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महासती सीता: रामायण के अमर पात्र / Mahasati Sita: Ramayan Ke Amar Patra PDF Download Free Hindi Books by Dr. Vinay

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥महासती सीता: रामायण के अमर पात्र / Mahasati Sita: Ramayan Ke Amar Patra
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 1.2 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖125
Last UpdatedApril 27, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category, , , ,

सीता रामायण और रामकथा पर आधारित अन्य रामायण ग्रंथ, जैसे रामचरितमानस, की मुख्य पात्र है। सीता मिथिला के राजा जनक की ज्येष्ठ पुत्री थी। इनका विवाह अयोध्या के राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र राम से स्वयंवर में शिवधनुष को भंग करने के उपरांत हुआ था। इनकी स्त्री व पतिव्रता धर्म के कारण इनका नाम आदर से लिया जाता है। त्रेतायुग में इन्हे सौभाग्य की देवी लक्ष्मी का अवतार मानते हैं। रामायण के अनुसार मिथिला के राजा जनक का हल खेतों में जोतते समय एक पेटी से अटका। इन्हें उस पेटी में पाया था। हल को मैथिली भाषा में 'सीत' कहने के कारण इनका नाम सीता पड़ा। राजा जनक और रानी सुनयना ने इनकी परवरिश की। उर्मिला उनकी छोटी बहन थीं । राजा जनक की पुत्री होने के कारण इन्हें जानकी, जनकात्मजा अथवा जनकसुता भी कहते हैं। मिथिला की राजकुमारी होने के कारण, ये मैथिली नाम से भी प्रसिद्ध हैं। भूमि में पाए जाने के कारण इन्हें भूमिपुत्री या भूसुता भी कहा जाता है। सीता को महासती क्यों कहा गया है, यह इस उपन्यास को पढ़कर आपको अच्छा लगेगा|

पुस्तक का कुछ अंश

 

भूमिका
रामायण और महाभारत भारतीय संस्कृति के विराट कोष हैं और इन दोनों में रामायण का सम्मान भक्त की दृष्टि में महाभारत से अधिक है। यद्यपि रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का प्रतिपादन है और महाभारत में कौरवों-पांडवों की कथा के बहाने कृष्ण का ब्रह्मत्व प्रतिष्ठित किया गया है। रामायण का मान सामान्य जन में इसलिए अधिक है कि उसके चरित्र नायक राम का जीवन चरित्र व्यक्ति और समाज दोनों के लिए जीवन-मूल्य की दृष्टि से अनुकरणीय है।
आदिकवि वाल्मीकि ने सम्पूर्ण रामकथा में राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिपादित कर एक महान सांस्कृतिक आधार प्रतिष्ठित किया था और उसके बाद अनेक प्रकार से रामकथा का स्वरूप विकसित होता रहा। जैन धर्मावलम्बियों ने अपने ढंग से इस कथा को प्रस्तुत किया और बाद के आने वाले रचनाकारों ने‒हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता‒के आधार पर राम की कथा को उसके मूल्य की रक्षा करते हुए अपने ढंग से प्रस्तुत किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामकथा को भक्ति का व्यावहारिक केन्द्र बिन्दु बना दिया। उनके राम भक्ति के आधार हैं और उनका जीवन ही अनुकरणीय है। गोस्वामी तुलसीदास के बाद भी रामकथा को विभिन्न रूपों में अनुभव किया जाता रहा और जहां-जहां इस विराट भाव-भूमि में कवियों की दृष्टि में जो स्थल मानवीय दृष्टि से उपेक्षित रह गये, उन्हें केन्द्र बनाकर राम की कथा में अन्य आयाम जोड़ने का उपक्रम भी जारी रहा।
रामकथा हमारे सामने जहां भक्ति का बहुत बड़ा मूल्य प्रस्तुत करती है, वही कुछ ऐसे प्रश्न भी छोड़ देती है जिनका कोई तर्कपूर्ण समाधान शायद नहीं मिल पाता और जब मन किसी बात को मानने से मना कर दे तथा उसका तर्कपूर्ण समाधान न हो, तब एक गहरे रचनात्मक द्वन्द्व की रचना होती है। हमने रामकथा के विभिन्न पात्रों को उस कथा के मूल आदर्श वृत्त में ही रखकर मनन और अनुसंधान से, औपन्यासिक रूप में चित्रित करने का प्रयास किया है। चूंकि रामकथा में प्रत्येक पात्र किसी न किसी जीवन दृष्टि या जीवन-मूल्य को भी प्रतिपादित करता है। राम यदि आदर्श पुत्र, पति हैं तो लक्ष्मण आदर्श भाई के रूप में प्रतिष्ठित हैं और इसी प्रकार अन्य पात्रों का मूल मूल्य वृत्त भी देखा जा सकता है। अब आधुनिक दृष्टि में यह मूल्य वृत्त कहां तक हमारे जीवन में रच सकता है, यह बहुत