ने एक साथ गहरी सांस ली फिर गेट खोलकर बाहर निकल गये। उनके जाने के पांच मिनट बाद अवनी ने गार्ड को फोन कर के उस बात की कंफर्मेशन हासिल की, तत्पश्चात रिवाल्वर को गोद में रखकर दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ कर बैठ गयी।
☐☐☐
उसी रात दस बजे।
सीढ़ियां चढ़कर रिजवान अहमद बिल्डिंग के दूसरे फ्लोर पर स्थित अपने कमरे तक पहुंचा, दरवाजा आधा खुला हुआ था, भीतर से टीवी चलने की आवाज आ रही थी। उसने दरवाजे को धकेल कर थोड़ा और खोला फिर भीतर दाखिल होने के बाद पलट कर सिटकिनी चढ़ा दी।
फर्श पर उसकी बेटी अफसाना कंबल ओढ़े उसकी तरफ पीठ किये बैठी थी। उसके सामने कटी हुई सब्जियों से भरी थाली और चाकू रखा हुआ था। हैरानी की बात थी कि आहट पाकर भी उसने पलट कर देखने की कोशिश नहीं की।
रिजवान ने बेड से रिमोट उठाकर टीवी बंद किया फिर किचन में पहुंचकर एक गिलास पानी गटकने के बाद वापिस कमरे में लौटा।
सामने का नजारा हैरान कर देने वाला था।
कंबल के भीतर अफसाना नहीं थी, बल्कि आटे के कनस्तर के ऊपर दो तकिये यूं रखकर कंबल ओढ़ा दिया गया था, कि पीछे से देखने वाले को वहां किसी के बैठा होने का भ्रम होना लाजिमी था। फिर कटी हुई सब्जियां भी उस भ्रम को कायम रखने में खास भूमिका निभा रही थीं।
रिजवान ने कंबल और तकियों को बेड पर उछाला और बगुले की तरह कमरे से बाहर निकल कर पड़ोस में रहते अनन्त सिंह का दरवाजा खटखटा दिया।
थोड़ी देर बाद एक तीसेक साल का युवक दरवाजे पर प्रकट हुआ। रिजवान के बदहवाश चेहरे पर उसकी निगाह पड़ी तो एकदम से सकपका सा गया।
“क्या हुआ अंकल, आप इतने घबराये हुए क्यों हैं?”

“अफसाना कुछ कहकर गई है?”
“मुझसे क्यों कहेगी?”
“कमरे में नहीं है, तुम पड़ोसी हो इसलिए सोचा क्या पता कुछ बोलकर गई हो।”
“नहीं, मुझसे तो कुछ नहीं कहा। हां आठ बजे के करीब मैंने उसे कमरे में बैठे देखा था। आप घबराईये मत, आस-पास किसी के यहां चली गई होगी, अभी लौट आयेगी।”
“तुम तो जानते ही हो वह किसी के घर नहीं जाती, बल्कि अपने कमरे से बाहर कदम ही नहीं रखती, ऐसे में इतनी रात गये बाहर क्यों जायेगी?”
“अरे अभी दस ही तो बजे हैं?”
“तो भी बहुत रात हो चुकी है।”
“आपने शमीम से पूछा?”
“नहीं।”
“पूछकर देखिये, क्या पता उसे कुछ मालूम हो।”
सहमति में सिर हिलाता रिजवान अपने कमरे के एकदम सामने वाले दरवाजे पर पहुंचा और हौले से दस्तक दे दी। तब तक उसकी हालत खराब हो चुकी थी। इस बात का उसे पूरा यकीन था कि इतनी रात गये अफसाना बिना उसे खबर किये कहीं नहीं जाने वाली। वह तो कभी मार्केट भी अकेली नहीं जाती थी।
उसका दिल नगाड़े की तरह बज रहा था। हाथ-पांव की कंपन साफ साफ देखी जा सकती थी।
यकीनन वह किसी अनहोनी की आशंका से त्रस्त था।
दरवाजा खुलने में देर हुई तो उसने फिर से दस्तक दे दी।
इस बार उसे इंतजार नहीं करना पड़ा।
“सलाम वालेकुम चच्चाजान।” रिजवान पर निगाह पड़ते ही शमीम बोल पड़ा।
“वालेकुम सलाम बेटा, अफसाना घर में नहीं है, तुमसे कुछ कहकर तो नहीं गई?”
