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मैं कौन हूँ | Main Kaun Hoon Book PDF Download Free in Hindi by Swami Vivekanand

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥मैं कौन हूँ PDF | Main Kaun Hoon
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 4.6 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖103
Last UpdatedAugust 15, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category, , ,
 

पुस्तक का कुछ अंश

अपनी बात
स्वामी विवेकानंद ने भारत में उस समय अवतार लिया जब यहाँ हिंदू धर्म के अस्तित्व पर संकट के बादल मँडरा रहे थे। पंडित-पुरोहितों ने हिंदू धर्म को घोर आंडबरवादी और अंधविश्वासपूर्ण बना दिया था। ऐसे में स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म को एक पूर्ण पहचान प्रदान की। इसके पहले हिंदू धर्म विभिन्न छोटे-छोटे संप्रदायों में बँटा हुआ था। तीस वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो, अमेरिका में विश्व धर्म संसद में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और इसे सार्वभौमिक पहचान दिलवाई।
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था, “यदि आप भारत को जानना चाहते हैं, तो विवेकानंद को पढि़ए। उनमें आप सबकुछ सकारात्मक ही पाएँगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।’’
रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था, “उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है। वे जहाँ भी गए, सर्वप्रथम हुए...हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे तथा सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख, ठिठककर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा, “शिव! यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।’’
39 वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानंद जो काम कर गए, वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढि़यों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
वे केवल संत ही नही थे, एक महान देशभक्त, प्रखर वक्ता, ओजस्वी विचारक, रचनाधर्मी लेखक और करुण मावनप्रेमी भी थे। अमेरिका से लौटकर उन्होंने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था, “नया भारत निकल पड़े मोदी की दुकान से, भड़भूजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से; निकल पड़े झाडि़यों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।’’
और जनता ने स्वामीजी की पुकार का उत्तर दिया। वह गर्व के साथ निकल पड़ी। गांधीजी को आजादी की लड़ाई में जो जन-समर्थन मिला, वह विवेकानंद के आह्वान का ही फल था। इस प्रकार वे भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा-स्रोत बने।
उनका विश्वास था कि पवित्र भारत वर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहाँ बड़े-बड़े महात्माओं तथा ऋषियों का जन्म हुआ, यही संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यही - केवल यही आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है।
उनके कथन - “उठो, जागो, स्वयं जगकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक रुको नहीं, जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।’’ - पर अमल करके व्यक्ति अपना ही नहीं, सार्वभौमिक कल्याण कर सकता है। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
प्रस्तुत पुस्तक ‘मैं कौन हूँ’ में स्वामीजी ने सरल शब्दों में एक आम आदमी के उन सवालों के जवाब दिए हैं, उन जिज्ञासाओं को शांत करने का प्रयास किया है जिनमें वह अकसर उलझ कर रह जाता है - कि आखिर वह है कौन? ये आत्मा-परमात्मा कौन हैं? स्वयं को कैसे जाना जा सकता है? उसके जीवन का उद्देश्य क्या है? धर्म का जीवन में क्या महत्त्व है? जीवन की सार्थकता क्या है? ऐसे ही अनेक सवालों और जिज्ञासाओं की प्रतिपूर्ति करने वाली एक प्रेरक और ज्ञानवर्द्धक पुस्तक।
1.
मनुष्य : श्रेष्ठतम जीव
ब प्रकार के शरीरों में मानव-शरीर ही श्रेष्ठतम है, मनुष्य ही श्रेष्ठतम जीव है। मनुष्य सब प्रकार के प्राणियों से - यहाँ तक कि देवादि से भी श्रेष्ठ है। मुनष्य से श्रेष्ठतर कोई और नहीं। देवताओं को भी ज्ञानलाभ के लिए मनुष्य देह धारण करनी पड़ती है। एकमात्र मनुष्य ही ज्ञानलाभ का अधिकारी है, यहाँ तक कि देवता भी नहीं। यहूदी और मुसलमानों के मतानुसार, ईदेवताश्वर ने देवदूत और अन्य समुदय सृष्टियों के बाद मनुष्य की सृष्टि की। और मनुष्य के सृजन के बाद ईश्वर ने देवदूतों से मनुष्य को प्रणाम और अभिनंदन कर आने के लिए कहाँ इबलीस को छोड़कर बाकी सबने ऐसा किया। अतएव ईश्वर ने इबलीस को अभिशाप दे दिया। इससे वह शैतान बन गया। इस रूपक के पीछे यह महान सत्य निहित है कि संसार में मनुष्य जन्म ही अन्य सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ है।