बड़ा प्रश्न है। इसलिए किसी भी लेखक का यह रचनात्मक प्रयास कि पुराकथा के पात्रों में क्या कोई मानसिक द्वन्द्व रहा होगा? क्या उन्होंने सहज मानव के रूप में होंठों को मुस्कराने की और आंखों को रोने की आज्ञा दी होगी? और तब हम यह अनुभव करते हैं कि उस विराट मूल्य के आलोक में छोटा-सा मानवीय प्रकाश खण्ड उठाकर अपने दृष्टिकोण से अपने पाठकों के सामने प्रस्तुत कर सकें। रामगाथा के विशिष्ट पात्रों पर औपन्यासिक रचनावली के पीछे हमारा यही दृष्टिकोण रहा है कि हम उस विराट व्यक्तित्व को अपनी दृष्टि से अपने लिए किस रूप में सार्थक कर सकते हैं।
गोस्वामी जी के शब्दों में‒
सरल कवित्त, कीरति बिमल, मुनि आदरहिं सुजान।
सहज बैर बिसराय रिपु, जो सुनि करै बखान।।
हम इस रास्ते पर यदि चल नहीं पाते तो चलने की सोच तो सकते हैं। हमारे सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह रहा कि जहां-जहां रामकथा के बड़े-बड़े ग्रन्थ कुछ नहीं बोलते, यहां उसी मूल्य चेतना में हम गद्य में कैसे उस अबोले यथार्थ को चित्रित करें। पुराकथा की दृष्टि से जो सच हो सकता है और आधुनिक दृष्टि से जो स्वीकार भी हो, ऐसे कथा तंत्रों को कल्पनाशीलता से रचते हुए हमारा हमेशा ध्यान रहा है कि मनुष्य के अन्तर का उदात्त भाव भी मुखर हो सके चूंकि हमने जब-जब इन बड़े पात्रों से साक्षात्कार किया है, तब-तब एक उदात्त तत्व के आलोक की तरह दृष्टि के सामने आया है। उस आलोक में से थोड़ा बहुत अब हमारी ओर से आपके सामने है।
महासती सीता
लक्ष्मण के लिए यह रात कालरात्रि के समान बीती और यह जो सवेरा हुआ, इसकी प्रत्येक किरण उसे चुभ रही थी। उन्हें फिर भयानक परीक्षा की घड़ी से गुजरना था।
राम का आदेश था—, ‘‘लक्ष्मण! कल सवेरे तुम सारथी द्वारा संचालित रथ पर सीता को ले जाकर इस राज्य की सीमा से बाहर छोड़ आओ। गंगा के उस पार तमसा नदी के किनारे महात्मा वाल्मीकि का आश्रम है। जाओ, मेरी आज्ञा का पालन हो।’’
‘‘लेकिन—।’’
‘‘कोई प्रश्न नहीं, कोई परामर्श नहीं। जो व्यक्ति मेरे इस कथन के बीच कूदकर अनुनय-विनय करेगा और मेरे निर्णय को बदलने के लिए मुझ पर दबाव डालेगा, वह मेरा शत्रु होगा।।
‘‘तुम लोग मेरा सम्मान करते हो और मेरी आज्ञा में रहना चाहते हो तो सीता को यहां से ले जाओ।
सीता की इच्छा भी थी कि वह गंगातट पर ऋषि का आश्रम देख ले।
‘‘अब जाओ लक्ष्मण।”
लक्ष्मण ने साफ देखा कि राम की आंखों से आंसू छलक आए थे, लेकिन निर्णय की दृढ़ता में कोई शिथिलता नहीं आने पाई। पास में खड़े भरत और शत्रुघ्न मौन थे।
क्या नियति है! जब जिसने चाहा, आदेश दिया‒पिता ने भरी युवावस्था में वन का आदेश दिया, भाभी सीता ने स्वर्ण मृग के पीछे राम की आवाज सुनकर मुझे राम की सेवा में जाने का आदेश दिया तथा रावण के छल का शिकार हुईं और आज स्वयं श्रीराम मुझे ही सीता को वन में छोड़ आने का आदेश दे रहे हैं। इच्छा के प्रतिकूल आदेश की बाध्यता बार-बार मेरी ही परीक्षा ले रही है और मैं भी भ्रातृ आदेश मानने के लिए बाध्य हूं।
लक्ष्मण बहुत देर तक अपने महल की ऊंचाइयों को देखते हुए सोच रहे थे। अगर आज यह सूर्य न उदित होता तो आदेश पालन की घड़ी कुछ और टल जाती, लेकिन आदेश का तो पालन करना ही है। इसमें देरी क्या है? लेकिन संकट तो यह है कि वे सीता से कहेंगे क्या? और कैसे जुटा पाएंगे साहस कहने का?
क्या वे कह पाएंगे कि रावण ने बलपूर्वक उन्हें अपनी गोद में उठाकर अपहरण किया था? और फिर वह उन्हें अपनी लंका में भी ले गया तथा वहां अन्तःपुर के क्रीड़ा कानन अशोक वाटिका में रखा। इस तरह राक्षसों के वश में रही सीता अयोध्या की प्रजा के लिए अपवित्र हो गई हैं और सीता के बारे में फैला यह अपवाद सुनकर ही राम ने उन्हें त्याग दिया।
कितनी कठिन परीक्षा की घड़ी है यह!
आदेश का पालन करना था। अतः प्रातःकाल होते ही लक्ष्मण ने मन दुखी होते हुए भी सारथी से कहा‒
“सारथी! एक सुन्दर रथ में शीघ्र गमन करने वाले घोड़े जोतकर उसमें सीताजी के लिए सुन्दर आसन बिछाओ। मैं महाराज की आज्ञा से सीताजी को तपस्वियों के आश्रम पर पहुंचा दूंगा। शीघ्र रथ लेकर आओ।”
और सारथी जो आज्ञा कहते हुए आदेशानुसार रथ ले आया और बोला, “रथ तैयार है श्रीमान!”
