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मानव की निरन्तर खोज | Man’s Eternal Quest Book PDF Download Free by Paramahansa Yogananda

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥मानव की निरन्तर खोज PDF | Man's Eternal Quest
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 131.3 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖581
Last UpdatedAugust 29, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category, , , , , ,

परमहंस योगानंद की एकत्रित वार्ता और निबंध एक योगी की आत्मकथा में लाखों लोगों को आकर्षित करने वाले प्रेरक और सार्वभौमिक सत्य की विशाल श्रृंखला की गहन चर्चा प्रस्तुत करते हैं। पाठक इन वार्ताओं को सर्वव्यापी ज्ञान, व्यावहारिक प्रोत्साहन और मानवता के प्रति प्रेम के अद्वितीय मिश्रण के साथ जीवंत पाएंगे, जिसने लेखक को आध्यात्मिक जीवन के लिए हमारे युग के सबसे सम्मानित और विश्वसनीय मार्गदर्शकों में से एक बना दिया है।
मनुष्य की अनन्त खोज परमेश्वर के बारे में एक पुस्तक है: मनुष्य के जीवन में परमेश्वर के स्थान के बारे में; उसकी आशाओं, इच्छा, आकांक्षाओं, उपलब्धियों में। जीवन, मनुष्य, उपलब्धि - सभी एक सर्वव्यापी निर्माता की अभिव्यक्तियाँ हैं, जैसे कि लहर समुद्र पर निर्भर है, उसी पर अविभाज्य रूप से निर्भर है। परमहंस योगानंद बताते हैं कि मनुष्य को ईश्वर ने क्यों और कैसे बनाया, और वह कैसे अपरिवर्तनीय रूप से ईश्वर का हिस्सा है, और व्यक्तिगत रूप से प्रत्येक के लिए इसका क्या अर्थ है। मनुष्य और उसके निर्माता की एकता का बोध ही योग का संपूर्ण सार है। जीवन के हर पहलू में ईश्वर के लिए मनुष्य की अपरिहार्य आवश्यकता की समझ धर्म से दूसरी दुनिया को हटा देती है और ईश्वर को जानने के लिए जीवन के लिए एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण का आधार बनाती है।

पुस्तक का कुछ अंश

मानव जाति उस "कुछ और" की निरन्तर खोज में व्यस्त है जिससे उसे आशा है कि संपूर्ण एवं असीम सुख मिल जाएगा। उन विशिष्ट आत्माओं के लिए जिन्होंने ईश्वर को खोजा और प्राप्त कर लिया है, यह खोज समाप्त हो चुकी है. ईश्वर ही वे "कुछ और" हैं। -श्री श्री परमहंस योगानन्द

श्री श्री परमहंस योगानन्दजी के व्याख्यानों का यह संग्रह उन सभी के लिए है जो कभी निराशा, असंतोष, उत्साहहीनता, दुःख, अथवा अतृप्त आध्यात्मिक ललक से सदा परिचित हुए हैं। यह उन के लिए है जिन्होंने जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने का प्रयास किया है, उनके लिए जिनके अपने हृदय के भीतर ईश्वर की वास्तविकता के विषय में एक अनिश्चित आशा बनी है और एक संभावना है कि उन्हें जाना जा सकता है; और यह उन जिज्ञासुओं के लिए है. जो अपनी खोज में पहले ही ईश्वर की ओर मुड़ चुके हैं। यह प्रत्येक पाठक के लिए उसके पथ पर दिव्य प्रकाश की किरण बने, नवजीवन और प्रेरणा तथा दिशा-निर्देशन का भाव लेकर आए। प्रभु सबके लिए सब कुछ हैं।
'मानव की निरन्तर खोज' पुस्तक ईश्वर के विषय में है मानव जीवन में ईश्वर का स्थान उसकी आशाओं में इच्छाशक्ति में, आकांक्षाओं तथा उपलब्धियों में जीवन, मानव, उपलब्धि - ये सब एक सर्वव्यापक सृष्टिकर्ता की अभिव्यक्तियों मात्र हैं, ये अविछिन्न रूप से ईश्वर पर निर्भर हैं, जैसे लहर सागर पर। परमहंसजी समझाते हैं कि ईश्वर द्वारा मानव का सृजन क्यों और कैसे हुआ और यह किस प्रकार ईश्वर का नित्य अंग है और प्रत्येक व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत रूप से इसका क्या अर्थ है। मानव और उसके सृष्टिकर्ता के एकल्च का बोध ही योग का संपूर्ण सार है। जीवन के हर पहलू में ईश्वर की अनिवार्य आवश्यकता का बोध, धर्म से पारलौकिकता को हटा देता है और ईश्वरीय प्राप्ति को, जीवन के व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक पथ के लिए आधार बनाता है।

जिज्ञासुओं ने सर्वप्रथम ईश्वर को कैसे प्राप्त किया?