आश्चर्य की बात है कि सभी धर्म एक स्वर से घोषणा करते हैं कि मनुष्य पहले निष्पाप और पवित्र था, पर आज उसकी अवनति हो गयी है। इस भाव को फिर वे रूपक की भाषा में या दर्शन की स्पष्ट भाषा में अथवा कविता की सुंदर भाषा में क्यों न प्रकाशित करें, पर वे सब के सब अवश्य इस एक तत्त्व की घोषणा करते हैं।
अतएव मनुष्य का प्रकृत स्वरूप एक ही है, वह अनंत और सर्वव्यापी है, और यह प्रातिभासिक जीव मनुष्य के इस वास्तविक स्वरूप का एक सीमाबद्ध भाव मात्र है। इसी अर्थ में पूर्वोक्त पौराणिक तत्त्व भी सत्य हो सकते हैं कि प्रातिभासिक जीव, चाहे वह कितना भी महान क्यों न हो, मनुष्य के इस अतींद्रिय प्रकृत स्वरूप का धुँधला प्रतिबिंब मात्र है। अतएव मनुष्य का प्रकृत स्वरूप - आत्मा - कार्य-कारण से अतीत होने के कारण, देश-काल से अतीत होने के कारण, अवश्य मुक्तस्वभाव है। वह कभी बद्ध नहीं थी, न ही बद्ध हो सकती थी। यह प्रातिभासिक जीव, यह प्रतिबिंब, देश काल-निमित्त के द्वारा सीमाबद्ध होने के कारण बद्ध है। अथवा हमारे कुछ दार्शनिकों की भाषा में, ‘प्रतीत होता है, मानो वह बद्ध हो गयी है, पर वास्तव में वह बद्ध नहीं है।’
संपूर्ण शास्त्र एवं विज्ञान मनुष्य के रूप में प्रकट होने वाली इस आत्मा की महिमा की कल्पना भी नहीं कर सकते। यह समस्त ईश्वरों मे श्रेष्ठ है, एकमात्र वही ईश्वर है, जिसकी सत्ता सदैव थी, सदैव है और सदैव रहेगी।
आदमी भ्रमवश अपने से बाहर विभिन्न देवताओं की तलाश में रहता है, पर जब उसके अज्ञान का चक्कर समाप्त होता है, तो वह पुनः लौटकर अपनी आत्मा पर आ टिकता है। जिस ईश्वर की खोज में वह दर-दर भटकता रहा, वन-प्रांतर तथा मंदिर-मसजिद को छानता रहा, जिसे वह स्वर्ग मैं बैठकर संसार पर शासन करनेवाला मानता रहा, वह कोई अन्य नहीं, बल्कि उसकी अपनी ही आत्मा है। वह मैं है, और मैं वह (जो आत्मा हूँ) ब्रहा हूँ, मेरे इस तुच्छ ‘मैं‘ का कभी अस्तित्व नहीं रहा।
ईश्वरोपासना करने के लिए प्रतिमा आवश्यक है, तो उससे कहीं श्रेष्ठ मानव-प्रतिमा मौजूद ही है। यदि ईश्वरोपासना के लिए मंदिर निर्माण करना चाहते हो, तो करो, किंतु सोच लो कि उससे भी उच्चतर, उससे भी महान् मानव देह रूपी मंदिर तो पहले से ही मौजूद है।
जीवित ईश्वर तुम लोगों के भीतर रहते हैं, तब भी तुम मंदिर गिरजाघर आदि बनाते हो और सब प्रकार की काल्पनिक झूठी चीजों में विश्वास करते हो। मनुष्य-देह में स्थित मानव-आत्मा ही एकमात्र उपास्य ईश्वर है। पशु भी भगवान के मंदिर हैं, किंतु मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ मंदिर है। यदि मैं उसकी उपासना नहीं कर सका, तो अन्य किसी भी मंदिर में कुछ भी उपकार नहीं होगा। जिस क्षण मैं प्रत्येक मनुष्य देह रूपी मंदिर में उपविष्ट ईश्वर की उपलब्धि कर सकूँगा, जिस क्षण मैं प्रत्येक मनुष्य के सम्मुख भक्तिभाव से खड़ा हो सकूँगा और वास्तव में उनमें ईश्वर देख सकूँगा, जिस क्षण मेरे अंदर यह भाव आ जाएगा, उसी क्षण मैं संपूर्ण बंधनों से मुक्त हो जाऊँगा - बाँधनेवाले पदार्थ हट जाएँगे और मैं मुक्त हो जाऊँगा। यह आदर्श अवस्था वह है, जिसमें मनुष्य का अहंभाव पूर्णतया नष्ट हो जाता है, उसका स्वत्व-भाव लुप्त हो जाता है, जब उसके लिए ऐसी कोई वस्तु नहीं रह जाती, जिसे वह ‘मैं‘ और ‘मेरी’ कह सके, जब वह पूर्णतया आत्म-विसर्जन कर देता है, मानो अपनी आहुति दे देता है। इस प्रकार अवस्थापन्न व्यक्ति के अंतर में स्वयं ईश्वर निवास करता है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति की अहं-वासना पूर्ण रूप से नष्ट हो गयी है, एकदम निर्मूल हो गयी है। यह है आदर्श व्यक्ति।
जिस परिमाण में मनुष्य इंद्रिय-परायणता को छोड़कर उच्च भाव-जगत् में अवस्थान करने का सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है, जिस परिमाण में वह विशुद्ध चिंतन रूपी प्राणवायु फेफड़ों के भीतर खींचने में समर्थ हो जाता है तथा जितने अधिक समय तक वह उस उच्च अवस्था में रह सकता है, केवल इसी आधार पर उसका विकास आँका जा सकता है।
पहले हमें ईश्वर बन लेने दो। त्तपश्चात् दूसरों को ईश्वर बनाने में सहायता देंगे। बनो और बनाओ, यही हमारा मूल-मंत्र रहे।
ऐसा न कहो कि मनुष्य पापी है। उसे यह बताओ कि तू ब्रह्म है। यदि कोई शैतान हो, तो भी हमारा कर्तव्य यही है कि हम ब्रह्म का ही स्मरण करें, शैतान का नहीं।
जब तुम अपने आपको शरीर समझते हो, तुम विश्व से अलग हो; जब तुम अपने आपको जीव समझते हो, तब तुम अनंत अग्नि के एक स्फुलिंग हो; जब तुम अपने आपको आत्मस्वरूप मानते हो, तभी तुम विश्व हो।
चालाकी से कोई बड़ा काम पूरा नहीं हो सकता। प्रेम, सत्यानुराग और महान् वीर्य की सहायता से सभी कार्य होते हैं। त्त् कुरु पौरुषम, इसलिए पुरुषार्थ को प्रकट करो।
हम नियम नहीं चाहते, हम चाहते हैं नियम को तोड़ने का सामर्थ्य। हम नियमों से बाहर चले जाना चाहते हैं। यदि तुम नियमों से बँधे हो, तो मिट्टी के ढेले की भाँति निर्जीव हो। प्रश्न यह नहीं है कि तुम नियमातीत हो या नहीं; किंतु यह धारणा कि हम नियमातीत हैं, समस्त मानव इतिहास की आधारशिला है।
