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इकिगाई हिंदी में / Ikigai in Hindi PDF Download Free Books by Hector Garcia

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Nameइकिगाई / Ikigai
लेखक / Author
आकार / Size1.7 MB
कुल पृष्ठ / Pages101
Last UpdatedApril 21, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category

दीर्घायु, तंदुरुस्त और आनंदित जीवन का जापानी रहस्य जापानी लोग मानते है कि हरइन्सान का इकिगाई होता ही है। इस किताब के लिए इकिगाई इस संकल्पना की जानकारी इकट्ठा करते वक्त लेखक ने कई सारे शतायुषी लोगों से बातचीत करके उनके दीर्घायु जीवन का रहस्य जान लिया। वह रहस्य इस किताब के माध्यम से आपके सामने रखा गया है। यह किताब आपको आपका इकिगाई प्राप्त करने में सहायता करेगी। * शारीरिक स्वास्थ्य के लिए 80 प्रतिशत का रहस्य। * चुस्त शरीर, चुस्त मन * तनाव का लाभ लेने की कला * स्टीव्ह जॉब्ज का जापानी संस्कृति के लिए प्रेम * लोगोथैरपी और मोरिता थैरपी * तंत्रज्ञान और संस्कृति का संगम.


पुस्तक का कुछ अंश

 

इकिगाई : एक रहस्यमयी शब्द

टोक्यो में एक रात बारिश हो रही थी। तब इस किताब के दोनों लेखक (हम दोनों) पहली बार मिलकर नगर के छोटे से बार में चर्चा कर रहे थे। इसी दौरान पहली बार इस किताब के बीज बोए गए।
इससे पहले कई बार हम दोनों ने एक-दूसरे की किताबों को पढ़ा था, लेकिन यह पहली ही बार था जब हम एक-दूसरे से मिल रहे थे। हम दोनों जापान की राजधानी से हज़ारों मील दूर रहते थे, लेकिन दोनों की पसंद का विषय एक ही था। शायद यही वजह थी कि हम उस रोज़ मिल रहे थे। उस मुलाक़ात की वजह से ही इस किताब का निर्माण हुआ है।
उस मुलाक़ात के क़रीब एक साल बाद हम दोनों दोबारा मिले। टोक्यो के बगीचे में टहलते हुए हमने पाश्र्चात्य मनोविज्ञान, और ख़ासकर के उस ‘लोगोथैरेपी’ के बारे में बातचीत की जो लोगों को अपने जीवन का मक़सद ढूँढ़ने में मदद करती है।
हमारी बातचीत में एक बात उभरकर आई कि आजकल के मनोचिकित्सक विक्टर फ़्रैंकल की बताई हुई ‘लोगोथैरपी’ का इस्तेमाल कम करते हैं। इसकी बजाय वे कॉलेजों में सिखाई जाने वाली बातों को प्रमाण मानते हैं। लेकिन आज भी लोग अपने जीवन का सही मक़सद जानने में नाकामयाब होते रहते हैं। हम हमेशा ही अपने आप से यह सवाल पूछते रहते हैं,
“मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?”
“क्या ज़्यादा से ज़्यादा साल ज़िंदा रहना ही जीवन का लक्ष्य है, या इससे भी बड़ा और इससे अलग कोई और उद्देश्य है?”
कुछ लोगों को यह पता होता है कि उन्हें क्या चाहिए और वे उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ही जीते हैं। जबकि कुछ लोग हमेशा दुविधा में जीते रहते हैं। ऐसा क्यों होता है?