रथ को तैयार कराकर लक्ष्मण संकोच और दुःख अनुभव करते हुए देवी सीता के महल में पधारे।
“आज प्रातःकाल भाभी की याद कैसे आ गई देवर जी?”
“आपकी इच्छा थी कि आप मुनियों के आश्रम में जाना चाहती हैं। अतः महाराज श्रीराम का आदेश है कि गंगातट पार करके ऋषियों के सुन्दर आश्रम हैं, आज उसी दिशा में भ्रमण करना है।”
“तुम्हारे महाराज भी बड़े विचित्र हैं, मैं इतने दिन से कह रही थी तो राजकार्य में व्यस्तता के कारण कभी मेरी बात नहीं सुनी और आज अचानक प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। फिर भी मुझे प्रसन्नता है, उन्हें मेरा ध्यान तो रहा।”
लक्ष्मण के इस प्रस्ताव पर सीता हर्षित होकर चलने के लिए शीघ्र तैयार हो गईं।
सीता ने अपने साथ बहुमूल्य वस्त्र और नाना प्रकार के रत्न लिये तथा यात्रा के लिए उद्धृत होकर बोलीं, “ये सब सामग्री मैं मुनि-पत्नियों को दूंगी।”
“जैसी आपकी इच्छा कहते हुए लक्ष्मण ने सीता को रथ पर चढ़ाया और सारथी से रथ बढ़ाने के लिए कहा।
लक्ष्मण के मन में यह कसक थी कि एक सरल स्वभाव की स्त्री को वे छल से निष्कासित करने में सहयोगी हो रहे हैं लेकिन राजाज्ञा के सामने वे लाचार हैं।
ज्योंही रथ आगे बढ़ा, सीता की दाईं आंख फड़कने लगी। उन्हें लगा कि कहीं अनिष्ट तो नहीं हुआ या होने की आशंका तो नहीं है? यह सोचकर उन्होंने लक्ष्मण को कहा, “देवर जी! आज मुझे शकुन कुछ सही नहीं दिखाई दे रहे। मेरा मन ठीक नहीं है। पता नहीं क्यों आज यह अधीर हो रहा है? प्रभु करे, आपके भाई कुशल से रहें। तीनों राजमाताएं और जनपद के सभी प्राणी कुशल रहें, सबका कल्याण हो।” फिर लक्ष्मण को सम्बोधित करते हुए सीता ने कहा‒
“तुम कुछ बोल नहीं रहे लक्ष्मण!”
“मैं आपकी बात सुन रहा हूं भाभी! और अनुभव कर रहा हूं आपकी अधीरता। आप वन में तो जा ही रही हैं, मुनियों के सत्संग में आपके मन को शान्ति मिलेगी। भागीरथी के तट पर स्नान करके आप सुख अनुभव करेंगी।”
“कितना अच्छा होता, जो तुम्हारे भैया श्रीराम भी साथ होते!”
लक्ष्मण मौन होकर सीता के मन में उठने वाली शंकाएं महसूस कर रहे थे और डर भी रहा थे कि लक्ष्य सामने आने पर वे अपनी बात कैसे कह पाएंगे? भाभी ने तो अनिष्ट अनुभव करके कह लिया, लेकिन वे तो रात से इस अनिष्ट के चक्रवाती दबाव में घूम रहे हैं। वे अपनी पीड़ा किससे कहें? अवज्ञा भी नहीं कर सकते।
और तभी कुछ देर में उन्होंने देखा, सामने गोमती नदी का तट दिखाई दे रहा था।
“देखिए भाभी! हमारी यात्रा का पहला पड़ाव कितनी जल्दी आ गया! आइए, इस भूमि का स्पर्श करें। इस नदी के जल से पैर धोएं। मन और आत्मा दोनों शीतल हो जाएंगे।”
लक्ष्मण के साथ सीता भी रथ से उतर आईं।
वनवास काल के बाद पहली बार सीता ने इतना खुला आकाश और विस्तृत हरियाली देखी थी। गोमती के किनारे बसा था एक छोटा-सा गांव। यहीं ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों के कई आश्रम थे। संध्या हो चुकी थी, सूर्य अस्ताचल की ओर जा रहे था।
नदी तट पर आकर सूर्य की परछाईं झिलमिलाती पानी में देख सीता को लगा मानो सूर्यदेव उन्हें नमस्कार कर रहे हैं और कह रहे हैं, ‘देवी! आज की रात्रि यहीं विश्राम करो, प्रातःकाल फिर आपके दर्शन करूंगा।’
वह रात्रि लक्ष्मण और सीता ने सारथी के साथ गोमती के तट पर ही एक रमणीक आश्रम में व्यतीत की।
प्रातःकाल होते ही जैसे ही पक्षियों का कलरव शुरू हुआ और यह आभास हुआ कि पौ फटने वाली है, लक्ष्मण ने सारथी को आदेश दिया, “सारथी शीघ्र रथ तैयार करो, हमें सायंकाल तक भागीरथी के तट पर पहुंच जाना है।”
सारथी को तो आदेश की प्रतीक्षा थी, उसका रथ तैयार था। आदेश पाते ही वह रथ लेकर तैयार हो गया और अब ये लोग तेजी से गंगातट की ओर बढ़ गए।
रथ इतनी तेजी से चला कि वे दोपहर तक ही भागीरथी के किनारे पहुंच गए। जल की धारा देखकर लक्ष्मण की आंखों में आंसू आ गए और वे ऊंचे स्वर से फूट-फूटकर रोने लगे।
“अरे यह क्या? लक्ष्मण! तुम रो रहे हो, मां भागीरथी के तट पर आकर तुम्हारी आंख में आंसू। क्या कारण है? इतने आतुर क्यों हो गए? कितने दिन से मेरी अभिलाषा थी कि मैं मां भागीरथी के दर्शन करूं। आज मेरी अभिलाषा पूर्ण हुई है और तुम रो रहे हो। तुम इस समय जबकि मैं प्रसन्न हो रही हूं, रोकर मुझे दुखी क्यों करते हो?”