प्रत्येक मनुष्य पहले से ही अनंत है, केवल इन सब विभिन्न अवस्था-चक्ररूपी द्वारों या प्रतिबंधों ने उसे बद्ध कर रखा है। इन प्रतिबंधों को हटाने मात्र से ही उसकी वह अनंत शक्ति बड़े वेग के साथ अभिव्यक्त होने लगती है।
योगी कहते हैं कि योगी के अतिरिक्त अन्य सब मानो गुलाम हैं - खाने-पीने के गुलाम, अपनी स्त्री के गुलाम, अपने लड़के-बच्चों के गुलाम, रुपये-पैसे के गुलाम, स्वदेशवासियों के गुलाम, नाम-यश के गुलाम, जलवायु के गुलाम, इस संसार के हजारों विषयों के गुलाम! जो मनुष्य इन बंधनों में से किसी में भी नहीं फँसे, वे ही यथार्थ मनुष्य हैं - यथार्थ योगी हैं।
प्रत्येक मनुष्य के लिए उसके अपने वर्तमान उन्नति-क्षेत्र के भीतर स्वयं को उन्नत बनाने के लिए अवसर विद्यमान है। हम अपना नाश नहीं कर सकते, हम अपने भीतर की जीवनी शक्ति को नष्ट या दुर्बल नहीं कर सकते, परंतु उस शक्ति को विभिन्न दिशा में परिचालित करने के लिए हम स्वतंत्र हैं।
व्यावहारिक और शरीर से सबल होने की शिक्षा देनी चाहिए। ऐसे केवल बारह नर-केसरी संसार पर विजय प्राप्त कर सकते हैं; परंतु लाख-लाख भेड़ों द्वारा यह नहीं होने का। और दूसरे, किसी व्यक्तिगत आदर्श के अनुकरण की शिक्षा नहीं देनी चाहिए, चाहे वह आदर्श कितना ही बड़ा क्यों न हो।
मनुष्य एक छोटे बक्से में कुंडलित अनंत स्प्रिंग जैसा है, जोकि अपने को खोलने का प्रयत्न कर रहा है। हम लोग जो भी सामाजिक व्यवस्था देखते हैं, वह इस अभिव्यक्ति का प्रयत्न मात्र है।
आप तो ईश्वर की आन हैं, अमर आनंद के भागी हैं, पवित्र और पूर्ण आत्मा हैं। आप इस मर्त्यभूमि पर देवता हैं। आप भला पापी? मनुष्य को पापी कहना ही पाप है, वह मानवस्वरूप पर घोर लांछन है। आप उठें! हे सिंहो! आयें, और इस मिथ्या भ्रम को झटककर दूर फेंक दें कि आप भेड़ हैं।
हम सभी एक जीवाणु-कोष से उत्पन्न हुए हैं और हम लोगों में जो कुछ भी शक्ति है, वह उसी में कुंडलीय-रूप में बैठी थी। तुम लोग यह नहीं कह सकते कि वह खाद्य में से आयी है; ढेर-की-ढेर खाद्य-सामग्री लेकर एक पर्वत बना डालो, किंतु देखोगे उसमें से कोई शक्ति नहीं निकलती। हम लोगों के भीतर शक्ति पहले से ही अव्यक्त भाव में निहित थी, और वह थी अवश्य। इसी प्रकार मनुष्य की आत्मा के भीतर अनंत शक्ति भरी पड़ी है, मनुष्य को उसका ज्ञान हो या न हो। उसे केवल जानने की ही अपेक्षा है। धीरे धीरे मानो वह अनंत शक्तिमान दैत्य जाग्रत होकर अपनी शक्ति का ज्ञान प्राप्त कर रहा है और जैसे-जैसे वह सचेतन होता जाता है, वैसे-वैसे एक के बाद एक उसके बंधन टूटते जाते हैं, श्रृंखलाएँ छिन्न-भिन्न होती जाती हैं; और वह दिन अवश्य ही आएगा, जब वह अपनी अनंत शक्ति के पूर्ण ज्ञान के साथ अपने पैरों पर उठ खड़ा होगा। आओ, हम सब लोग उस महिमामयी निष्पत्ति को शीघ्र लाने में सहायता करें।
2.
आत्मतत्त्व : आत्मा
तुममें से बहुतों ने मैक्समूलर की सुप्रसिद्ध पुस्तक - ‘वेदांत दर्शन पर तीन व्याख्यान’ को पढ़ा होगा, और शायद कुछ लोगों ने इसी विषय पर प्रोफेसर डायसन की जर्मन भाषा में लिखित पुस्तक भी पढ़ी हो। ऐसा लगता है कि पाश्चात्य देशों में भारतीय धार्मिक चिंतन के बारे में जो कुछ लिखा या पढ़ाया जा रहा है, उसमें भारतीय दर्शन की अद्वैतवाद नामक शाखा प्रमुख स्थान रखती है। यह भारतीय धर्म का अद्वैतवाद वाला पक्ष है, और कभी-कभी ऐसा भी सोचा जाता है कि वेदों की सारी शिक्षाएँ इस दर्शन में सन्निहित हैं। खैर, भारतीय चिंतन-धारा के बहुत सारे पक्ष हैं; और यह अद्वैतवाद तो अन्य वादों की तुलना में सबसे कम लोगों द्वारा माना जाता है। अत्यंत प्राचीन काल से ही भारत मे अनेकानेक चिंतन-धाराओं की परंपरा रही है, और चूँकि शाखाविशेष के अनुयायिओं द्वारा अंगीकार किये जाने वाले मतों को निर्धारित करने वाला कोई सुसंघटित या स्वीकृत धर्मसंघ अथवा कतिपय व्यक्तियों के समूह वहाँ कभी नहें रहे, इसलिए लोगों को सदा से ही अपने मन के अनुरूप धर्म चुनने अपने दर्शन को चलाने तथा अपने संप्रदायों को स्थापित करने की स्वतंत्रता रही। फलस्वरूप हम पाते हैं कि चिरकाल से ही भारत में मतमतांतरों की बहुतायत रही है। आज भी हम कह नहीं सकते कि कितने सौ धर्म वहाँ फल रहे हैं और कितने नये धर्म हर साल उत्पन्न होते हैं। ऐसा लगता है कि उस राष्ट्र की धार्मिक उर्वरता असीम है।
भारत में प्रचलित इन विभिन्न मतों को मोटे तौर पर दो भागों में विभक्त किया जा सकता है, आस्तिक और नास्तिक। जो मत हिंदू धर्मग्रंथों अर्थात् वेदों को सत्य की शाश्वत निधि श्रुति मानते हैं, उन्हें आस्तिक कहते हैं, और जो वेदों को न मानकर अन्य प्रमाणों पर आधारित हैं, उन्हें भारत में नास्तिक कहते हैं। आधुनिक नास्तिक हिंदू मतों में दो प्रमुख हैं : बौद्ध और जैन। आस्तिक मतावलंबी कोई-कोई कहते हैं कि शास्त्र हमारी बुद्धि से अधिक प्रमाणिक हैं, जबकि दूसरे मानते हैं कि शास्त्रों के केवल बुद्धिसम्मत अंश को ही स्वीकार करना चाहिए, शेष को छोड़ देना चाहिए।