तब हमारी चर्चा में एक शब्द बार-बार आया और वह जादुई शब्द था - इकिगाई।
यह एक जापानी संकल्पना है। इसका सामान्य अर्थ है, “हमेशा व्यस्त रहने से मिलने वाला आनंद।” लोगोथैरपी की तरह इसका मक़सद भी अपने जीवन का उद्देश्य ढूँढ़ना है लेकिन इसमें काफ़ी गहरा अर्थ छुपा हुआ है। इकिगाई शब्द जापान के लोगों की लंबी आयु का रहस्य बताता है। ओकिनावा जैसे शहर में रहने वाले लोगों की आयु काफ़ी ज़्यादा होती है। यहाँ पर प्रति एक लाख लोगों में से 24.55 लोग 100 साल से ज़्यादा उम्र के पाए जाते हैं। वैश्विक स्तर की तुलना में यह अनुपात काफ़ी ज़्यादा है।
जिन लोगों ने यह राज़ पता लगाने के लिए अध्ययन किया है कि इस द्वीप के लोग बाक़ी जगहों की तुलना में लंबी उम्र जीते हैं, उनका कहना है कि अच्छा भोजन, ग्रीन टी तथा अच्छा मौसम (हवाई शहर के मौसम की तरह यहाँ का माहौल भी काफ़ी अच्छा और सुखद होता है) इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं, लेकिन यहाँ के लोगों के ज़्यादा साल जीने के पीछे की असली वजह होती है इकिगाई। यह शब्द उनके जीवन को सही दिशा देता है।
इस विषय का अध्ययन करते वक्त एक बात विशेष रूप से हमारे सामने आई कि मनोविज्ञान या निजी विकास के क्षेत्र में कोई भी किताब उपलब्ध नहीं है जिससे कि इस दर्शन से पश्चिमी जगत परिचित हो सके। क्या अन्य जगहों की तुलना में ओकिनावा निवासियों के शतायु होने का का राज़ इकिगाई है? उनके आनंदित और लंबी उम्र वाले जीवन के पीछे क्या राज़ होगा?
हमने इस बात की और गहराई से खोज की तो हमें द्वीप के उत्तरी छोर पर स्थित ओगिमी नामक एक छोटे से गाँव के बारे में पता चला। इस गाँव को दीर्घायु लोगों के गाँव के रूप में जाना जाता है। तीन हज़ार लोगों के इस छोटे से गाँव में विश्व के सबसे ज़्यादा दीर्घायु लोग रहते हैं।
ओकिनावा ऐसी जगह स्थित है जहाँ जापान का शिकुवासा फल (नींबू की तरह दिखने वाला और एन्टीऑक्सीडेंट की बहुत ज़्यादा मात्रा वाला) सर्वाधिक मिलता है। कहीं यह फल तो इनकी लंबी उम्र का राज़ नहीं है? मोरिंगा चाय बनाने के लिए जो शुद्ध पानी इस्तेमाल होता है, कहीं वह इसके पीछे की वजह तो नहीं है?
हमने जापानियों के शतायु होने का रहस्य व्यक्तिगत तौर पर जानने की ठान ली। एक साल के प्रारंभिक शोध के बाद हम अपने कैमरों और रिकॉर्डिंग उपकरणों के साथ ओकिनावा पहुँच गए। वहाँ के लोग काफ़ी प्राचीन भाषा बोलते हैं और जीववादी धर्म के उसूलों के अनुसार जीते हैं जंगल के लंबे बालों वाले वेताल ‘बुनागया’ को अहमियत दी जाती है। हमारे पहुँचते ही वहाँ के लोगों ने स्नेहशीलता के साथ हमारा स्वागत किया। कुछ ही समय में हम उनके साथ अच्छे से घुलमिल गए। वे लोग हरी-भरी पहाड़ियों और स्वच्छ पानी वाले वातावरण में हँसते और चुटकुले सुनाते दिखते।
जब हमने वहाँ के सबसे बुज़ुर्ग लोगों से भेंटवार्ता की तो हमें पता चला कि कुदरती माहौल के अलावा वहाँ पर कुछ और भी है जिसकी वजह से वहाँ के लोग लंबी आयु जीते हैं। वहाँ के लोगों में एक अजीब-सी ऊर्जा और जोश है जिसकी वजह से वे लंबा और आनंददायक जीवन जीते हैं। फिर एक बार इकिगाई शब्द हमारे सामने आया। हमने वहाँ के लोगों से पता करने की कोशिश की कि इकिगाई मतलब क्या? इसका असली अर्थ क्या है और इससे क्या फ़ायदा होता है?