फिर लक्ष्मण को छेड़ते हुए देवी सीता ने कहा, “क्या तुम्हारे प्राणप्रिय भाई तुम्हें इतना याद आ रहे हैं कि दो दिन की बिछुड़न भी सहन नहीं कर पा रहे हो? इतने शोकाकुल क्यों हो? तुम तो सदा ही राम के साथ रहते हो।
हे लक्ष्मण! राम तो मुझे भी प्राणों से बढ़कर प्रिय हैं, परन्तु मैं तो इस प्रकार शोक नहीं कर रही। तुम ऐसे नादान न बनो। चलो, शीघ्रता करो। मुझे गंगा के पार ले चलो। मैं उन्हें वस्त्र और आभूषण दूंगी। उसके बाद उन महर्षियों का यथायोग्य अभिवादन करके एक रात ठहरकर हम लोग अयोध्या लौट जाएंगे।
मेरा मन भी राम से अधिक दूर रहने पर विचलित हो जाता है। इसलिए हे सत्यवीर! शोक छोड़ो और मल्लाहों से कहो, वे नाव तैयार करें।”
सीता की सहजता देखकर लक्ष्मण फिर हूक उठे, लेकिन तुरन्त ही अपने आपको संयत करते हुए रथ से उतरे और अपनी दोनों आंखें पोंछ लीं।
लक्ष्मण ने नाविकों को बुलाया और उन्हें सीताजी के साथ भागीरथी पार कराने के लिए कहा।
मल्लाहों ने हाथ जोड़ते हुए कहा, “प्रभु! आपके आदेश पर नाव तैयार है।”
अब लक्ष्मण आगे बढ़ते हुए सीताजी के साथ नाव पर बैठ गए। नाविकों ने बड़ी सावधानी के साथ उन्हें गंगा के उस पार पहुंचाया।
भागीरथी के उस तट पर पहुंचकर अब लक्ष्मण का साहस टूटने लगा और वह घड़ी आ गई, जिसका उन्हें डर था।
वह रात्रि लक्ष्मण ने दुविधा और अन्तर्द्वन्द्व में व्यतीत की।
प्रातःकाल जब भागीरथी के तट पर बने मुनियों के आश्रम में जाने के लिए सीता उद्यत हुईं तो लक्ष्मण की दशा देखकर वे चिंतित हो उठीं।
“कहो प्रिय लक्ष्मण! क्या बात है? एक ही रात्रि में तुम्हारा मुख इतना फीका कैसे हो गया? क्या संकट है? क्या दुविधा है? किस द्वन्द्व में फंसे हो? देखो जो कुछ भी कहना हो, मुझसे स्पष्ट कहो। क्या कोई अनिष्ट हो गया है? क्योंकि मैंने अनुभव किया है कि चलते समय भी तुम बहुत उदास थे। तुम अपने मन में कोई गुप्त रहस्य पाले हुए हो।
“मेरा हृदय बड़ा विशाल है लक्ष्मण! और मैं हर कटु बात सहने की आदी हो गई हूं। रावण के घर में जितने दिन रही हूं, उससे बड़ा यातनामय जीवन का कोई भाग नहीं हो सकता। इसलिए मुझसे कोई रहस्य मत छुपाओ। कह देने से पीड़ा हल्की हो जाती है।”
“लेकिन भाभी! कह देने का साहस जुटाना तो सरल नहीं होता। यह ठीक है कि यात्रा में मेरा मन अत्यन्त चिंतित रहा। एक अनागत संकट मेरे सामने है और एक आदेश भी।”
“तुम पहले की बात करो। अवश्य ही वह श्रीराम का आदेश होगा और श्रीराम कोई गलत आदेश नहीं करते।”
“यही तो कष्ट है भाभी! जो आदेश मुझे दिया गया है, वह मुझे पूरा भी करना है और मेरे द्वारा पूरा होगा, यह यंत्रणा भी मुझे ही झेलनी है।”
“तो फिर इस यंत्रणा को दुविधा में क्यों झेल रहे हो? और इतना लंबा क्यों कर रहे हो? साफ-साफ क्यों नहीं कहते कि बात क्या है।”
“मैं तो तुमसे कल दोपहर से ही पूछ रही हूं, क्या संकट है? लेकिन तुमने मुझे बताया ही नहीं।”
“तब से अब तक साहस जुटा रहा था।”
“तुम बोलो लक्ष्मण! मेरा आदेश है, उसका पालन करो।”
“भाभी! नगर और जनपद में आपके विषय में रावण के यहां बलात् रहने को लेकर अत्यन्त भयानक अपवाद फैला हुआ है, जिसे राजसभा में सुनकर भैया राम का हृदय दुखी हो उठा। वे मुझे आदेश देकर चले गए। जिन अपवाद वचनों को न सह सकने के कारण उन्होंने मुझसे छुपा लिया, वह तो मैं नहीं बता सकता और जो कुछ मुझसे कहा, वह यही है कि भले ही आप अग्नि-परीक्षा में निर्दोष सिद्ध हो चुकी हैं तो भी अयोध्या का जनसमूह इसे सत्य नहीं मान रहा। इसी लोकोपवाद से महाराज ने आपको त्याग दिया है।”
“क्या! तुम क्या कह रहे हो लक्ष्मण? महाराज ने त्याग दिया है और तुम मुझे यहां बता रहे हो?”
