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इम्प्रूव योर मेमोरी पॉवर | Improve Your Memory Power in Hindi PDF Download Free by Arun Sagar Anand

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥इम्प्रूव योर मेमोरी पॉवर PDF | Improve Your Memory Power
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 26 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖212
Last UpdatedAugust 7, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category

इस प्रतिस्पर्धी दुनिया में, केवल कड़ी मेहनत से सफलता प्राप्त नहीं की जाती है। सफलता पाने के लिए आपको कई तरह की तकनीकों का इस्तेमाल करना होगा।
प्रस्तुत पुस्तक में इस दिशा में सराहनीय प्रयास किए गए हैं। इसकी मदद से आप न केवल अपनी मेमोरी बढ़ा सकते हैं, बल्कि परीक्षा में अच्छे अंक भी प्राप्त कर सकते हैं।
इसके बजाय, प्रस्तुत पुस्तक में मेमोरी बढ़ाने के लिए 30 दिनों की तकनीक है, जिसके अनुसार कोई व्यक्ति केवल 30 दिनों में अपनी याददाश्त विकसित कर सकता है और परीक्षाओं आदि में अच्छा कर सकता है। कोई भी अंक प्राप्त करके मेधावी बन सकता है।
इस पुस्तक में आप पाएंगे:
* कल्पना शक्ति कैसे विकसित करें, एकाग्रता शक्ति कैसे विकसित करें
* अच्छी स्मृति के महत्वपूर्ण सूत्र और दैनिक कार्यों को कैसे याद रखें।
* सफलतापूर्वक पढ़ाई कैसे करें, मेरिट में कैसे आएं
* नोट्स कैसे तैयार करें, टेलीफोन नंबर, चेहरे और नाम कैसे याद रखें
* जन्मदिन और इतिहास की महत्वपूर्ण तारीखें कैसे याद रखें
युवा हों या बूढ़े, छात्र हों या व्यापारी, सभी को अच्छी याददाश्त की आवश्यकता होती है। इसलिए यह पुस्तक न केवल सामान्य पाठकों के लिए उपयोगी है, बल्कि यह छात्रों को परीक्षा में टॉप करने के लिए उपयुक्त है।

 

