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माया मिली न राम / Maya Mili Na Ram Novel PDF Download Free by Santosh Pathak

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Nameमाया मिली न राम / Maya Mili Na Ram
लेखक / Author
आकार / Size2.8 MB
कुल पृष्ठ / Pages226
Last UpdatedApril 9, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category, ,

दौलत और शोहरत दो ऐसी चीजें थीं, जिन्हें हासिल करने की खातिर सब-इंस्पेक्टर निरंकुश राठी किसी भी हद तक जा सकता था। स्याह को सफेद कर सकता था, बेगुनाह को फांस सकता था, मुजरिम के खिलाफ जाते सबूतों को नजरअंदाज कर सकता था। प्रत्यक्षतः वह ऐसा करप्ट पुलिसिया था जिसका नौकरी को लेकर कोई दीन ईमान नहीं था। ऐसे में एक रोज जब वह सड़क पर हुई एक मौत को अपने हक में करने की कवायद में जुटा, तो जल्दी ही यूं लगने लगा जैसे उसकी किस्मत रूठ गयी हो! जैसे ऊपरवाला उसके गुनाहों का हिसाब मांगने लगा हो।


पुस्तक का कुछ अंश

माया मिली न राम

अभिजीत सक्सेना शहर का जाना-माना, बल्कि टॉप का क्रिमिनल लॉयर था। धंधे में उसने दौलत और शोहरत दोनों कमाई थी और खूब कमाई थी। साउथ दिल्ली के लाजपत नगर इलाके में उसका कई एकड़ में फैला हुआ बड़ा बंगला था, जहां वह अपनी इकलौती बेटी अवनी के साथ रहता था।
सक्सेना की बीवी बारह-तेरह साल पहले दुनिया से चल बसी थी। तब अवनी मुश्किल से ग्यारह साल की रही होगी, जबकि खुद सक्सेना की उम्र उस वक्त महज अड़तीस साल थी। इसके बावजूद बीवी की मौत के बाद उसने दूसरी शादी करने की कोई कोशिश नहीं की और पूरी लगन से बेटी की परवरिश में जुट गया।
आज वह पचास का हो चुका था, मगर अपने शानदार रख-रखाव के कारण चालीस से ज्यादा का नहीं दिखाई देता था। ऊपर से नियमित वॉक और संतुलित खान-पान के कारण वह अधेड़ तो कहीं से भी नहीं लगता था, जिसमें उसका लंबा कद और गठा हुआ बदन भी अहम भूमिका निभाते थे।
उस वक्त रात के दस बजे थे जब उसका ध्यान बेटी की तरफ चला गया। अवनी अभी तक घर नहीं लौटी थी। मगर ऐसा पहली बार नहीं हुआ था इसलिए उस बात को लेकर वह बहुत ज्यादा फिक्रमंद नहीं हुआ। मगर बेटी की तरफ से ध्यान फिर भी नहीं हटा पाया। जल्दी ही तरह तरह की बातें उसके दिमाग में उथल-पुथल मचाने लगीं। जिसमें सबसे अहम बात ये थी कि आजकल उसकी बेटी, उसकी लाड़ली बेटी, ड्रग्स लेने लगी थी। जबकि ड्रिंक तो वह पिछले पांच सालों से, स्कूल के जमाने से ही करती आ रही थी।
मगर ड्रग्स! सोचने मात्र से ही सक्सेना का दिल हलक में आ फंसता था। ऐसा नहीं था कि उसने बेटी से उस बारे में बात न की हो, बराबर की थी। अवनी ने उस बात से इंकार भी नहीं किया, क्योंकि बाप बेटी दोनों ही बेहद खुले विचारों के थे। उनके बीच कुछ भी छिपा हुआ नहीं था।
ऊपर से अवनी में लाख ऐब सही मगर एक खास बात जरूर थी कि वह बाप के किसी भी सवाल के बदले कभी भी झूठ नहीं बोलती थी। इसलिए ड्रग्स की बाबत भी उसने कुछ छिपाने की कोशिश नहीं की। मगर इतना जरूर कहा था कि वह रोज-रोज ऐसा नहीं करती, बस महीने में एक बार या फिर दो बार ऐसा मौका आ जाता था जब उसे दोस्तों का साथ देना ही पड़ता था। साथ ही उसने ये भी कहा था कि, ‘डैड आपने मुझे कभी नशे में देखा है? जिस दिन दिखाई दे जाऊं बेशक मेरा घर से निकलना बंद कर दीजियेगा, मगर उससे पहले नहीं।’
और यूं अभिजीत सक्सेना को ना चाहते हुए भी खामोशी अख्तियार करनी पड़ी थी। इसलिए नहीं कि वह बेटी की बात से मुतमईन हो गया था, बल्कि इसलिए क्योंकि वह जानता था कि ज्यादा सख्ती करने पर उसकी बेटी बगावत पर उतर सकती थी। जो काम कभी-कभार करती थी उसे अपनी आदत में शुमार कर लेती तो वह उसका क्या बिगा़ड़ लेता।
विचारों के भंवर में फंसे हुए कब रात के बारह बज गये उसे पता ही नहीं लगा। आखिरकार उसका धैर्य जवाब दे गया, तब उसने मोबाइल उठाकर बेटी को फोन लगाया। बेल जाती रही लेकिन दूसरी तरफ से कॉल पिक नहीं की गई।
उसने दोबारा तिबारा ट्राई कर डाला, मगर अवनी ने कॉल पिक नहीं की।

अब सक्सेना ये सोचकर निश्चिंत नहीं हो सका कि वह अवनी के लिये रोजमर्रा की बात थी। कुछ देर तक मन ही मन विचार करने के बाद वह उठ खड़ा हुआ और बाहर निकल कर अपनी कार की तरफ बढ़ा ही था कि सर्द हवा का एक तेज झोंका उसे भीतर तक सिहराता चला गया।
वह वापस लौटा। वार्डरोब से निकाल कर एक ओवरकोट अपने तन पर डाला फिर कार की तरफ बढ़ गया। ड्राईवर को बुलाने की उसने जरूरत नहीं समझी। ड्राईविंग सीट पर पहुंचकर उसने कार स्टार्ट कर के यू टर्न लिया और गेट की तरफ बढ़ चला।
गार्ड ने वह नजारा देखा तो लोहे के बड़े फाटक के दोनों पल्ले खोलकर खड़ा हो गया।
बंगले से निकलकर उसने कार को रिंग रोड पर डाला और साउथ एक्स की तरफ ड्राईव करने लगा, जो कि वहां से बमुश्किल डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर था। जहां एक फ्लैट में उसे बेटी के मिलने की पूरी-पूरी उम्मीद थी।
दस मिनट बाद साउथ एक्स में उसने अपनी कार को एक ज्वेलरी के शोरूम के पीछे ले जाकर खड़ा किया फिर नीचे उतर कर सामने दिखाई दे रहीं सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।
वहां पहली मंजिल पर बस एक ही फ्लैट था। जिसके सामने पहुंचकर उसने कॉलबेल पुश कर दिया।
कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
उसने फिर से बेल बजायी।
इस बार भी दरवाजा खुलता नहीं दिखाई दिया।
तीसरी बार वह बेल पुश करने जा ही रहा था कि दरवाजा खुल गया। सामने एक खूब लंबा-चौड़ा फैशनेबल युवक खड़ा था जो उस वक्त नशे में धुत्त जान पड़ता था। सक्सेना पर निगाह पड़ते ही वह बुरी तरह सकपका गया।
“अंकल आप।”
“हां मैं।” - कहकर सक्सेना ने उसके पीछे निगाह डाली तो बेटी को दो अन्य युवकों के बीच फर्श पर बिछे कालीन पर बैठा पाया। दोनों युवकों के हाथ में ताजा सुलगाये गये सिगरेट थे जबकि उसकी खुद की बेटी उस वक्त बीयर की कैन से घूंट लगा रही थी। उसका मन वितृष्णा से भर उठा – “अवनी को बोलो मैं नीचे कार में उसका इंतजार कर रहा हूं।”
कहकर वह नीचे पहुंचा और अपनी कार में जा बैठा।
थोड़ी देर बाद अवनी वहां पहुंची और दरवाजा खोलकर कार के भीतर दाखिल हुए बिना बोली, “आप चलिये डैड मैं अपनी कार लेकर आती हूं।”
“मेरे साथ चलो, कार भागी नहीं जा रही। सुबह ड्राईवर को भेजकर मंगवा लेंगे।”
अवनी बस एक पल को हिचकिचाई फिर उसके बगल में पैसेंजर सीट पर सवार हो गई।
सक्सेना ने कार को बैक किया और मुड़कर जिधर से आया था उधर को ही चल पड़ा।
“वक्त का कोई अंदाजा है तुम्हें?”