“हां भाभी! यह महाराज की ही आज्ञा थी। उन्हीं के आदेशानुसार आपको रथ पर चढ़ाकर मैं यहां आश्रमों के पास छोड़ने के लिए आया हूं।”
क्षण भर के लिए सीता ने अपनी आंखें मूंद लीं। वह एक वृक्ष के सहारे बैठ गई। हाथ कांप रहे थे, हृदय की धड़कन तेज हो रही थी, माथे पर पसीना छलक आया था और आंखों के सामने अंधेरा छा गया।
“आप विषाद न करें भाभी! यहां से तमसा का किनारा पास ही है। वहीं महर्षि वाल्मीकि का आश्रम है और अन्य अनेक तपस्वी ऋषि-मुनि वहां वास करते हैं। आप महात्मा वाल्मीकि के चरणों की छाया का आश्रय लेकर वहां सुखपूर्वक रहें।
“आप तो जनकपुत्री हैं, सब सह लेंगी। मैं जानता हूं राम में आपकी अनन्य भक्ति और अनुरक्ति है। आप हृदय में राम का जाप करती हुई पतिव्रत का ही पालन करेंगी और यही आपके लिए उत्तम मार्ग शेष है।”
सीता वृक्ष के नीचे ही गहन दुख का अनुभव करती हुई अचेत हो गईं। कुछ क्षण के लिए उन्हें होश ही नहीं रहा। उनकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी।
क्या विडम्बना थी? विवाह के बाद जब राजसुख भोगने का अवसर आया तो माता कैकेयी के वरदान आड़े आ गए और एक राज महिषी को वनवास के लिए जाना पड़ा।
पंचवटी में जब एक आश्रम बनाकर सुखपूर्वक रहने का मन बनाया तो लंका का दुष्ट राजा रावण उन्हें छल से हर ले गया।
राम ने यथा प्रयास करते हुए वानरों की सेना तैयार की, रावण का वध किया और उन्हें उसके कारागार से मुक्त कराया। एक बार फिर दिन पलटे और अयोध्या की भूमि पर पैर रखने का सुअवसर मिला।
अभी तो जीवन के सुखद दिन पूरी तरह आ भी नहीं पाए थे कि यह वनवास!
“लक्ष्मण! वास्तव में विधाता ने मुझे केवल दुख भोगने के लिए ही रचा है। पल-प्रतिपल केवल दुख ही मेरे सामने नाचता रहता है।
“पता नहीं पूर्वजन्म में मुझसे ऐसा कौन-सा पाप हुआ है अथवा किसका स्त्री से बिछोह कराया था, जो मुझ शुद्ध आचरण वाली को ये कष्ट भोगने पड़ रहे हैं और आज स्वयं मुझे मेरे देवाधिदेव पति श्रीराम ने त्याग दिया।
“मैंने तो वनवास के दुख में भी सदैव उन्हीं के चरणों का स्मरण किया।
“तुम ही बताओ लक्ष्मण! अब मैं अकेली अपने परिवार और प्रियजनों से अलग इस आश्रम में कैसे रह पाऊंगी? दुख पड़ने पर किससे अपनी बात कहूंगी।
“बताओ लक्ष्मण! जब मुनिगण मुझसे पूछेंगे कि राम ने तुम्हें किस अपराध के कारण त्यागा है तो मैं क्या जवाब दूंगी?