पुस्तक का कुछ अंश

प्रकाशकीय
प्रबद्ध पाठकगण! प्रस्तुत पुस्तक ‘अपनी स्मरण-शक्ति बढ़़ायें’ को आपके समक्ष रखते हुए हमें बेहद हर्ष हो रहा है, वर्तमान में बाजारों में ‘मस्तिष्क’ की क्षमता बढ़ाया, मेमोरी पावर को विकसित करने के लिए अनेक पुस्तके मिलती हैं, जिनमें बढ़-चढ़कर अनेक दावे, वायदे किये गये रहते हैं, किन्तु इम्प्रूव योर मेमोरी पॉवर की यह पुस्तक विशेष रूप से आम पाठकों के लिए उपयोगी है।
इसी कड़ी में विद्यार्थियों व सामान्य पाठकों की याददास्त को विकसित करके उनकी मेमोरी पावर को बढ़ाने के लिए मनोवैज्ञानिक विधि से विज्ञान सम्मत तरीके बताने के लिए यह पुस्तक ‘इम्प्रूव योर मेमोरी पॉवर’ आपके समक्ष प्रस्तुत है।
इस पुस्तक में स्मरण-शक्ति बढ़ाने की जितनी भी तकनीकें बतायी गयी हैं, वे पूर्ण रूप से मनोवैज्ञानिक हैं। इसमें लेखक द्वारा कहीं भी कपोल कल्पना का सहारा नहीं लिया गया है।
इस पुस्तक में विद्यार्थियों एवं सामान्य पाठकों की स्मरण-शक्ति बढ़ाने के अनेक, वैज्ञानिक तथा यौगिक क्रियाएँ दी गयी हैं, जिन्हें अपनाकर वे अपनी मानसिक क्षमता को बढ़ा सकते हैं। ये उपाय विशेषज्ञों द्वारा आजमाये हुए, परीक्षित तथ्य हैं। इनमें कोई काल्पनिक उड़ान नहीं है, अपितु वास्तविकता का स्पर्श है।
इस पुस्तक की यह विशेषता है कि इसके तीस पाठों में तीस दिन में त्वरित गति से स्मरण-शक्ति बढ़ाने के तरीके दिये गये हैं। विद्यार्थी/पाठक प्रत्येक दिन पाठ में बताये गये कार्यक्रम के अनुसार अध्ययन करेगा, तो तीसवें दिन निश्चय ही उसकी स्मरण-शक्ति बढ़ जायेगी और वह अपनी जीवन परीक्षा के प्रत्येक पड़ाव पर सफ़ल होगा।
इस पुस्तक की विशेषता यही है कि इसे पाठकों के साथ-साथ विद्यार्थियों के लिए भी लिखा गया है।
अकसर ऐसा होता है कि कुशाग्र-से-कुशाग्र बुद्धि वाला छात्र भी परीक्षा में अव्वल नहीं आ पाता, क्योंकि वह अध्ययन करने के तौर-तरीक़ों को नहीं समझता। इस पुस्तक में न केवल सफ़ल अध्ययन के बारे में विस्तार से बताया गया है, बल्कि इस बात की भी चर्चा की गयी है कि परीक्षा के अन्तिम दिनों में विद्यार्थियों को किस तरह से अपनी परीक्षाओं की तैयारियाँ करनी चाहिए और अव्वल कैसे आना चाहिए।
आशा है, यह पुस्तक विद्यार्थियों/पाठकों का मनोरंजन तो करेगी ही उनकी मानसिक क्षमता को बढ़ाने में भी सहायक होगी। प्रत्येक विद्यार्थी/ पाठक के लिए उपयोगी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और उत्कृष्ट पुस्तक है यह-
‘इम्प्रूव योर मेमोरी पॉवर’।
-प्रकाशक
प्रस्तावना
प्रिय पाठकों!
यह पुस्तक मैंने विशेषतः आपके लिए लिखी है।
आप यह ज़रूर जानना चाहेंगे कि मैंने यह पुस्तक आपके लिए क्यों और किस वजह से लिखी?
आजकल बाज़ार में स्मरण-शक्ति बढ़ाने वाली पुस्तकों का अम्बार लगा हुआ है और लगभग सभी में एक ही बात घुमा-फि़रा कर लिखी हुई है। मेरी बरसों से ख़्वाहिश थी कि मैं मेमोरी पॉवर पर एक ऐसी पुस्तक लिखूँ, जिसका फ़ायदा विद्यार्थियों के साथ-साथ एक आम पाठक भी उठा सके।
इसलिए मैंने इस पुस्तक को सरल व बोलचाल की भाषा में लिखा है। मुझे यक़ीन है कि अगर आप इस पुस्तक में बतायी गयी तकनीकों पर अमल करेंगे, तो आप अपनी स्मरण-शक्ति को दोगुनी-तिगुनी नहीं, बल्कि चौगुनी विकसित कर सकते हैं।
लेकिन इसके लिए आपको अपने मस्तिष्क पर विश्वास करना होगा। यदि आपको अपने मस्तिष्क पर पूरा भरोसा है, तो दुनिया की कोई भी ताक़त आपको असफ़लता की ओर नहीं ले जा सकती। आपको बस ज़रूरत है, अपने विश्वास को सकारात्मक (Positive) बनाने की। आप यक़ीन कीजिए, इस सकारात्मक (Negetive) विश्वास के सहारे आप कठिन-से-कठिन कार्य आसानी से करके अपने जीवन की ऊँचाइयों तक पहुँच सकते हैं। जबकि नकारात्मक विश्वास आपको केवल असफ़लता की ओर ले जाता है। नकारात्मक विचार सफ़लता के बीच एक ऊँची चट्टान के समान है, जो कभी-कभी हाथ आयी हुई बाज़ी को भी हाथ से निकाल देता है।
कोई भी व्यक्ति नकारात्मक विश्वास की दलदल में फ़ँसकर अपने लक्ष्य तथा सफ़लता से दूर होता चला जाता है। आपको इसी दलदल से बाहर आकर सफ़लता के मध्य आने वाली बाधाओं से निजात पानी है। और, इसके लिए आपको निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना होगा।
 
आपको अपने मस्तिष्क को हमेशा यही निर्देश देना होगा कि आप सब कुछ कर सकते हैं। अगर आपको परीक्षाओं में अच्छे अंक प्राप्त करने हैं, तो आप अच्छे अंक पाकर ही रहेंगे।
 
आपको अपने मस्तिष्क को हमेशा तनाव से दूर रखना होगा। असल में तनाव आपकी बहुत सारी शक्ति नष्ट कर देता है।
 