आस्तिक मतों के भी फिर तीन शाखाएँ हैं : सांख्य, न्याय और मीमांसा। इनमें से पहली दो शाखाएँ किसी संप्रदाय की स्थापना करने में सफल न हो सकीं, यद्यपि दर्शन के रूप में उनका अस्तित्व अभी भी है। एकमात्र संप्रदाय जो अभी भारत में प्रायः सर्वत्र प्रचलित है, वह है उत्तरमीमांसा अथवा वेदांत। इस दर्शन को ‘वेदांत‘ कहते हैं। भारतीय दर्शन की समस्त शाखाएँ वेदांत, यानी उपनिषदों से ही निकली हैं, किंतु अद्वैतवादियों ने यह नाम खासकर अपने लिए रख लिया, क्योंकि वे अपने संपूर्ण धर्म-ज्ञान तथा दर्शन को एकमात्र वेदांत पर ही आधारित करना चाहते थे। आगे चलकर वेदांत ने प्राधान्य प्राप्त किया और, भारत में अब जो अनेकानेक संप्रदाय हैं, वे किसी-न-किसी रूप में उसी की शाखाएँ हैं। फिर भी ये विभिन्न शाखाएँ अपने विचारों में एकमत नहीं हैं।
हम देखते हैं कि वेदांतियों के तीन प्रमुख भेद हैं। पर एक विषय पर सभी सहमत हैं। वह यह कि ईश्वर के अस्तित्व में सभी विश्वास करते हैं। सभी वेदांती यह भी मानते हैं कि वेद शाश्वत आप्तवाक्य हैं, यद्यपि उनका ऐसा मानना उस तरह का नहीं, जिस तरह ईसाई अथवा मुसलमान लोग अपने-अपने धर्मग्रंथों के बारे में मानते हैं। वे अपने ढंग से ऐसा मानते हैं। उनका कहना है कि वेदों में ईश्वरसंबंधी ज्ञान सन्निहित है और चूँकि ईश्वर चिरंतन है, अतः उसका ज्ञान भी शाश्वत रूप से उसके साथ है। अतः वेद भी शाश्वत है। दूसरी बात जो सभी वेदांती मानते हैं, वह है सृष्टिसंबंधी चक्रीय सिद्धांत। सब यह मानते हैं कि सृष्टि चक्रों या कल्पों में होती है। संपूर्ण सृष्टि का आगम और विलय होता है। आरंभ होने के बाद सृष्टि क्रमशः स्थूलतर रूप लेती जाती है, और एक अपरिमेय अवधि के पश्चात् पुनः सूक्ष्मतर रूप में बदलना शुरू करती है तथा अंत में विघटित होकर विलीन हो जाती है। इसके बाद विराम का समय आता है। सृष्टि का फिर उद्भव होता है और फिर इसी क्रम की आवृत्ति होती है। ये लोग दो तत्त्वों को स्वतः प्रमाणित मानते हैं : एक को ‘आकाश’ कहते हैं, जो वैज्ञानिकों के ‘ईश्वर’ से मिलता-जुलता है और दूसरे को ‘प्राण’ कहते हैं, जो एक प्रकार की शक्ति है। ‘प्राण’ के विषय में इनका कहना है कि इसके कंपन से विश्व की उत्पत्ति होती है। जब सृष्टि-चक्र का विराम होता है, तो व्यक्त प्रकृति क्रमशः सूक्ष्मतर होते-होते आकाश तत्त्व के रूप में विघटित हो जाती है, जिसे हम न देख सकते हैं और न अनुभव ही कर सकते हैं; किंतु इसी से पुनः समस्त वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं।
प्रकृति में हम जितनी शक्तियों देखते हैं, जैसे, गुरुत्वाकर्षण, आकर्षण, विकर्षण अथवा विचार, भावना एवं स्नायविक गति - सभी अंत्तोगत्वा विघटित होकर प्राण में परिवर्तित हो जाती हैं और प्राण का स्पंदन रुक जाता है। इस स्थिति में वह तब तक रहता है, जब तक सृष्टि का कार्य पुनः प्रारंभ नहें हो जाता। उसके प्रारंभ होते ही ‘प्राण’ में पुनः कंपन होने लगते हैं। इस कंपन का प्रभाव ‘आकाश’ पर पड़ता है और तब सभी रूप और आकार एक निश्चित क्रम में बाहर प्रक्षिप्त होते हैं।
सबसे पहले जिस दर्शन की चर्चा मैं तुमसे कहूँगा, वह द्वैतवाद के नाम से प्रसिद्ध है। द्वैतवादी यह मानते हैं कि विश्व का स्रष्टा और शासक ईश्वर शाश्वत रूप से प्रकृति एवं जीवात्मा से पृथक है। ईश्वर नित्य है, प्रकृति नित्य है तथा सभी आत्माएँ भी नित्य हैं। प्रकृति तथा आत्माओं की अभिव्यक्ति होती है एवं उनमें परिवर्तन होते हैं परंतु ईश्वर ज्यों-का-त्यों रहता है। द्वैतवादियों के अनुसार ईश्वर सगुण है; उसके शरीर नहीं है, पर उसमें गुण हैं। मानवीय गुण उसमें विद्यमान हैं; जैसे वह दयावान है, वह न्यायी है, वह सर्वशक्तिमान है, वह बलवान है, उसके पास पहुँचा जा सकता है, उसकी प्रार्थना की जा सकती है, उसकी भक्ति की जा सकती है, भक्ति से वह प्रसन्न होता है, आदि।
संक्षेप में वह मानवीय ईश्वर है, अंतर इतना है कि वह मनुष्य से अनंत गुना बड़ा है, तथा मनुष्य में जो दोष है, वह उनसे परे है। ‘वह अनंत शुभ गुणों का भंडार है’ - ईश्वर की यही परिभाषा लोगों ने दी है। वह उपादानों के बिना सृष्टि नहीं कर सकता। प्रकृति ही वह उपादान है, जिससे वह समस्त विश्व की रचना करता है। कुछ वेदांतेतर द्वैतवादी जिन्हें ‘परमाणुवादी’ कहते हैं, यह मानते हैं कि प्रकृति असंख्य परमाणुओं के सिवा और कुछ नहीं है और ईश्वर की इच्छा-शक्ति इन परमाणुओं में सक्रिय होकर सृष्टि करती है, वेदांती लोग इस परमाणु सिद्धांत को नहीं मानते। उनका कहना है कि यह नितांत तर्कहीन है। अविभाज्य परमाणु रेखागणित के बिंदुओं की तरह हैं, खंड और परमाणुरहित। किंतु ऐसी खंड और परमाणुरहित वस्तु को अगर असंख्य बार गुणित किया जाए, तो भी वह ज्यों-की-त्यों रहेगी। फिर कोई वस्तु, जिसके अवयव नहीं, ऐसी वस्तु का निर्माण नहीं कर सकती, जिसके विभिन्न अवयव हों। चाहे जितने भी शून्य इकट्ठे किये जाएँ, उनसे कोई पूर्ण संख्या नहीं बन सकती। इसलिए अगर ये परमाणु अविभाज्य हैं तथा परिमाणरहित हैं, तो इनसे विश्व की सृष्टि सर्वथा असंभव है। अतएव वेदांती द्वैतवादी अविश्लिष्ट एवं अविभेद्य प्रकृति में विश्वास करते हैं, जिससे ईश्वर सृष्टि की रचना करता है।