“नहीं, मुझे तो कुछ नहीं बताया, लेकिन इतनी रात गये! कहां जा सकती है?”
“क्या पता बेटा, मेरा दिल बहुत घबरा रहा है।”

“नाहक परेशान होने की जरूरत नहीं है, आपकी बेटी बिना बताये कहीं दूर नहीं जाने वाली, आस-पास किसी के यहां चली गई होगी, चलिये पता करते हैं चलकर।” कहकर उसने अपने कमरे की कुंडी लगाई और रिजवान के साथ हो लिया।
अगले एक घंटे में उन दोनों ने बिल्डिंग में रहते हर शख्स से दरयाफ्त कर लिया, मगर अफसाना को देखा होने की हामी किसी ने नहीं भरी। फिर उनमें से बहुत से लोग तो ऐसे थे जो उसे और उसकी बेटी को पहचानते तक नहीं थे, क्योंकि उन्हें वहां शिफ्ट हुए अभी महीना ही बीता था।
तत्पश्चात बिल्डिंग के आस-पास के इलाकों का भी फेरा लगा लिया गया। मगर अफसाना नहीं मिली, ना ही उसकी कोई खबर ही हासिल हो पाई। तब तक रिजवान की हालत मरणासन्न हो चुकी थी। शमीम ये सोचकर डर रहा था कि कहीं उसे दिल का कोई दौरा-वौरा न पड़ जाये। इसलिए वह लगातार उसे तसल्ली देने की कोशिश कर रहा था, जिसका प्रत्यक्षतः उसपर कोई असर नहीं हो रहा था।
☐☐☐
एम.बी. रोड पुलिस चौकी का निर्माण अभी दस महीने पहले ही किया गया था। जो कि उसी रोड पर तुगलकाबाद गांव से थोड़ा आगे जाने पर सड़क के दाहिने तरफ स्थित थी। थाने से महज तीन किलोमीटर की दूरी पर चौकी के निर्माण की अहम वजह ये थी कि लाल कुआं से लेकर संगम बिहार तक का रास्ता बेहद सुनसान था और आये दिन उधर वारदातें घटित होती रहती थीं। खास तौर पर रात के वक्त होने वाले एक्सीडेंट्स का तो कोई ओर-छोर ही नहीं था।
राठी वहां का पहला इंचार्ज बनाया गया, जो इस बात पर फूला नहीं समाता था कि चौकी में उसकी पावर थाने के एसएचओ जितनी थी, वह जैसे चाहे वहां के स्टाफ को हैंडल कर सकता था, उनपर हुक्म चला सकता था।
वह छह फीट का, अठाईस की उम्र वाला कड़ियल नौजवान था, जो कि शक्ल से ही बेहद खूंखार और गुस्सैल दिखाई देता था। हैवी ड्रिंकर था, वूमनाईजर था, बस यही गनीमत थी कि ड्यूटी के वक्त खुद को तमाम व्यसनों से दूर रखता था।
उस वक्त सुबह के दस बजे। राठी अपने कमरे में दोनों टांगे मेज पर चढ़ाये, कुर्सी पर अधलेटी मुद्रा में बैठा हुआ था। उसकी उंगलियों में ताजा सुलगाया गया सिगरेट फंसा था जबकि पैरों के पास मेज पर उपेक्षित सा चाय का एक भरा हुआ कप मौजूद था, जिससे उसने तब तक एक चुस्की भी नहीं ली थी।
मां-बाप ने उसका नाम निरंकुश क्यों रखा, इसका जवाब तो वही जानते होंगे। मगर वह नाम राठी के स्वभाव से पूरी तरह मैच करता था। असल में वह पूरी तरह निरंकुश ही था। कर्म और मन दोनों से वह बेहद घूसखोर पुलिसिया था जो कि पैसा बनाने का कोई भी मौका चूकना हराम समझता था। जीवन में उसकी दो ही ख्वाहिशें थीं, खूब पैसा कमाना और कोई ऐसा केस सॉल्व कर दिखाना जिससे पूरे हिंदुस्तान में उसके नाम का डंका बज उठे। टीवी पर बार-बार उसकी सूरत दिखाई जाये और बड़े अफसर उसकी वाहवाही करते न थकें।