किसी भी कार्य को करने से पहले आपको अपने मन में उस कार्य की सफ़लता के लिए विश्वास पैदा करना होगा। मैं आपको यक़ीन दिलाता हूँ कि आपकी यही भावना आपको सफ़लता दिलायेगी।
इसके अलावा यह बात भी आप ध्यान में रखें कि जब भी आप किसी कार्य को हाथ में लेते हैं या कोई समस्या सुलझाने की स्थिति में आ जाते हैं, तो अपने मस्तिष्क से विचार-विमर्श कीजिए और उसके उत्तम विचारों को जानने के बाद ही कोई उचित निर्णय कीजिए। याद रखिए, इन सब बातों पर ग़ौर करने के बाद उचित दिशा में उठाया गया सार्थक कदम आपको निश्चित रूप से सफ़लता दिलायेगा।
इस पुस्तक में इन सभी बातों पर गहराई से प्रकाश डाला गया है। मुझे उम्मीद ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि यह पुस्तक विद्यार्थियों को तो लाभान्वित करेगी ही, साथ-ही-साथ आम पाठकों की भी स्मरण-शक्ति बढ़ाने में मील के पत्थर की भूमिका निभायेगी।
इस पुस्तक के लेखन के लिए मैं ‘वी एण्ड एस’ पब्लिशर्स के युवा डायरेक्टर श्री साहिल गुप्ताजी का विशेष रूप से आभारी हूँ, जिन्होंने पाण्डुलिपि को पढ़कर कई ज़रूरी सुझाव दिये।
प्रस्तुत पुस्तक के विषय में आपके सुझावों का मुझे इन्तज़ार रहेगा।
-अरुण सागर ‘आनन्द’
समर्पण
अरुणिमा को!
जिसकी मधुर स्मृतियाँ
हमेशा मेरे सृजनात्मक
लेखन की प्रेरणा-स्रोत रहीं!
विषय-सूची
भाग-1
  • दिमाग की ताकत कैसे बढ़ायें
  • पहला दिन-अपने मस्तिष्क को पहचानें
  • दूसरा दिन-सीखने की कला कैसे विकसित करें?
  • तीसरा दिन-अवलोकन-शक्ति कैसे विकसित करें?
  • चौथा दिन-कल्पना-शक्ति कैसे विकसित करें?
  • पाँचवाँ दिन-निर्णय-शक्ति कैसे विकसित करें?
  • छठा दिन-एकाग्रता-शक्ति कैसे बढ़ायें?
भाग-2
  • स्मरण-शक्ति कैसे बढ़ायें?
  • सातवाँ दिन-क्या कहता है, मनोविज्ञान ‘स्मृति’ के बारे में...
  • आठवाँ दिन-उत्तम स्मृति के मूल मन्त्र
  • नौवाँ दिन-सम्बन्ध/शृंखला-विधि (Chain Method)
  • दसवाँ दिन-स्मृति की भाषा
  • ग्यारहवाँ दिन-संख्या आकृति-विधि
  • बारहवाँ दिन-वर्णमाला एवं यादगार घटनाएँ-विधि
  • तेरहवाँ दिन-पुनरावृत्ति
  • चौदहवाँ दिन-स्मृति-चिह्नों की परीक्षा
  • पन्द्रहवाँ दिन-खूँटी-सिद्धान्त
  • सोलहवाँ दिन-खूँटी-सिद्धान्त द्वारा दैनिक कार्यों को कैसे याद किया जाये?
  • सतरहवाँ दिन-टेलीफोन नम्बर, चेहरे व नामों को कैसे याद रखे?
  • अठारहवाँ दिन-जन्मदिन -व इतिहास की महत्त्वपूर्ण तिथियाँ कैसे याद करें?
  • उन्नीसवाँ दिन-विभिन्न विषयों से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण तथ्य कैसे याद करें?
  • बीसवाँ दिन-भाषण व निबन्ध कैसे याद करें?
भाग-3
  • परीक्षा में अव्वल कैसे आयें
  • इक्कीसवाँ दिन-कुछ बातें विद्यार्थियों से
  • बाईसवाँ दिन-पढ़ाई का तनाव और आप
  • तेईसवाँ दिन-ध्यान लगाओ...तनाव भगाओ
  • चौबीसवाँ दिन-नोट्स कैसे तैयार करें?
  • पच्चीसवाँ दिन-टाइम मैनेजमेण्ट
  • छब्बीसवाँ दिन-सफल अध्ययन कैसे करें?
  • सत्ताईसवाँ दिन-आत्मविश्वास कैसे बढ़ायें?
  • अठ्ठाईसवाँ दिन-परीक्षा के अन्तिम दिनों में क्या करें?
  • उन्तीसवाँ दिन-मेरिट में आने के लिए क्या करें?
  • तीसवाँ दिन-अपनी स्मरण-शक्ति फिर से परखिए
  • ....और अन्त में
भाग-1
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दिमाग की ताकत कैसे बढ़ायें
पहला दिन-अपने मस्तिष्क को पहचानें
मानव-मस्तिष्क एक पैराशूट की तरह है। जब तक वह खुला रहता है, तभी तक कार्यशील रहता है।
-लॉर्ड डेवन
मनुष्य के शरीर में मस्तिष्क ऐसी चीज़ है, जो किसी बन्धन को नहीं मानती।
-जवाहर लाल नेहरू
मनुष्य का मस्तिष्क बंजर खेत की तरह है। जब इसमें बाहर से मसाला नहीं आयेगा, इसमें कुछ पैदा नहीं हो सकता।
-रेनॉल्ड्स
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प्रिय पाठकों! "इम्प्रूव योर मेमोरी पॉवर" क्लास रूम में आपका स्वागत है। आप यहाँ अपनी स्मरण-शक्ति विकसित करने के उद्देश्य से आये हैं। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि अगर आप मेरे द्वारा बतायी गयी तकनीकों पर बिना नागा किये अमल करेंगे, तो आपकी स्मरण-शक्ति, दोगुनी-तिगुनी नहीं, बल्कि चौगुनी विकसित हो जायेगी।
 