“सॉरी डैड।”
“और ये कैसे लोगों के साथ दोस्ती कर रखी है तुमने, एक भी ढंग का लड़का नहीं दिखाई देता। सब के सब अव्वल दर्जे के नशेड़ी जान पड़ते हैं।”
“ऐसा कुछ नहीं है डैड, फिर आप अच्छी तरह से जानते हैं कि तीनों इज्जतदार परिवारों के लड़के हैं, बस एक आप ही हैं जिन्हें उनके भीतर शैतान नजर आता है।” कहकर उसने हंसने की कोशिश की मगर बाप के चेहरे पर निगाह पड़ते ही खामोश हो गई।
“हो सकता है मेरी निगाहें धोखा खा रही हों, हो सकता है तीनों शराफत और सदाचार के पुतले हों, लेकिन आधी रात तक मैं तुम्हारा इंतजार करने की हिम्मत नहीं कर सकता।”
“क्या डैड आप भी कभी-कभी एकदम दकियानूसी बातें करने लगते हैं। दिल्ली शहर में क्या रात और क्या दिन? अपनी बेटी पर विश्वास रखिये, और कुछ सोचने की जरूरत नहीं है आपको।”
“विश्वास है तभी तुम्हें इतनी आजादी दे रखी है। मगर हूं तो आखिर बाप ही, कैसे तुम्हारी तरफ से बेफिक्र रह सकता हूं?”
“ओह डैड!” - कहकर वह दाईं तरफ झुकी और बाप के गले में बाहें डालकर बोली – “सॉरी।”
“अरे-अरे क्या करती है? एक्सीडेंट हो जायेगा।”
“नहीं होगा, मैं क्या जानती नहीं कि आप मुझसे कितना प्यार करते हैं।”
“एक्सीडेंट से प्यार का क्या ताल्लुक?”
“है क्यों नहीं, एक्सीडेंट हुआ तो क्या मुझे चोट नहीं आयेगी, और मुझे चोट आने देना आप भला कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं?”
सुनकर सक्सेना सारा गुस्सा भूलकर जोर से हंस पड़ा।
☐☐☐
संदीप डांगे! जुर्म की दुनिया का ऐसा नाम था, जिससे गली में विचरते चोर-उच्चकों से लेकर पुलिस के आला अफसर तक बखूबी वाकिफ थे। ये हाल तब था जब देश की राजधानी दिल्ली में ना तो माफिया राज था ना ही मुम्बई की तरह भाई लोगों ने यहां आतंक मचा रखा था। इसके बावजूद उसका धंधा जोरों पर था। स्मगलिंग से लेकर वसूली तक के कामों में उसका अस्सी फीसदी दबदबा कायम था। बाकी का बीस फीसदी हसीब बाबा नाम के एक ऐसे शख्स के कब्जे में था जो कि जुर्म की दुनिया में उभरता हुआ नाम था और डांगे की तरह हर किसी को उसकी वाकफियत नहीं थी। अलबत्ता पुलिस की निगाहों में वह बराबर था। इसलिए था क्योंकि आने वाले दिनों में दोनों के बीच टकराव की संभावना प्रशासन को बराबर दिखाई दे रही थी।

संदीप डांगे की उम्र पचास साल के आस-पास रही होगी, लेकिन एक नजर देखने पर चालीस से ज्यादा का नहीं दिखाई देता था। कद खूब लंबा था, जिसकी वजह से हेल्दी होते हुए भी वह बेहद पतला-दुबला नजर आता था। शक्लोसूरत से वह काफी संभ्रांत दिखता था। हर वक्त महंगे कपड़ों में सज-धज कर रहना उसे बेहद पसंद था। बात करने का सलीका लाजवाब था, जिसकी वजह से मिलने-जुलने वाले सहज ही उसकी तरफ आकर्षित हो जाते थे। सरकारी महकमों से लेकर राजनैतिक गलियारों तक उसकी अच्छी पहुंच थी, जो उसे ताकतवर तो बनाता ही था, साथ ही कानून की पकड़ से दूर रखने में अहम भूमिका भी निभाता था।
उस वक्त रात के नौ बजे थे।
डांगे हौजखास स्थित अपने बंगले में डाईनिंग टेबल पर मौजूद था। सामने मेज के एकदम दूसरे सिरे पर उसका पच्चीस साल का बेटा स्वदेश बैठा था, बायीं तरफ बीवी चित्रा डांगे मौजूद थी, जबकि दायीं तरफ परिवार की सबसे छोटी सदस्य उसकी बीस साल की बेटी अनुष्का बैठी हुई थी।
खाना परोसा जा चुका था, मगर निवाला मुंह में डालने की बजाय संदीप डांगे बदस्तूर सामने बैठे अपने होनहार बेटे स्वदेश को घूरे जा रहा था। जो कि रह-रहकर कुर्सी पर पहलू बदल रहा था, हथेली के पिछले हिस्से से अपनी नाक और आंखें साफ करने लग जाता था।
दोनों मां-बेटी धड़कते दिल से टुकर-टुकर डांगे की तरफ देख रही थीं, जो कि किसी भी वक्त फट पड़ने वाला था।
“तुम बाज नहीं आ सकते?” बेटे को घूरता वह वितृष्ण भरे स्वर में बोला।
“अब - मैंने - क्या - कर - दिया - डैड?” वह अटक-अटक कर बोला।
“तुम्हें नहीं मालूम क्या कर दिया? जरा आईने के सामने खड़े होकर अपनी सूरत तो देखो, लगता है जैसे कुपोषण के शिकार हो गये हो। शरीर गला जा रहा है, आंखें अंदर धंसी जा रही हैं, हाथ-पांव हर वक्त कांपते रहते हैं। अगर यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मुझे तुम्हारी अर्थी को कांधा देने की मृत्युतुल्य कष्टकारी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी।”
स्वदेश ने एकदम से सिर झुका लिया।
“ड्रग्स लेने से बाज नहीं आ सकते तो कम से कम उसे कंट्रोल तो करो, अभी तो यूं लग रहा है जैसे तुम नशा नहीं करते बल्कि नशा तुम्हें हजम किये जा रहा है। मैं तुम्हें आखिरी बार चेतावनी दे रहा हूं, बाज आ जाओ वरना तुम्हें किसी रिहैब में डाल दूंगा, जहां तुम नशा तो छोड़ो अपने उन कमीने दोस्तों की शक्ल देखने के लिये भी तरस जाओगे जिनकी सोहबत में तुम्हें इस नामुराद नशे की लत पड़ गई है।”

“मेरे फ्रैंड्स को गाली मत दीजिये डैड! मैं कोई बच्चा नहीं हूं जिसे उन लोगों ने उंगली पकड़कर ड्रग्स लेना सिखा दिया हो।”
“हजार बार दूंगा, बल्कि तुम नहीं सुधरे तो दूसरा रास्ता भी है मेरे पास। इशारा करने भर की देर है तुम्हारे तमाम दोस्त यूं शहर से गायब हो जायेंगे कि ढूंढे भी नहीं मिलेंगे।”
“व्हॉट द हेल!” - वह तमक कर उठ खड़ा हुआ – “आप मेरे फ्रैंड्स के साथ ऐसा नहीं कर सकते।”
“कर सकता हूं, कर के रहूंगा, कौन रोकेगा मुझे?”
“मैं रोकूंगा, उन तक पहुंचने के लिये आपको पहले मुझसे निपटना पड़ेगा।” कहकर उसने सामने मौजूद खाने की थाली को उठाकर इतनी जोर से फर्श पर पटका कि वहां कालीन बिछे होने के बावजूद काफी देर तक डाईनिंग हॉल उसकी प्रतिध्वनि से गूंजता रहा।
फिर पैर पटकता वह कमरे से बाहर निकल गया।
संदीप डांगे ने एक लंबी आह भरी, फिर बारी-बारी से बेटी और बीवी की तरफ देखता हुआ बोला, “खाना शुरू करो, ये कमबख्त नहीं सुधरने वाला।”
दोनों काफी देर तक उस गेट को घूरते रहे जिधर से स्वदेश बाहर निकला था, जैसे इंतजार कर रहे हों कि वह अभी वापस लौटकर अपनी चेयर पर आ बैठेगा। मगर ऐसा नहीं हुआ। तब बाप के साथ-साथ दोनों मां-बेटी भी सिर झुकाकर जबरन अपने गले में निवाले उतारने लगीं, जबकि खाने का मन अब किसी का भी नहीं हो रहा था।
☐☐☐