दो महीना पहले उसकी दोनों ही ख्वाहिशें पूरी होती होती रह गयी थीं, जिसका उसे इतना मलाल था कि रात-रात भर कमरे में बैठा गुजरे वक्त के बारे में सोचता रहता। इस वक्त भी उसका ध्यान पूरी तरह उन्हीं बातों पर टिका हुआ था। वह याद कर रहा था उस दौलत को जो उसके हाथों में पहुंचकर भी फिसल गई थी, याद कर रहा था महाहरामी हवलदार लांबा को जो असल में उसकी हार की वजह बना था।
तभी एक सिपाही इजाजत लेकर भीतर दाखिल हुआ।
राठी के मौजूदा पोज में कोई अंतर नहीं आया। उसने सिगरेट का एक गहरा कश लिया फिर घूर कर सिपाही को देखा, “तुझे बवासीर है?”
“क्या कह रहे हैं जनाब?”
“फिर अपनी सीट पर टिक कर क्यों नहीं बैठता? सुबह से देख रहा हूं, हर आधे घंटे बाद तू किसी न किसी बहाने मेरे सिर पर आ खड़ा होता है।”
“सॉरी सर।”
“अब बोलता क्यों नहीं, क्या बात है?”
“ड्यूटी रूम में रिजवान अहमद नाम का एक शख्स बैठा है जो अपनी बेटी की गुमशुदगी दर्ज कराने के लिए आया है। साथ ही अपने मकान मालिक पर शक जता रहा है कि उसकी बेटी को गायब करने में उसी का हाथ है।”
“उससे बोल चौबीस घंटे बाद आये।”
“मैंने बोला था साहब, तो कहने लगा कि अफसाना खुद गायब नहीं हुई है, बल्कि कर दी गई है। इसलिए मामला गुमशुदगी का नहीं बनता। उसका पूरा जोर अपहरण की रिपोर्ट लिखवाने पर है, जो हमने दर्ज नहीं की तो वह थाने पहुंचने से बाज नहीं आयेगा।”
“दिखता कैसा है? मेरा मतलब है कोई रूतबे वाला शख्स तो नहीं है?”
“नहीं जनाब पहनावे से तो एकदम फटीचर जान पड़ता है, हां सूरत अच्छी है। मगर हमारे घुड़कने का, घुड़ककर यहां से भगा देने की कोशिश का कोई असर उसपर होता दिखाई नहीं दे रहा।”
“सब के सब एकदम निकम्मे हो, एक मामूली से आदमी को हैंडल नहीं कर पाते, जबकि खड़े यूं अकड़ कर होते हो जैसे सिकंदर के बाद दुनिया फतह करने का सेहरा तुम्हारे ही सिर बंधने वाला है।”
“सॉरी जनाब, लेकिन वह कुछ भी सुनने को राजी नहीं है, हां आप कहेंगे तो उसे उठाकर चौकी से बाहर जरूर फेंक आयेंगे हम।”
“तब वह थाने नहीं जाता हो तो भी जाकर रहेगा।” - कहकर राठी ने सिगरेट के बचे हुए हिस्से को ऐशट्रे में डाला। कुछ क्षण विचार करने का नाटक किया, फिर बोला, “ठीक है लेकर आ।”

सिपाही तत्काल बाहर निकल गया और थोड़ी देर बाद जब हाजिर हुआ तो उसके साथ मैले-कुचैले पजामा-कुर्ता में, पैंतालिसेक साल का एक ऐसा शख्स मौजूद था, जो सूरत से ही बहुत हलकान-परेशान दिखाई दे रहा था। उसकी आंखें यूं सूजी पड़ी थीं जैसे घंटो रोता रहा हो, या फिर पूरी रात सो न पाया हो।
राठी ने गहरी निगाहों से उसका नख-शिख मुआयना किया फिर उसे बैठने का इशारा कर दिया।
वह बुरी तरह सहमता हुआ, सकुचाता हुआ उसके सामने मौजूद विजिटर्स चेयर्स में से एक पर बैठ गया, यूं बैठ गया जैसे किसी भी वक्त उठ खड़ा होने का हुक्म मिलने की आशंका हो।
“क्या हो गया?”
