मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी | Shayari of Mirza Ghalib | Mirza Galib Shayari in Hindi Pdf Free Download

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पुस्तक का विवरण (Description of Book मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी | Mirza Galib Shayari in Hindi Pdf Free Download PDF Download) :-

नाम : मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी | Mirza Galib Shayari in Hindi Pdf Free Download Book PDF Download
लेखक :
आकार : 65 MB
कुल पृष्ठ : 351
श्रेणी : काव्य / Poetryशायरी | Shayari
भाषा : हिंदी | Hindi
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मिर्जा ग़ालिब अपने आप में बेमिसाल शायर हैं। ग़ालिब का नाम आज देश में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो नहीं जानता हो। उनकी शोहरत के पीछे दो खास वजह हैं, पहला कारण उनकी मोहब्बत भरी शायरी, उनका चंचल स्वभाव, लतीफेबाज़ी और कटाक्ष करने की आदत। फारसी के दौर में ग़ज़लों में उर्दू और हिंदी का इस्तेमाल कर उन्होंने आम आदमी की जबान पर चढ़ा दिया। उन्होंने जिन्होंने जीवन को कोरे कागज़ की तरह देखा और उस पर दिल को कलम बनाकर दर्द की स्याही से जज़्बात उकेरे। उनकी ज़िंदगी का फलसफा ही अलग था। यथा—
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
गालिब का जन्म उनके ननिहाल आगरा में 27 दिसंबर, 1797 को हुआ। उनके पिता फौज में नौकरी के दौरान इधर-उधर घूमते रहे, इसलिए इनका पालन-पोषण ननिहाल में ही हुआ। जब वे पाँच साल के थे, तभी पिता का साया सिर उठ गया। बाद में उनके चाचा नसीरुल्लाह उनका पालन करने लगे, लेकिन जल्दी ही उनकी भी मौत हो गई और वे स्थायी रूप अपने ननिहाल आकर रहने लगे। मिर्जा ग़ालिब शुरू में ‘असद’ नाम से रचनाएँ करते थे। बाद में उन्होंने ग़ालिब उपनाम अपनाया। इस प्रकार उनका पूरा नाम मिर्जा असद उल्लाह खाँ ‘ग़ालिब’ था।[adinserter block=”1″]

ग़ालिब ने फारसी की शुरुआती तालीम आगरा के तत्कालीन विद्वान् मौलवी मोहम्मद मोअज्जम से हासिल की। बाद में वे ईरान से आगरा आए फारसी और अरबी के प्रतिष्ठित विद्वान् मुल्ला अब्दुस्समद के संपर्क (1810-1811) में आए। मुल्ला अब्दुस्समद दो साल आगरा में रहें इस दौरान ग़ालिब ने उनसे फारसी एवं काव्य की बारीकियों का ज्ञान प्राप्त किया। ग़ालिब से अब्दुस्समद इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी सारी विद्या ग़ालिब में उँडेल दी। और ग़ालिब 11 साल की उम्र में ही शेरो-शायरी करने लगे। तेरह साल की उम्र में 9 अगस्त, 1890 को लोहारू के नवाब अहमद बख्श खां के छोटे भाई मिर्जा इलाही बख्श ‘मारूफ’ की 11 साल की बेटी उमराव बेगम से उनका निकाह हुआ। शादी के पहले ग़ालिब कभी-कभी दिल्ली आते थे, मगर शादी के दो-तीन साल बाद दिल्ली आ गए और फिर यहीं के होकर रह गए।
दिल्ली में उन दिनों शायराना माहौल था। ग़ालिब का भी उन मुशायरों में जाना होता और उसकी चर्चा अक़सर होती। एक तो वे फलसफी शायर थे, दूसरे उनके कलाम बहुत मुश्किल होते थे। मुशायरों, जलसों व महफिलों में इनकी मुश्किलगोई के चर्चे आम थे। वे बहुत जल्दी ही शोहरत की बुलंदियों पर पहुँच गए। उन्होंने उर्दू शायरी को एक नया आयाम दिया। उन्होंने उर्दू शायरी को तंग गलियारों—हुस्न व इश्क़, गुलो व बुलबुल में न घोटकर नई पहचान दी।
ग़ालिब खर्चीले व उदार स्वभाव के थे, जिसके चलते अक़सर तंगहाल रहते। यहाँ तक की कभी-कभी पास में फूटी कौड़ी न होती। एक बार उधार की शराब पीकर पैसा न देने पर उन पर मुफ्ती सदरूद्दीन की अदालत में मुकदमा चला। आरोप सुनकर ग़ालिब ने सिर्फ एक शेर सुनाया।
कर्ज की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ,
रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।
इतना सुनना था कि मुफ्ती साहब ने अपने पास से रुपए निकालकर दिए और ग़ालिब को जाने दिया।[adinserter block=”1″]