एम.बी. रोड पुलिस चौकी का निर्माण अभी छह महीने पहले ही किया गया था। जिसकी अहम वजह ये थी कि लाल कुआं से लेकर संगम विहार तक का रास्ता बेहद सुनसान था और आए दिन उधर वारदातें घटित होती रहती थीं। खास तौर पर रात के वक्त होने वाले एक्सीडेंट्स का तो कोई ओर-छोर ही नहीं था।
चौकी का पहला इंचार्ज एसआई निरंकुश राठी को बनाया गया, जिसने आठ लोगों के स्टाफ के साथ अपना पदभार संभाला और काम में लग गया। उसके अलावा चौकी में दो हवलदार और छह सिपाही थे। जिसमें से हवलदार सुदीप लांबा उसका हमप्याला-हमनिवाला था इसलिए मुंहलगा भी था।
निरंकुश राठी इस बात पर बहुत-बहुत खुश था कि कम से कम चौकी में उसपर हुक्म चलाने वाला कोई नहीं था। वह कुछ भी करने को आजाद था। हकीकत में यह उसे ऐसा खास मौका दिखाई दे रहा था जो छप्पर फाड़ कर उसकी झोली में आ गिरा था।
उस वक्त रात के साढ़े दस बजे थे। वह चौकी के अपने कमरे में बैठा हवलदार सुदीप लांबा के साथ गप्पे हांकने जैसे अहम काम में मशगूल था।
राठी छह फीट का, अठाईस की उम्र वाला कड़ियल नौजवान था, जो कि शक्ल से ही बेहद खूंखार और गुस्सैल दिखाई देता था। हैवी ड्रिंकर था, वूमनाईजर था, बस यही गनीमत थी कि ड्यूटी के वक्त खुद को तमाम व्यसनों से दूर रखता था।
मुजरिमों के साथ उसका बर्ताव एकदम कसाईयों वाला होता था। लिहाजा छोटे-मोटे मुजरिमों का गुनाह कबूल करवाने के लिये सहज ही उन्हें राठी के हवाले कर दिया जाता था, जो कि मार-मार उन्हें अधमरा करने से बाज नहीं आता था।

जहां एक तरफ पुलिस के बड़े ऑफिसर साईकोलॉजिकल प्रेशर की बात करते थे, सुप्रीम कोर्ट थर्ड डिग्री टॉर्चर को असंवैधानिक घोषित कर चुका था। वहीं दूसरी तरफ राठी का मानना था कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते। ऐसे में हिरासत में लिये गये किसी शख्स को मनोवैज्ञानिक तरीके से तोड़ने की कोशिश उसने आज तक नहीं की थी, बल्कि कर ही नहीं सकता था। उसे तो बस एक ही रास्ता पता था जो कि उसके हाथ में थमें डंडे से होकर गुजरता था।
निरंकुश राठी! नाम उसके स्वभाव से पूरी तरह मैच करता था। वह सचमुच निरंकुश ही था। वह अखलाकन बेहद घूसखोर पुलिसिया था जो कि पैसा बनाने का कोई भी मौका चूकना हराम समझता था। जीवन में उसकी दो ही ख्वाहिशें थीं, खूब पैसा बनाना और कोई ऐसा केस सॉल्व कर दिखाना जिससे पूरे हिंदुस्तान में उसके नाम का डंका बज उठे। टीवी पर बार-बार उसकी सूरत दिखाई जाये और बड़े अफसर उसकी वाहवाही करते न थकें। अफसोस दोनों में से अभी तक एक भी ख्वाहिश पूरी नहीं हुई थी। छोटी-मोटी रिश्वत किसी गिनती में नहीं आती थी और किसी हाईप्रोफाईल केस की इंडिपेंडेंट इन्वेस्टीगेशन कभी उसे सौंपी नहीं गई थी।
इसके विपरीत हवलदार सुदीप लांबा को दौलत की चाह तो बराबर थी मगर वाहवाही की कोई लालसा उसके मन में दूर-दूर तक नहीं थी। अलबत्ता शराबखोरी के मामले में वह राठी के कान कुतरता जान पड़ता था।
“लांबे।” राठी बोला।
“जी साहब जी।”
“यार कोई मोटा मुर्गा हमारे हाथ क्यों नहीं लगता?”
“कभी तो लगेगा, देख लीजियेगा तब अगला-पिछला सारा हिसाब एक ही झटके में बराबर हो जायेगा।”
“वह वक्त आयेगा तो सही, कहीं ऐसा न हो कि हम इंतजार करते-करते एक दिन रिटायर हो जायें और ख्वाहिश अधूरी की अधूरी रह जाये।”
“ऐसा नहीं होगा, मेरा दिल कहता है कि बहुत जल्द आपकी तमाम ख्वाहिशें पूरी होंगी और उस वक्त आपको याद भी नहीं रहेगा कि जो हासिल हुआ है वह हवलदार लांबा की दुआओं का फल है।”
“कैसी बात करता है, तुझे कैसे भूल सकता हूं मैं?”
“दौलत आने के बाद होता तो अक्सर यही है।”
“मैं ऐसा नहीं करने वाला, तू मेरा दोस्त है, इसलिए ऐसी बातें मत सोचा कर।”
“ठीक है आप कहते हैं तो नहीं सोचता। मगर मुझे नहीं लगता कि आपको दो ऑडी खरीदना, दो बंगले खरीदना और दो लड़कियों से शादी करना पसंद आयेगा?”
राठी सकपकाया, “दो किसलिये?”
“लो आप तो अभी से भूल गये, दौलत हासिल हो जाने के बाद तो मेरी शक्ल पहचानने से इंकार कर देंगे।”
“तेरा मतलब है एक अपने लिये और एक तेरे लिये?”
“और क्या कह रहा हूं मैं?”
“साले बाकी चीजें तो ठीक हैं, मगर दो लड़कियों से शादी भी मैं ही करूंगा? एक अपने लिये और एक तेरे लिये?”
“क्या हर्ज है, मैं तो पहले से ही शादीशुदा हूं, ऐसे में दूसरा ब्याह कैसे रचाने देगी मेरी बीवी? फाड़कर खा नहीं जायेगी।”
“डरता बहुत है यार तू अपनी जोरू से।”

“डरना पड़ता है साहब जी! मिले तो हो आप उससे। भूल गये गिलास मांगने पर कैसे उसने हमारे सामने रखी बोतल उठाकर खिड़की के बाहर फेंक दी थी?”
“याद है भाई सब याद है, मगर उसमें जोरू से डरने जैसी तो कोई बात नहीं दिखाई दी मुझे।”
“इसलिए नहीं दिखाई दी क्योंकि उसने लिहाज किया था।”
“किस बात का मुझे कुछ ना कहकर?”
“नहीं, मुझे आपके सामने ना कूट कर।”
सुनकर राठी ने जोर का ठहाका लगाया।
“आपके निकलते ही वह राशन-पानी लेकर मुझपर चढ़ दौड़ी, झाड़ू उठाकर दे झाड़ू, दे झाड़ू! उस रोज उसने पहली और आखिरी बार मुझपर हाथ उठाया था।”
“शुक्र है अब उसे अक्ल आ गई।”
“हां अक्ल तो आ गई साहब जी।” - लांबा हंसता हुआ बोला – “अब उसमें इतनी तमीज आ गई है कि पति अगर बिना पिये घर लौट आये, साथ में किसी यार दोस्त को ना लेकर आये, घर में शराब की बैठकें ना जमाये, तो उसकी पिटाई करने की बजाय, चूल्हा चौका कराकर भी अपने मन की भड़ास निकाली जा सकती है।”
राठी फिर हंस पड़ा।
तभी एक सिपाही कमरे में दाखिल हुआ।
“जनाब एक वारदात की खबर मिली है।”
“कैसी वारदात?”
“सड़क पर एक ऑडी कार में किसी की लाश मिलने की सूचना है। गाड़ी लालकुआं से थोड़ा हमारी तरफ जहां से चढ़ाई शुरू होती है, सड़क के किनारे खड़ी बताई गई है।”
“जाकर देख क्या माजरा है?”
“मैं जाऊं?” सिपाही हड़बड़ाकर बोला।
“मैं क्या अंग्रेजी बोल रहा हूं जो तेरी समझ में नहीं आ रहा? और फिर घबरा क्यों रहा है इतना, पहली कोई लाश नहीं देखी क्या?”
“देखी क्यों नहीं है सर जी? लेकिन वहां पहुंचकर तफ्तीश भी तो करनी होगी, जो कि आखिरकार आपको ही करनी पड़ेगी।”
“हां ये बात तो सही कही तूने, जांच पड़ताल की जिम्मेदारी तो मुझे ही उठानी होगी। ठीक है तू रहने दे, मैं ही जाता हूं।” - कहकर वह उठ खड़ा हुआ – “चल भाई लांबे, कुछ हाथ-पांव मार कर आयें।”
सहमति में सिर हिलाता हवलदार उसके साथ हो लिया।
घटनास्थल वहां से बमुश्किल तीन सौ मीटर के फासले पर था। वह चाहता तो पैदल भी वहां पहुंच सकता था, मगर यूं उसे हालिया हासिल अपने चौकी इंचार्ज के रूतबे का एहसास कैसे होता?

