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कश्मीर लाइव / Kashmir LIVE PDF Download Free Hindi Book by Dharmesh Gandhi

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Nameकश्मीर लाइव / Kashmir LIVE
लेखक / Author
आकार / Size4.4 MB
कुल पृष्ठ / Pages120
Last UpdatedMarch 17, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category

झीलसारा अमीन, जिसे जर्नलिज्म में अपना करियर बनाना है। लेकिन उसके पहले धरती की इस जन्नत से भारतीय संविधान की धारा 370 रद्द होती है। जिसके बाद कश्मीर घाटी में जन्म लेने वाले विरोध की आँधी के बीच उसके सपने जाने कहाँ उड़ जाते हैं।

कश्मीर की वादियों में कहीं बर्फबारी की ठंडक है तो कहीं बम ब्लास्ट की प्रचंड गर्मी। एक न्यूज़ चैनल के कैमरामैन के लेंस से कश्मीर की हसीन वादियों की वेदना और संवेदना के प्रतिबिंब से रूबरू होने के लिए पढ़िए - कश्मीर live

पुस्तक का कुछ अंश

प्रकरण-1 आक्रोश

है हक़ हमारा, आज़ादी।
हम ले के रहेंगे, आज़ादी।
हम छिन के लेंगे, आज़ादी।
हज़ारों लोगों की आवाज़ें घाटी से उठती हुई एक बुलंद शिखर को जैसे छू रही थी, “आज़ादी... आज़ादी... वी वोन्ट फ्रीडम... हम चाहते हैं – आज़ादी...।' के नारें गूँज रहे थे। माहौल गरमाया हुआ था। सभी उम्र के पुरुष और महिला, युवा और बूढ़े, 'आज़ादी-ए-कश्मीर मार्च' और “फ्रीडम इन कश्मीर” के बड़े-बड़े बैनरों के साथ अपने कदम आगे बढ़ा रहे थे। पूरी भीड़ एक विशाल पुल से गुजरकर पहले से तय किये गए एक बड़े से मैदान में इकट्ठा होने जा रही थी। हवा में अपने-अपने हाथ लहराते हुए हर कोई जोर-जोर से चिल्ला रहा था, “गो इंडिया, गो बैक।' लिखे हुए लाल-पीले प्ले कार्ड हिलाती हुई भीड़ चिल्ला रही थी, “इंडिया केन नोट किल अवर स्पिरिट। भारत हमारी आत्मा को नहीं मार सकता।”
उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और दोनों हाथों को अपने कानों के ऊपर दबा दिया। लेकिन धुएँ से मिश्रित आक्रोश कितना भी भारी क्यों न हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। तार की बाड़ जैसे मजबूत बंधन की परवाह किये बिना वह अपने तरीके से अपना रास्ता बना ही लेता है। घाटी से उठने वाला सुलगता हुआ धुआँ पहाड़ों की ऊँचाई में तब्दील होकर उसके चारों ओर घूम रहा था। विशाल मैदान से बाहर निकलता हुआ आक्रोश उसकी हथेली और कान को चीरता हुआ सीधा उसके मस्तिष्क में फ़ैल रहा था। जगह-जगह लगाया गया कर्फ्यू और संदेश व्यवहार का प्रतिबंध उसके दिमाग को हिला रहा था।
घाटी की सड़कों पर कभी गहरा सन्नाटा छा जाता था तो कभी-कभी किसी नफ़रत का तेज बवंडर शोर मचा दिया करता था। कहीं पर अन्याय होने की भावनाएँ हमले बनकर अफरा-तफरी मचा रही थी, तो कहीं पर मानव अधिकार एक नया चेहरा बनाने के लिए उग्र स्वरूप धारण कर रहा था। वह जानता था कि ऐसी स्थितियों का अब उसे कई दिनों तक, शायद कई महीनों तक, सामना करना पड़ सकता है।
स्वर्ग का केवल यही रूप है – सुंदरता, भव्यता और महानता। लेकिन यहाँ कश्मीर की इस घाटी में स्वर्ग का एक और भी रूप, भयानक रूप दिन प्रतिदिन फैलता जा रहा था। कुछ आवेग जो दशकों से घर कर गये थे, अब उनको अपनी आँखों से देखना था। वातावरण में फैले हुए गुस्से से जैसे वह खुद को छिपा लेना चाहता था। उसने अपने दोनों घुटनों के बीच सिर दबाया और खुद को खुद में लपरटना शुरू कर दिया।