हमें और एक बात सुनकर झटका लगा कि दूसरे विश्वयुद्ध के वक्त इसी गाँव पर हमला हुआ था और दो लाख लोग मारे गए थे। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि इन लोगों के मन में किसी के भी प्रति कोई नकारात्मक भावना नहीं थी। उल्टा, वे सकारात्मक सोच और इचारीबा चोडे के आधार पर जीवन जी रहे थे। इचारीबा चोडे का अर्थ है - “सभी के साथ भाई की तरह बर्ताव करें। जिन लोगों से आप कभी नहीं मिले हों उनके बारे में भी यह मानकर ही जिएँ कि वे आपके भाई हैं।”
ओगिमी लोगों के आनंददायक जीवन के पीछे का पहला राज़ जो हमें मिला वह था, उनका सामाजिक जीवन। वे लोग काफ़ी पहले से ही युइमारु या टीम भावना के साथ और अपनेपन से जीवन जीते आए हैं। वे लोग हमेशा एक-दूसरे के साथ प्यार से पेश आते हैं और एक-दूसरे की मदद करते हैं।
दोस्ताना अंदाज़ में जीना, हलका भोजन करना, तथा सही मात्रा में आराम और नियमित हल्का व्यायाम उनके स्वस्थ रहने के कारण हैं। लेकिन उनके पूर्णतः आनंददायक और शतायु जीवन के पीछे का असली कारण है इकिगाई। वे हर दिन को इकिगाई के हिसाब से जीते हैं।
इन लोगों के शतायु जीवन का राज़ आपके सामने उजागर करना और साथ ही आपको अपना इकिगाई ढूँढ़ने में मदद करना ही इस किताब का मूल मक़सद है। क्योंकि जिन-जिन लोगों को इकिगाई मिला है वे लोग आनंददायक और लंबा जीवन जी रहे हैं। आपकी इस यात्रा के लिए आप सभी को दिल से शुभकामनाएँ।
—हेक्टर गार्सिया और फ़्रन्सेस्क मिरालेस

 1  

इकिगाई
बढ़ती उम्र में भी
युवा रहने की कला
आपके अस्तित्व की वजह क्या है?
जापानी लोगों का ऐसा मानना है कि हर एक के जीवन का एक इकिगाई होता है। शायद फ़्रांस के दार्शनिक इसे ‘जीवन का उद्देश्य’ कहेंगे या अन्य देशों के लोग किसी और नाम से पुकारेंगे। इकिगाई हर एक के अंदर छुपा हुआ होता है। कुछ लोगों को अपना इकिगाई मिल जाता है तो कुछ लोग उसकी खोज में होते हैं।
हमारा इकिगाई हमारे भीतर काफ़ी गहराई तक छुपा हुआ होता है और उसे खोजने के लिए संयम की आवश्यकता होती है। ओकिनावा के लोग कहते हैं कि उनके सुबह उठने के पीछे एक ही वजह होती है और वह है उन्हें मिला हुआ उनका इकिगाई।
 
कुछ भी करो, लेकिन कभी भी रिटायर मत होना!
एक बार आपको अपना इकिगाई स्पष्ट हो जाए तो फिर सुख और संतुष्टि अपने आप मिलती है; जीवन को असली अर्थ मिलता है। इस किताब के माध्यम से आपको आपका इकिगाई मिले और जापानी लोगों के तन, मन व बुद्धि से हमेशा स्वस्थ रहने के पीछे का राज़ आप समझ पाएँ, यही इस किताब के पीछे की मूल वजह है।
आप यह जानकर हैरान हो जाएँगे कि रिटायर होने के बाद भी वहाँ के लोग हमेशा काफ़ी सक्रिय और व्यस्त रहते हैं। सच बात तो यह है कि जापान के लोग रिटायर होते ही नहीं हैं। जब तक उनका शरीर साथ देता है वहाँ के लोग अपना पसंदीदा काम करते रहते हैं।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जापानी भाषा में रिटायर शब्द के लिए कोई भी शब्द नहीं है। जैसे अंग्रेज़ी में एक उम्र के बाद नौकरी या काम बंद करने के लिए ‘रिटायरमेंट’ शब्द है, वैसा कोई शब्द जापानी भाषा में नहीं है। नैशनल जिओग्राफ़िक के रिपोर्टर डैन ब्युटेनर ने काफ़ी समय जापान में बिताया है और उनका कहना है कि जापानी लोगों को अपने जीवन का उद्देश्य इतना महत्त्वपूर्ण लगता है कि उनके यहाँ पर रिटायरमेंट की कोई संकल्पना ही नहीं है।