उसने ड्राईवर को गाड़ी निकालने को कहा फिर दो सिपाहियों और हवलदार सुदीप लांबा को साथ लेकर घटनास्थल पर पहुंचा। कार ब्लैक कलर की ऑडी थी जिसका रूख उस घड़ी बदरपुर की तरफ था और वह सड़क के एकदम किनारे खड़ी थी।
ड्राईवर ने कार के पीछे पहुंचकर जीप रोकी तो सब नीचे उतर आये। राठी ने एक उड़ती सी नजर ऑडी पर डाली फिर हवलदार की तरफ देखता हुआ बोला, “लांबे।”
“जी साहब जी।”
“तुगलकाबाद गांव के मोड़ पर किसकी ड्यूटी है आज?”
“अमनदीप है साहब जी।”
“उससे बोल कि बैरिकेड लगाकर रास्ता बंद कर दे और ट्रैफिक को डाइवर्ट कर के परली तरफ से भेजे।”
“जाम लग जायेगा साहब जी, फिर कार तो एकदम किनारे खड़ी है, ऐसे में रोड ब्लॉक करने की क्या जरूरत है?”
“तभी तू साला दस साल बाद भी हवलदार का हवलदार ही रह गया। जानता नहीं है कि क्राईम सीन को एकदम नई जोरू की तरह हिचक-हिचक कर, दूर-दूर से हैंडल करना पड़ता है, ताकि मौका-ए-वारदात पर कोई सूत्र मौजूद हों तो वह खत्म न हो जायें। ताकि जोरू बिदक न जाये। और बिदक कर सुहागरात का सत्यानाश न कर दे। समझा कुछ?”
“जी साहब जी समझ गया।”
कहकर उसने मोबाइल निकाला और अमनदीप को फोन कर के राठी का हुक्म सुना दिया। ये अलग बात थी कि राठी की कही कोई भी बात उसके पल्ले नहीं पड़ी थी। वह बड़ी गंभीरता से सोच रहा था कि नई जोरू और क्राईम सीन में क्या समानता थी? इन्वेस्टिगेशन करना और सुहागरात मनाना दोनों एक ही बात कैसे हो सकते थे?
“सब लोग इधर ही रूको वरना जमीन पर कोई फुटप्रिंट हुए तो सब हमारे कदमों तले पड़कर बर्बाद हो जायेंगे।” - कहकर उसने लांबा की तरफ देखा – “टॉर्च दे।”
लांबा ने फौरन जीप से टॉर्च निकालकर उसके हवाले कर दिया।
निरंकुश राठी ने टॉर्च जलाकर आस-पास की जमीन का मुआयना किया तो वहां कुछ आधे-पौने फुट प्रिंट्स जरूर दिखाई दिये मगर उनके जरिये किसी की शिनाख्त कर पाना या कातिल के कद काठी का अंदाजा लगा पाना उसे मुमकिन नहीं जान पड़ा।

कार एकदम चमचमाती हुई नजर आ रही थी और हालिया खरीद जान पड़ती थी। सावधानी से चलता राठी कार के अगले हिस्से में पहुंचा तो वहां सीट पर कोई पड़ा दिखाई दिया। जेब से रूमाल निकालकर उसने अपने बायें हाथ में लपेटा फिर दरवाजे का हैंडल थाम कर उसे अपनी तरफ खींचा। दरवाजा निःशब्द खुलता चला गया।
टॉर्च की रोशनी उसने सीट पर पड़े शख्स पर डाली जो कि बायीं करवट सीट पर गिरा हुआ था। पैर ड्राईविंग सीट की तरफ नीचे लटके थे जबकि सिर वाला हिस्सा पैसेंजर सीट पर पड़ा था। लाश की दायीं कनपटी में बना बुलेट वुन्ड साफ दिखाई दे रहा था, जबकि दायें हाथ में रिवॉल्वर मौजूद थी और वह हाथ उसके पेट पर टिका हुआ था।
मरने वाले की सूरत खून से लिथड़ी हुई थी, मगर उसके रख-रखाव और परिधान को देखकर राठी ने यही अंदाजा लगाया कि वह कोई नौजवान शख्स था, जो कि ड्राईवर नहीं हो सकता था। फिर उसकी निगाह रिवॉल्वर वाले हाथ पर गई तो उसकी दो उंगलियों में डायमंड रिंग जगमगाती दिखाई दी। होने को वह कोई आम - हीरे जैसा दिखने वाला - कांच का टुकड़ा भी हो सकता था, मगर गाड़ी क्योंकि ऑडी थी और मरने वाले ने महंगे कपड़े पहन रखे थे, इसलिए राठी ने सहज ही दोनों अंगूठियों को डायमंड रिंग कबूल कर लिया। मृतक का बायां हाथ कुछ यूं उसके शरीर के नीचे दबा हुआ था कि बस उसकी कलाई के आगे का हिस्सा ही बाहर दिखाई दे रहा था। जिसमें मौजूद घड़ी रौलेक्स की है, ये पहचानने में उसे जरा भी वक्त नहीं लगा। टॉर्च की रोशनी उसने गाड़ी के फर्श पर डाली तो वहां एक आईफोन पड़ा दिखाई दिया। जिसके बगल में ही बीयर के दो खुले कैन लुढ़के हुए थे।
राठी के मुंह से बरबस ही सीटी निकल गई।
‘लगता है लांबे की दुआ कबूल हो गई’ - वह जैसे खुद से बोला – ‘हर तरफ से रईसी की बू आ रही है।’
उसने कार की पिछली सीट का मुआयना किया तो वहां भी बीयर की खुली हुई दो कैन दिखाई दीं, साथ ही चिप्स के तीन-चार खाली पैकेट भी पड़े हुए थे।
डैड बॉडी का प्रथम-दृष्टया मुआयना ये कहता था कि मरने वाले ने आत्महत्या की थी। उसने गाड़ी को सड़क के किनारे रोका और रिवॉल्वर निकालकर खुद को शूट कर लिया। हां ये बात जरूर हैरान कर देने वाली थी कि जान देने से पहले उसने कार का दरवाजा क्यों अनलॉक कर दिया था? या फिर कार में उसके अलावा भी लोग मौजूद थे, अगर बीयर की कैन और चिप्स के पैकेट हालिया खाली हुए थे तो यकीनन रहे होंगे। ऐसे में हैरानी की बात थी कि उसके सुसाईड कर चुकने के बाद वहां मौजूद बाकी लोग पुलिस को इन्फॉर्म करने की बजाय फरार हो गये थे, क्यों हो गये थे?

होने को ये भी हो सकता था कि पीसीआर को कॉल उनमें से ही किसी शख्स ने की हो और फरार इसलिए हो गये, क्योंकि मरने वाले की मौत के साथ अपना नाम नहीं जुड़ने देना चाहते होंगे।
राठी को अपना दूसरा ख्याल ज्यादा वजनदार महसूस हुआ।
मृतक यकीनन कोई बड़ा आदमी था, या फिर किसी बड़े आदमी का होता-सोता था। ऐसे में हंगामा तो यकीनन खड़ा होना था, मगर आत्महत्या! - जो कि पहली नजर में दिखाई देता था - केस को इतना हंगामाखेज नहीं बना सकती थी कि हर तरफ उसकी जय-जयकार होने लगती। बड़ी हद चौकी पहुंचे किसी न्यूज रिपोर्टर के कैमरे में उसके थोबड़े की झलक दिखाई दे जाती, मगर उससे क्या होता? वैसा तो वह पहले भी कई बार जबरन कैमरे के सामने अपना चौखटा चमका कर चुका था।
फिर आत्महत्या के मामले में ना तो रिपोर्टर के पास खास सवाल होते ना ही वह उनके आगे कोई मिस्ट्री झाड़ पाता। यानि कुल मिलाकर एसआई निरंकुश राठी गुमनामी के अंधेरे में ही पड़ा रह जाता।
‘एक लड़के ने अपनी कार को सड़क के किनारे खड़ा कर के खुद को शूट कर लिया’ ये भी कोई केस हुआ साला।
‘कुछ करना होगा।’ - उसने सोचा – ‘कुछ ऐसा जिससे मेरी जय-जयकार भी हो जाये और मोटा माल भी झटका जा सके।’
कैसे? कैसे? वह अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाने लगा।
मरने वाला दौलतमंद शख्स जान पड़ता है। कार में उसके साथ बीयर पीने वाले लोग भी उसी के हैसियत के होंगे। ऐसे लोगों को जब अपनी गर्दन फंसती दिखाई देगी तो क्या वे लोग अपनी तिजोरी का दरवाजा खोलने से मना कर देंगे?
नहीं ऐसा तो कोई नहीं करता। लेकिन मरने वाले ने अगर सचमुच आत्महत्या ही की है तो भला कोई उसे रिश्वत क्यों देने लगा?
‘फिर क्या करूं? क्या करना चाहिये? लांबे को बुलाता हूं, ऐसे मामलों में वह पूरा शैतान की औलाद है, कोई ना कोई रास्ता जरूर सुझा देगा।’
‘ईडिएट, खामख्वाह का हिस्सेदार पैदा हो जायेगा। देखा नहीं कैसे थोड़ी देर पहले वह दो ऑडी, दो बंगले और दो लड़कियों की बात कर रहा था?’
‘तो क्या करूं?’
‘कुछ ऐसा जिससे आत्महत्या की वारदात हत्या दिखाई देने लगे, कोल्ड ब्लडेड मर्डर दिखाई देने लगे। मगर बाद में क्या? केस को सॉल्व भी तो कर के दिखाना होगा, वरना वाहवाही कहां से हासिल होगी?’
राठी का दिमाग इस वक्त चकरघिन्नी बना हुआ था। वह समझ नहीं पा रहा था कि ऐसे हालात का उसे किस तरह से फायदा उठाना चाहिये? वह ऐसा क्या करे जिससे एक ही झटके में उसकी दोनों अहम ख्वाहिशें पूरी हो जायें?