“मेरी बेटी लापता है साहब, कल रात से उसका कुछ पता नहीं चल रहा।”
“किसी रिश्तेदार के पास न पहुंच गई हो?”
“बिना बताये वह कहीं नहीं जा सकती सर! बल्कि घर से भी बहुत कम ही निकलती थी। जमाने को देखते हुए कुछ पाबंदियां मैंने भी उसपर लगा रखी थीं।”
“जिनसे आजाद होने की खातिर वह घर से भाग गई होगी।”
“ऐसा नहीं हो सकता, ऊपर से अभी वह नाबालिग थी, महज सत्रह साल की।”
“तो किसी लड़के के साथ भाग गई होगी, आजकल ऐसे केसेज की भरमार है हमारे पास। लड़की जाती तो अपनी मर्जी से है, मगर उनके पेरेंट्स जाहिर यूं करते हैं जैसे उसका अपहरण कर लिया गया हो। असल में गलती मां-बाप की होती है। बेटी को उनपर इतना भी भरोसा नहीं होता कि वे गंभीरता से उसकी बात सुनेंगे, सुनकर उसकी मर्जी के मुताबिक अमुक लड़के के साथ उसकी शादी कर देंगे। जरा खुद सोचकर देखो, लड़की के भाग जाने में ज्यादा बेइज्जती है या बिरादरी से बाहर उसकी शादी कर देने में? मगर पेरेंट्स को ये बात समझ में नहीं आती, जरा सी बात को नाक का सवाल बना लेते हैं। जानते हो किसी मल्टी मिलेनियर की बेटी या बहन घर से क्यों नहीं भागती?”
“मैं कैसे जानूंगा साहब?”
“इसलिए नहीं भागती क्योंकि वहां बाप-बेटी के बीच, बहन-भाई के बीच, इतना दोस्ताना माहौल होता है कि अपने मन की बात पेरेंट्स को बताने से वह जरा भी नहीं सकुचातीं, और ना ही उनके मां-बाप अपनी बेटियों पर नाजायज दबाव बनाने की कोशिश करते हैं।”
“इन बातों को अफसाना के गायब होने के साथ क्या रिश्ता हो सकता है साहब?”
“यही कि जो लड़की अपनी मर्जी से घर छोड़कर चली गई हो, उसे पुलिस जबरन घर वापिस लौटने को मजबूर नहीं कर सकती। इसलिए एक नेक राय देता हूं तुम्हें, पता करो वह किसके साथ भागी है, दोनों को ढूंढकर उनकी शादी को रजामंदी दे दो, सारी परेशानियां एक झटके में खत्म हो जायेंगी। पुलिस इसमें कुछ नहीं कर सकती।”
“क्यों नहीं कर सकती सर? मैं क्या जानता नहीं की कानूनन नाबालिग की अपनी कोई मर्जी नहीं होती।”
“कानून सिखा रहा है?” राठी का लहजा एकदम से बदल गया।
“मेरी क्या मजाल साहब जो आपको कानून सिखाने की कोशिश करूं, मैं तो बस इतना चाहता हूं कि आप लोग उसे ढूंढ निकालें, वरना उसके साथ कुछ भी हो सकता है।”
“क्या हो सकता है?”