आपको यह जानकर बेहद हैरानी हो रही होगी कि मात्रा एक किताब पढ़ने से आपकी स्मरण-शक्ति चौगुनी कैसे हो सकती है, जबकि आपने कई दिग्गज लेखकों की स्मरण-शक्ति बढ़ाने वाली महँगी पुस्तकें न केवल पढ़ी हैं, बल्कि उन्हें दिन-रात रट्टा लगाकर कण्ठस्थ भी किया हुआ है, फिर भी आप अपनी मेमोरी अपने मनमाफि़क विकसित न कर सके।
प्यारे पाठकों! सच बात तो यह है कि कुछ पुस्तकें बाहर से देखने के लिए होती हैं और कुछ पुस्तकें अन्दर से झाँकने के लिए। कुछ पढ़ने के लिए और कुछ समझने के लिए। यह पुस्तक जो आपके हाथों में है, न केवल पढ़कर समझने के लिए है, बल्कि समझकर प्रयोग करने के लिए भी है। परन्तु आप इस पुस्तक में दी गयी विशेष मनोवैज्ञानिक विधियों का प्रयोग और सदुपयोग तभी कर पायेंगे, जब आप इसमें दिये गये अभ्यासों पर अच्छी तरह से अभ्यास करेंगे।
आज हम मस्तिष्क के बारे में चर्चा करेंगे, क्योंकि हमारी स्मरण-शक्ति को विकसित करने का कार्य मस्तिष्क ही करता है।
 
वास्तव में, हमारा मस्तिष्क प्रकृति की अनमोल देने है। यह मनुष्य की शक्तियों का भण्डार है। यह अद्भुत शक्ति आपको तभी मिल सकती है, जब आप इसका उपयोग करना सीख लेंगे। इसका इस्तेमाल करने से पहले आइए! हम एक नज़र इसकी कार्य-प्रणाली पर डालते हैं।
मस्तिष्क बहुत ही कोमल अंग है। यह आठ हड्डियों से बने एक कोष्ठ (खोपड़ी) में सुरक्षित रहता है। इसकी बनावट अखरोट से मिलती-जुलती है तथा इसका रंग भूरा होता है। इसके आगे-पीछे की लम्बाई लगभग 6 इंच तथा दायें-बायें की चौड़ाई लगभग 5 इंच होती है। पुरुष के मस्तिष्क का भार जहाँ लगभग 50-60 औंस होता है, वहीं स्त्री के मस्तिष्क का भार लगभग 45-50 औंस होता है।
संसार के सभी प्राणियों में मनुष्य का मस्तिष्क सबसे विकसित माना गया है। इसमें लगभग 1000 खरब स्नायु-कोशिकाएँ होती हैं, जिन्हें ‘न्यूरॉन’ कहा जाता है। हमारा मस्तिष्क दो भागों में बँटा हुआ है। इन दोनों भागों को दायाँ व बायाँ गोलार्द्ध कहा जाता है। ये दोनों गोलार्द्ध तन्तुओं के माधयम से आपस में जुड़े रहते हैं। हमारे शरीर से सम्बन्धित सभी क्रियाओं का विभाजन मस्तिष्क द्वारा ही किया जाता है। हमारे शरीर के बायें हिस्से का संचालन जहाँ मस्तिष्क का दायाँ गोलार्द्ध करता है, वहीं दायें भाग का संचालन बायाँ गोलार्द्ध करता है।
मस्तिष्क का बायाँ भाग जहाँ बोलने, तार्किक-विश्लेषण, गणना करने, सोचने का काम करता है, वहीं दाहिना भाग कल्पना, संगीत, शारीरिक-अभिव्यक्तियों, दुनिया को जानने, ज्यामिति गणित, और अन्य जटिल गणनाओं का काम करता है। दोनों भाग अलग-अलग होने के बावजूद भी ‘कोरपस केलोमस’ द्वारा आपस में मिलकर मनुष्य की हर गतिविधि का संचालन करते हैं।
मस्तिष्क के बारे में मैं आपको एक ख़ास बात और बता देता हूँ। असल में, दुनिया की अस्सी प्रतिशत आबादी का बायाँ मस्तिष्क सक्रिय है। इसकी वज़ह से दुनिया के ज़्यादातर लोग अपने काम दायें हाथ से करते हैं। दायें हाथ से काम करने की वज़ह से बायाँ मस्तिष्क सक्रिय रहता है। यही वज़ह है कि दुनिया के अधिकतर लोग एक ही तरह से सोचते और काम करते हैं।
दायें को एक्टिव करें
 
मस्तिष्क का बायाँ हिस्सा जहाँ आदेश देता है, शरीर को नियत्रिंत करता है और काम में निपुणता देता है, वहीं मस्तिष्क का दायाँ हिस्सा हमें आज़ादी, जोखि़म और परेशानी उठाने को उकसाता है। यदि आप सफलता की ओर बढ़ना चाहते हैं, तो अपने दाहिने मस्तिष्क को ज्यादा से ज्यादा सक्रिय करें।
चेतन और अवचेतन मस्तिष्क
हमारे शरीर में होने वाली सारी क्रियाओं का नियन्त्रण चेतन और अवचेतन मस्तिष्क द्वारा ही किया जाता है। दोनों को हम कुछ निम्नलिखित बातों से समझ सकते हैं।
 
हमारे दिल की धड़कन कौन नियत्रिंत कर रहा है?
 
शरीर का ताप कौन नियत्रिंत कर रहा है?
 
शरीर की श्वास गति को कौन नियत्रिंत कर रहा है?
 