हजारों की भीड़ में शामिल हर कोई अलग-अलग बैनरों के साथ एक निश्चित जगह पर इकट्ठा होने के लिए थिरक रहा था। कोई 'आज़ाद कश्मीर' तो कोई पाकिस्तान का झंडा लहराते हुए एक विशाल मैदान की ओर बड़ी बेताबी के साथ चल रहा था। कई युवक और युवतियाँ अपने गले में स्कूल-कॉलेज के पहचान पत्र के साथ बैनर हिला रहे थे। कुछ बच्चों ने काले रंग की तो कुछ बच्चों ने सफ़ेद रंग की युनिफोर्म पहनी हुई थी। लोग पूरे जोश के साथ रैली में भाग ले रहे थे।
लाउड स्पीकर के माध्यम से एक गर्जना पूर्ण बयान गूँज उठा, 'मुजफ्फराबाद की स्कूलों के सभी बच्चों का इस रैली में स्वागत है। हम अब और अन्याय नहीं सहेंगे। दिखा देंगे हिन्दुस्तान को भी, हम आज़ाद कश्मीर के सिपाही है। हम अपने अधिकारों का पालन करेंगे। हम ईंट का जवाब पत्थर से देंगे!'
'इंडियन फोर्सेस, लीव कश्मीर' के कई बैनरों के साथ इकट्ठा हुई भीड़ एक बदसूरत माहौल पैदा कर रही थी। हर युवा और महिला पूरी आवेग के साथ हवा में हाथ लहरा रहे थे। राजधानी के माहौल में एक बार फिर नारा गूँज उठा –
तेरी शान, मेरी आन,
कश्मीर बनेगा पाकिस्तान।
एक 12 से 15 साल की लड़की अपने सिर पर 'स्टॉप किलिंग इन कश्मीर' नामक सफेद पट्टी लगाकर तेजी के साथ हवा में अपना हाथ लहरा रही थी। घुटने से भी नीचे तक फैली हुई एक लंबी आस्तीन वाली सफेद शर्ट उस लड़की को निर्दोष साबित करने के लिए मानो कमजोर साबित हो रही थी।
वह लड़की, जिसका नाम सेहरिश था, चेहरे पर एक खास मकसद लेकर आई थी। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें चारों तरफ़ घूम रही थीं। वे किसी लक्ष्य के ऊपर टिकी थीं। वह अपनी कोहनी से अपने बाएँ हाथ को ऊपर-नीचे झूला रही थी, मानो उसके शरीर में जमा पूरी ताकत दाँव पर लगा रही हो। कम उम्र की उसकी तेज आवाज माहौल को गंभीरता से भर रही थी। पूरी ताकत से उसके मुँह से एक चीख गूँज उठी –
उठो तकबीर के नारों की गर्ज से,
जाबिर ज़ालिम के इवान को हिला दो।
जो हिंदुइज़म करने लगा है हमारे कश्मीर में,
उस काफिर मर्दूद का कश्मीर में शमशान बना दो।
उसी उम्र के अन्य छात्र, सेहरिश के पीछे खड़े होकर जोर-जोर से नारे लगा रहे थे। यहाँ तक कि उसके हाथों की मुट्ठियाँ भी आक्रोश से हवा में लहरा रही थीं।
एक झटके के साथ उसने अपना सिर हिला दिया, जैसे कि उन बुरे विचारों को दूर करने की कोशिश कर रहा हो जो उसके मस्तिष्क में घुसपैठ कर रहे थे। उसने अपना मुँह उठाया। उसकी नज़र अखरोट के रंग से और ऐसे ही लकड़े से बनी हुई आईने की नक्काशीदार फ्रेम के ऊपर चिपक गई, “होटल दावत-ए-जन्नत” के लेबल को पढ़ते हुए मन-ही-मन वह बड़बड़ाया, “जन्नत” और फिर एक थकी हुई मुस्कान रिहा की।
क्या यह वही जगह है जिसे लोग “धरती का स्वर्ग' कहते हैं? उसने खुद महसूस किया कि उसकी मुस्कान में लगभग कोई हँसी नहीं थी, कोई ख़ुशी नहीं थी। थी तो सिर्फ और सिर्फ पीड़ा की उपस्थिति। उसकी निगाहें वहाँ से खिसककर फ्रेम के अंदर रहे वृत्ताकार आईने में चली गईं; फिर वहीं पर जम गईं। उसने अपने चेहरे पर टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं को देखकर एक बार फिर अपना सिर झुका लिया। पसीने से तर चेहरे पर ठंडे पानी की बौछार करके उसने दो घूँट पानी पीया। उसके दिमाग में अटका हजारों प्रदर्शनकारियों का शोर बाहर निकलने के लिए जैसे अपना दम तोड़ रहा था।
कुछ दिन पहले एक न्यूज चैनल पर उसने जो वीडियो देखा था, वह बार-बार उन्हें परेशान कर रहा था, जिससे उनके मन में परेशानियों का बवंडर पैदा हो रहा था। हजारों की भीड़ से उठ रहे नारे उसे परेशान कर रहे थे। पिछले हफ़्ते मुजफ्फराबाद में जो दृश्य खड़ा हुआ था वह एक जिद्दी साधक की तरह उसकी आँखों के सामने अटक गया था।