“उसकी जान जा सकती है, क्योंकि मुझे पूरा यकीन है कि उसके गायब होने में अंकुर का कोई ना कोई हाथ जरूर है। वह अक्सर हमारे कमरे के आस-पास मंडराता रहता था, कई बार अफसाना को घटिया इशारे भी कर चुका था। यहां तक कि एक बार उसका हाथ तक पकड़ लिया था कमीने ने।”
“तब कंप्लेन क्यों नहीं की?”
“जगहंसाई कौन चाहता है साहब, कंप्लेन करता तो मोहल्ले में रहना दुश्वार हो जाता, लोग तरह तरह की बातें करने लगते, फिर पानी में रहकर मगर से बैर कौन लेना चाहता है? इधर किसकी मजाल है जो अंकुर के खिलाफ जाने की कोशिश करे।”
“ये अंकुर कहीं रोहिल्ला ट्रांसपोर्ट वाला तो नहीं है?”
“वही है साहब।”
तत्काल राठी के होंठों से सीटी सी निकल गई। रोहिल्ला से वह बहुत अच्छी तरह से वाकिफ था, उसका ट्रांसपोर्ट का बिजनेस कोई खूब बड़ा तो नहीं था, मगर चांदी यकीनन काट रहा था, जिसका कुछ हिस्सा हर महीने चौकी को प्रसाद के रूप में भी चढ़ाया जाता था।
तत्काल निरंकुश राठी के आंखों में लालच की चमक उभर आई। कंप्लेन अगर रोहिल्ला के खिलाफ थी तो उसे हाथ से जाने देना ठीक नहीं होगा।
“इतना बड़ा आदमी ऐसी छिछोरी हरकत करेगा, यकीन तो नहीं आता।”
“वह बहुत ही अय्याश किस्म का है सर! अक्सर उसके ट्रांसपोर्ट ऑफिस में, जिसके पहली मंजिल पर वह खुद रहता है, शाम ढले नई-नई लड़कियों पहुंचती रहती हैं। जो कभी घंटा दो घंटा में वापिस लौट जाती हैं तो कभी अगली सुबह निकलती दिखाई देती हैं। गांव में क्योंकि उसका बहुत दबदबा है इसलिए कोई उसके खिलाफ बोलने की कोशिश नहीं करता, अलबत्ता खुसर-फुसर, ढके छुपे ढंग से उसकी बुराई हर कोई करता है। आप ढूंढे से भी ऐसा कोई शख्स नहीं मिलेगा जो ये कह दे कि अंकुर रोहिल्ला बहुत अच्छा इंसान है।”
“जरूरी नहीं कि वह असल में वैसा ही हो जैसा कि लोग बाग अंदाजा लगाये बैठे हों, अक्सर सुनी सुनाई बातों को एक में आठ लगाकर बयान किया जाता है, आगे वह आठ सोलह हो जाता है और फिर चौबीस बनते देर नहीं लगती।”
“ऐसा नहीं है सर, बात अगर सिर्फ अफवाह होती तो हर कोई उसे हवा नहीं दे रहा होता। लोगों का अपना सेंस भी तो होता है, वह यूं ही किसी से सुनी हुई बात को पास ऑन नहीं कर बैठते।”
“भई इत्तेफाक तो नहीं रखता तुम्हारी बातों से मगर जाने दो, ये बताओ कि तुम कहां रहते हो?”
“वहीं सड़क के दूसरी तरफ एक बिल्डिंग है, वह भी अंकुर रोहिल्ला की ही मिल्कियत है, उसी की दूसरी मंजिल पर मैं अपनी बेटी के साथ रहता हूँ।”
“और बीवी कहां है तुम्हारी?”
“कहीं नहीं है साहब, सालों पहले चल बसी थी।”
“और कोई साथ नहीं रहता?”
“नहीं साहब।”
“करते क्या हो?”

“सिलाई का कारीगर हूं, संगम विहार में छोटी सी एक कंपनी है, उसी में दिहाड़ी पर काम करता हूं।”
“बेटी स्कूल नहीं जाती थी?”
“दसवीं तक पढ़ी थी, आगे उसे स्कूल भेजना मुनासिब नहीं समझा।”
“मौजूदा कमरे में कब से रह रहे हो?”