(अधिकतर) युवा लोगों का द्वीप
दीर्घायु के रहस्य के बारे में और जानकारी हासिल करते वक्त हमें पता चला कि जापानी लोगों के खाने-पीने के तौर-तरीक़े और उनकी खाद्य-संस्कृति के साथ इकिगाई का ज्ञान उनकी लंबी उम्र की बड़ी वजह है। ओकिनावा जैसी जगहों का, जहाँ कि लंबी आयु वाले बहुत सारे लोग रहते हैं (ऐसी जगहों को ब्लू ज़ोन कहते हैं) अध्ययन करने के बाद कुछ अनोखे तथ्य सामने आए। जैसे कि :
 ये लोग ज़्यादा साल ही नहीं जीते हैं बल्कि इन लोगों को कैन्सर और हृदयरोग जैसी बड़ी बीमारियाँ भी नहीं होती हैं।
 इन लोगों के जीवन जीने का तरीक़ा इतना प्रभावी और आनंददायी होता है कि बाक़ी देशों के लोग उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते।
 ख़ून में उपलब्ध जिस चीज़ की वजह से उम्र बढ़ने की प्रक्रिया होती है उसकी मात्रा इन लोगों में कम होती है। इसका श्रेय वे 80 प्रतिशत पेट भरने तक खाना खाने और चाय पीने की आदत को देते हैं।
 वहाँ की महिलाओं को रजोनिवृत्ति के समय हल्की-फुलकी परेशानी होती है। इतना ही नहीं, विश्व के बाक़ी लोगों की तुलना में इन जगहों के स्त्री-पुरुषों में लैंगिक हार्मोन्स ज़्यादा उम्र तक सक्रिय होते हैं।
 डिमेन्शिया जैसी बीमारियों की संभावना काफ़ी कम होती है।
इकिगाई का अर्थ
जापान में इकिगाई शब्द इस प्रकार से लिखते हैं- 生き甲斐। जिसमें 生き इसका अर्थ “जीवन” और 甲斐 मतलब “अर्थपूर्ण।” 甲斐 इसी शब्द को अगर हम दो हिस्सों में लिखें तो 甲 इसका मतलब है “पहले दर्जे का योद्धा” (युद्ध में हमेशा पहले स्थान पर रहना) और 斐 मतलब “सुंदर और सुघड़” ऐसा होता है।
हालाँकि इस किताब में हम इन सभी बातों पर रोशनी नहीं डालने वाले हैं, लेकिन इतना पक्का है कि उनकी लंबी उम्र के पीछे उनका अपने इकिगाई को जानना और उस उद्देश्य पर लक्ष्य केंद्रित करना ही है। यह बात अध्ययन से ज़्यादा स्पष्ट हो गई।
दीर्घायु लोगों के पाँच टापू (ब्लू ज़ोन्स)
ओकिनावा ब्लू ज़ोन में पहले स्थान पर आता है। यहाँ की महिलाएँ दुनिया के अन्य हिस्सों में रहने वाली महिलाओं की तुलना में अधिक समय तक जीवित और स्वस्थ रहती हैं। डैन ब्युटनर ने अपनी पुस्तक द ब्लू जोन्स में इन पाँच जगहों को पहचाना और विश्लेषित किया है :
  1. ओकिनावा, जापान (ख़ासकर द्वीप का उत्तरी इलाक़ा) - यहाँ के लोग एक छोटी सी प्लेट में तोफ़ू और इसी प्रकार की कई सारी उच्च गुणवत्ता वाली सब्ज़ियाँ डालकर खाते हैं। अपने इकिगाई दर्शन को जानने के साथ-साथ ‘मोइ’ यानि कि ‘दोस्तों का एक गुट’ उनकी लंबी उम्र में बड़ा योगदान करता है।
  2. सार्दीनिया, इटली (ख़ासकर न्युओरो और ओलियास्त्रा का इलाक़ा)- यहाँ के लोग ब़डी मात्रा में सब्ज़ियाँ खाते हैं और रोज़ एक या दो ग्लास वाइन पीते हैं। ओकिनावा की तरह यहाँ के लोग भी अपनी लंबी उम्र का श्रेय सामाजिक जुड़ाव की भावना को देते हैं।