“यूएनओ, युनाईटेड नेशन्स ऑर्गनाइजेशन्स की जगह अनेबल नेशन्स ऑर्गनाइजेशन्स है!” काले रंग की पोशाक में एक महिला बोल रही थी। उसकी गहरी-गहरी आँखें मासूम लग रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में मचल रही घृणा किसी से छिपी नहीं रह सकती थी।
“अगर दुनिया सो रही है, हम तो जाग रहे हैं न। हमें ये देखना है कि अगर दुनिया सो रही है, तो हम तो जाग रहे हैं न। हमने कश्मीर के लिए क्या किया है?” उसका नाम उसके गले में लटके पहचान-पत्र पर पढ़ा जा सकता था, आयशा। उसके चारों ओर खड़े छात्रों के हाथों में लगभग बीस फीट लंबा एक बैनर लटका हुआ था। बड़े-बड़े लाल अक्षरों में बैनर के ऊपर लिखा हुआ विधान वीडियो में स्पष्ट रूप से पढ़ा जा सकता था, “रीड फाउंडेशन साइंस कॉलेज, मुजफ्फराबाद।”
अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। वह चौंक पड़ा। वह पलक झपकते ही उसी समय मुजफ्फराबाद के विशाल मैदान में फैली भीड़ में से होटल के अपने कमरे में गिर पड़ा। बंद दरवाजे पर उसकी आँखें चौड़ी होकर ठहर गईं। वह धीमी गति के साथ आगे बढ़ा जैसे खुद ही खुद को संभाल रहा हो। धीरे से उसने अंदर से लॉक किया हुआ दरवाजा खोला।
“अनिकेत सर! दस मिनट में कैमरा, माइक्रोफोन और आवश्यक शूटिंग-सेटअप के साथ तैयार हो जाइए।” जैसे ही दरवाजा खोला गया एक मीठी आवाज़ कमरे के अंदर चली आई, “बॉस लिमिटेड स्टाफ के साथ रिपोर्टिंग के लिए रवाना हो रहे हैं।”
“लेकिन काज़ुमी, श्रीनगर के सुरक्षा अधिकारी साहब की अनुमति भी तो...!”
“हमने पहले ही ले ली है सर! बॉस ने सारी औपचारिकताएँ पूरी कर ली हैं। दस्तावेज और कागज़ात थी तैयार हैं।” काज़ुमी ने हँसते हुए कहा। दूसरे क्षण वह होटल के लकड़ी के फर्श पर अपनी सैंडल की ठक-ठक छोड़ती हुई चली गई। अनिकेत ने महसूस किया कि काज़ुमी के पैरों में एक सख्ती है। उसका हर कदम दृढ़ता से भरा हुआ है।
जैसे ही काज़ुमी उसकी दृष्टि से गायब हुई, उसका दिमाग फिर से विचारों के भंवर में फँसता चला गया। वह इतना परेशान क्यों है? उसने सोचा। ये सभी चीजें आम बात हैं। यह उसके लिए सामान्य ही होना चाहिए।
तो यह सब अराजकता! वह खुद भाग रहा है! किससे? धरती के स्वर्ग की वर्तमान स्थिति से? सीमा पार के छल से? या अपने काम से ही? या फिर...।
उसने अपना सिर दबा लिया।
गृहमंत्री ने संसद में कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की घोषणा की और कुछ लोगों की आवाज़ का घृणित बड़बोलापन कम होने का नाम ही नहीं ले रहा। कैमरा और शूटिंग किट को बैग में ठीक तरह से रखते हुए वह बड़बड़ाया। बिस्तर पर आधी खुली पड़ी एक मैगज़ीन की कवर-स्टोरी पर उसने फिर एक बार गौर किया, ‘पाकिस्तान ने अपने नियंत्रण में रखे तकरीबन तेरह हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक के क्षेत्र को ‘आज़ाद कश्मीर’ का अलग और सुहाना नाम दे दिया। देश का विभाजन हो गया और पाकिस्तान ने एक लाख बीस हज़ार वर्ग किमी का हिन्दुस्तान के कश्मीर का हिस्सा छीन लिया। यह एक छिना हुआ क्षेत्र हो या आज़ाद कश्मीर, शासक तो पाकिस्तान ही रहा है।’
ये ‘आज़ाद कश्मीर’ नाम से जाने जाते विस्तार की राजधानी मुजफ्फराबाद में स्थानीय लोगों के साथ-साथ स्कूल-कॉलेज के हज़ारों छात्रों भी इकट्ठा हो गये थे। उनके हाथ में प्लेकार्ड्स और मुँह में भारत विरोधी नारे लेकर सब लोग अपना आक्रोश प्रकट कर रहे थे। वह शायद सोच रहें होंगे कि अनुच्छेद 370 यानी उनके मानव अधिकारों का उल्लंघन। वे इनके हकदार थे और मानो अब वह निराधार हो चुके हो।


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