भारत में अधिकांश लोग द्वैतवादी हैं, मानवप्रकृति सामान्यतः इससे अधिक उच्च कल्पना नहीं कर सकती। हम देखते हैं कि संसार में धर्म में विश्वास रखनेवालों में नब्बे प्रतिशत लोग द्वैतवादी ही हैं। यूरोप तथा एशिया के सभी धर्म द्वैतवादी हैं, वैसा होने के लिए विवश हैं। कारण, सामान्य मनुष्य उस वस्तु की कल्पना नहीं कर सकता, जो मूर्त न हो। इसलिए स्वभावतः वह वस्तु से चिपकना चाहता है, जो उसकी बुद्धि की पकड़ में आती है। तात्पर्य यह कि वह उच्च आध्यात्मिक भावनाओं को तभी समझ सकता है, जब वे उसके स्तर पर नीचे उतर आयें। वह सूक्ष्म भावों को स्थूल रूप में ही ग्रहण कर सकता है। संपूर्ण विश्व में सामान्य लोगों के लिए यही धर्म है। वे एक ऐसे ईश्वर में विश्वास करते हैं, जो उनसे पूर्णतया पृथक, मानो एक बड़ा राजा, अत्यंत बलिष्ठ सम्राट् हो। साथ ही वे उसे पृथ्वी पर के राजाओं की अपेक्षा अधिक पवित्र बना देते हैं। वे उसे समस्त दुर्गुणों से रहित और समस्त सद्गुणों का आधार बना देते हैं। जैसे कहीं अशुभ के बिना शुभ और अंधकार के बिना प्रकाश संभव हो। सभी द्वैतवादी सिद्धांतों के साथ एक कठिनाई यह है कि असंख्य सद्गुणों के भंडार, न्यायी तथा दयालु ईश्वर के राज्य में इतने कष्ट कैसे हो सकते हैं? यह प्रश्न ही द्वैतवादी धर्म के समक्ष है, पर हिंदुओं ने कभी भी इसे सुलझाने के लिए शैतान की कल्पना नहीं की। हिंदुओं ने एकमत से स्वयं मनुष्य को ही दोषी माना है, और उनके लिए ऐसा मानना आसान भी था। क्यों? इसलिए कि, जैसा मैंने तुमसे अभी कहा, वे मानते हैं कि आत्मा की सृष्टि शून्य से नहीं हुई हे। इस जीवन में हम देखते हैं कि हम अपने भविष्य का निर्माण करते हैं, हममें से प्रत्येक हर रोज आने वाले कल के निर्माण में लगा रहता है। आज हम कल के भाग्य को निश्चित करते हैं, और इसी तरह यह क्रम चलता रहता है। इसलिए इस तर्क को हम यदि पीछे की ओर ले चलें, तो भी यह पूर्णतः युक्तिसंगत होगा।
अगर हम अपने ही कर्मो से भविष्य को निश्चित करते हैं, तो यही तर्क हम अतीत के लिए भी क्यों न लागू करें? अगर किसी अनंत शृंखला की कुछ कडि़यों की पुनरावृत्ति होते हम बारंबार देखें, तो कडि़यों के इन समूहों के आधार पर हम समूची शृंखला की भी व्याख्या कर सकते हैं। इसी तरह इस अनंत काल के कुछ भाग को लेकर अगर हम उसकी व्याख्या कर सकें और समझ सकें, तो यही व्याख्या समय की समूची अनंत शृंखला के लिए भी सत्य होगी; यदि प्रकृति में एकरूपता हो, तो काल की संपूर्ण शृंखला पर यही व्याख्या लागू होंगी। अगर यह सत्य है कि इस छोटी सी अवधि में हम अपने भविष्य का निर्माण करते हैं, और अगर यह सत्य है कि हर कार्य के लिए कारण अपेक्षित है, तो यह भी सत्य है कि हमारा वर्तमान हमारे संपूर्ण अतीत के लिए मनुष्य ही उत्तरदायी है, और कोई नहीं। यहाँ जो कुछ भी अशुभ दीखता है, उसके कारण तो हम ही हैं। हम लोग ही सारे पापों की जड़ हैं। और जिस तरह हम यह देखते हैं कि पापों का परिणाम दुःखद होता है, उसी तरह यह भी अनुमान किया जा सकता है कि आज जितने कष्ट देखने को मिलते हैं, उन सब के मूल में वे पाप हैं, जिन्हें मनुष्य ने अतीत में किया है। इसलिए इस सिद्धांत के अनुसार मनुष्य ही उत्तरदायी है; ईश्वर पर दोष नहीं लगाया जा सकता। वह, जो चिरंतन परम दयालु पिता है, कैसे दोषी माना जा सकता है? ‘हम जो बोते हैं, वही काटते हैं।’
द्वैतवादियों का एक दूसरा विचित्र सिद्धांत यह है कि सभी आत्माएँ कभी-न-कभी मोक्ष को प्राप्त कर ही लेंगी; कोई भी छूटेगी नहीं। नाना प्रकार के उत्थान-पतन तथा सुख-दुःख के भोग के ऊपरांत अंत में ये सभी आत्माएँ मुक्त हो जायेंगी। आखिर मुक्त किससे होंगी? सभी हिंदू संप्रदायों का मत है कि इस संसार से मुक्त हो जाना है। न तो यह संसार, जिसे हम देखने तथा अनुभव करते हैं, और न वह जो काल्पनिक है, अच्छा, और वास्तविक हो सकता है, क्योंकि दोनों ही शुभ और अशुभ से भरे पड़े हैं। द्वैतवादियों के अनुसार इस संसार से परे एक ऐसा स्थान है, जहाँ केवल सुख और केवल शुभ ही है; जब हम उस स्थान पर पहुँच जाते हैं, तो जन्म-मरण के पाश से मुक्त हो जाते हैं। कहना न होगा कि यह कल्पना उन्हें कितनी प्रिय है। वहाँ न तो कोई व्याधि होगी और न मृत्यु; वहाँ शाश्वत सुख होगा और सदा ईश्वर के समक्ष रहते हुए परमानंद का अनुभव करते रहेंगे। उनका विश्वास है कि सभी प्राणी - कीट से लेकर देवदूत और देवता तक - कभी-न-कभी उस लोक में पहुँचेंगे ही, जहाँ दुःख का लेश भी नहीं होगा। किंतु अपने इस जगत् का अंत नहीं होगा; तरंग की भाँति यह सतत चलता रहेगा। निरंतर परिवर्तित होते रहने के बावजूद, इसका कभी अंत नहीं होता।
