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कितने पाकिस्तान / Kitne Pakistan PDF Download Free Hindi Book by Kamleshwar 

कितने पाकिस्तान उपन्यास का सारांश
कितने पाकिस्तान उपन्यास Pdf
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Kitne Pakistan English translation
Kitne Pakistan in hindi

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥कितने पाकिस्तान / Kitne Pakistan
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 2.9 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖334
Last UpdatedApril 16, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category

कमलेश्वर का यह उपन्यास मानवता के दरवाजे पर इतिहास और समय की एक दस्तक है... इस उम्मीद के साथ कि भारत ही नहीं, दुनिया भर में एक के बाद एक दूसरे पाकिस्तान बनाने की लहू से लथपथ यह परम्परा अब खत्म हो…
इन कविताओं की रचना के समय कवि की आयु 27-28 वर्ष की थी, अतः स्वाभाविक है कि ये संग्रह यौवन के रस और ज्वार से भरपूर हैं। स्वयं बच्चन ने इन सबको एक साथ पढ़ने का आग्रह किया है। कवि ने कहा है: 'आज मदिरा लाया हूं-जिसे पीकर भविष्यत् के भय भाग जाते हैं और भूतकाल के दुख दूर हो जाते हैं..., आज जीवन की मदिरा, जो हमें विवश होकर पीनी पड़ी है, कितनी कड़वी है। ले, पान कर और इस मद के उन्माद में अपने को, अपने दुख को, भूल जा।''

पुस्तक का कुछ अंश

एक भूली हुई दास्तान उसे याद आती है।

वह तो एक बंजर जमीन से आया था। खामोश आकर्षणों की दुनिया से, जहाँ कहा कुछ भी नहीं जाता। मन ही मन में कुछ अरमान करवटें लेते हैं। अनबूझी इच्छाएँ आती और चली जाती हैं... और कस्बाई सपने छतों पर फैले कपड़ों की तरह धूप उतरते ही बटोर लिए जाते हैं। कुछ अनकहे धुंधले से अक्स स्मृतियों में उलझे रह जाते हैं, जो न घटते हैं न बढ़ते हैं। बस, पानी के दाग़ की तरह वजूद के लिबास पर नक्श हो जाते हैं।

उसका पूरा कस्बा, उसके क़स्बे का अपना मोहल्ला, मोहल्ले की कई खिड़कियाँ भी उसे

मौन हसरत से देखती दिखाई दी थीं। कभी-कभी बरसात के दिनों में लौटते हुए पाँवों के निशान दिखाई पड़ जाते थे। ज्यादा बारिश हुई तो निशान पहले तो भरी आँख की तरह डबडबाते थे, फिर देखते-देखते मिट जाते थे। वापस गए पैर फिर नज़र नहीं आते थे। कुछ आँखें थीं, जो कहना तो बहुत कुछ चाहती थीं, पर उन्होंने कभी कुछ कहा नहीं था। कहीं कोई काजल लगी आँख उलझी थी। किसी खिड़की में हल्की-सी कोई परछाईं। किसी में इशारा करती कोई उँगली। कहीं शरमा के लौटते हुए अधूरे अरमान और कहीं किसी मजबूरी की कोई दास्तान.....

अजीब दिन थे।

नीम के झरते हुए फूलों के दिन।

कनेर में आती पीली कलियों के दिन।

न बीतनेवाली दोपहरियों के दिन।

और फिर एक के बाद एक, लगातार बीतते हुए दिशाहीन दिन। उन दिनों भविष्य कहीं था ही नहीं। एक व्यर्थ वर्तमान साथ था जो बस, चलता जाता था। यह आज़ादी से ठीक पहले का दौर था। रेलगाड़ियों में आरक्षण की सुविधा और सिस्टम नहीं था। अब उसे याद नहीं विद्या शायद साइंस में थी, पर छुट्टियाँ साथ-साथ होती थीं, इसलिए वे इलाहाबाद स्टेशन पर मिल ही जाते थे। विद्या फतेहगढ़ की थी। तीज-त्योहार और फिर गर्मियों की छुट्टियाँ अपने-अपने घर जाने के लिए एकाध बार तो उससे ऐसे ही मुलाकात हुई, फिर जब भी कोई छुट्टी आती तो स्टेशन पर एक-दूसरे का इंतजार करने लगे। न मालूम यह कैसा लगाव था कि प्लेटफार्म पर, एक तब तक रुका रहता था, जब तक दूसरा आ नहीं जाता था। अनकहे तरीके से यह तय हो गया था कि छुट्टी होने वाले दिन की सुबह, पहली पैसिंजर गाड़ी से ही सफ़र किया जाएगा। उन दिनों भी कुछ तेज़ एक्सप्रेस गाड़ियाँ चलती थीं, पर उन्हें पैसिंजर ही पसंद थी। वह धीरे-धीरे चलती और हर स्टेशन पर रुकती थी।

उन दोनों को साथ-साथ सफ़र करते, छोटे-छोटे स्टेशनों के नाम रट गए थे। अब बमरौली आएगा। अब मनौरी, अब सैयद सरावां और फिर भरवारी और सिराथू उसके बाद फतेहपुर। और फिर... फिर कानपुर स्टेशनों के नाम के साथ-साथ पढ़ते थे और किस स्टेशन पर कितनी जल-क्षमता वाली टंकी विशाल कुकुरमुत्ते की तरह खड़ी है, यह भी उन्हें याद हो गया था। इंजन किस स्टेशन पर पानी लेगा, यह भी उन्हें पता था। कुछ ऐसा भी था जो दोनों को एक साथ व्यापता था। उनके मन की अनकही इच्छाओं के पल एकाएक एक साथ जुड़ जाते थे। अब यही, जैसे भरवारी स्टेशन के समोसे अभी विद्या कहने को ही होती थी कि वह बोल पड़ता था-खट्टी चटनी... या फिर फतेहपुर की दही की पकौड़ियों पर मीठी चटनी। कभी-कभी वह भागते पेड़ों में से किसी एक को सहसा एक साथ देखते थे।

फिर कुछ स्टेशनों का साथ और... चाहते तो दोनों नहीं थे, पर कानपुर आ ही जाता था। विद्या वहीं उतर कर फतेहगढ़ वाली गाड़ी बदलती थी। कानपुर से उसे छोटी लाइन पकड़नी होती थी, जिसका प्लेटफार्म आखिरी था। बीच में बड़ी लाइन के कई प्लेटफार्म थे। उन दिनों 'टाटा' और 'बॉय बॉय' नहीं होता था। फ्लाइंग किस तो था ही नहीं। खामोशी की गहराई ही शायद लगाव का पैमाना था। विद्या चुपचाप उतरती थी। वह उसका झोला या टीन का छोटा बक्सा या किताबों का बस्ता उठाकर थमा देने में मदद कर देता था। उन दिनों लेट होने पर गाड़ियों भी एक-दूसरे का इन्तजार कर लेती थीं। विद्या 'अच्छा' कहकर पुल पर चढ़कर अपनी गाड़ीवाले प्लेटफार्म पर चली जाती थी। वह उसे छोड़ने या विदा देने नहीं जा पाता था, क्योंकि तब तक....

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