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हॉस्पिटल से जिन्दा कैसे लौटे / Hospital se Zinda Kaise Lote PDF Download Free Book by Dr. Biswaroop Roy Chowdhury

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥हॉस्पिटल से जिन्दा कैसे लौटे / Hospital se Zinda Kaise Lote
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 19.7 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖105
Last UpdatedMarch 15, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category

मैं अपने पाठकों से यह वादा नहीं कर सकता कि वे इस पुस्तक को पढ़ने के बाद हमेशा जीवित रहेंगे या अमर हो जाएंगे। हां, मैं भरोसा कर सकता हूं कि यदि वे इस पुस्तक में दिए गए सुझावों और सुझावों का पालन करते हैं, तो वे निश्चित रूप से एक लंबा और स्वस्थ जीवन पाएंगे और उनके जीवन का अंतिम समय दुख और बीमारियों से रहित होगा।
यह पुस्तक कई अस्पतालों, डॉक्टरों, चिकित्सा संस्थानों और चिकित्सा विश्वविद्यालयों के अध्ययन, रिपोर्ट, सर्वेक्षण और परीक्षणों पर आधारित है।

पुस्तक का कुछ अंश

अध्याय-1

बीमारी : एक व्यापार

पुस्तक का शीर्षक न केवल भ्रामक अपितु चौंका देने वाला भी है। हम तो ऐसी बात सोच भी नहीं सकते। जरा सा कोई रोग होते ही सबसे पहले हम डॉक्टर या अस्पताल के दर पर माथा टेकने पहुंच जाते हैं। वहां जाते ही हमें लगता है कि हम अपने मसीहा के पास पहुंच गए और अब किसी तरह की चिंता या परेशानी नहीं रही किंतु यह पुस्तक तो जैसे हमारी सदियों पुरानी मान्यताओं व विश्वास पर करारी चोट करने वाली है। यह हमें बताने वाली है कि हॉस्पिटल से जीवित कैसे लौटें मानो अस्पताल रोगमुक्ति का कोई केंद्र नहीं बल्कि यमराज का घर हो!
दरअसल अब तक सामने आए आंकड़े तो यही बताते हैं कि अस्पताल जाने पर प्रायः मरने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। यानी यदि आपकी निकट भविष्य में मरने की संभावना नहीं भी है, तो भी वहां का वातावरण, अवस्थाएं, डॉक्टरों व कर्मचारियों द्वारा जाने-अनजाने में की गई भूलें आपको यमराज के द्वार तक पहुंचाने की भूमिका रच देती हैं। अब अस्पताल में होने वाली इन सामान्य भूलों पर एक नज़र डालें :
पहला मामला : 17 साल की सुनैना की मौत हार्ट ट्रांसप्लांट के दो सप्ताह के भीतर ही हो गई। आप कहेंगे कि इसमें भला इतनी हैरानी की क्या बात है। ऐसा तो किसी के भी साथ हो सकता है। हो सकता है कि उसकी इतनी ही आयु शेष थी या उसे ऑपरेशन सूट नहीं किया। यदि ऐसा होता तो संभवतः हम भी अपने मन को तसल्ली दे देते किंतु कारण यह था कि सर्जन ने यह गौर ही नहीं किया कि सुनैना का ब्लड ग्रुप, लगाए गए हार्ट से मैच ही नहीं कर रहा था। सर्जन की एक भूल ने 17 साल की उस युवती को सदा के लिए मौत की नींद सुला दिया।
दूसरा मामला : 47 वर्षीय रामलाल अपने बाएं टेस्टीकल में दर्द और सिकुड़न की वजह से अस्पताल में भर्ती थे। सर्जन ने आशंका जताई कि यह कैंसर हो सकता है और बांया टेस्टीकल निकालने का फैसला किया परंतु गलती से दायां स्वस्थ टेस्टीकल निकाल दिया। अब इस भूल को आप क्या कहेंगे?