कार के खुले दरवाजे के पास खड़ा वह भीतर पड़ी डेड बॉडी पर अपने सपनों का महल खड़ा करने की कोशिश करता रहा। उस दौरान उसने अपने दिमाग को मथ कर रख दिया। हालत ये हो गई कि उसके दिल की धडकनें बढ़ती चली गईं, जिस्म पसीने से नहा उठा।
फिर उसने फैसला कर लिया।
सीधे खड़े होकर एक नजर पीछे जीप के पास खड़े अपने हमराहियों पर डाली, फिर झुककर लाश के दायें हाथ से पिस्तौल निकाल लिया। इसके बाद रिवॉल्वर को रूमाल से पोंछकर उसे मृतक के शरीर के नीचे दबे बायें हाथ में थमाकर, उसकी मुट्ठी कसकर बंद कर दी। फौरन बाद लाश की उंगलियां खुलने सी लगीं, मगर उस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था, क्योंकि रिवॉल्वर पर उसके फिंगरप्रिंट वह बना चुका था।
अब कोई मामूली सा सिपाही भी लाश पर नजर डालता तो ये समझते देर नहीं लगती कि मामला कत्ल का था, जिसे हत्यारे ने आत्महत्या का रंग देने की कोशिश की थी, मगर हड़बड़ी में भारी चूक कर बैठा।
टॉर्च की रोशनी में एक बार फिर उसने कार के भीतरी हिस्से का मुआयना किया और दरवाजा बंद करता हुआ कार के सामने से घेरा काटकर वापस अपनी जीप के पास पहुंच कर खड़ा हो गया।
“कुछ दिखाई दिया साहब जी?” लांबा ने सवाल किया।
“हां भाई साफ-साफ कत्ल का केस जान पड़ता है।”
“कत्ल का।” - वहां खड़ा एक सिपाही चौंक सा गया, वह वही शख्स था जिसने कंट्रोल रूम का मैसेज राठी तक पहुंचाया था – “लेकिन मैसेज में तो बताया गया था कि मरने वाले ने आत्महत्या की थी।”
राठी को जैसे सांप सूंघ गया। तब जाकर उसे इस बात का ख्याल आया कि लाश की खबर कंट्रोल रूम को देने वाले शख्स ने पुलिस से पहले लाश को देखा था। राठी का दिल नगाड़े की तरह बज उठा।
‘क्या करूं जाकर रिवॉल्वर को फिर से पहले वाली पोजिशन में पहुंचा दूं? यही करना पड़ेगा, साला अपना तो नसीब ही खराब है।’
सोचता हुआ वह ऑडी की तरफ घूमा तो ये देखकर हड़बड़ा सा गया कि उसका एक सिपाही कार का दरवाजा खोलकर भीतर झांक रहा था।
“साहब जी एकदम ठीक कह रहे हैं।” - सिपाही का स्वर उसके कानों से टकराया – “गोली दायीं कनपटी में लगी है, रिवॉल्वर बायें हाथ में है, इतने फसादी तरीके से भला कोई अपनी जान क्यों लेगा?”
“इधर आ।” राठी गुस्से से बोला।

सिपाही तत्काल उसके सामने जा खड़ा हुआ।
राठी को उसपर गुस्सा तो बहुत आ रहा था, दिल हो रहा था कि एक जोर का थप्पड़ उसके गालों पर जड़ दे, मगर किसी तरह खुद को हाथ उठाने से रोकता हुआ क्रोधित स्वर में बोला, “तुझे किसने कहा था वहां जाकर अपना ज्ञान बघारने को, चुपचाप खड़ा नहीं रह पाया बाकी लोगों की तरह।”
“सॉरी सर जी।” - सिपाही सकपका कर बोला – “लेकिन आप जब उधर से फारिग हो ही चुके हैं तो मेरे वहां पहुंच जाने से कौन सी आफत आ गई?”
“गलती नहीं मानता! जुबान लड़ाता है?”
“सॉरी सर।”
“ठीक है, ठीक है, अब यहीं टिक कर खड़ा रह।” कहकर उसने अपना मोबाइल निकाला और थाने को फोन कर के वारदात की इत्तला दे दी। एसएचओ ने फौरन वहां पहुंचने की बात कही, साथ ही ये हुक्म भी दनदना दिया कि फोरेंसिक टीम के आने तक वह लाश को हाथ लगाने की भी कोशिश ना करे।
कॉल डिस्कनेक्ट करने के बाद निरंकुश राठी एक सिगरेट सुलगा कर गहरे-गहरे कश लगाने लगा। अब वह इस बात पर पछता रहा था कि क्यों उसने रिवॉल्वर के साथ फेर-बदल किया था? क्यों पहले उसका ध्यान उस शख्स की तरफ नहीं गया, जिसने लाश की खबर कंट्रोल रूम को दी थी?
बड़ी शिद्दत से अब उसे ये बात महसूस होने लगी कि वैसा करते वक्त उसे लांबा से सलाह मशवरा कर लेना चाहिये था। ना कि रिश्वत हाथ आने से पहले ही हिस्सेदार घटाने के बारे में सोचने लगना था। आगे चलकर कोई मुसीबत सामने आने पर लांबा की मदद लेना उसकी मजबूरी होती, क्योंकि ऐसे मामले में उसके सिवाय किसी और पर विश्वास नहीं किया जा सकता था।
सिगरेट फेंककर उसने हवलदार सुदीप लांबा का हाथ पकड़ा और उसे जीप से थो़ड़ा परे निकाल ले गया।
“क्या हुआ साहब जी?” वह हड़बड़ाता हुआ बोला।
“मैंने कुछ किया है।”

“क्या किया है?”
“शी! धीरे बोल! मैंने हमारे सपनों को सच करने के लिये कुछ किया है।”
“अभी! यहीं?”
“हां यहीं, मैं करना तो तुझसे पूछकर चाहता था, मगर डर था कि बीच में यहां मौजूद सिपाहियों में से कोई और कार के पास पहुंचकर लाश पर निगाह न मार ले, जो कि आखिरकार तो होकर रहा था। समझ गया तू?”
“नहीं साहब जी! कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा।”
“पड़ जायेगा, बाद में पड़ जायेगा, अभी ये बात मैंने तुझे इसलिए बता दी है ताकि बाद में तू ये न सोचने लगे कि मैं एक ऑडी, एक बंगला और एक बीवी की फिराक में लगा था, क्या समझा?”
“कुछ भी नहीं, आप तो मेरा दिमाग हिलाये दे रहे हैं।”
“बाद में समझाता हूं, पहले इधर से निपट लें तब सारी बात बताऊंगा तुझे।”
लांबा ने सहमति में सिर हिला दिया। इसके बाद दोनों वापस जीप के पास जाकर खड़े हो गये। राठी ने फिर से सिगरेट सुलगा लिया और एसएचओ के वहां पहुंचने का इंतजार करने लगा।
फोरेंसिक टीम और एंबुलेंस एसएचओ से पहले वहां पहुंच गईं। गाड़ी से उतरकर उन लोगों ने कार को कब्जे में ले लिया और फौरन अपने काम में जुट गये।
पांच मिनट बाद एसएचओ भानु प्रताप की गाड़ी भी वहां आ खड़ी हुई। उसपर नजर पड़ते ही राठी ने हाथ में थमी सिगरेट को सिगरेट को तिलांजलि दी और ठोक कर उसे सेल्यूट मारा।
“कुछ पता चला?”
“अभी नहीं सर! मैंने तो बस लाश पर एक नजर डालकर ही आपको फोन कर दिया था। आपका हुक्म था इसलिए कोई जांच-पड़ताल करने की कोशिश नहीं की।”
“अच्छा किया, आगे के लिये भी याद रखो कि कत्ल की वारदात में फोरेंसिक टीम की इंक्वायरी पूरी होने से पहले कुछ मत करो। इंतजार करो, क्योंकि ये लोग सबूत इकट्ठा करने में हमसे कहीं ज्यादा माहिर होते हैं।”