मोक्ष प्राप्त करने वाली आत्माओं की संख्या अपरिमित है। उनमें से कुछ तो पौधों में हैं, कुछ पशुओं में, कुछ मनुष्यों में तथा कुछ देवताओं में हैं। पर सब-के-सब - उच्चतम देवता भी - अपूर्ण हैं, बंधन में हैं। यह बंधन क्या है? जन्म और मरण की अपरिहार्यता। उच्चतम देवों को भी मरना पड़ता है। देवता क्या हैं? वे विशिष्ट अवस्थाओं या पदों के प्रतीक हैं। उदाहरणस्वरूप, इंद्र जो देवताओं के राजा हैं, एक पद विशेष के प्रतीक हैं। कोई अत्यंत उच्च आत्मा इस कल्प से उस पद पर विराजमान हैं। इस कल्प के बाद पुनः मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर अवतरित होगी और इस कल्प में जो दूसरी उच्चतम आत्मा होगी, वह उस पद पर जाकर आसीन होगी। ठीक यही बात अन्य सभी देवताओं के बारे में भी है। वे विशिष्ट पदों के प्रतीक हैं, जिन पर एक के बाद एक, करोड़ों आत्माओं ने काम किया है और वहाँ से उतरकर मनुष्य का जन्म लिया है। जो मनुष्य कल की आकांक्षा से इस लोक में परोपकार तथा अच्छे काम करते हैं और स्वयं अथवा यशप्राप्ति की आशा करते हैं; वे मरने पर देवता बनकर अपने किये का फल भोगते हैं। याद रहे कि यह मोक्ष नहीं है। मोक्ष, फल की आशा रखने से नहीं मिलता। मनुष्य जिस किसी भी चीज की आकांक्षा करता है; ईश्वर उसे वह देता है। आदमी शक्ति चाहता है, पद चाहता है, देवताओं की भाँति सुख चाहता है; उसकी इच्छाएँ तो पूरी हो जाती हैं, पर उसके कर्म का कोई शाश्वत फल नहीं होता। एक निश्चित अवधि के बाद उनके पुण्य का प्रभाव समाप्त हो जाता है - चाहे वह अवधि कितनी ही लंबी क्यों न हो। उसके समाप्त होने पर उसका प्रभाव समाप्त हो जाएगा और तब वे देवता पुनः मनुष्य हो जाएँगे और उन्हें मोक्ष-प्राप्ति का दूसरा अवसर मिलेगा। निम्न कोटि के पशु क्रमशः मनुष्यत्व की ओर बढेंगे, फिर देवत्व की ओर, और तब शायद पुनः मनुष्य बनेंगे अथवा पशु हो जाएँगे। यह क्रम तब तक चलता रहेगा, जब तक वे वासना से रहित नहीं हो जाते, जीवन की तृष्णा को छोड़ नहीं देते और ‘मैं और मेरा’ के मोह से मुक्त नहीं हो जाते। यह ‘मैं और मेरा’ ही संसार में सारे पापों का मूल है। अगर तुम किसी द्वैतवादी से पूछो कि क्या तुम्हारा बच्चा तुम्हारा है? तो फौरन वह कहेगा - “यह तो ईश्वर का है; मेरी संपत्ति मेरी नहीं, बल्कि ईश्वर की है।’’ सबकुछ ईश्वर का है - ऐसा ही मानना चाहिए।
भारत में ये द्वैतवादी पक्के निरामिष तथा अहिंसावादी हैं। किंतु उनके ये विचार बौद्ध लोगों के विचारों से भिन्न हैं। अगर तुम किसी बौद्ध धर्मावलंबी से पूछो - “आप क्यों अहिंसा का उपदेश देते हैं?’’ - तो वह उत्तर देगा - “हमें किसी के प्राण लेने का अधिकार नहीं है।’’ किंतु अगर तुम किसी द्वैतवादी से पूछो - “आप जीव-हिंसा क्यों नहीं करते?’’ तो वह कहेगा, “क्योंकि सभी जीव तो ईश्वर के हैं।’’ इस तरह द्वैतवादी मानते हैं कि ‘मैं और मेरा’ का प्रयोग केवल ईश्वर के संबंध में ही करना चाहिए। ‘मैं’ का संबोधन केवल वही कर सकता है, और सारी चीजें भी उसी की हैं। जब मनुष्य इस स्तर पर पहुँच जाए कि ‘मैं और मेरा’ का भाव उसमें न रहे, सारी चीजों को ईश्वरीय मानने लगे, हर प्राणी से प्रेम करने लगे और किसी पशु के लिए भी अपना जीवन देने के लिए तैयार रहे - और ये सारे भाव बिना किसी प्रतिफल की आकांक्षा से हों, तो उसका हृदय स्वतः पवित्र हो जाएगा तथा उस पवित्र हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम उत्पन्न होगा। ईश्वर ही सभी आत्माओं के आकर्षण का केंद्र है। द्वैतवादी कहते हैं - “अगर कोई सुई मिट्टी से ढँकी हो, तो उस पर चुंबक का प्रभाव न होगा; पर ज्यों ही उस पर से मिट्टी को हटा दिया जाएगा, त्यों ही वह चुंबक की ओर आकृष्ट हो जाएगी।’’
ईश्वर चुंबक है और मनुष्य की आत्मा सुई; पापरूपी मल इसको ढँके रहता है। जैसे ही कोई आत्मा इस मल से रहित हो जाती है, वैसे ही प्राकृतिक आकर्षण से वह ईश्वर के पास चली आती है और सनातन रूप से उसके साथ रहने लगती है, यद्यपि उसका ईश्वर से कभी तादात्म्य नहीं होता। पूर्ण आत्मा अपनी इच्छा के अनुरूप स्वरूप ग्रहण कर सकती है। अगर वह चाहे, तो सैकड़ों रूप धारण कर सकती है, और चाहे तो कोई भी रूप न ले। यह लगभग सर्वशक्तिमती हो जाती है, अंतर केवल इतना रहता है कि यह सृष्टि नहीं कर सकती। सृष्टि करने की शक्ति केवल ईश्वर ही को है चाहे कोई कितना भी पूर्ण क्यों न हो, वह विश्वनियंता नहीं हो सकता; यह काम केवल ईश्वर ही कर सकता है। किंतु जो आत्माएँ पूर्ण जो जाती हैं, वे सभी आनंद से ईश्वर के साथ रहती हैं। द्वैतवादी लोगों की यही धारणा है।
ये द्वैतवादी एक दूसरा भी उपदेश देते हैं। “प्रभु मुझे यह दो, मुझे वह दो’’ - ईश्वर से इस तरह की प्रार्थना करने पर इन लोगों को आपत्ति है। ये समझते हैं कि ऐसा नहीं करना चाहिए। अगर मनुष्य को कुछ-न-कुछ वरदान माँगना ही है तो वह ईश्वर से न माँगे, बल्कि छोटे-छोटे देवी-देवताओं अथवा पूर्ण आत्माओं से माँगे। ईश्वर केवल प्रेम के लिए है, यह तो कलंक की बात है कि हम ईश्वर से भी ‘मुझे यह दो, वह दो’ ऐसा निवेदन करते हैं। इसलिए द्वैतवादी कहते हैं कि मनुष्य अपनी वासनाओं की पूर्ति तो निम्न कोटि के देवताओं को प्रसन्न करके कर लें, पर अगर वह मोक्ष चाहता है, तो उसे ईश्वर की पूजा करनी होगी। भारतवर्ष में असंख्य लोगों का यही धर्म है।