  3. लोमा लिंडा, कैलिफ़ोर्निया - यहाँ के ‘सेवन्थ-डे एडवेन्टिस्ट’ इस ग्रुप के लोगों का निरीक्षण किया गया। ये लोग अमेरिका के दीर्घायु लोगों में से हैं।
  4. द निकोया पेनिन्सुला, कोस्टा रिका - यहाँ के लोग नब्बे साल के बाद भी सक्रिय होते हैं। यहाँ के लोग ख़ुशी-ख़ुशी सुबह 5.30 बजे उठते हैं और अपने खेतों में और बगीचों में काम करते हैं।
  5. इकारिया, ग्रीस - यहाँ के समंदर किनारे रहने वाले लोगों में हर तीन में से एक इंसान 90 साल से ऊपर जीता ही जीता है। (जबकि अमेरिका में इसका प्रतिशत सिर्फ़ 1 है।) इसी वजह से इसको दीर्घायु लोगों का टापू कहा जाता है। 500 बीसी से चली आई जीवन-शैली को इसका श्रेय जाता है।
किताब के अगले हिस्से में हम ओकिनावा टापू पर रहने वाले लोगों की लंबी उम्र के पीछे के मुख्य कारणों का परीक्षण करेंगे। इन पाँच जगहों में से तीन जगह टापू हैं, इस वजह से वहाँ पर सामग्री काफ़ी सीमित है। ज़ाहिर सी बात है कि एक-दूसरे की मदद के अलावा दूसरा कोई चारा इन लोगों के पास नहीं रहता।
कुछ लोगों के लिए तो दूसरों की मदद करना ही उन लोगों का इकिगाई होता है और वही उनके शतायु जीवन का राज़ है।
जिन वैज्ञानिकों ने पाँच ब्लू जोन्स का अध्ययन किया वे इसी नतीजे पर पहुँचे कि दीर्घायु जीवन का राज़ खाद्य-संस्कृति, व्यायाम, इकिगाई को जानना तथा सामाजिक जुड़ाव जैसी बातों में छुपा है।
इस समाज के लोग अपने जीवन के समय का प्रबंधन इस प्रकार से करते हैं ताकि कम से कम तनाव आए। इसी के साथ वे मांसाहार भी बहुत कम करते हैं। प्रसंस्कृत पदार्थों का सेवन भी कम करते हैं। मदिरापान भी कम करते हैं।1
वे तनावपूर्ण कसरत नहीं करते लेकिन हर रोज़ अपने सब्ज़ी के बगानों में काम करते हैं और पैदल बहुत ज़्यादा चलते हैं। ब्लू जोन्स के लोग गाड़ी से जाने की बजाय वे पैदल चलना ज़्यादा पसंद करते हैं। उनमें से लगभग सभी लोग अपने बगीचे में काम करते हैं जिसमें हल्की-फुलकी गतिविधि की ज़रूरत होती है।
80 प्रतिशत का राज़
जापान में हमेशा ही इस्तेमाल होने वाली एक कहावत है - ‘हारा हाची बु।’ यह पंक्ति खाना खाने से पहले कही जाती है। इसका अर्थ है कि उतना ही खाइए जिससे आपका पेट 80 प्रतिशत भरे। यह काफ़ी पुरानी सीख है जिसमें इतना ना खाने की सलाह दी जाती है कि पेट पूरा भर जाए। यही वजह है कि ओकिनावा के लोग उतना ही खाना खाते हैं जितने में 80 प्रतिशत पेट भरे। वे कभी भी पूरा पेट भरने तक खाना नहीं खाते। इसकी वजह से खाना हज़म करने में जो ऊर्जा ख़र्च होती है उसकी बचत हो जाती है, साथ ही यह तीव्र कोशिकीय ऑक्सिडेशन की प्रक्रिया को भी कम करता है।
वैसे तो यह जानने का कोई उपाय नहीं है कि हमारा पेट वाकई 80 प्रतिशत भरा है या नहीं। इसलिए जब हमें लगे कि हमारा पेट भरने लगा है तभी खाना बंद कर देना चाहिए। पेट भरने के बाद का ज़्यादा खाना, बिना वजह का नाश्ता, मीठी चीज़ें, खाने के बाद सेब का रस आदि चीज़ें भले ही हमें कुछ पल का आनंद देती हों लेकिन अगर हम इन चीज़ों को टाल दें तो हमें लंबे समय तक आनंद मिलेगा।