“यस सर।”
“कैसा चल रहा है तुम्हारा चौकी का काम-धाम?”
“आपकी कृपा है सर तो बढ़िया ही होगा।”
“गुड! जानते हो थाने के आठ सब-इंस्पेक्टर्स को छोड़कर मैंने तुम्हारा नाम क्यों रिकमेंड किया?”
“अब जान लेता हूं सर।”
“क्योंकि तुम्हारे मन में अपराधियों के प्रति जो नफरत भरी हुई है वह मुझे बहुत-बहुत पसंद है। उम्मीद है मेरे विश्वास को गलत साबित नहीं होने दोगे।”
“बिल्कुल नहीं सर, आज तक क्या मैंने आपको शिकायत का एक भी मौका दिया है?”
“आगे भी मत देना।” - भानुप्रताप उसे गहरी निगाहों से देखता हुआ बोला – “तो मरने वाले ने आत्महत्या की है?”
राठी बुरी तरह चौंका, ‘हे भगवान! इसे भी मालूम है? होना ही था कंट्रोल रूम का मैसेज क्या सिर्फ चौकी में सुना गया होगा?’
“जवाब नहीं दिया तुमने?”
“मैं! मैं सोच रहा था सर।”
“क्या?”
“यही कि आत्महत्या करने के लिये कोई शख्स बायें हाथ से अपनी दायीं कनपटी को निशाना क्यों बनायेगा? अगर वह लैफ्ट हैंडर था तो गोली का सुराख उसकी बायीं कनपटी में मिलना चाहिये था ना कि दायीं में।”
“कमाल है, जबकि पुलिस को इन्फॉर्म करने वाले शख्स ने तो ये कहा था कि रिवॉल्वर मरने वाले के दायें हाथ में थी और गोली भी दायीं कनपटी पर ही लगी थी।”
“उसे कोई धोखा हुआ होगा सर।” - राठी डूबते स्वर में बोला – “या फिर मैसेज रिसीव करने वाले से कोई गलती हुई होगी, वैसे भी बायां और दायां! ध्यान से न सुना जाये तो कंफ्यूजन हो जाना बहुत आम बात है।”
“हां ये तो हो सकता है, फिर भी उसे फोन कर के या चौकी बुलाकर एक बार इस बारे में दरयाफ्त जरूर कर लेना।”
“कर लूंगा सर, बिल्कुल करूंगा। अगर वह फिर भी अपनी बात पर अड़ा रहा तो इसका साफ-साफ मतलब ये होगा कि मौत हो चुकने के बाद किसी ने रिवॉल्वर के साथ छेड़खानी की थी।”

“दरवाजा खुला मिला था तुम्हें?”
“खुला तो नहीं मिला था सर मगर लॉक्ड भी नहीं था। मैंने हैंडल पर रूमाल रखकर उसे अपनी तरफ खींचा तो वह फौरन खुल गया था।”
“खैर जो भी रहा हो आखिरकार तो सामने आ ही जायेगा। फिर इधर कैमरे भी तो लगे हुए हैं।” - सुनकर राठी का दिल इतनी जोर से उछला कि उसके लिये अपनी हड़बड़ाहट छिपा पाना मुश्किल हो गया, जबकि भानुप्रताप बोले जा रहा था – “सुबह सबसे पहले कैमरे की फुटेज हासिल करने की कोशिश करना, क्या पता कुछ खास दिखाई दे जाये। ऐसा हुआ तो तुम्हारा काम आसान हो जायेगा।”
हे भगवान! ये हो क्या रहा था? क्यों सारी बातें उसे बाद में याद आ रही थीं? जबकि वह खूब जानता था कि बायीं तरफ जो किला दिखाई दे रहा है उसे पुरातत्व विभाग ने अपने अधिकार में लेने के बाद ना सिर्फ उसकी मरम्मत कराई थी बल्कि इधर-उधर कैमरे भी लगा दिये गये थे।
“तुम्हारा ध्यान कहां है भाई?” एसएचओ ने पूछा।
“यहीं है जनाब, बस जरा लाश की तरफ भटक गया था।” - वह बात संभालता हुआ बोला – “मरने वाला बड़ा आदमी जान पड़ता है। गाड़ी तो महंगी है ही सर, उसके लिबास भी खासे कीमती दिखाई देते हैं। कार में पड़ा मोबाइल आई-फोन का लेटेस्ट मॉडल जान पड़ता है, उंगलियों में हीरे की अंगूठियां पहने हुए है, हाथों में रोलेक्स की घड़ी तक मौजूद है।”
“और तुम कहते हो कि” - एसएचओ उसे घूरता हुआ बोला – “तुमने लाश को हाथ भी नहीं लगाया था?”
“बाई गॉड नहीं लगाया था सर! ये सारी चीजें तो बाहर खड़े होकर ही नोट की थीं मैंने।”
“मोबाइल भी बाहर से ही दिखाई दे गया तुम्हें?”
“कार के फर्श पर पड़ा है सर, वह भी पैसेंजर साईड में, इसलिए मुझे लगता है कि कातिल जो कोई भी था उसके साथ कार में बैठकर यहां तक पहुंचा था। ऐसे में उसका मकतूल का जानकार निकल आना कोई बड़ी बात नहीं होगी।”
“मोबाइल कार के फर्श पर क्यों पड़ा है?”
“जिस वक्त गोली चली थी उस वक्त जरूर वह फोन पर किसी से बातें कर रहा होगा, तब मोबाइल उसके बायें हाथ में रहा होगा, नतीजा ये हुआ कि गोली खाकर जब वह बायीं तरफ को गिरा तो मोबाइल उसके हाथों से छूटकर पैसेंजर साईड में नीचे जा गिरा।”
“ब्रीलियेंट।”
“थैंक्यू सर, जब आप तारीफ कर ही रहे हैं तो एक बात और कहना चाहूंगा।”
“बोलो।”

“गोली कार के भीतर बैठकर नहीं चलाई गई हो सकती।”
“ऐसा किस आधार पर कह रहे हो?”
“उसकी दायीं कनपटी को शूट किया गया है, इसलिए हत्यारा पैसेंजर सीट पर बैठा नहीं हो सकता था। और अगर वह पिछली सीट पर सवार होता तो बुलेट वुन्ड बड़ा होता जो की नहीं है।”
“मैं समझा नहीं।”
“मान लीजिये मैं ड्राईविंग सीट पर बैठा हूं, मेरे मोबाइल की घंटी बजती है और मैं कॉल अटैंड करने के लिये गाड़ी साइड में लगाने के बाद बायें हाथ से मोबाइल को कान सटा लेता हूं। आप मेरे एकदम पीछे मौजूद हैं, आपने रिवॉल्वर निकालकर मेरी कनपटी पर गोली चला दी, मगर आपकी मजबूरी ये है कि ड्राईविंग साईड में इतनी जगह नहीं है कि आप अपनी कोहनी को मोड़कर रिवॉल्वर का रूख एकदम से सीधा कर सकें, आपके पास वक्त भी नहीं है क्योंकि उस काम को फौरन अंजाम देना है, ऐसे में आप जब मेरी कनपटी पर रिवॉल्वर रखकर मुझे शूट करने की कोशिश करेंगे तो रिवॉल्वर का रूख थोड़ा तिरछा हो जायेगा, तब गोली सीधी भीतर उतरने की बजाय नीचे से ऊपर और बायें से दायें तरफ बढ़ेगी, नतीजा ये होगा कि बुलेट खाल को छीलती हुई खोपड़ी में दाखिल होगी, जिसके कारण घाव अपेक्षाकृत बड़ा दिखाई देगा।”
“जो कि तुम्हें नहीं दिखाई देता?”
“एक नजर में तो ऐसा ही महसूस हुआ था सर! बाकी फोरेंसिक टीम बेहतर बता पायेगी।”
“यूं बाहर खड़े होकर गोली चलाने वाला भी तो कोई जानकार ही रहा होगा? वरना किसी अजनबी के लिये वह कार का शीशा नीचे क्यों खिसकाता?”
“बेशक रहा होगा, इसलिए हो न हो यह मकतूल के किसी जानने वाले का ही कारनामा दिखाई देता है।”
“फिर तो सीसीटीवी कैमरा तुम्हारा बहुत भला कर सकता है।”
“उसकी उम्मीद ना के बराबर है सर।”
“क्यों?”

“क्योंकि मुझे नहीं लगता कि हत्यारा यहां अकेला पहुंचा था। जो भी हुआ दिखाई देता है वह पलक झपकने जितनी देर में अंजाम दिया गया था। हो सकता है हत्यारा कार में सवार होकर यहां पहुंचा हो। उसके साथी ने ऑडी के बगल में कार रोकी तो नीचे उतर कर उसने विंडो ग्लास खुलवाया, उसे गोली मारी, फिर गेट खोलकर रिवॉल्वर को उसके हाथ में थमाया और विंडो ग्लास बंद करने के बाद कार का दरवाजा बंद किया और अपनी कार में सवार होकर यहां से चलता बना। दूसरे किसी वाहन की मौजूदगी इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि इतनी रात गये यहां कोई वाहन मिलना बेहद मुश्किल काम था। ऊपर से ऐसे किसी वाहन में रात को सवार होने वाली सवारी की शिनाख्त हो जाना कौन सी बड़ी बात है? नहीं जनाब हत्यारे ने इतना बड़ा रिस्क नहीं लिया हो सकता। और अगर सबकुछ मेरे बताये ढंग से हुआ है तो यहां मौजूद कैमरे में उसकी शक्ल दिखाई दे जाना नामुमकिन जान पड़ता है क्योंकि दोनों कैमरे रोटेट होने वाले हैं, फिर उन्हें लगाने का मकसद किले की दीवार और उसके साथ-साथ दिखाई दे रहे पार्क, फूलों की क्यारियों इत्यादि पर नजर रखना है ना कि आते-जाते वाहनों या सड़क पर। आप जरा उनके एंगल पर गौर फरमाईये, मुझे तो ऐसा लगता है कि ऑडी के बगल में आ खड़ी हुई कोई कार भी शायद ही उसकी रिकॉर्डिंग की रेंज में आती हो।”
एसएचओ ने उसके कहने के बाद एक नजर दीवार पर लगे कैमरों पर डाली भी सहमति में सिर हिलाता हुआ बोला, “कहीं इसके कत्ल में तुम्हारा तो कोई हाथ नहीं है?”
राठी के मन में मौजूद चोर ने उसे एकदम से हड़बड़ाकर रख दिया, “क्या कह रहे हैं सर? मैं भला इसका कत्ल क्यों करूंगा?”
“भई घटनाक्रम तो ऐसे ही बयान कर रहे हो जैसे सबकुछ अपनी आंखों से देखा था।” भानुप्रताप हंसता हुआ बोला।
यह जानकर कि वह मजाक कर रहा था, निरंकुश राठी ने मन ही मन चैन की सांस ली।
“एक बात समझ में नहीं आती कि जब हत्यारे को विंडो ग्लास चढ़ाना याद रहा, दरवाजा बंद करना याद रहा तो रिवॉल्वर को दायें हाथ में थमाना कैसे भूल गया वह?”
“क्या कह सकते हैं सर सिवाय इसके कि हड़बड़ी में, बेध्यानी में हत्यारा यह बड़ी चूक कर बैठा।”
तभी फोरेंसिक टीम के लोग अपना ताम-झाम समेटने लगे। उनका इंचार्ज टहलता हुआ भानुप्रताप के करीब आ खड़ा हुआ, “कोल्ड ब्लडेड मर्डर जान पड़ता है, जिसे आत्महत्या की वारदात साबित करने की पूरी कोशिश की गई, लेकिन हड़बड़ाहट में हत्यारा एक भारी चूक कर गया, जिसकी वजह से हाथ के हाथ ये साबित हो गया कि मरने वाले ने खुद अपनी जान नहीं ली थी।”
कहकर आगे उसने घटना के संदर्भ में अपना जो अंदाजा बयान किया वह राठी की ओपेनियन की पुष्टि सा करता जान पड़ा, जिसके बारे में वह पहले ही एसएचओ के सामने अपना ज्ञान बघार चुका था।