“अभी बस महीना ही बीता है।”
“इससे पहले कहां रहते थे?”
“आजादपुर में।”
“बेटी के गायब होने की खबर कब लगी?”
“कल रात को मैंने ओवरटाईम किया था, इसलिए घर पहुंचते-पहुंचते दस बज गये। वहां पहुंचकर पाया कि अफसाना घर में नहीं थी, दरवाजा खुला पड़ा था। हालांकि पास-पड़ोस में उसके कहीं चले जाने की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी, फिर भी मैंने पूरी बिल्डिंग में दरयाफ्त कर लिया, किसी ने उसको नहीं देखा था। आस-पास के इलाकों में भी देख डाला मगर वह नहीं मिली। पूरी रात मैं उसके वापिस लौटने का इंतजार करता रहा। आज सुबह कई जानने वालों को फोन कर के उसके बारे में दरयाफ्त भी किया, मगर कोई खबर नहीं मिली, तब मेरे पास यहां पहुंचने के अलावा और कोई चारा नहीं था। आप मेरी रिपोर्ट लिखकर अंकुर से पूछताछ कीजिये सर! सच्चाई सामने आ जायेगी।”
“तुम्हें लगता है हम उससे जाकर पूछेंगे कि बता भाई अफसाना कहां है? तो वह बता देगा?”
“क्यों नहीं बता देगा? आप पुलिस वाले हैं, आपके सामने भला झूठ बोलने की हिम्मत वह कैसे कर सकता है?”
तब ना चाहते हुए भी निरंकुश राठी को उस सीधे-सादे आदमी पर तरस हो आया। अंकुर रोहिल्ला के कारनामों से बहुत हद तक वह पहले से ही वाकिफ था, इसलिए रिजवान का आरोप सही भी हो सकता था।
कुछ क्षण विचार करने के बाद आखिरकार उसने अंकुर से पूछताछ करने का मन बना लिया। इसलिए नहीं कि उसे लड़की की कोई फिक्र थी, बल्कि इसलिए क्योंकि कमाई का एक जरिया उसे रिजवान अहमद के रिपोर्ट की सूरत में दिखाई देने लगा था। आंखों के आगे नोटों की गड्डियाँ घूमने लगी थीं। फिर ऐसा कोई मौका हाथ से निकलने देना उसकी निगाहों में अहमकों वाला काम था।

और राठी अहमक बिल्कुल नहीं था।
“ठीक है तुम घर जाओ।” - प्रत्यक्षतः वह बोला – “हम अंकुर से पूछताछ कर के देखते हैं। कोई शक वाली बात दिखाई दी तो उसके खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज करेंगे और वह गिरफ्तार भी होकर रहेगा। बस शाम तक इंतजार करो, चाहो तो यहां आकर केस की अपडेट ले सकते हो।”
“थैंक्यू सर! थैंक्यू वैरी मच।” कहकर रिजवान अपना एक हाथ माथे तक ले गया और भारी मन से दरवाजे की तरफ बढ़ गया।
उसके जाते ही राठी ने हवलदार हनुमंत प्रसाद को वहां तलब किया। जिसे बुलाते के साथ ही उसके जेहन में अपने मुंहलगे कलीग लांबा की याद ताजा हो आई, जिसने राठी को इतना बड़ा धोखा दिया था कि उसका नाम याद आते ही उसके मुंह से एक भद्दी सी गाली निकल गई। हनुमंत पर उसे ज्यादा भरोसा तो नहीं था, मगर इतना जानता था कि उससे बाहर जाने की मजाल उसकी नहीं होने वाली थी।
‘कितना भरोसा करता था वह लांबा पर।’
करता बिल्कुल नहीं था।
‘दोस्त जैसा मानता था।’
हर वक्त उसे धोखा देने की फिराक में लगा रहता था।
‘जिसका ऐसा सिला दिया कमीने ने कि जिंदगी में शायद ही उसे भुला पाता।’
जो हुआ ठीक हुआ, राठी उसी के लायक था।
‘अच्छा हुआ साला मर गया।’ वह बड़बड़ाया।

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