असली वेदांत दर्शन विशिष्टाद्वैत से प्रारंभ होता है। इस संप्रदाय का कहना है कि कार्य कभी कारण से भिन्न नहीं होता। कारण ही परिवर्तित रूप में कार्य बनकर आता है। अगर सृष्टि कार्य है और ईश्वर कारण, तो ईश्वर और सृष्टि दो नहीं हैं। वे अपना तर्क इस तरह आरंभ करते हैं कि ईश्वर जगत् का निमित्त तथा उपादान कारण है। अर्थात् इस सृष्टि का ईश्वर ही स्वयं कर्ता है और वही स्वयं इसका उपादान भी है, जिससे संपूर्ण प्रकृति प्रक्षिप्त हुई है। तुम्हारी भाषा में जो ‘क्रियेशन’ शब्द है, वस्तुतः संस्कृत में उसका समानार्थक शब्द नहीं है, क्योंकि भारत में ऐसा कोई संप्रदाय नहीं, जो पाश्चात्य लोगों की तरह यह मानता हो कि प्रकृति की स्थापना शून्य से हुई है। हो सकता है कि आरंभ में कुछ लोग ऐसा मानते भी हों पर शीघ्र ही उनको दबा दिया गया होगा। मेरे जानते आजकल कोई ऐसा संप्रदाय नहीं है, जो इस धारणा में विश्वास करता हो। सृष्टि से हम लोगों का तात्पर्य है, किसी ऐसी वस्तु का प्रक्षेपण, जो पहले से ही हो। इस विशिष्टाद्वैत संप्रदाय के अनुसार तो सारा विश्व स्वयं ईश्वर ही है। वेदों में कहा गया है, ‘जिस तरह मकड़ी अपने ही शरीर से तंतुओं को निकालती है, उसी तरह यह सारा विश्व भी ईश्वर से प्रादुर्भूत हुआ है।’
अब अगर कार्य कारण का ही दूसरा रूप है, तो प्रश्न उठता है कि ईश्वर, जो चेतन और शाश्वत ज्ञानस्वरूप है, किस तरह इस भौतिक, स्थूल और अचेतन जगत् का कारण हो सकता है? अगर कारण परम शुद्ध और पूर्ण हो, तो कार्य अन्यथा कैसे हो सकता है? ये विशिष्टवादी क्या कहते हैं? उनका एक विचित्र सिद्धांत है। उनका कहना है कि ईश्वर, प्रकृति एवं आत्मा एक है। ईश्वर मानो जीव है और प्रकृति तथा आत्मा उसके शरीर हैं। जिस तरह मेरे एक शरीर है तथा एक आत्मा है, ठीक उसी तरह संपूर्ण विश्व एवं सारी आत्माएँ ईश्वर के शरीर हैं और ईश्वर सारी आत्माओं की आत्मा हैं। इस तरह ईश्वर विश्व का उपादान कारण हैं। शरीर परिवर्तित हो सकता है - तरुण या वृद्ध, सबल या दुर्बल हो सकता है - किंतु इससे आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। एक ही
शाश्वत सत्ता शरीर के माध्यम से सदा अभिव्यक्त होती है। शरीर आता-जाता रह सकता है, पर आत्मा कभी परिवर्तित नहीं होती। ठीक इसी तरह समस्त जगत् ईश्वर का शरीर है और इस दृष्टि से वह ईश्वर ही है; किंतु जगत् में जो परिवर्तन होते हैं, उनसे ईश्वर प्रभावित नहीं होता।
जगदरूपी उपादान से वह सृष्टि करता है और हर कल्प के अंत में उसका शरीर सूक्ष्म होता है, वह संकुचित होता है; फिर परवर्ती कल्प के प्रारंभ में वह विस्तृत होने लगता है और उससे विभिन्न जगत् निकलते हैं।
फिर द्वैतवादी एवं विशिष्टाद्वैतवादी, दोनों यह मानते हैं कि आत्मा स्वभावतः पवित्र है, किंतु अपने कर्मों से यह अपने को अपवित्र बना लेती है। विशिष्टाद्वैतवादी इसको द्वैतवादियों की अपेक्षा अधिक सुंदर ढंग से कहते हैं। उनका कहना है कि आत्मा की पवित्रता एवं पूर्णता कभी संकुचित हो जाती है, पर फिर ज्यों-की-त्यों हो जाती है। और हमारा प्रयास यह है कि उसकी अवस्था को बदलकर पुनः उसकी पूर्णता, पवित्रता एवं शक्ति को स्वाभाविक स्थिति में ले आयें।
आत्मा के अनेक गुण हैं, पर उसमें सर्वशक्तिमत्ता या सर्वज्ञता नहीं है। हर पापकर्म उसकी प्रकृति को संकुचित कर देता है और पुण्य कर्म विस्तीर्ण। जिस तरह किसी प्रज्वलित अग्नि से उसी जैसे करोड़ों स्फुलिंग निकलते हैं, उसी तरह इस अपरिमेय सत्ता (ईश्वर) से सभी आत्माएँ निकली हैं। सबका उद्देश्य एक ही है। विशिष्टाद्वैतवादियों का ईश्वर भी सगुण है, पर विशेषता यह है कि वह विश्व की हर चीज में व्याप्त है। वह विश्व की हर वस्तु में हर जगह अंतर्निहित है। जब शास्त्र कहते हैं कि ईश्वर सबकुछ है, तो उनका तात्पर्य यही रहता है कि ईश्वर सबमें व्याप्त है। उदाहरणतः ईश्वर दीवाल नहीं हो जाता, बल्कि वह दीवाल में व्याप्त है। विश्व में कोई ऐसा कण नहीं, ऐसा अणु नहीं, जिसमें वह न हो। आत्माएँ सीमित हैं; वे सर्वव्यापी नहीं हैं। जब उनकी शक्तियों का विस्तार होता है और वे पूर्ण हो जाती हैं, तो जरामरण के चक्र से मुक्ति पा जाती हैं और सदा के लिए ईश्वर में ही वास करती हैं।
अब हम अद्वैतवाद पर आते हैं। मेरे विचार में अब तक विश्व के किसी भी देश में दर्शन एवं धर्म के क्षेत्र में जो प्रगति हुई है, उसका चरमतम विकास एवं सुंदरतम पुष्प अद्वैतवाद में है। यहाँ मानव-विचार अपनी अभिव्यक्ति की पराकाष्ठा प्राप्त कर लेता है और अभेद्य प्रतीत होने वाले रहस्य से भी पार चला जाता है। यह है अद्वैत वेदांतवाद। अपनी दुरूहता और अतिशय उत्कृष्टता के कारण यह जनसमुदाय का धर्म नहीं बन पाया। आगे चलकर हम देखेंगे कि संसार महत्तम चिंतनशील व्यक्तियों को भी इसको समझने में कठिनाई होती रही है। हमने अपने को इतना दुर्बल बना लिया है, इतना नीचे गिरा लिया है। हम बातें चाहे जितनी बड़ी-बड़ी करें, पर सत्य तो यह है कि स्वभावतः हम किसी दूसरे का सहारा चाहते हैं। हमारी दशा उन कमजोर पौधों की है, जो किसी सहारे के बिना नहीं रह सकते। ओह, कितनी बार लोगों ने मुझसे “एक आरामदायक धर्म’’ की मांग की। बस, कुछ ही लोग हैं, जो सत्य की जिज्ञासा करते हैं, उससे भी कम लोग ऐसे मिलेंगे, जो सत्य को जानने का साहस करते हैं, और उससे भी कम ऐसे हें, जो सत्य को जानकर हर प्रकार से उसकी कार्यरूप में परिणत करते हैं। यह उनका दोष नहीं, बल्कि उनके मस्तिष्क का दोष है।
