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पंचतंत्र / Panchatantra PDF Download Free Hindi Book by Vishnu Sharma

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Nameपंचतंत्र / Panchatantra
लेखक / Author
आकार / Size4.2 MB
कुल पृष्ठ / Pages110
Last UpdatedMarch 26, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category, , ,

दक्षिण देश के एक प्रान्त में महिलारोप्य नाम का नगर था। वहाँ एक महादानी, प्रतापी राजा अमरशक्ति रहता था। उसके पास अनन्त धन था; रत्नों की अपार राशि थी किन्तु उसके पुत्र बिल्कुल जड़बुद्धि थे। तीनों पुत्रों–बहुशक्ति, उग्रशक्ति, अनन्तशक्ति–के होते हुए भी वह सुखी न था। तीनों अविनीत, उच्छृंखल और मूर्ख थे। राजा ने विष्णुशर्मा को बुलाकर कहा कि यदि आप मेरे इन पुत्रों को शीघ्र ही राजनीतिज्ञ बना देंगे तो मैं आपको एक सौ गाँव इनाम में दूँगा। विष्णुशर्मा ने हँसकर उत्तर दिया–महाराज! मैं अपनी विद्या को बेचता नहीं हूँ। इनाम की मुझे इच्छा नहीं है। आपने आदर से बुलाकर आदेश दिया है, इसलिए छह महीने में ही मैं आपके पुत्रों को राजनीतिज्ञ बना दूंगा। यदि मैं इसमें सफल न हुआ तो अपना नाम बदल डालूंगा। आचार्य का आश्वासन पाकर राजा ने अपने पुत्रों का शिक्षण-भार उनपर डाल दिया और निश्चिन्त हो गया। विष्णुशर्मा ने उनकी शिक्षा के लिए अनेक कथाएँ बनाईं। उन कथाओं के द्वारा उन्हें राजनीति और व्यवहार-नीति की शिक्षा दी। उन कथाओं के संग्रह का नाम ही ‘पंचतन्त्र’ है। पाँच प्रकरणों में उनका विभाजन होने से उसे ‘पंचतन्त्र’ नाम दिया गया है। राजपुत्र इन कथाओं को सुनकर छह महीने में ही पूरे राजनीतिज्ञ बन गए। उन पाँच प्रकरणों के नाम हैं : 1. मित्रभेद 2. मित्रसम्प्राप्ति 3. काकोलूकीयम् 4. लब्धप्रणाशम् और 5. अपरीक्षितकारकम्।
प्रस्तुत पुस्तक में पाँचों प्रकरण दिए गए हैं।


पुस्तक का कुछ अंश

भूमिका

प्रत्येक देश के साहित्य में उस देश की लोककथाओं का स्थान बहुत महत्वपूर्ण होता है। भारत का साहित्य जितना पुराना है उतनी ही पुरानी इसकी लोककथाएँ हैं। इन कथाओं में भी श्री विष्णु शर्मा द्वारा प्रणीत कथाओं का स्थान सबसे ऊँचा है। इन कथाओं का पाँच भागों में संकलन किया गया है। इन पाँच भागों के संग्रह का नाम ही 'पंचतन्त्र' है।
पंचतन्त्र की कथाएँ निरुद्देश्य कथाएँ नहीं हैं। उनमें भारतीय नीतिशास्त्र का निचोड़ है। प्रत्येक कथा नीति के किसी न किसी भाग का प्रतिपादन करती है। प्रत्येक कथा का निश्चित उद्देश्य है।
• ये कथाएँ संसार भर में प्रसिद्ध हो चुकी हैं। विश्व की बीस भाषाओं में इनके अनुवाद हो चुके हैं। सबसे पहले इनका अनुवाद छठी शताब्दी में हुआ था। तब से अब तक यूरोप की हर भाषा में इनका अनुवाद हुआ है। अभी-अभी संसार की सबसे अधिक लोकप्रिय प्रकाशन संस्था 'Pocket Book Inc.' ने भी पंचतन्त्र के अंग्रेज़ी अनुवाद का सस्ता संस्करण प्रकाशित किया हैं। इस अनुवाद की लाखों प्रतियाँ बिक चुकी हैं।