खाना किस प्रकार से परोसा जाता है यह भी महत्त्वपूर्ण है। जापान में लोग छोटी-छोटी थालियों में खाना देते हैं। इसी वजह से वहाँ के लोग कम खाना खाते हैं। जापान के होटलों में खाना एक अनोखी थाली में परोसा जाता है। इसमें चार छोटी-छोटी थालियाँ और एक उससे थोड़ी बड़ी थाली; ऐसी कुल पाँच थालियाँ होती हैं। जब आप पाँच थालियाँ देखते हैं तो आपको ऐसा लगता है कि आप भरपेट खाना खाने वाले हैं। लेकिन जब आप खाना ख़त्म करते हैं तो आपको पता चलता है कि आपने कम खाया है और आपको पुनः भूख लगने लगती है। इसलिए कई विदेशी लोग जब जापान जाते हैं तो उनका वज़न घट जाता है और वे पतले हो जाते हैं।
हाल ही में किए गए एक सर्वे में यह साबित हुआ है कि वहाँ के लोग दिनभर में 1,800 से 1,900 कैलरीज़ खाते हैं। जबकि अमेरिका में लोग 2,200 से 3,300 कैलरीज़ खाते हैं। अमेरिका में बॉडीमास इंडेक्स 26 से 27 होता है जबकि ओकिनावा में यह 18 से 22 है।
ओकिनावा में रहने वाले लोग उच्च कोटि की खाद्य-संस्कृति का पालन करते हैं। वे हफ़्ते में तीन बार तोफ़ू, शकरकंद और मछली खाते हैं। वे रोज़ क़रीब 30 ग्राम सब्ज़ियाँ खाते हैं। पोषण वाले अध्याय में हम विस्तार से जानेंगे कि इस 80 प्रतिशत में क्या-क्या आता है।
मोआई : जीवन से जुड़ना
ओकिनावा में लोग अन्य किसी जगह के लोगों की तुलना में ज़्यादा दोस्ताना बर्ताव करते हैं। यह उनकी संस्कृति का एक अंग है। मोआई का मतलब होता है - एक ही उद्देश्य से इकट्ठा हुए लोगों का गुट। इस समाज के कई लोगों के लिए समाज-सेवा करना ही उनका इकिगाई होता है।
मोआई संकल्पना की शुरुआत काफ़ी साल पहले हुई थी। कठिन परिस्थितियों में कुछ किसान इकट्ठा हुए और उन्होंने इसकी शुरुआत की। इसके तहत जिसके खेत में कम अनाज उगता था, उसकी बाक़ी सभी किसान मदद करते थे।
मोआई से जुड़े लोग मासिक चंदा तय करते हैं और उसको जमा करते हैं। इस भुगतान से उन्हें बैठकों, भोज, गो ऐंड शोगी (जापानी शतरंज) जैसे खेलों या साझा अभिरुचियों में भाग लेने का मौक़ा मिला है।
इस प्रकार समूह से एकत्रित धन को गतिविधियों में इस्तेमाल करने के बाद बचने पर उसे किसी एक सदस्य को दे देते हैं (इसका चुनाव रोटेशन के आधार पर किया जाता है।) इस प्रकार से मोआई में जो सदस्य होते हैं उनकी भावनात्मक और आर्थिक दोनों ज़रूरतें पूरी होती रहती हैं। अगर मोआई के किसी सदस्य को पैसे की ज़रूरत हो तो उसे कुछ पैसे उधार भी दिए जाते हैं। इन सभी बातों का बहीखाता रखा जाता है और हर कोई अपनी ज़िम्मेदारी पहचानकर इस समूह का फ़ायदा लेता है। इस वजह से सभी के मन में सुरक्षा की भावना पनपती है और ‘मेरी मदद के लिए पूरा समूह है’ इस विचार से वे तनावरहित और दीर्घायु जीवन जीते हैं।
अभी तक हमने इकिगाई के बारे में संक्षिप्त जानकारी ली है। अब हम इस पर रोशनी डालेंगे कि आज के इस युग में लोग उम्र से पहले ही ब़ूढ़े क्यों होते हैं। साथ ही यह भी समझेंगे कि इकिगाई का हमें किस प्रकार से फ़ायदा हो सकता है।

 2  

उम्र ना बढ़ने का राज़
छोटी-छोटी बातें आपको
आनंद और दीर्घायु देती है.