आँखों की पलकों को कौन झपका रहा है?
यह सब क्रियाएँ अवचेतन मस्तिष्क द्वारा की जाती हैं। इसके अलावा चाय पीना, पढ़ना-लिखना तथा अन्य शारीरिक कार्य चेतन मस्तिष्क करता है।
यहाँ आप यह जान लीजिए कि चेतन व अवचेतन दो मस्तिष्क नहीं हैं। यह एक ही मस्तिष्क में होने वाली दो गतिविधियाँ हैं। आप जो भी बातें अवचेतन मन में छोड़ते हैं, वह उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेता है। यदि झूठी बातों को हमारा चेतन मन सच मान लेता है, तो वह उसी रूप में मान लेगा। इसलिए इस बात का आप हमेशा ध्यान रखें कि जब भी किसी बात को स्वीकार करें, तो अच्छी तरह से सोच-समझकर करें। वरना यह सोच देर-सबेर कभी भी आपको परेशान कर सकती है।
चेतन मस्तिष्क की तुलना में अवचेतन मस्तिष्क ज्यादा शक्तिशाली होता है। अवचेतन पर हमारा नियन्त्रण नहीं होता, फिर भी यह हमारे दैनिक जीवन की क्रियाओं, विचार-शक्ति तथा कल्पना को प्रभावित करता है। चेतन और अवचेतन मस्तिष्क में हमेशा द्वन्द्व चलता रहता है। अवचेतन मन हमेशा चेतन मन द्वारा उपजाये गये भ्रम व द्वन्द्व से खुद को दूर रखते हुए लगातार कार्य करता रहता है। अवचेतन हमारी जागृत अवस्था में ही नहीं, बल्कि सुप्त अवस्था में भी लगातार कार्य करता है। चेतन अच्छे-बुरे के बारे में सोचकर अपने कार्यक्षेत्र से हटने या उस पर बने रहने के लिए प्रेरित करता है।
आप जो-जो चाहते हैं, जिसे पाने की कामना करते हैं, उसके लिए अवचेतन मस्तिष्क को आदेश दें। वह वक़्त आने पर आपकी कामना अवश्य पूरी करेगा। अगर आप चाहते हैं कि आपकी स्मरण-शक्ति ख़ासी विकसित हो, तो आप अपने अवचेतन को बार-बार यह बात याद कराते रहें कि आपको अपनी स्मरण-शक्ति चौगुनी विकसित करनी है। तो आपका अवचेतन मस्तिष्क आपकी यह मनोकामना बड़े चमत्कारिक ढंग से अवश्य पूरी करेगा।
 
अवचेतन मन के बारे में मनोशास्त्री फ्रॉयड ने कहा है कि यह बर्फ के उस बड़े खण्ड के समान है, जो समुद्र में बहता रहता है, जिसका 1/10 भाग पानी के ऊपर और 9/10 भाग पानी के नीचे रहता है। इसी प्रकार हमारी चेतना का भाग बहुत छोटा है और अवचेतन मन का भाग काफ़ी बड़ा है।
हालाँकि आइसवर्ग का थोड़ा-सा भाग दिखायी देता है, फिर भी वह बड़े-बड़े जहाजों को चकनाचूर कर सकता है। इसी प्रकार चेतन मन में थोड़ी-सी ही अवचेतन क्रिया अप्रत्यक्ष रूप से दिखायी देती है, परन्तु उनमें इतनी शक्ति होती छिपी होती है कि वह बड़े-बड़े व्यक्तित्त्व को नष्ट कर देती है।
मस्तिष्क का व्यायाम-न्यूरोबिक्स
 
मस्तिष्क को हमेशा सक्रिय बनाये रखने के लिए व्यायाम की आवश्यकता होती है। मस्तिष्क को सक्रिय न रखा जाये, तो वह कमज़ोर और सख़्त हो जाता है। इससे आपके दिमाग़ के सोचने-समझने की शक्ति कम हो जाती है। साथ-साथ आइडिया (विचारों) का संचारण भी कम होने लगता है। तनाव और बोरियत (ऊब) बढ़ जाती है। उम्र बढ़ने के साथ भी मस्तिष्क की क्षमताएँ घटने लगती हैं। इन सबको रोकने का एक ही उपाय है- 'न्यूरोबिक्स।'
न्यूरोबिक्स को मनोवैज्ञानिक मस्तिष्क का व्यायाम कहते हैं। जब विचारों और सोच का दायरा सिमटने लगता है, नये विचार और कल्पना मस्तिष्क में नहीं उपजते, तब न्यूरोबिक्स का सहारा लेना पड़ता है, ताकि मस्तिष्क के सभी अंग अच्छी तरह से काम करना शुरू कर दें।
न्यूरोबिक्स करने से आप अपने दिमाग़ में समायोजन (Adjustment), अनुकूलन (Adoption), सीखने की योग्यता (Ability to Learning), अर्मूत चिन्तन (Abstract thinking), समझ (Understanding), तथा विवेक (Wisdom) में सुधार पायेंगे।
मनोवैज्ञानिकों ने न्यूरोबिक्स के लिए कई सुझाव दिये हैं, जो बेहद सरल हैं। इन पर अमल करने के बाद आप अपनी मस्तिष्क-क्षमताओं को सारी उम्र पैना बना करके रख सकते हैं।
 
अपनी आँखों में पट्टी बाँधाकर या आँखें बन्द करके अपने कमरे में घूमें और वहाँ रखी चीज़ों को हाथों से छूकर महसूस करें।
 