तीसरा मामला : 49 वर्षीय कमलकांत जब अस्पताल में भर्ती हुए तो उनके पेट में ट्यूमर था। सर्जरी से ट्यूमर निकाल दिया गया परंतु सर्जन गलती से कैंची पेट में ही भूल गए। भले ही आपको यकीन न आए किंतु यह बात पूरी तरह से सत्य है। एक साल बाद एक और सर्जरी से कैंची को निकाला गया परंतु तब तक कैंची पेट में इतने घाव कर चुकी थी कि पेट से कैंची निकालने के दो माह के भीतर ही कमलकांत चल बसे।
चौथा मामला : 67 वर्षीय मारिया को एंजियोप्लास्टी के लिए अस्पताल ले जाया गया। एंजियोप्लास्टी के बाद गलती से उनको अपने ही वार्ड या बेड में ले जाने की बजाए दूसरे फ्लोर में ले जाकर लिटा दिया गया। दूसरे दिन अस्पताल के कर्मचारी मारिया को ऑपरेशन थिएटर ले गए क्योंकि उस फ्लोर पर ऑपरेशन के लिए ले जाए जाने वाले मरीजों को लिटाया जाता था नतीजन डॉक्टरों ने ओपन हार्ट सर्जरी के लिए मारिया के सीने को चीर दिया। तभी एक और डॉक्टर ने फोन से संदेश भिजवाया कि यह मरीज तो अस्पताल से छुट्टी लेने के लिए तैयार है और इनके हार्ट में कोई परेशानी थी ही नहीं। तब मारिया का सीना सिलाई कर उसे अस्पताल से विदा कर दिया गया।
पांचवां मामला : जरा 52 वर्षीय सत्यश्याम की करुण गाथा भी सुन लें। सर्जन ने भूल से बाएं की बजाए दायां पांव काट डाला और ऑपरेशन थिएटर में जब तक सर्जन अपनी यह भूल समझ पाते, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
छठा मामला : 35 वर्षीया प्रथा की दाईं किडनी में ट्यूमर पाया गया। डॉक्टरों ने यह आशंका जताई कि यह ट्यूमर कैंसर हो सकता है इसलिए दाईं किडनी को निकालने का फैसला लिया परंतु ऑपरेशन के दौरान सर्जन ने गलती से बाईं किडनी निकाल दी। अगले दिन निकाली गई किडनी में से जब पैथोलॉजिस्ट्स को कोई भी कैंसरयुक्त सेल नहीं मिले तब भूल समझ में आई कि प्रथा की गलत किडनी निकाल दी गई थी।
सातवां मामला : 73 वर्षीय श्रीमन को पेट दर्द के कारण अस्पताल में भर्ती किया गया। चार दिनों तक जांच-पड़ताल के बाद भी जब डॉक्टर किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे तो खोजबीन सर्जरी का निर्णय लिया गया। ऑपरेशन से पहले बेहोशी के लिए एनस्थीसिया दिया गया, परंतु एनस्थीसिया ने पूरी तरह से अपना प्रभाव नहीं दिखाया और नतीजन श्रीमन एक ऐसी स्थिति में चले गए कि वह न तो पूरी तरह से होश में रहे और न ही बेहोशी में। यह एक ऐसी स्थिति थी जब रोगी सर्जरी का दर्द अनुभव तो कर सकता है परंतु हाथ-पैर हिलाकर या डॉक्टर को बोलकर नहीं बता सकता। कहा जाता है कि यह दर्द मौत के दर्द से भी ज्यादा दर्दनाक होता है। शायद यही वजह रही कि सर्जरी के एक ही सप्ताह के भीतर श्रीमन ने आत्महत्या कर ली। उन्हें ऐसी दर्दनाक जिंदगी से मौत का सामना करना कहीं ज्यादा आसान लगा। उनके परिवार वालों का कहना है कि श्रीमन के लिए वह सब सहन करना असहनीय हो रहा था।