हम आसानी से समझ सकते हैं कि मानव ने औषधि-विज्ञान के बारे में पहली बार कैसे सोचा। वह शारीरिक पीड़ा से दुःखी हुआ, अतः उसने उपचार करने की विधि खोज निकाली। परन्तु मानव ने ईश्वर के प्रति जानकारी प्राप्त करने का प्रयास कैसे किया? यह प्रश्न गहन चिन्तन के लिए अवसर प्रदान करता है। भारत के वेदों में हम ईश्वर की आरम्भिक सच्ची धारणा को पाते हैं। भारत ने अपने धर्मग्रन्थों में संसार को शाश्वत सत्य दिए हैं जो समय की परीक्षा में खरे उतरे हैं। प्रत्येक भौतिक आविष्कारक भौतिक आवश्यकता से प्रेरित होता है 'आवश्यकता आविष्कार की जननी है। इसी प्रकार आवश्यकता से प्रेरित होकर, भारत के प्राचीन ऋषि प्रबल आध्यात्मिक जिज्ञासु बन गए उन्होंने खोज लिया था कि आन्तरिक सन्तुष्टि के बिना, चाहे कितनी भी बाहरी समृद्धि हो, स्थायी सुख नहीं मिल सकता। तब कोई किस प्रकार अपने को वास्तव में सुखी बना सकता है? यही यह उलझन है जिसे सुलझाने का बीड़ा भारत के ऋषियों ने उठाया।

प्रकृति के तीन रूप

इतिहासपूर्व काल में ईश्वर की पूजा मनुष्य के प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के प्रति भय के कारण आरम्भ हुई। जब अत्यधिक वर्षा हुई तो बाद ने अनेक लोगों की जान ले ली। भयभीत मानव ने दर्षा, आँधी और अन्य प्राकृतिक शक्तियों को देवताओं के रूप में मान लिया। बाद में, मानव ने अनुभव किया कि प्रकृति तीन रूपों में क्रियाशील होती है: सृजनात्मक, पालक और संहारक। सागर से उठती हुई लहर सृजनात्मक अवस्था को दर्शाती है, सागर के सीने पर क्षण भर के लिए ठहरी हुई लहर पालक अवस्था को दर्शाती है, और पुनः सागर में डूबती हुई लहर संहारक अवस्था में से गुज़रती है।
जिस प्रकार जीसस ने बुराई की सर्वव्यापक शक्ति को शैतान के रूप में साकार देखा, उसी प्रकार, महान् ऋषियों ने सृजनात्मक, पालक और संहारक ब्रह्माण्डीय शक्तियों को निश्चित आकारों में देखा। प्राचीन ऋषियों ने सृजन करने वाली शक्ति का नाम ब्रह्मा, पालन करने वाली शक्ति का नाम विष्णु और संहार करने वाली शक्ति का नाम शिव रखा। परमात्मा की सृष्टि के असीम नाटक को प्रकट करने के लिए इन आद्य शक्तियों को उस निराकार ब्रह्म के साकार रूप में प्रकट किया गया, जबकि सम्पूर्ण सृष्टि के परे वे परमात्मा, तीनों की चेतना के पीछे सदा छुपा रहता है। ब्रह्माण्डीय प्रलय के समय में, समस्त सृष्टि और इसकी विशाल सक्रिय शक्तियाँ पुनः परमात्मा में विलीन हो जाती हैं। वहाँ शक्तियाँ तब तक विश्राम करती हैं जब तक कि 'महान् निर्देशक' द्वारा उन्हें अपनी-अपनी भूमिका निभाने के लिए दोबारा नहीं बुलाया जाता।