विभिन्न प्रकार के ताले और उनकी चाबियों का गुच्छेा सामने रखें और आँखें बन्द कर लें। अब ताले को हाथ में लेकर चाबी के गुच्छे में से चाबी ढूँढकर ताले को खोलें।
 
आँखें मूँद कर नहायें। शरीर को पोंछें, कपड़े बदलें। बाथरूम से निकलने तक आँखें बन्द करके रखें।
 
भोजन की थाली आने के पहले आँखें बन्द कर लें। थाली सामने आने पर केवल सुगन्धा से पहचानें कि उसमें क्या-क्या रखा है। इसके बाद हाथ लगाकर पहचानें।
 
कैरम, टेनिस, लूडो, शतरंज, टेबल टेनिस, बैडमिण्टन, ताश आदि के खेल उल्टे हाथ से खेलें। अपने साथी को भी ऐसा करने के लिए कहें।
 
उल्टे हाथ से लिखने की कोशिश करें। चित्र बनायें। उल्टे हाथ से चम्मच से खाना खायें और उल्टे हाथ से लेन-देन के काम करें।
 
उल्टे हाथ से बाल सँवारें।
 
स्कूटर या मोटर-साइकिल पर दूसरी तरफ़ से बैठें।
 
ब्रश करने, शेव करने, सब्ज़ी काटने, मोबाइल फ़ोन पर नम्बर डायल करते समय उल्टे हाथ का प्रयोग करें।
 
टीवी, म्यूजिक सिस्टम, एयर-कण्डीशनर, रिमोट कण्ट्रोल चलाने के लिए उल्टे हाथ का ही इस्तेमाल करें।
 
पहेलियाँ हल करें, शब्द-पहेलियाँ भरें, अन्त्याक्षरी खेलें, किसी भी प्रतियोगिता में हिस्सा लें। जनरल नॉलेज के सवाल-जवाब में हिस्सा लें। वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लें।
 घर-परिवार के लोगों के साथ इशारमें बातचीत करें। न समझ में आये, तो उन्हें इशारों से बार-बार समझाने की कोशिश करें। यह दिमाग़ को तेज़ करने का काफ़ी अच्छा उपाय है।
 
 
दो गेंद लेकर एक साथ खेलें। दोनों हाथों में गेंद लेकर एक साथ उठा लें, उसे पकड़ें। टप्पे के साथ उसे उछालें और पकड़ें। इसे करने में शुरू-शुरू में दिक़्क़त होगी, लेकिन बाद में आपको अच्छा-ख़ासा अभ्यास हो जायेगा।
 
मस्तिष्क को सक्रिय करने के लिए कोई नयी कला, नयी हॉबी या फिर नयी भाषा सीखें।
 
उल्टी गिनती गिनें, उल्टे पहाड़े पढ़ें।
 
पुस्तक को उल्टा करके पढ़ें।
 
 
पूर्व परिचित अपने दस लोगों के नाम व उनके चेहरे आँखें बन्द करके याद करें। उसे लिख लें। ऐसा हर दिन करें। इस बात का ध्यान रखें कि जब नाम व चेहरा याद करें, वह हर बार नये होने चाहिए।
 
किसी की नकल करें। एंकर बनकर टीवी-प्रोग्राम प्रस्तुत करें। किसी का इण्टरव्यू लें।
 
टीवी पर प्रसारित होने वाले जिंगल याद करें। उस जिंगल पर आधार अपने मन से नयी जिंगल बनायें।
 
पुरानी बातों को याद करें। कब आइसक्रीम खायी थी? कब गोल-गप्पा का स्वाद चखा था? घूमने के लिए कहाँ गये थे और वहाँ आपने क्या-क्या किया था। दिल्ली में तेज़ बारिश व कड़ाके की सरदी कब-कब हुई थी।
ध्यान रखें
 
न्यूरोबिक्स का जितना अभ्यास करेंगे, उतना ही आपका दिमाग़ तेज़ होगा।
 
न्यूरोबिक्स के अभ्यास में जल्दबाज़ी न करें। इनसे आपको लाभ तभी मिलेगा, जब आप इन्हें नियमित रूप से समय देकर करेंगे।
 वास्तव में, न्यूरोबिक्स में परफ़ैक्ट होने के लिए धैर्य की जरूरत होती है। मस्तिष्क की तह तक पहुँचने में थोड़ा वक़्त लगता है। सिर्फ एक ही प्रयास से विचलित न हो जायें। अभ्यास जारी रखें।
 
***
दूसरा दिन-सीखने की कला कैसे विकसित करें?
मनुष्य सफलता से कुछ नहीं सीखता, विफलता से बहुत कुछ सीखता है।
-अरबी लोकोक्ति
यदि मनुष्य सीखना चाहे, तो उसकी हर भूल उसे कुछ शिक्षा दे सकती है।
-महात्मा गाँघी
शिक्षा का मतलब केवल पढ़ना-लिखना, सीख लेना ही नहीं है। इसका मतलब है, व्यक्तित्व का विकास। इसके बिना मनुष्य उन्नति की चोटी पर नहीं पहुँच सकता।
-स्वेट मार्डेन
 