“मैं तो अभी इसी पल देवी मां भागीरथी की गोद में शरण ले लेती, किन्तु मैं ऐसा नहीं कर सकती। अयोध्या का राजवंश मेरे आंचल में सांस ले रहा है। राम का अंश मेरी कोख में पनप रहा है।
“लेकिन तुम चिंता मत करो। तुम्हें जो आदेश दिया गया है, वही करो। मुझ दुखियारी का क्या है? वन में रहने की मेरी आदत है। यदि महाराज की इसी में प्रसन्नता है तो इसे मैं सहर्ष स्वीकार करूंगी।
लक्ष्मण! तुम राजमाताओं को मेरी ओर से चरण स्पर्श करना और महाराज को आश्वस्त करना कि सीता उनकी चिरसंगिनी, उनके आदेश का सदैव पालन करेगी।
राम से कहना‒हे रघुनंदन! आप जानते हैं, सीता शुद्ध चरित्र है। आपके हित में तत्पर रहने वाली, आप ही में प्रेम-भक्ति रखने वाली है।
“हे वीर! आपने अपयश से डरकर मुझे त्यागा है। अतः लोगों में आपकी जो निंदा हो रही है अथवा मेरे कारण जो अपवाद फैल रहा है, उसे दूर करना मेरा भी कर्तव्य है, क्योंकि मेरे परम आश्रय आप ही तो हैं।
“हे महाराज! मैं दुखियारी समय की मारी हूं। आपसे और क्या निवेदन करूं, पुरवासियों के साथ तो आप उदार व्यवहार करेंगे ही, अपने भाइयों के साथ भी स्नेह बनाए रखें।
“स्त्री के लिए तो उसका पति ही देवता होता है, वही बंधु और गुरु होता है। एक क्लेश मुझे अवश्य है, यदि आप मुझे अपने मन की पीड़ा बता देते तो संभवतया मुझे अधिक प्रसन्नता होती और यह विश्वास होता कि आप मेरा विश्वास करते हैं, लेकिन आप भय के कारण मुझसे कुछ नहीं कह पाए किन्तु मैं जीवित रहने के लिए अभिशप्त हूं। ऋतुकाल का उल्लंघन करके गर्भवती जो हो चुकी हूं।”
लक्ष्मण अपना साहस खो चुके थे। उनके मन में उद्विग्नता पैदा हो रही थी। राम के इस व्यवहार से वे क्षुब्ध भी थे,लेकिन रघुकुल की रीति है कि मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। वे छोटे भाई हैं और राम राजा। उनके आदेश का पालन तो लक्ष्मण को करना ही है।
लक्ष्मण ने धरती पर माथा टेकते हुए सीता को प्रणाम किया। उनकी जीभ ठहर गई थी, आंखें पथरा-सी गई थीं, गला खुश्क हो रहा था और एक अकथनीय वेदना से चेतना विलुप्त होना चाहती थी, फिर भी रोते हुए ही उन्होंने सीता कि परिक्रमा की और पुनः उनके चरण छूते हुए बोले‒
“हे निष्पाप पतिव्रते! आपको यहां वन में छोड़ने का जो पाप मैं कर रहा हूं, उसके लिए मुझे क्षमा कर देना। मैं आपका अपराधी हूं।”
और फिर बिना सीता की तरफ देखे लक्ष्मण नाव में सवार हो गए।
लक्ष्मण अनुभव कर रहे थे कि दो निरीह आंखें उन्हें देख रही हैं, लेकिन वे इन आंखों को देखने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे।
निर्जन वन में एकान्त अकेली खड़ी सीता जाते हुए लक्ष्मण को देखती रहीं। लक्ष्मण की नाव आगे बढ़ चुकी थी।
उस पार पहुंचकर लक्ष्मण रथ पर सवार हो गए। गंगा के इस पार से उस पार गए लक्ष्मण इतनी दूर आने पर भी पीछे देखने का साहस नहीं कर पाए।
सारथी रथ को दौड़ाए चले जा रहे थे। रथ के पीछे-पीछे सीता की आंखें धुंधली पड़ने लगी थीं।
अब रथ भी दिखाई नहीं दे रहा था। केवल धूल-ही-धूल और इस धूल में उन्हें दिखाई दिया अपने पिता जनक का राजमहल, वह पुष्प वाटिका जहां उन्हें श्रीराम पहली बार मिले थे और सखियों के साथ खड़ी सीता संकुचित पूजा के फूल हाथ में लिये ऐसी लग रही थीं मानो उनका देवता साक्षात् सामने आ गया है और वे उसे पूजने के लिए ही इस वाटिका में आई हैं।
जनकपुरी में सीता
उसे नहीं मालूम अपने जन्म की कथा। वह तो इतना जानती है कि वह धरती की बेटी है। मिथिला के महाराज जनक तब संतानहीन थे। राज्य में अकाल की स्थिति हो गई थी। महाराज ने श्रद्धापूर्वक विशाल यज्ञ किया और भूमि का पूजन किया।
खेतों में सामूहिक हल चलाने के लिए राजकीय आयोजन किया गया। बड़ा पंडाल सजाया गया, महर्षि शतानन्द ने वेद मंत्रोच्चार करते हुए महाराज के हाथ में पवित्र जल से छींटे देकर कहा, ‘‘चलिए महाराज! हल चलाइए।’’ और जैसे ही महाराज ने हल चलाया, अभी वे खेत को एक पारी भी पूरी नहीं कर पाए थे कि उन्हें लगा हल के एक घड़े से टकराने की आवाज हुई है।
यह देखते ही सेवकों ने उस जगह को खोदा, वहां एक सुवर्ण पात्र में एक नवजात कन्या लेटी मुस्करा रही थी। यह कन्या हल से उत्पन्न हुई थी, इसलिए उसका नाम सीता रख दिया गया।
महारानी सुनयना ने जब उस कन्या को देखा तो उनकी आंखों में ममता उभर आई और ज्योंही उन्होंने उसे अपने सीने से लगाया, उनके स्तनों में दूध उतर आया। पास ही वृक्ष की छाया के नीचे बैठकर महारानी ने परिचारिकाओं की ओट में होकर कन्या को स्तनपान कराया।