आत्मा ही आपकी रक्षक है

ये गहन सत्य मात्र क्षणिक प्रेरणा के लिए नहीं है अपितु अपने उच्चतम हित के लिए इनको अपने जीवन में आत्मसात करने और व्यवहार में लाने के लिए है। काश! लोग यह जानते कि उनका अपना भला किसमें है। जो गलत कार्य करते हैं आत्मा उनकी शत्रु है। आत्मा के मित्र बन जाएं और यही आत्मा आपकी रक्षा करेगी। आत्मा के अतिरिक्त आपका और कोई रक्षक नहीं है। अज्ञानता की बेड़ियाँ और बुरी आदतें आपको बन्धन में बांधे रखती हैं। आप गलत आदतों का अनुसरण करने के लिए दृढ निश्चयी हैं इसलिए आप कष्ट भोगते हैं। यदि केवल आप अपने जीवन के विषय में दूरदृष्टि रखें ताकि यह समय यह कीमती समय जो आपको मिला है, निष्फल न बीत जाए। हिन्दुओं की एक कहावत है: बालक क्रीड़ा में व्यस्त है, युवा कामवासना में व्यस्त है और प्रौढ़ चिन्ताओं में व्यस्त है। कितने कम लोग हैं जो ईश्वर के साथ व्यस्त हैं।" इस काल्पनिक आशा को त्याग दें कि सांसारिक उपलब्धियों से सुख प्राप्त होगा। समृद्धि पर्याप्त नहीं है, 'रमणीय जीवन' पर्याप्त नहीं है। आप शाश्वत रूप से सुखी होना चाहते हैं। अपने भीतर विद्यमान ईश्वर को कस कर पकड़े और अनुभव करें कि आत्मा ईश्वर है। अपनी बुद्धि के उच्चत्तम प्रश्न- "मैं कहाँ से आया हूँ" का दृक्ता से उत्तर देने का सामर्थ्य आप में होना चाहिए।
ईश्वर एवं अमरत्व की धारणा काल्पनिक नहीं हैं। इस विश्वास के साथ मर जाना कि आप एक नश्वर मानव हैं आपके अन्दर विद्यमान आत्मा का घोर अपमान है। आप जो ईश्वर की संतान हैं, कब तक स्वयं को मृत्यु रूपी दराँती द्वारा असहाय की भांति कटवाते रहेंगे केवल इसलिए कि अपने जीवन काल में आपने कभी भी माया अर्थात् अज्ञान, पर विजय पाने का प्रयास नहीं किया है?

ईश्वर की असीम शक्ति द्वारा रोग मुक्ति

रोग तीन प्रकार के होते हैं शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शारीरिक रोग विभिन्न प्रकार की विषाक्त दशाओं (toxic conditions), संक्रामक रोग, तथा दुर्घटनाओं के कारण होते हैं। मानसिक अस्वस्थता भय, चिंता, क्रोध तथा अन्य भावनात्मक विकारों के कारण होती है। आत्मा की अस्वस्थता मनुष्य को भगवान के साथ उसके सच्चे सम्बन्ध का ज्ञान न होने के कारण होती है। अज्ञान ही सबसे बड़ा रोग है। जब कोई अज्ञान को हटा देता है तो वह शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक रोगों के सभी कारणों को भी हटा देता है।
मेरे गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वर जी प्रायः कहते थे, “ज्ञान सबसे उत्तम शोधक है।" विभिन्न प्रकार की पीड़ा को भौतिक उपचार की विधियों की सीमित शक्ति से हटाने का प्रयास प्रायः निराशाजनक होता है। केवल आध्यात्मिक विधियों की असीम शक्ति में ही व्यक्ति तन, मन एवं आत्मा की 'अस्वस्थता' का स्थायी उपचार पा सकता है। उस असीम आरोग्यकर शक्ति को ईश्वर में खोजने का यत्न करना होगा। यदि आपने अपने प्रियजनों की मृत्यु पर मानसिक दुःख उठाया है तो आप उन्हें ईश्वर में फिर से पा सकते हैं। भगवान की सहायता से सब कुछ संभव है।

जब तक कोई भगवान को वास्तव में न जान ले तब तक उसका यह कहना ठीक नहीं है कि केवल मन का ही अस्तित्व है, इसलिए उसे स्वास्थ्य नियमों का पालन करने की या रोग निवारण के लिए किन्हीं भौतिक साधनों की सहायता लेने की आवश्यकता नहीं है। जब तक सच्चा साक्षात्कार प्राप्त न हो जाए. मनुष्य को प्रत्येक कार्य में सामान्य बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए। साथ ही ईश्वर पर कभी संदेह नहीं करना चाहिए, बल्कि ईश्वर की व्यापक दिव्य शक्ति में अपने विश्वास को निरन्तर मन ही मन में दृढ करते रहना चाहिए।
डॉक्टर रोग के कारणों को खोजकर उन्हें दूर करने का प्रयास करते हैं। ताकि वे रोग फिर से न हों। चिकित्सा की अनेक विशेष भौतिक पद्धतियों के प्रयोग में डॉक्टर प्रायः बहुत निपुण होते हैं। तथापि प्रत्येक रोग औषधि और शल्य चिकित्सा से ठीक नहीं होता, और इसी तथ्य में निहित है इन पद्धतियों की मूलभूत सीमा।

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