प्रिय पाठकों! स्मरण-शक्ति बढ़ाने में आपके सीखने की कला का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। ज़ाहिर-सी बात है कि जब तक आप किसी चीज़ को समझेंगे नहीं, फिर उसे कैसे याद रख पायेंगे। इसलिए आज हम सीखने की कला के बारे में चर्चा करेंगे। मुझे पूरा यक़ीन है कि यह कला आपकी मेमोरी पॉवर को चौगुनी करने में अहम भूमिका निभायेगी।
अगर हम सीखने की परिभाषा को जानना चाहें, तो हमारे सामने यही बात आयेगी कि जिस काम को हम आज नहीं कर सकते, उसे हम कल करना जान लेते हैं, तो इसे ‘सीखना’ कहा जाता है। ज़रा सोचिए, यदि सीखने की क्रिया नहीं होती, तो हम अपने जूते समय पर नहीं पहन पाते, कपड़ों के बटन बन्द करने में घण्टों लगाते, बाज़ार जाते, परन्तु घर लौटते समय रास्ता भूलकर कहीं और पहुँच जाते। इस संसार में खेल-कूद तथा कुश्ती के दंगल नहीं हो पाते, मेले नहीं लग पाते, मकान नहीं बन पाते और मानव-संस्कृति का निर्माण नहीं हो पाता। इसलिए हमारा सीखने की कला को जानना बहुत ज़रूरी है।
मनोवैज्ञानिकों ने सीखने की तीन विधियाँ मानी हैं-
1. प्रयत्न और भूल के द्वारा सीखना (Learning by trial and error)
2. सूझ के द्वारा सीखना (Learning by Insight)
3. अनुकरण के द्वारा सीखना (Learning by Imitation)
अब हम इन तीन विधियों के बारे में थोड़ा विस्तार से जानने की कोशिश करते हैं।
प्रयत्न और भूल
यह विधि हमें यह बताती है कि मानों हम किसी कार्य को बिना सोचे-समझे कर रहे हों और कुछ देर के बाद ही हमारी कोई क्रिया ऐसी हो जाये, जो हमें सफलता प्रदान करे, तो इस प्रकार का सीखना ‘प्रयास’ और ‘भूल’ का सीखना कहा जायेगा। उदाहरण के तौर पर यदि हम किसी ताले को खोलना चाहते हैं, परन्तु उसकी चाबी नहीं पहचान पाते। ऐसी स्थिति में गुच्छे में जितनी चाबियाँ होती हैं, हम ताले में डालकर ताला खोलने की कोशिश करते हैं। कुछ कोशिशों के बाद हमें सफलता मिल जाती है और हम ताला खोलन में सफल रहते हैं।
 
यदि हम इसी क्रिया को बार-बार दोहरायें, तो हमें हर बार कुछ कोशिशों के बाद सफलता मिल जाती है और हम सही चाबी का प्रयोग करना सीख लेते हैं। साथ-ही-साथ यदि हम इसका रिकॉर्ड बनाते जायें, तो पता चलेगा कि ज्यों-ज्यों हमारा अभ्यास बढ़ता जाता है, हम कम प्रयासों में ही सही चाबी ढूँढ़ निकालते हैं और अन्त में एक ही प्रयास में ताला खोल सकते हैं। इसी भूल और प्रयास के द्वारा सीखने की क्रिया सफल होती है।
सूझ के द्वारा सीखना
 
इसे हमारी तीसरी आँख यानी कि ‘अन्तर्दृष्टि’ (Insight) के द्वारा सीखना भी कहा जाता है। जब हम किसी परिस्थिति अथवा किसी मुश्किल को अच्छी तरह समझ लेते हैं और तर्क-वितर्क के द्वारा उसका समाधान ढूँढ़ लेते हैं, तो यह ‘सूझ के द्वारा सीखना’ कहा जाता है। दूसरों शब्दों में हम कह सकते हैं कि समझ के आधार पर सीखना ही सूझ के द्वारा सीखना होता है। इस प्रकार के सीखने में हम अपने पहले के अनुभवों को भली-भाँति मिलाकर नयी स्थितियों में काम कर सकते हैं। मान लीजिए, हमें एक ऐसी जगह पर जाना है, जिसकी दूरी लगभग 200 किलोमीटर है। वहाँ हमें कल शाम के पहले ही पहुँचना है। ऐसी स्थिति में हम रेलवे टाइम-टेबल देख डालते हैं। इण्टरनेट से उसके बारे में जानकारी लेते हैं और यह जान लेते हैं कि वहाँ कौन-सी गाड़ी या बस हमें समय से पहले पहुँचा सकती है। हमारे इसी प्रयास को सूझ के द्वारा सीखना कहा जाता है।
अनुकरण के द्वारा सीखना
आज बहुत से मनोवैज्ञानिक अनुकरण की विधि को सबसे प्रधान बताते हैं। वास्तव में, अनुकरण एक प्रकार की सामाजिक क्रिया है। आज का युग समाज-प्रधान युग है। अनुकरण के क्रिया की शुरुआत समाज के सम्पर्क में आने के बाद ही सम्पन्न होती है। कुछ विद्वानों के अनुसार पूरे समाज का ढाँचा अनुकरण पर ही आधार है। अनुकरण का अर्थ है.‘किसी को देखकर वैसा ही कार्य करना।’ मनुष्य समाज में रह-रहकर रीति-रिवाजों, परम्पराओं, लोक-रीतियों आदि का पालन अनुकरण के आधार पर ही करता है। इसलिए समाज की छाप व्यक्ति के व्यक्तित्व में स्पष्ट रूप से झलकती है। प्रत्येक समाज की संस्कृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी अनुकरण के आधार पर ही आगे बढ़ती है।
सीखने के नियम (Laws of Learning)
सीखने के तीन नियम हैं-
1. तत्परता का नियम (Law of Readiness)
2. अभ्यास का नियम (Law of Exercise) तथा
3. प्रभाव का नियम (Law of Effect)
तत्परता का नियम
‘तत्परता’ सीखने का मुख्य आधार है। जो शरीर सीखने के लिए जितना तैयार होगा, वह उतना ही तेज़ी से सीखता है। जब शरीर तत्परता की स्थिति में होता है, तो वह सामग्रियों को तत्काल ग्रहण कर लेता है। परीक्षाओं के दिनों में विद्यार्थी अपना विषय सीखने के लिए तत्पर होते हैं। वे थोड़ा-सा बता देने पर ही याद कर लेते हैं।
अभ्यास का नियम
‘अभ्यास’ सीखने का महत्त्वपूर्ण आधार है। जिन कार्यों का हम अभ्यास करते हैं, उन्हें हम सीख लेते हैं तथा जिन कार्यों का हम कभी अभ्यास नहीं करते, उन्हें भूल जाते हैं या सीख नहीं पाते।
प्रभाव का नियम
 