‘महाराज जनक ने हल चलाते हुए एक दिव्य कन्या प्राप्त की है।’ जब यह समाचार नगरवासियों को मिला तो सब लोग बधाईयां देने आए।
महाराज विदेह थे, इसलिए पुत्री को पाकर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए। उनकी खुशी की सीमा न रही। जो आंगन अब तक राज्यादेश की आवाजों से गूंजता था, आज पहली बार वहां किसी बालक के रोने की आवाज सुनाई दी।
किसी भी घर का यह सौभाग्य होता है कि वहां बालक की किलकारी उभरे।
आज तक महाराज ने कभी इस सुख का अनुभव नहीं किया था, पर सीता के आने पर महाराज जनक और महारानी सुनयना के हर्ष की कोई सीमा न रही मानो उन्हें मुंहमांगी मुराद मिल गई हो।
फिर क्या था? राज्यमंत्री और महर्षि शतानन्द के परामर्श से महाराज जनक ने दूर-दूर तक के राज्यों के अधिपतियों और राजाओं के पास न्यौता भेजा कि वे अपने यहां पुत्री के जन्म का उत्सव मना रहे हैं, सभी राजागण पधारकर बालिका को आशीर्वाद दें।
बालिका सीता के जन्म की खुशी में महाराज ने कितने ही बंदियों को रिहा कर दिया, जी खोलकर दान दिया। रानी सुनयना के लिए वह दिन एक अनमोल क्षण था, उनकी सूनी गोद भर गई थी। उनका नीरस जीवन रससिक्त हो गया था। अब उनके आंगन में जिद करने वाला आ गया था।
बालिका सीता न केवल रूप सौन्दर्य में अप्रतिम थी, बल्कि वह अपने हाव-भाव में भी आकर्षक थी।
सीता के जन्मोत्सव पर अनेक राजागण पधारे। पूरे पखवाड़े यह उत्सव चलता रहा। इन्द्र देवता इतने अधिक प्रसन्न हुए कि नित्य ही आकाश में बादल घुमड़ते थे और पृथ्वी को सुख पहुंचाते थे। महाराज के भूमि-पूजन यज्ञ से न केवल महाराज जनक का अपना आंगन लहलहा उठा, बल्कि उनके खेतों में भी हरियाली छा गई। जो भूमि कल तक ऊसर हो रही थी, वह आज उपजाऊ लग रही थी। यह मिथिला के लिए एक सुखकारी वर्ष था। अब निश्चय ही कोई व्यक्ति गरीब नहीं होगा। किसी प्रकार का अभाव नहीं रहेगा।
महाराज जनक तो वैसे भी धर्मात्मा, दानी और उदार प्रजापालक के रूप में प्रचलित थे, लेकिन पुत्री के आगमन ने उन्हें प्रकृति से और उदास बना दिया। अब तो यहां नित्य ही मेले लगने लगे।
पूरे पखवाड़े चले जन्मोत्सव संस्कार के सम्पन्न होने के बाद इस विशाल प्रांगण में, जहां भूमि-पूजन किया गया था, सभी राजाओं ने मिलकर देवी सीता को अपने आशीर्वाद से समृद्ध किया।
महाराज जनक के लिए तो यह दुर्लभ क्षण था। वे संतान की ओर से यद्यपि निराश नहीं हुए थे, फिर भी इस अप्रत्याशित तरीके से पुत्री का प्राप्त होना उनके लिए सुखद अनुभव अवश्य था।
जो सौभाग्यशाली होता है, उसके कदम पड़ते ही चारों तरफ सौभाग्य-ही-सौभाग्य दिखाई पड़ता है। महाराज के यहां भी यही हुआ। सीता के आगमन के कुछ समय बाद ही महारानी सुनयना गर्भवती हुईं।
महाराज जनक ने जब यह जाना तो सीता को साथ लेकर वे महारानी के कक्ष में गए।
रानी ने शैया से उठकर सीता को अपने अंक से लगा लिया और बोलीं, “मेरी सौभाग्यशाली बेटी! तू देवी है, तू साधारण कन्या नहीं है, तू देवकन्या है, तेरे आगमन से ही मेरे यहां एक और फूल खिलने वाला है।”
सीता ने अपने पिता से पूछा, “मेरे आने से कहां फूल खिला पिताजी?”
राजा असमंजस में पड़ गए। इस बालिका को क्या जवाब दें? तब रानी ने कहा, “हे पुत्री! कुछ दिनों में तुम्हारे साथ खेलने के लिए तुम्हारी छोटी बहन आएगी।”
बाल सुलभ प्रसन्नता जाहिर करते हुए सीता खिलखिला पड़ी, “अच्छा मेरी छोटी बहन आएगी, तब मैं इसे बहुत प्यार करूंगी। जैसे आप मुझे गोद में खिलाते हैं, वैसे मैं उसे अपनी गोद में खिलाते हुए उसे ढेर सारे फूल दूंगी।”
और फिर कुछ समय बाद महाराज जनक के यहां एक कन्या ने जन्म लिया। इसका नाम उर्मिला रखा गया।
सीता तो अपनी छोटी बहन पाकर बहुत प्रसन्न हुईं, क्योंकि अब उनके लिए यह महल अकेला नहीं था, उनके साथ उनकी सहेली बनकर छोटी बहन आ गई थी।
लड़की पराया धन होती है और बेल की तरह बढ़ती है। देखते-ही-देखते महाराज जनक की ये दोनों कन्याएं युवती हो गईं।
महाराज ने सीता को बड़े होते देखा तो उन्हें प्रसन्नता भी हुई, लेकिन साथ ही उनके विवाह की चिंता भी।
एक दिन सीता ने महाराज के विशेष कक्ष में रखे हुए धनुष को कक्ष की सफाई कराते हुए उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर रख दिया। महाराज जनक को जब यह ज्ञात हुआ कि सीता ने यह धनुष उठा लिया है तो उनके आश्चर्य की सीमा न रही।