आठवां मामला : 34 वर्षीया नैंसी ने तय किया कि वह गर्भाधान के लिए इनविट्रो फर्टिलिटी के माध्यम का प्रयोग करेगी किंतु जब शिशु ने जन्म लिया तो सभी यह देख कर हैरत में पड़ गए कि गोरे माता-पिता के घर सांवले शिशु ने कैसे जन्म लिया। डीएनए टेस्ट के बाद उन्हें पता चला कि यह सब डॉक्टरों की ही गलती का परिणाम था। उन्होंने किसी दूसरे पुरुष का वीर्य नैंसी के गर्भाशय में प्रविष्ट करवा दिया था।
निष्कर्ष‒
आप भी इन चौंका देने वाले व शर्मनाक मामलों को पढ़कर हैरत में पड़ गए होंगे। दूसरा चौंका देने वाला तथ्य यह है कि यह सब तो भारत सहित दुनियाभर के सभी अस्पतालों के लिए आम बातें हैं। उन्हें कभी महसूस नहीं होता कि जो लोग उन पर पूरा विश्वास करते हुए वहां तक आए हैं, उनके जीवन के प्रति भी उनका कोई उत्तरदायित्व हो सकता है।
हम आपको जर्नल ऑफ हेल्थ अफेयर्स के माध्यम से बता रहे हैं कि विभिन्न देशों के अस्पतालों में इस तरह की होने वाली भूलों की संभावना का क्या प्रतिशत है:
देश
मेडिकल भूलों की संभावना का प्रतिशत
ब्रिटेन
18 प्रतिशत
ऑस्ट्रेलिया
23 प्रतिशत
न्यूजीलैन्ड
23 प्रतिशत
कनाडा
25 प्रतिशत
यूएसए
28 प्रतिशत
अब आप जानना चाहेंगे कि भारत में कितनी प्रतिशत सर्जरी में इस प्रकार की चिकित्सीय भूलें होती हैं। सच्चाई तो यह है कि हमारी सरकार ने भारतीय अस्पतालों में कभी भी ऐसे शोधों में रुचि ही नहीं ली किंतु विश्वस्त सूत्रों की मानें तो कह सकते हैं कि भारत के अस्पतालों में सर्जरी में लगभग 40 प्रतिशत तक भयंकर मेडीकल भूलें होने की संभावना है।
यूएसए के औपचारिक तथ्यों के अनुसार इन देशों में मौत का सबसे बड़ा कारण कोई बीमारी नहीं बल्कि अस्पतालों में घटी भूलें हैं जिन्हें हम तकनीकी भाषा में ‘एट्रोजेनिक डेथ’ कहते हैं।
जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन, वोल्यूम 284, जुलाई 2000 के लेख, ‘डेथ फ्रॉम एट्रोजेनिक कौजिज (चिकित्सकजनित भूलों)’ के अनुसार हर साल यूएस के अस्पतालों में मारे जाने वाले लोगों की संख्या निम्नलिखित है:
संख्या
कारण
12,000
अनावश्यक सर्जरी
7000
गलत दवाइयां
20,000
अस्पताल में घटी अन्य भूलें
80,000
अस्पतालों में होने वाले संक्रमण
1,06,000
सही दवाओं के दुष्प्रभाव
भारत की बात करें तो एक अनुमान के अनुसार, अस्पताल में हुई तीन में से दो मौतों का कारण अस्पताल की लापरवाही और दवाइयों से होने वाले दुष्प्रभाव हैं। यदि आपको भारत के अस्पतालों में होने वाली इन मौतों के शर्मनाक तथ्यों पर विश्वास नहीं होता तो जरा कुछ और नज़ारे भी देख लें। हम आपको चिकित्साजगत से जुड़े कुछ लोगों से मिलवाने जा रहे हैं। भारत के प्रतिष्ठित इंडियन मेडिकल एसोसिएशन में तीन लाख से अधिक डॉक्टर सदस्य हैं। इसे भारत के आधुनिक मेडीसिन का बैकबोन भी कहा जाता है। सन् 2008 में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने टी वी पर एक विज्ञापन के माध्यम से ट्रोपिकाना जूस पीने की सिफारिश की और कहा कि वह सेहत के लिए बहुत लाभदायक है। जबकि सच्चाई तो यह है कि अगर आप जूस में डाली गई सामग्री की जांच करें तो पाएंगे कि वह सेहत के लिए बेहद नुकसानदायक है। यह किस्सा यहीं समाप्त नहीं होता। जरा हमारे साथ कुछ बड़े व निजी अस्पतालों के रसोईघरों में झांकें तो पाएंगे कि मरीजों को फलों के जूस के नाम पर पैक्ड और केमीकल युक्त जूस दिए जा रहे हैं, जो कि रोगियों के नाजुक रोग प्रतिरोधक तंत्र के लिए जहर का काम करते हैं।