“रिवॉल्वर पर सिर्फ और सिर्फ मकतूल की उंगलियों के निशान हैं, ऊपर से वह चोरी की जान पड़ती है क्योंकि सीरियल नंबर को रेती से घिसकर मिटा दिया गया है। फिर भी हम उसे अपने साथ ले जा रहे हैं, कोशिश करेंगे किसी तरह उसका घिसा जा चुका नंबर पढ़ा जा सके, वैसे उम्मीद कम ही है। बाकी भीतर मौजूद बीयर की कैन, चिप्स के पैकेट और दरवाजे से हमें कुछ ताजा उंगलियों के निशान मिले हैं। इसके अलावा कांच का एक टुकड़ा भी मिला है जो कि साफ-साफ किसी घड़ी का जान पड़ता है।” - इंचार्ज ने बताया – “उम्मीद है इनसे से कोई नतीजा निकल कर रहेगा। बाकी विस्तृत रिपोर्ट कल शाम तक आपको मेल कर दी जायेगी।”
“मकतूल के बारे में कुछ पता चला?”
“हां चला, आप ये जानकर हैरान रह जायेंगे कि हत्प्राण संदीप डांगे का बेटा है।”
सुनकर भानुप्रताप तो चौंका ही चौंका, राठी की हालत यूं हो गई जैसे वह खड़े-खड़े मर गया हो। उसका चेहरा निचुड़ सा गया, दिल धाड़-धाड़ कर के पसलियों को ठोकर मारने लगा। कानों में सांय-सांय की आवाज सुनाई देने लगी। कुछ देर के लिये उसका दिमाग जैसे एकदम कुंद होकर रह गया।
“ये भी तो हो सकता है।” - एसएचओ की आवाज उसके कानों में पड़ी – “कि मरने वाले के बाप का नाम इत्तेफाकन संदीप डांगे रहा हो, वो वह संदीप डांगे ना हो जिसके बारे इस वक्त हमारे दिमाग में ख्याल घुमड़ रहे हों?”
‘हां ऐसा हो तो बराबर सकता था।’ राठी को थोड़ी तसल्ली सी महसूस हुई जिसपर अगले ही पल पानी फिर गया।
“नहीं हो सकता।” - इंचार्ज बोला – “क्योंकि मकतूल के ड्राईविंग लाईसेंस पर जो पता दर्ज है वह उसी संदीप डांगे का है, जो ड्रग्स के कारोबार में लिप्त बताया जाता है, पहाड़गंज में जिसके एक दर्जन से ज्यादा होटल हैं, डिस्कोथेक हैं, क्लब हैं जहां धड़ल्ले से जुआ खेला जाता है। यहां तक कि बड़े-बड़े लोगों को एक्सकॉर्ट सर्विसेज मुहैया कराना भी उसके प्रमुख धंधों में से एक है। अभी तीन महीने पहले एनसीबी की एक टीम ने उसके तीन आदमियों को तेईस किलो फाईन हेरोइन के साथ गिरफ्तार किया था जिसकी कीमत करीब नब्बे करोड़ बताई जाती है, तब उसकी तरफ एक मजबूत उंगली उठी है। यूं लगा कि वह बस गिरफ्तार हुआ ही हुआ था। मगर सिर्फ लगा था, हकीकत में वह आज भी आजाद है, उसका धंधा ज्यों का त्यों बरकरार है। ये बात आप नहीं जानते या मैं नहीं जानता?”
“बेशक जानता हूं, मगर उस मामले में गिरफ्तार हुए लोगों का डांगे के साथ कनेक्शन जोड़ पाने में एनसीबी कामयाब नहीं हो पाई। बल्कि सच्चाई यही है कि आज तक उसके खिलाफ कोई एक भी इल्जाम भी साबित नहीं हो पाया है।”
“क्यों नहीं हो पाया, आप ये बात मुझसे बेहतर जानते हैं, इसलिए उस बात पर बहस करने से कोई लाभ नहीं होगा। वह मेरा महकमा भी नहीं है इसलिए मुझे उस बात से कोई लेना-देना नहीं है। चर्चा चल निकली इसलिए मैं इतना बोल गया, वरना तो उसके खिलाफ कुछ बोलना भी कौन सा आसान काम है।”
सुनकर भानुप्रताप हौले से हंस दिया।
“बहरहाल घटनास्थल अब आपके हवाले है, जो चाहें कर सकते हैं, हमारा काम पूरा हो गया अब चलते हैं। क्या पता कहां किसकी लाश के पास से बुलावा आ जाये?”
एसएचओ ने सहमति में सिर हिला दिया।
☐☐☐

दो बजे के करीब पुलिस ने फोन कर के संदीप डांगे को स्वदेश के कत्ल की खबर दी। सुनकर वह एकदम से भौंचक्का रह गया। ना तो उसकी आंखों से आंसू निकले ना ही उसके चेहरे पर गम के बादल उमड़ते दिखाई दिये। वह तो बस हैरान था, जैसे यकीन ही नहीं कर पा रहा हो कि उसके बेटे का कत्ल भी किया जा सकता है।
“डेड बॉडी कहां है?” उसने फोन पर मौजूद पुलिसिये से सवाल किया।
“अभी तो घटनास्थल पर ही है सर, आप आकर शिनाख्त कर लेते तो हम बॉडी को पोस्टमार्टम के लिये रवाना कर देते।”
“कहां पहुंचना है?”
सिपाही ने बता दिया।
“ठीक है हम पहुंचते हैं।”
कहकर उसने कॉल डिस्कनेक्ट कर के बगल में मौजूद अपनी बीवी पर निगाह डाली जो कि दीन दुनिया से बेखबर बेड पर लेटी खर्राटे भर रही थी। वह स्लीपिंग डिसऑर्डर का शिकार थी इसलिए हर रात नींद की दवाई खाकर सोती थी। ऐसे में मोबाइल की घंटी सुनकर भी उसकी नींद न खुलना कोई हैरानी की बात नहीं थी।
बेडरूम से बाहर निकलकर डांगे ने इलियास हिन्दुस्तानी को फोन लगाया। जो कि अपने बराबर के ही रूतबे वाले मनीष ओजस्वी के साथ बंगले के ही एक दूसरे पोर्शन में रहता था। दोनों डांगे के खास आदमी थे, उसके बॉडी गार्ड थे, उसके ट्रबल शूटर थे, बल्कि यह कहना गलत नहीं होगा कि सबकुछ थे।
“बाहर जाना है।” कहकर उसने कॉल डिस्कनेक्ट कर दी।
इसके बाद वह बगल के कमरे में पहुंचा, जहां उसने अपना नाईट ड्रेस उतारकर सूट पहना फिर रिवॉल्वर निकाल कर कोट की अंदरूनी जेब में रखने के बाद पांव में जूते डालकर नीचे पहुंचा।
इलियास हिन्दुस्तानी और मनीष ओजस्वी उसकी मर्सडीज के पास तत्पर मुद्रा में खड़े दिखाई दिये। इलियास ने आगे बढ़कर पिछला दरवाजा खोला तो डांगे गाड़ी में सवार हो गया। ओजस्वी ड्राईविंग सीट पर जा बैठा तो इलियास पैसेंजर साईड का दरवाजा खोलकर गाड़ी में सवार हो गया।
तब तक गेट पर खड़ा गार्ड दरवाजा खोल चुका था। ओजस्वी ने गाड़ी फौरन आगे बढ़ा दी।
“एमबी रोड पकड़, तुगलकाबाद गांव के आगे पुलिस मौजूद होगी वहीं रूकना है।”
ओजस्वी ने सहमति में सिर हिला दिया।