उम्र बढ़ने से परे की कहानी
एक सदी से भी अधिक समय से हम अपने आयुर्मान को हर साल 0.3 साल बढ़ा रहे हैं। अब ऐसा सोचिए कि यदि हमारे पास ऐसी तकनीक आ जाए जिसकी मदद से हम अपने आयुर्मान को हर साल एक साल से बढ़ा सकें तो हम उम्र बढ़ने की गति को पीछे छोड़ देंगे और जीवशास्त्र के सिद्धांत के हिसाब से अमर हो जाएँगे।
अमरत्व और खरगोश
 
ऐसा सोचिए कि दूर कहीं पर एक बोर्ड लगा हुआ है जिस पर एक अंक लिखा है जो आपकी मृत्यु की उम्र बताता है। हर वर्ष आप जीते हुए उस अंक के क़रीब पहुँचते जाते हैं जब आप उस अंक के अनुरूप उम्र के होते हैं, आपकी मृत्यु हो जाती है।
अब इस प्रकार से सोचिए कि एक खरगोश है जिसने उस बोर्ड को हाथ में पकड़ा हुआ है और वह भी भविष्य की दिशा में यात्रा कर रहा है। आप जब एक साल आगे बढ़ते हैं तो वह खरगोश आधा साल आगे जाता है। इस प्रकार से दोनों यात्रा करते रहेंगे तो एक समय आप उसके पास पहुँचेंगे और आपकी मृत्यु हो जाएगी।
लेकिन यदि खरगोश भी हर साल एक साल आगे जाने लगा तो क्या होगा? उसकी गति हर साल के लिए एक साल की होगी तो आप उस खरगोश तक कभी भी पहुँच नहीं पाएँगे और आपकी कभी भी मौत नहीं होगी।
जिस गति से खरगोश भविष्य में चल रहा है वह है हमारी तकनीक। हम जितना तकनीकी विकास करेंगे और अपने शरीर को समझेंगे उतना ही हम उस खरगोश को तेज़ भगाने में सफल होंगे।
अमरत्व यानी वह स्थिति जब हम खरगोश को हर साल एक साल या उससे भी ज़्यादा आगे भेजने में कामयाब हों और कभी भी उस तक नहीं पहुँचने की वजह से अमर हो जाएँ।
भविष्य के बारे में काफ़ी सकारात्मक नज़रिया रखते हुए रे कुर्झवेल और औबरी डि ग्रे को लगता है कि आने वाले 10 सालों में हम इस लक्ष्य को पा सकते हैं। हालाँकि कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि ऐसा हो पाना असंभव है, हमने तकनीक में चाहे कितना भी विकास क्यों नहीं किया हो लेकिन हम अपनी आयु को एक सीमा से ज़्यादा नहीं बढ़ा सकते। उदाहरण के लिए कुछ वैज्ञानिक व विशेषज्ञ ऐसा मानते हैं कि 120 की उम्र के बाद हमारे शरीर में नई कोशिकाओं का बनना बंद हो जाता है।
कार्यक्षम मन, युवा शरीर
“स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन”, यह पुरानी कहावत वाकई काफ़ी अर्थपूर्ण और सोचने पर मजबूर करने वाली है। इस कहावत से हमें यह बात समझ में आती है कि शरीर और मन दोनों ही महत्त्वपूर्ण हैं। इन दोनों का स्वास्थ्य एक-दूसरे पर निर्भर होता है। इसका अर्थ यही है कि हमेशा जवान रहने के लिए आपके मन का कार्यक्षम और खुला होना ज़्यादा आवश्यक है।
जोश से भरा हुआ मन हमेशा आपको जवान रखता है और उम्र बढ़ने के आसार कम दिखाई देते हैं।
जिस प्रकार से शारीरिक व्यायाम नहीं करने की वजह से हमारे शरीर और जोश पर बुरा असर होता है, वैसे ही यदि हम मानसिक व्यायाम नहीं करें तो हमारी न्यूरोलॉजिकल कनेक्शन्स भी कमज़ोर होने लगते हैं। फिर परिस्थितियों व माहौल को प्रतिक्रिया देने की हमारी शक्ति कमज़ोर होने लगती है। इसलिए मस्तिष्क को भी व्यायाम कराने की आवश्यकता होती है।