यह भगवान महादेव शिव का धनुष था, जिसे महादेव ने अपने श्वसुर प्रजापति दक्ष महाराज के यज्ञ को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए उठाया था। उन्होंने देवताओं से कहा था कि मैं अपना यज्ञ-भाग लूंगा, लेकिन प्रजापति दक्ष ने उसे स्वीकार नहीं किया।
महाराज दक्ष की पुत्री और महादेव की पत्नी सती को अपना और अपने पति का यह अपमान सहन नहीं हुआ और देखते ही देखते वे यज्ञ कुंड में कूद पड़ी।
सती के इस प्रकार अग्नि-समर्पण से शिव क्रुद्ध हो गए।
देवताओं के अनुनय-विनय पर उन्होंने प्रसन्न होकर यह धनुष उन्हें दे दिया।
महाराज जनक के पूर्वजों ने देवताओं से इस धनुष को प्राप्त किया।
इस शिव-धनुष को उठाना कोई सरल काम नहीं था, प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर की बात है। इसकी प्रत्यंचा तो वही चढ़ा सकता है, जो शिव का अनन्य भक्त हो या जिस पर शिव की कृपा हो।
जब सीता ने यह धनुष उठा लिया तो निश्चय ही इसके लिए सुयोग्य वर वही हो सकता है, जो इस धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाए।
बस फिर क्या था! देवी सुनयना को बुलाकर महाराज जनक ने अपने मंत्रीमंडल के सम्मुख यह प्रतिज्ञा की कि वे अपनी पुत्री सीता का विवाह उसी वीर क्षत्रिय के साथ करेंगे, जो इस धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा देगा।
सीता के लिए तो यह एक सामान्य बात थी। जब भी कभी सीता उसके पास आती-जातीं या उसे स्वयं सफाई करने का ध्यान आता तो वे उसे बड़ी सरलता से उठा लेतीं और पूजा-भाव से नीचे की जमीन साफ करके बड़े आदर के साथ धनुष को वहीं रख देतीं।
महाराज जनक ने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए दूर देश से अनेक राजा। महाराजाओं को आमंत्रित किया और साथ ही यह घोषणा करा दी कि महाराज जनक अपनी पुत्री का विवाह उसी क्षत्रिय से करेंगे, जो इस धनुष को उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाएगा।
इसके लिए उन्होंने धनुष यज्ञ का आयोजन किया।
राम का जनकपुर आगमन
अयोध्या के महाराज दशरथ बड़े प्रतापी राजा थे। उनकी तीन रानियां थीं-कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा।
महाराज निःसंतान थे। इतने बड़े राज्य का कोई उत्तराधिकारी नहीं था। इससे वे चिंतित रहने लगे।
उनकी राज्य परिषद में अनेक विद्वान महात्मा थे। महर्षि वसिष्ठ राजगुरु थे। उन्हीं के परामर्श पर महाराज दशरथ ने अश्वमेध यज्ञ किया और मुनि ऋष्य शृंग को यज्ञ का पुरोहित बनाया गया।
ऋष्य शृंग के यज्ञ प्रताप से पूर्णाहुति के दिन यज्ञकुंड से एक खीरपात्र प्रकट हुआ। मुनि ऋष्य शृंग ने महाराज से कहा, “लीजिए महाराज! आपकी मनोकामना पूरी हो। यह खीरपात्र लीजिए और अपनी पत्नियों को इसे खिला दीजिए।”
महाराज ने खीरपात्र से आधी खीर कौशल्या को और आधी कैकेयी को दे दी। दोनों रानियों ने अपनी खीर का आधा-आधा अंश सुमित्रा को दे दिया।
समय आने पर अयोध्यापति महाराज दशरथ के यहां क्रमशः चार पुत्र उत्पन्न हुए।
कौशल्या के पुत्र राम, कैकेयी के भरत और सुमित्रा के यहां लक्ष्मण व शत्रुघ्न जन्मे।
महाराज दशरथ इन चार पुत्रों को पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। उनकी खुशी की कोई सीमा न रही। जहां राजमहल में एक भी किलकारी नहीं उभरती थी, वहां चार-चार बच्चों की किलकारियों ने धूम मचा दी।
धीरे-धीरे ये राजपुत्र बड़े हुए। महर्षि वसिष्ठ, वामदेव और जाबालि के संरक्षण में इन्होंने वेद और धनुर्विद्या सीखी।
राम बड़े थे, अतः महाराज दशरथ को अत्यन्त प्रिय थे। राम युद्ध-कुशल भी थे और धीर, गंभीर, दयावान व सहिष्णु भी थे। उनकी ख्याति महाराज दशरथ के चारों पुत्रों में सबसे अधिक थी।
यही सोचकर एक दिन महर्षि विश्वामित्र अयोध्या पधारे।
महाराज दशरथ ने जब सुना कि महर्षि विश्वामित्र पधारे हैं तो उन्हें बहुत अधिक प्रसन्नता हुई।
अपने सिंहासन से उठकर महाराज दशरथ ने मुनि का आर्य पाद्य सेवन करते हुए स्वागत किया और उन्हें राजसभा में उच्च स्थान पर बैठाते हुए कहा, “आज अयोध्या के अहोभाग्य, जो ऋषिवर पधारे हैं।” और फिर उनका यथावत् अभिवादन करते हुए उनसे निवेदन करते हुए कहा, “आज्ञा कीजिए देव! मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं? आपके अयोध्या आगमन का प्रयोजन क्या है?”
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