एक तो सर्दी का मौसम दूसरे रात का वक्त! सड़क एकदम खाली मिली।
हौजखास से तुगलकाबाद के सफर में उन्हें मुश्किल से दस मिनट लगे। फिर ओजस्वी ने कार की रफ्तार घटा दी। गाड़ी थोड़ी और आगे बढ़ी तो सड़क पर खड़ी पुलिस की जीप उसे दूर से ही दिखाई दे गई, नजदीक पहुंचकर ज्योंही ओजस्वी की निगाह ऑडी पर पड़ी वह चौंक सा पड़ा, “ये! ये तो स्वदेश बाबा की कार है।”
“उसी की है।” - डांगे गंभीर स्वर में बोला – “गोली खा गया है।”
सुनकर क्या ओजस्वी और क्या इलियास दोनों ने एक साथ चौंककर डांगे की तरफ देखा फिर सामने सड़क पर देखने लगे। उन्हें इस बात पर बहुत हैरानी हो रही थी कि कैसे वह बेटे के साथ इतनी बड़ी घटना घटित हो जाने के बाद भी यूं नार्मल बना हुआ था, कि घर से निकलते वक्त डांगे को देखकर उनके मन में एक बार को भी ये विचार नहीं आया था कि उनका बॉस उस वक्त गहरे सदमें में था।
पुलिस जीप के पीछे पहुंचकर ओजस्वी ने कार रोक दी।
तीनों नीचे उतरे। तब तक सब इंस्पेक्टर निरंकुश राठी की नजर कार पर पड़ चुकी थी वह तेजी से चलता हुआ उनके करीब पहुंचा।
“इंचार्ज कौन है यहां का?” डांगे ने गंभीर स्वर में पूछा।
“मैं ही हूं सर, यहां का भी और इधर की चौकी का भी।”
“क्या हुआ है?”
“गोली लगी है सर! कनपटी में।”
डांगे कार की तरफ बढ़ा, “कुछ पता लगा?”
“सिर्फ इतना कि हत्या लूटपाट की खातिर नहीं की गई है। अभी-अभी फोरेंसिक टीम अपनी जांच पूरी कर के गयी है। एसएचओ साहब भी तब तक यहीं थे, फिर डीसीपी साहब के बुलावे पर उन्हें थाने लौटना पड़ा।”
डांगे ने सहमति में सिर हिलाया और कार के करीब जाकर बेटे की लाश पर एक निगाह डालने के बाद गहरी सांस लेकर दरवाजा बंद कर दिया।
राठी ने सवाल करती निगाहों से उसकी तरफ देखा तो डांगे ने सहमति में सिर हिला दिया।
इसके बाद लाश को एंबुलेंस में डालकर मोर्ग भेज दिया गया, जहां दिन चढ़े कहीं जाकर उसका पोस्टमार्टम होना था। तत्पश्चात राठी की जीप के पीछे चलती मर्सडीज एमबी रोड चौकी पहुंची।

अपने कमरे में पहुंचकर उसने डांगे को बैठने का इशारा किया फिर मेज का घेरा काटकर दूसरी तरफ पहुंचा और अपनी कुर्सी पर आसीन हो गया।
“मैं जानता हूं सर कि इंक्वायरी के लिये ये सही वक्त नहीं है, फिर भी अगर आप इजाजत दें तो कुछ सवाल पूछ लूं।”
“जो पूछना है पूछो, वक्त की परवाह मत करो।”
“शुक्रिया सर!” - राठी बोला – “क्या आपको कोई अंदाजा है कि आपका बेटा इतनी रात गये घर से दूर इस सड़क पर क्या कर रहा था?”
“डिनर टेबल पर मैंने उसे डांट दिया था, तब वह गुस्से में घर से बाहर निकल गया, आगे किधर गया और कहां से इस तरफ को निकल आया मैं नहीं जानता।”
ओह गुस्से में निकला था, यानि आत्महत्या वाली बात में कोई भेद नहीं हो सकता!
“डांटने की वजह?” प्रत्यक्षतः उसने पूछा।
“पिछले कुछ महीनों से वह ड्रग लेने लगा था, बस उसी बात पर चेतावनी देते हुए मैंने उसे डांट दिया था और कोई बात नहीं थी।”
“कब की बात है ये?”
“नौ बजकर कुछ मिनट हुए थे, जब वह डाईनिंग हॉल से उठकर बाहर निकल गया था। आगे बंगले से कब निकला मैं नहीं जानता, मगर साढ़े नौ के करीब जब मैं डिनर से फारिग होकर बंगले के अहाते में टहल रहा था तो उस वक्त स्वदेश की ऑडी वहां नहीं थी।”
“कोई यार दोस्त?”
“कई हैं, सबके होते हैं। मगर पक्के यार बस दो ही थे रूद्र और आनंद। स्कूल के जमाने से ही तीनों में अच्छी निभती थी।”
“उन दोनों का कोई अता-पता?”
“रूद्र के पिता सांसद हैं, नाम है छत्रपति शाह, उसका घर सीआर पार्क में कहीं है। जबकि आनंद का बाप बलदेव बादशाह बड़ा बिल्डर है, उसका घर ग्रेटर कैलाश में कहीं है, मगर ऑफिस के बारे में मुझे पक्का पता है कि वह लाजपत नगर में सेंट्रल मार्केट के ऐन सामने है। ग्रीन सिटी का बहुत बड़ा बोर्ड वहां लगा हुआ है इसलिए ढूंढने में परेशानी नहीं होगी।”
“और कोई?”
“कहा न होने को बहुत होंगे, बल्कि हैं, मगर उनका नाम-पता मुझे नहीं मालूम है। रूद्र या आनंद से उस बात की जानकारी मिल सकती है। तीनों में सबकुछ साझा था।”
“सबकुछ साझा का मतलब!”
“मतलब तो बहुत कुछ है मगर फिलहाल मेरा इशारा उनकी गर्ल फ्रेंड अवनी सक्सेना की तरफ है, जो कि तीनों की ही गर्ल फ्रेंड है।”
राठी सकपका कर उसकी सूरत देखने लगा।

“चौंको मत भाई मॉडर्न जमाना है, जो न हो जाये वही कम है।”
राठी ने गंभीरता से सिर हिलाया फिर बोला, “अवनी सक्सेना के बारे में और क्या जानते हैं आप?”
“खूबसूरत है आजाद ख्याल है। बाप बड़ा एडवोकेट है। नाम और पता मुझे नहीं मालूम।”
“वह हम जान लेंगे सर! जानकर रहेंगे।” - राठी मजबूत लहजे में बोला – “कत्ल की कोई वजह सुझा सकते हैं आप?”
“नहीं।”
“किसी से मरने वाले की कोई अदावत रही हो, कोई हालिया लड़ाई-झगड़ा?”
“तुम भूल गये दिखते हो कि ये सवाल तुम किसके बेटे के बारे में पूछ रहे हो। किसकी मजाल थी जो उससे उलझने की हिम्मत कर पाता?”
“सॉरी सर मैं सचमुच भूल गया था, तो ऐसा कुछ होने की कोई उम्मीद नहीं है।”
“नहीं, जरा भी नहीं, और कुछ पूछना चाहते हो?”
“एक आखिरी सवाल सर।”
“पूछो।”
“उम्मीद है आप बुरा नहीं मानेंगे।”
“तुम वक्त बर्बाद कर रहे हो।” डांगे तल्ख लहजे में बोला।
“ओके मैं साफ-साफ पूछता हूं, क्या आपके बेटे की हत्या का संबंध आपके बिजनेस से हो सकता है? मेरा इशारा हसीब बाबा की तरफ है, जो कि धीरे धीरे आपका प्रतिद्वंदी बनता दिखाई दे रहा है।” - कहकर उसने जल्दी से जोड़ा – “अगर आप जवाब देना चाहें तो?”
डांगे ने कुछ क्षण उस बात पर गौर किया फिर बोला, “चौबीस घंटों में अगर तुम्हें हसीब बाबा की लाश बरामद होने की खबर मिल जाये तो बेशक अपनी इन्वेस्टिगेशन बंद कर देना।” - कहकर वह उठ खड़ा हुआ – “अगर ऐसा नहीं होता है तो एक हफ्ते का वक्त है तुम्हारे पास, कातिल को ढूंढ निकालने के लिये। अगर कामयाब हो गये तो याद करोगे कि किसी दरियादिल बाप से पाला पड़ा था। इसके विपरीत अगर तुम नाकामयाब रहे....”
राठी का दिल जोर से उछला!
“......तो मुझे तुम्हारे ‘कहीं ना होने का’ का बहुत अफसोस होगा।” अपनी बात पूरी कर के वह घूमा और कमरे से बाहर निकल गया।
राठी बहुत देर तक दरवाजे को घूरता रहा, फिर धम्म से कुर्सी पर बैठकर दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया।


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