बेशक फलों का जूस सेहत के लिए अच्छा होता है किंतु पैक्ड एंड प्रोसेस्ड जूस सेहत के खराब होने का कारण बन जाते हैं। उसी प्रकार माइक्रोवेव द्वारा पकाया गया भोजन डायबिटीज़, कोलेस्ट्रॉल, हार्ट डिज़ीज और कैंसर जैसे जानलेवा रोगों का कारण बन जाता है। माइक्रोवेव खाने की नमी या वॉटर मोल्यूकलस को एक सेकेंड में लाखों बार वाइब्रेट करता है, जिससे गर्मी पैदा होती है और खाना गरम हो जाता है लेकिन साथ ही वॉटर मोल्यूकलस का केमिकल स्ट्रक्चर अस्वाभाविक रूप से बदल जाता है, जो कि हमारे शरीर में जाकर जहर के रूप में काम करता है। अब विचार करने की बात यह है कि ऐसे खाने का सेवन करके रोगी बना व्यक्ति जब अस्पताल पहुंचता है तो उसे वहां भी माइक्रोवेव से पका या गरम किया गया भोजन ही परोसा जाता है यानी इलाज के साथ-साथ रोग के दोबारा पनपने या बने रहने का कारण भी परोसा जा रहा है। संभवतः हमारे देश के चिकित्सक भी आम आदमी की तरह इन सभी कारणों को निरंतर नजरअंदाज करते हैं, यही कारण है कि स्वयं चिकित्सक ही एक आम आदमी की अपेक्षा अधिक रोगी पाए जाते हैं। हाल ही में, मेरे दल ने भारत के सबसे श्रेष्ठ व अच्छे माने जाने वाले टॉप 10 अस्पतालों के ओबेसिटी (मोटापा) विभाग के प्रमुखों की सेहत का जायजा लिया और पाया कि 10 में से 9 प्रमुख तो स्वयं ही मोटापे से ग्रस्त हैं। अब आप ही सोचें कि जो इंसान स्वयं मोटापे की मार झेल रहा है, वह भला किसी दूसरे को पतला होने की क्या सलाह देगा? यदि भारत का सबसे बड़ा मधुमेह का डॉक्टर स्वयं ही मधुमेह का रोगी होगा तो वह अपने रोगियों की चिकित्सा क्या खाक करेगा?
आप किसी भी बड़े निजी अस्पताल में जाइए, अस्पताल के अंदर ही फास्ट फूड के रेस्त्रां मिल जाएंगे, हालांकि यह सिद्ध हो चुका है कि वर्तमान जीवनशैली से जुड़े अधिकतर रोगों का प्रमुख कारण फास्ट फूड ही होता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्राइवेट अस्पतालों में बीमारी के नाम पर पैसा कमाने का ऐसा कारोबार आरंभ हो चुका है, जिसकी तेजी से बढ़ने की संभावनाएं सौ प्रतिशत से भी अधिक हैं।
इस प्रचलित मुहावरे पर ध्यान दें:
‘‘आज इंसान अपने 50 साल की बचत को जीवन के आखिरी 50 दिनों में ही खुद को मौत से बचाने में खर्च कर देता है।’’
निःसंदेह अस्पताल का व्यापार एक उन्नत व्यापार बन गया है।
याद रखिए, आपके बीमार पड़ने, बीमार रहने और उस बीमारी के लंबे समय तक चलते रहने में ही अस्पतालों और कुछ कंपनियों का लाभ है। संभवतः यही कारण है कि ब्रिटानिया जैसी कंपनी भी डायबिटीज़ रोगियों के लिए बनाए गए अपने एक खास बिस्किट के विज्ञापन में लिखती है ‘लैट्स बी फ्रेंड्ज विद डायबिटीज़’। भला सोचिए, कौन बेवकूफ इस बीमारी से दोस्ती करना चाहेगा!