इसे सन्तोष तथा असन्तोष का नियम भी कहा जाता है। जो क्रियाएँ हमें सन्तोष देती हैं, उन्हें हम कम बार दोहराने पर भी सीख लेते हैं और जो क्रियाएँ हमें असन्तोष देती हैं, उन्हें बार-बार दोहराने के बाद भी हम सीख नहीं पाते।
सीखना कई परिस्थितियों पर आधारित है। सीखने की उत्पत्ति केवल एक परिस्थति द्वारा नहीं होती। जब तक आदमी किसी चीज़ को सीखने के योग्य नहीं है, वह नहीं सीख सकता। केवल योग्यता के द्वारा भी नहीं सीखा जा सकता। योग्यता के साथ-साथ इच्छा और परिश्रम का होना भी अनिवार्य है। कोई विद्यार्थी कितना भी प्रतिभाशाली क्यों न हो, बिना पढ़े वह परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त नहीं कर सकता। अभ्यास के साथ ही उसे अपनी क्रियाओं के द्वारा सन्तोष होना चाहिए। असन्तोष के कारण काम पूरा नहीं हो पाता। ऐसे कई आधार है, जिन्हें सीखने के अंग (Factors) कहा जाता है।
आप सीखने की कला में अच्छी तरह से माहिर हो जायें, इसके लिए मैं आपको सीखने के अंगों के बारे में भी बता देता हूँ।
वंश-परम्परा (Heridity) : वंश-परम्परा के द्वारा व्यक्ति के शारीरिक आकार तथा उसकी योग्यता का पता चलता है। जिस प्रकार का स्नायुमण्डल, शारीरिक आकार तथा बुद्धि, संवेग आदि की मानसिक क्रियाएँ व्यक्ति में होती हैं, उसी प्रकार की क्रियाओं को वह सीखने में सक्षम रहता है।
प्रेरणा (Motivation) : हर इनसान में दैहिक, सामाजिक तथा व्यक्तिगत प्रेरणाएँ पायी जाती हैं। जब सीखने की क्रिया किसी प्रेरणा के साथ जुड़ जाती हैं, तब उसकी प्राप्ति शीघ्रता से होती है। दण्ड, पुरस्कार, प्रशंसा, डाँट, आत्मसम्मान, भूख, प्यास इत्यादि प्रेरणाओं के ही अंग हैं।
इच्छा शक्ति (Will to learn) : हम जिस कार्य के प्रति जितना अधिक सचेत होते हैं, उसे उतना ही शीघ्रता से सीख लेते हैं।
पुनरावृति (Repition) : दोहराना सीखने का आवश्यक अंग है। यदि हम बिना किसी उद्देश्य के ही वस्तु को दोहराते रहेंगे, तो हम कुछ भी नहीं सीख सकेंगे। साथ-ही-साथ बिना दोहराये सीखना प्रारम्भ नहीं होता। किसी वस्तु को सीखने के लिए कम-से-कम एक बार दोहराना ज़रूरी है।
फल का ज्ञान (Knowledge of Result) : किसी भी काम को सीखने के लिए कोई-न-कोई उद्देश्य ज़रूर होता है। जब आदमी कोई कोशिश करता है और जब उसकी कोशिश बेक़ार हो जाती है, तो उस आदमी का उत्साह टूट जाता है। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी हर कोशिश के फल के बारे में ज़रूर जानें और उसी चीज़ को सीखें, जो हमें अच्छा फल दे सकती है।

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