पंचतन्त्र में भारत के सब नीति शास्त्रों-मनु, शुक्र और चाणक्य के नीति वाक्यों का सार कथारूप में दिया है। मन्द से मन्द बुद्धि वाला भी इन कथाओं से गहन से गहन नीति की शिक्षा ले सकता है। आज से लगभग 160 वर्ष पूर्व इंग्लैंड के प्रसिद्ध विद्वान सर विलियम जोन्स ने पंचतन्त्र के विषय में लिखा था :
Their (The Hindoo's ) Neeti Shastra, or System of Ethics, is yet preserved and the fables of Vishnu Sharma, are the most beautiful, if not the most ancient collection of parables in world.
अर्थात् हिन्दुओं का नीति-शास्त्र अभी तक सुरक्षित है और विष्णु शर्मा की कहानियाँ संसार की सबसे पुरानी नहीं तो सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ अवश्य हैं।
प्रोफेसर मूरते ने पंचतन्त्र व हितोपदेश की भूमिका लिखते हुए लिखा था : It comes to us from a far place and time, as a manual of worldly wisdom, inspired throughout by the religion of its place and time...every fable of Panchatantra can still be applied to human character, every maxim quoted from the wise men of two or three thousand years ago when parted from the local accidents of form, might find its time
for being quoted now in church or at home.
सारांश यह है कि पंचतन्त्र के नीति-वाक्यों में सांसारिक ज्ञान का जो कोष हैं, वह समय और स्थान की दूरी होने पर भी सदैव उपयोगी हैं। पंचतन्त्र की प्रत्येक कहानी आज भी मानव चरित्र का सच्चा चित्रण करती हैं और उसमें लिखे गए दो-तीन हज़ार वर्ष के नीति-वाक्य आज भी मानव मात्र का पथ-प्रदर्शन कर सकते हैं, आज भी उनका प्रवचन घरों व गिरजाघरों में हो सकता है।


अन्य विदेशी विद्वानों ने भी पंचतन्त्र की कथाओं और उनके नीति-वाक्यों की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है। फिर भी हमारे देश के लाखों शिक्षित व्यक्ति ऐसे हैं जिन्होंने पंचतन्त्र का नाम नहीं सुना है। अपने साहित्य के प्रति यह उदासीनता अब अक्षम्य है। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद अपने साहित्य को उचित आदर देना हमारा कर्तव्य हो गया है। पंचतन्त्र को भारतीय साहित्य मन्दिर की प्रथम सीढ़ी कहा जा सकता है। यह पुस्तक उसी पंचतन्त्र का सरल हिन्दी रूपान्तर है। इस पुस्तक में जीतिभाग को साररूप में कहकर कथा- भाग को मुख्यता दी गई हैं। कुछ कहानियों में विक्षेप होने के कारण उन्हें छोड़ दिया गया है।


पंचतन्त्र की कथा

दक्षिण देश के एक प्रान्त में महिलारोप्य नाम का नगर था। वहाँ एक महादानी, प्रतापी राजा अमरशक्ति रहता था। उसके पास अनन्त धन था; रत्नों की अपार राशि थी किन्तु उसके पुत्र बिल्कुल जड़बुद्धि थे। तीनों पुत्रों-बहुशक्ति, उग्रशक्ति, अनन्तशक्ति के होते हुए भी वह सुखी न था। तीनों अविनीत, उच्छृंखल और मूर्ख थे। राजा ने अपने मन्त्रियों को बुलाकर पुत्रों की शिक्षा के सम्बन्ध में अपनी चिन्ता प्रकट की। राजा के राज्य में उस समय पाँच सौ वृत्ति भोगी शिक्षक थे। उनमें से एक भी ऐसा नहीं था जो राजपुत्रों को उचित शिक्षा दे सकता। अन्त में राजा की चिन्ता को दूर करने के लिए सुमति नाम के मन्त्री ने सकलशास्त्र पारंगत आचार्य विष्णुशर्मा को बुलाकर राजपुत्रों का शिक्षक नियुक्त करने की सलाह दी।
राजा ने विष्णुशर्मा को बुलाकर कहा कि यदि आप मेरे इन पुत्रों को शीघ्र ही राजनीतिज्ञ बना देंगे तो मैं आपको एक सौ गाँव इनाम में दूँगा। विष्णुशर्मा ने हँसकर उत्तर दिया-महाराज! मैं अपनी विद्या को बेचता नहीं हूँ। इनाम की मुझे इच्छा नहीं है। आपने आदर से बुलाकर आदेश दिया है, इसलिए छह महीने में ही मैं आपके पुत्रों को राजनीतिज्ञ बना दूंगा। यदि में इसमें सफल न हुआ तो अपना नाम बदल डालूंगा।


आचार्य का आश्वासन पाकर राजा ने अपने पुत्रों का शिक्षण-भार उनपर डाल दिया और निश्चिन्त हो गया। विष्णुशर्मा ने उनकी शिक्षा के लिए अनेक कथाएँ बनाई। उन कथाओं के द्वारा उन्हें राजनीति और व्यवहार नीति की शिक्षा दी। उन कथाओं के संग्रह का नाम ही 'पंचतन्त्र' पाँच प्रकरणों में उनका विभाजन होने से उसे 'पंचतन्त्र' नाम दिया गया है। राजपुत्र इन कथाओं को सुनकर छह महीने में ही पूरे राजनीतिज्ञ बन गए। उन पाँच प्रकरणों के नाम हैं: 1. मित्रभेद 2. मित्रसम्प्राप्ति 3. काकोलूकीयम् 4. लब्धप्रणाशम् और 5. अपरीक्षितकारकम् प्रस्तुत पुस्तक में पाँचों प्रकरण दिए गए हैं।


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