Mirza Ghalib is a unique poet in himself. There would be hardly any person in the country today who does not know the name of Ghalib. There are two special reasons behind his fame, the first reason is his love poetry, his playful nature, his habit of joking and sarcasm. In the era of Persian, he used Urdu and Hindi in his ghazals and put them on the tongue of the common man. Those who saw life like a blank paper and made heart a pen on it and engraved emotions with the ink of pain. His philosophy of life was different. Like-
we are not capable of running in the veins,
when it does not drip from the eyes, then what is blood? [adinserter block=”1″]

Ghalib was born on December 27, 1797 in his maternal grandfather Agra. His father kept roaming here and there during his service in the army, so he was brought up in his maternal grandfather’s house. When he was five years old, only then the father’s shadow raised his head. Later, his uncle Nasirullah took care of him, but soon he also died and he came to stay with his maternal grandfather permanently. Mirza Ghalib initially used to compose under the name ‘Asad’. He later adopted the surname Ghalib. Thus his full name was Mirza Asad Ullah Khan ‘Ghalib’.
Ghalib received his initial Persian training from the then scholar Maulvi Mohammad Moazzam of Agra. Later he came in contact with Mulla Abdussamad (1810-1811), a distinguished scholar of Persian and Arabic who had come to Agra from Iran. Mulla Abdus Samad lived in Agra for two years, during which Ghalib learned from him the nuances of Persian and poetry. Abdussamad was so impressed by Ghalib that he poured all his knowledge into Ghalib. And Ghalib started writing poetry at the age of 11. At the age of thirteen, on August 9, 1890, he was married to Umrao Begum, the 11-year-old daughter of Mirza Elahi Baksh ‘Maroof’, the younger brother of Ahmed Baksh Khan, the Nawab of Loharu. Before marriage, Ghalib used to come to Delhi sometimes, but after two-three years of marriage, he came to Delhi and then stayed here. [adinserter block=”1″]

There was a poetic atmosphere in Delhi in those days. Ghalib would also go to those mushairas and he would often be discussed. Firstly, he was a philosophical poet, secondly, his Kalams were very difficult. Discussions of his difficult speech were common in mushairas, jalsas and gatherings. He reached the heights of fame very soon. He gave a new dimension to Urdu poetry. He gave a new identity to Urdu poetry by not shoving it into narrow corridors-Husn aur Ishq, Gulo aur Bulbul.
Ghalib was of spendthrift and generous nature, due to which he was often in trouble. Even sometimes there was not even a penny nearby. Once he was prosecuted in the court of Mufti Sadruddin for not giving money after drinking borrowed alcohol. Ghalib recited only one sher after hearing the allegation. [adinserter block=”1″]

We used to drink alcohol due to debt but used to think that yes,
one day our fun will pay off.
Had to listen so much that Mufti Sahib took out the money from his pocket and gave it to Ghalib.

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पुस्तक का कुछ अंश (मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी | Mirza Galib Shayari in Hindi Pdf Free Download PDF Download)

उर्दू अदब (साहित्य) में मिर्ज़ा ग़ालिब एक ऐसा नाम है जो अपने आपमें एक अलग ही पहचान है। वे सिर्फ उर्दू अदब में ही नहीं अन्य भाषा जगत की पहचान हैं। जिस तरह संस्कृत साहित्य में कालिदास, अंग्रेजी साहित्य में शेक्सपियर को निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ साहित्यकार माना जाता है, उसी प्रकार ग़ालिब को उर्दू अदब में श्रेष्ठ शायर माना गया है।
ग़ालिब का पूरा नाम, मिर्जा असद उल्ला खां ग़ालिब है। ‘ग़ालिब’ इनका तखल्लुस (उपनाम) है। जिसका शाब्दिक अर्थ है -दूसरों पर श्रेष्ठता प्राप्त कर लेना। इन्होंने अपने नाम के अनुरूप ही सभी शायरों पर श्रेष्ठता प्राप्त की।[adinserter block=”1″]