हर नया विचार, खासकर उच्च कोटि का, लोगों को अस्त-व्यस्त कर देता है, उनके मस्तिष्क में नया मार्ग बनाने लगता और उनके संतुलन को नष्ट कर देता है। साधारणतः लोग अपने इर्द-गिर्द के वातावरण में रमे रहते हैं, और इससे ऊपर उठने के लिए प्राचीन अंधविश्वासों, वंशानुगत अंधविश्वासों, वर्ग, नगर, देश के अंधश्वासों तथा इन सबकी प्रष्ठभूमि में स्थित मानव-प्रकृति में सन्निहित अंधविश्वासों की विशाल राशि पर विजय प्राप्त करनी होती है।
फिर भी कुछ तो ऐसे वीर लोग संसार में हैं ही, जो सत्य को जानने का साहस करते हैं, जो उसे धारण करने तथा अंत तक उसका पालन करने का साहस करते हैं। तो अद्वैतवादी लोगों का क्या कहना है? उनका कहना है कि अगर कोई ईश्वर है तो वह ईश्वर सृष्टि का निमित्त तथा उपादान कारण, दोनों है। इस तरह केवल वह स्रष्टा नहीं अपितु सृष्टि भी है। वह स्वयं विश्व है। पर यह कैसे संभव है? शुद्ध, चेतनस्वरूप ईश्वर विश्व कैसे बन सकता है? यह इस तरह संभव है : जिसे अज्ञानी लोग विश्व कहते हैं, वस्तुतः उसका अस्तित्व है ही नहीं। तब तुम और में और ये सारी चीजें जिन्हें हम देखते हैं, क्या हैं? ये तो मात्र आत्मसम्मोहन हैं; सत्ता तो केवल एक है और वह अनादि, अनंत और शाश्वत शिवस्वरूप है। उस सत्ता के अंतर्गत ही हम ये सारे सपने देखते हैं। एक आत्मा है जो इन सारी चीजों से परे है जो अपरिमेय है, जो ज्ञात से तथा ज्ञेय से परे है। हम उसी में तथा उसी के माध्यम से विश्व को देखते हैं। एकमात्र सत्य वही है। वही सत्ता यह मेज है, दर्शक है, दीवाल है, सबकुछ है; पर वह नाम और रूप नहें है। मेज में से नाम और रूप को हटा दो; जो बचेगा, वही वह सत्ता है। वेदांती लोग उस सत्ता में लिंग-भेद नहीं मानते - लिंग तो मानव-मस्तिष्क से उत्पन्न एक भ्रम है - आत्मा का कोई लिंग नहीं। जो लोग भ्रम में हैं, जो पशु के सदृश हो गये हैं, वे पुरुष या स्त्री को देखते हैं, किंतु जो जीता-जागता देवता है, वह नर या नारी में अंतर नहीं जानता। जो सारी चीजों से ऊपर उठ चुका है, उसके लिए लिंग-संबंधी झमेला क्या?
हर व्यक्ति, हर वस्तु शुद्ध आत्मा है जो पवित्र है, लिंगहीन है तथा शाश्वत शिव है। नाम, रूप और शरीर जो भौतिक है, सारी भिन्नताओं के मूल हैं। अगर तुम नाम और रूप के अंतर को हटा दो, तो सारा विश्व एक है; दो की सत्ता नहीं है बल्कि सर्वत्र एक ही है। सर्वत्र एक है। तुम और मैं एक हैं। न तो प्रकृति है, न ईश्वर और न विश्व; बस एक ही अपरिमेय सत्ता है जिससे नाम और रूप के आधार पर ये तीनों बने हैं।
ज्ञाता स्वयं को कैसे जान सकता है? वह नहीं जान सकता। तुम अपने आपको कैसे देख सकते हो? तुम अपने को प्रतिबिंबित भर कर सकते हो। इस तरह यह सारा विश्व एक शाश्वत सत्ता, आत्मा की प्रतिछाया मात्र है। और चूँकि प्रतिछाया अच्छे या बुरे प्रतिक्षेपक पर पड़ती है, इसलिए तदनुरूप अच्छे या बुरे बिंब बनते हैं। अगर कोई व्यक्ति हत्यारा है तो उसमें प्रतिक्षेपक बुरा है न कि आत्मा। दूसरी ओर अगर कोई साधु है तो उसमें प्रतिक्षेपक शुद्ध है। आत्मा तो स्वरूपतः शुद्ध है। एक वही सत्ता है जो कीट से लेकर पूर्णतया विकसित प्राणी तक में प्रतिबिंबित है। इस तरह यह संपूर्ण विश्व एक है; भौतिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक - हर दृष्टि से इस एक सत्ता को ही हम विभिन्न रूपों में देखते हैं, अपने मन से अनेक बिंब इस पर अध्यस्त करते हैं। जिस प्राणी ने अपने को मनुष्यत्व तक ही सीमित रख लिया है उसे ऐसा लगता है कि यह संसार मनुष्यों का है। किंतु यह चेतना के उच्चतर स्तर पर है, उसे यह संसार स्वर्ग सा दिखता है। वस्तुतः एक ही सत्ता या आत्मा अखिल ब्रह्मांड में व्याप्त है। इसका न तो आना होता है न जाना। न यह पैदा होती है, न मरती है और न पुनः अवतरित होती है। आखिर यह मर भी कैसे सकती है? यह जाए, जो कहाँ जाए? संसार और स्वर्ग आदि सारे स्थानों की व्यर्थ कल्पना तो हमने कर रखी है। न तो वे कभी रहे हैं, न अभी हैं और न भविष्य में कभी होगा।
मैं सर्वव्यापी हूँ, शाश्वत हूँ। तो फिर मैं जा कहाँ सकता हूँ? मैं कहाँ नहीं हूँ, जहाँ जाऊँ? मैं तो प्रकृतिरूपी पुस्तक को पढ़ रहा हूँ। पृष्ठ पर पृष्ठ उलटता जा रहा हूँ और जीवन का एक-एक स्वप्न समाप्त होता जा रहा है। एक पन्ना पढ़ता हूँ तो एक स्वप्न समाप्त होता है; और इसी तरह यह क्रम जारी है। जब सारी पुस्तक पढ़ डालूँगा तो उसे लेकर एक किनारे रख दूँगा; यही मेरे खेल का अंत होगा। आखिर वेदांतियों के इन सारे कथनों का तात्पर्य क्या है?
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