मस्तिष्क और मन को व्यायाम की ज़रूरत होती ही है ऐसा बताने वाले न्यूरोलॉजिस्ट श्लोमो ब्रेझनिट्ज़ कहते हैं, “दिमाग़ को सही रखने के लिए उसका व्यायाम किया ही जाना चाहिए।” उन्होंने स्पेनी टेलीविज़न के कार्यक्रम रेडेस में एडवर्ड पुन्सेट से मुलाक़ात में कहा था :
किसी के लिए क्या अच्छा है और उसे क्या करना अच्छा लगता है इसमें हमेशा ही दुविधा होती है, जिसकी वजह से ही तनाव का निर्माण होता है। ख़ासकर बुज़ुर्ग लोगों को हमेशा ही वही करना अच्छा लगता है जो वे आज तक करते आए हैं। समस्या यह है कि दिमाग़ के काम करने का तरीक़ा ही ऐसा है कि वह नया सोचने की बजाय उसी चीज़ को दोहराना ज़्यादा पसंद करता है जो वह हमेशा से करता आया है। इसमें कोई शक नहीं कि हमेशा एक ही प्रकार का काम करने की वजह से वह काम अच्छा भी होता है और सहजता से भी होने लगता है। इसके कई सारे फ़ायदे भी हैं। इसलिए लोग अपनी दिनचर्या से चिपके रहते हैं। यह श्रंखला अगर तोड़नी हो तो दिमाग़ को नई-नई जानकारी देना ज़रूरी होता है।1
जब दिमाग़ को नई जानकारी मिलती है तो दिमाग़ नए कनेक्शन्स का निर्माण करता है और पुनर्जीवित होता है। इसलिए हमेशा नई बातें करना और बदलाव के सामने जाना महत्त्वपूर्ण होता है। इसलिए भले ही हमें कठिन लगे और तनाव महसूस हो, तब भी हमारा अपने आराम के दायरे से बाहर आना ज़रूरी होता है।
दिमाग़ को प्रशिक्षण देने से क्या-क्या फ़ायदे होते हैं यह विज्ञान ने साबित किया है। कॉलिन्स हेमिंग्वे और श्लोमो ब्रेझनिट्ज़ ने अपनी पुस्तक मैक्सिमम ब्रेन पॉवर : चैलेंजिंग द ब्रेन फ़ॉर हेल्थ ऐंड विज़्डम में लिखा है, “मानसिक प्रशिक्षण का फ़ायदा अलग-अलग स्तरों पर होता है।” वे कहते हैं, “जब आप कोई भी काम पहली बार करते हैं तो वह आपको कठिन लगता है। उसे पूरा करने में आपको ज़्यादा परेशानियाँ होती हैं। लेकिन वही काम जब आप दोबारा करते हैं तो पहली बार किया हुआ अभ्यास काम में आता है और वह काम आपको उतना कठिन नहीं लगता। आपको लगता है कि यह काम तो काफ़ी आसान है। असल में काम वैसा ही होता है लेकिन पहली बार काम करते वक्त मिले हुए अनुभव और प्रशिक्षण का प्रभाव आगे काम आता है। उस वक्त काम करने का जोश और गुणवत्ता भी बढ़ती है। इसका परिणाम यही होता है कि वह काम करते वक्त उस इंसान की स्वयं की छवि भी उन्नत होती है।”
“मानसिक व्यायाम” का सबसे साधारण उदाहरण है कि दूसरों के साथ कोई खेल खेलने या गपशप करने से भी मन में एक नया जोश आ जाता है। इससे अकेलापन और निराशा भी नष्ट हो जाती है।
जब हम बीस की उम्र पार करते हैं तभी से हमारे न्यूरॉन्स वयस्क होने लगते हैं। बौद्धिक व्यायाम, जिज्ञासा और सीखने की इच्छा इत्यादि चीज़ों की वजह से न्यूरॉन्स के वयस्क होने की यह प्रक्रिया धीमी पड़ने लगती है, जिसकी वजह से उम्र बढ़ने की प्रक्रिया भी कम होने लगती है। इसी के साथ इस कार्य से हमें सकारात्मक नज़रिया और जोश जैसे कई फ़ायदे मिलते हैं।

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