इनका बचपन का नाम मिर्ज़ा नौशा था। मिर्ज़ा इनका घराना था। तुर्क जाति के लोगों में मिर्ज़ा घराना पाया जाता है। प्रथम मुगल सम्राट बाबर भी मिर्ज़ा घराने से था। इस तरह माना जाता है कि बाबर या अन्य मुगल बादशाहों के समय ही ग़ालिब के परिवार वाले तुर्किस्तान से भारत आये होंगे। सैन्य सेवा में रहे होंगे—तबियत से फक्कड़ ग़ालिब ने खुद को शेरो-शायरी की दुनिया में डाल दिया तथा दुनिया के श्रेष्ठ शायरों में मुकाम पा गये। ग़ालिब ने अपनी वंशावली के बारे में खुद भी संक्षिप्त जानकारी देते हुए
लिखा है कि वे तुर्क कौम के सलजूकी सुल्तान बरकियारुक सलजूकी की औलाद
में से थे। दादा कौकान बेग, बादशाह शाह आलम के शासनकाल में समरकंद
से दिल्ली आये थे। पचास घोड़ों और नक्कारा निशान से सम्मानित होकर शाह
आलम के यहां नौकरी पायी थी। पहासू का परगना, जो समरू बेगम को सरकार
से मिला था, उसकी जायदाद की जिम्मेदारी उठायी थी।[adinserter block=”1″]

पिता अब्दुल्ला बेग योद्धा सैनिक थे। अलवर के राजा राव बख्तियार सिंह की सेवा में लगे थे। एक युद्ध में बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति पायी।
पिता के निधन के बाद ग़ालिब के चचा नसरुल्ला बेग खां पर ग़ालिब के लालन-पालन की जिम्मेदारी आयी।
नसरुल्ला बेग खां मराठों की सेवा में अकबराबाद के सूबेदार थे।

Mirza Ghalib is such a name in Urdu Adab (literature) which has a different identity in itself. He is the identity of other languages world not only in Urdu literature. Just as Kalidas in Sanskrit literature, Shakespeare in English literature is considered undisputedly the best litterateur, in the same way Ghalib is considered the best poet in Urdu literature.
Ghalib’s full name is Mirza Asad Ullah Khan Ghalib. ‘Ghalib’ is his takhallus (surname). Which literally means – to get superiority over others. According to his name, he attained superiority over all the poets. [adinserter block=”1″]

His childhood name was Mirza Nausha. Mirza was his family. Mirza Gharana is found in people of Turkic race. The first Mughal emperor Babur was also from the Mirza family. In this way, it is believed that Ghalib’s family members must have come to India from Turkistan at the time of Babur or other Mughal emperors. Must have been in military service- Fakkar Ghalib called himself a lion because of his health.
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हमने मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी | Mirza Galib Shayari in Hindi Pdf Free Download PDF Book Free में डाउनलोड करने के लिए Google Drive की link नीचे दिया है , जहाँ से आप आसानी से PDF अपने मोबाइल और कंप्यूटर में Save कर सकते है। इस क़िताब का साइज 65 MB है और कुल पेजों की संख्या 351 है। इस PDF की भाषा हिंदी है। इस पुस्तक के लेखक मिर्ज़ा ग़ालिब / Mirza Galib हैं। यह बिलकुल मुफ्त है और आपको इसे डाउनलोड करने के लिए कोई भी चार्ज नहीं देना होगा। यह किताब PDF में अच्छी quality में है जिससे आपको पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। आशा करते है कि आपको हमारी यह कोशिश पसंद आएगी और आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी | Mirza Galib Shayari in Hindi Pdf Free Download की PDF को जरूर शेयर करेंगे।

Q. मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी | Mirza Galib Shayari in Hindi Pdf Free Download किताब के लेखक कौन है?
 

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