आपको रोगों के साथ जीवित बनाए रखने में ही दवा कंपनियों व अस्पतालों को लाभ होगा। वे सब मिलकर यह षड्यंत्र रच रहे हैं और आप सब कुछ जानकर भी अनजान बने बैठे हैं। यह मानवजाति का ही दुर्भाग्य है कि केवल मनुष्य ही रोगों से मरता है। क्या कभी आपने सुना कि बिल्ली हार्ट अटैक से मारी गई या किसी कुत्ते को उच्च रक्तचाप हो गया।
मर्क, ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन, फाइजर सहित दुनिया की टॉप 10 दवा कंपनियों में आए दिन किसी न किसी मेडिकल घोटाले का सामने आना इस बात का प्रमाण है कि हम सब किसी न किसी गहरे जानलेवा खतरे से घिरते जा रहे हैं और बचाव का कोई उपाय सामने नहीं है।
‘‘पारंपरिक डॉक्टर बीमारी के बारे में बात करते हैं
और प्राकृतिक डॉक्टर सेहत के बारे में।’’
— महात्मा गांधी

अध्याय‒2
बीमारियों का गणित
हम आपको 1975 के उस जमाने में ले चलते हैं जहां हम दुनिया की 10 टॉप कंपनियों में से दूसरे नंबर की बड़ी कंपनी मर्क की बात करेंगे। उस कंपनी के सीईओ का नाम था, हेनरी गॉडसन। उनका कहना था कि उनके मन में एक ही दुख है कि दुनिया में केवल रोगी ही उनकी कंपनी द्वारा बनाए गए उत्पाद का सेवन कर पाते हैं। वे उस दिन का सपना देख रहे थे जब वे दुनिया के स्वस्थ लोगों को भी अपने उत्पाद बेच सकेंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि वे चाहते थे, सारी दुनिया बीमार पड़ जाए या न भी पड़े पर उनके उत्पाद अवश्य बिकें। जैसे कि च्यूइंगम। दुनिया में हर आदमी इसे चबाना पसंद करता है, चाहे वह छोटा हो या बड़ा। बीमार हो या स्वस्थ! इसी तरह दुनिया की सभी दवा कंपनियां यही चाहती हैं कि उनकी दवाएं दुनिया के सभी लोग बार-बार लें। यह प्रमाणित करने के लिए ही आप कुछ उदाहरण देखिए :
मान लेते हैं कि आपको नींद नहीं आ रही। भले ही इसका कारण कुछ भी हो परंतु आप नींद लाने की दवा खा लेते हैं। आप निरंतर इसी अभ्यास को जारी रखते हैं और कुछ समय बाद नौबत यह आ जाती है कि आपको नींद की दवा खाए बिना नींद आनी ही बंद हो जाती है। इसी प्रकार यदि आपको डिप्रेशन है तो कुछ दिन तक डिप्रेशन की दवा खाने का प्रभाव ऐसा होगा कि आप उन गोलियों को न खाने पर स्वयं को डिप्रेशन से घिरा पाएंगे। ऐसा लगेगा कि आपके जीवन में कोई कमी-सी है। इसी प्रकार यदि आपको डायबिटीज़ की शिकायत नहीं है और फिर भी आप डायबिटीज़ नियंत्रित करने के लिए दवा लेते हैं तो कुछ ही दिनों में आप इस पर निर्भर हो जाएंगे।
ये सब कोरे किस्से नहीं हैं। ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन नामक एक बड़ी कंपनी डॉक्टरों को निरंतर बीस वर्षों तक घूस देती रही ताकि उनकी दवाएं अधिक से अधिक स्वस्थ लोगों को दी जाएं। संभवतः वे जानते थे कि यदि उनकी दवाएं स्वस्थ लोगों को भी दी जाएंगीं तो कुछ ही दिनों में बहुत से लोग उन पर निर्भर हो जाएंगे। उनकी दवाइयों के बिना लोगों का काम नहीं चलेगा। पूरे बीस साल बाद उनका यह दुष्कर्म पकड़ में आया। 20 जुलाई, 2010 में लोगों को इस बात का पता चला और इस वजह से कंपनी को 16 हजार करोड़ रुपए से भी अधिक जुर्माना देना पड़ा। सवाल यह पैदा होता है कि क्या केवल जुर्माना भर देने से ही वे उस नैतिक अपराध से मुक्त हो गए जो उन्होंने मानवजाति के प्रति किया था?
केवल यही एक उदाहरण नहीं है जब दवा कंपनियों ने अपने लाभ कमाने के उद्देश्य को सबसे आगे रखते हुए बाकी दूसरे तथ्यों व कर्तव्यों को नकार दिया हो। उनका किसी की भी सेहत से कोई लेन-देन नहीं है। वे केवल रोगों को बढ़ावा देना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग बीमार पड़ें और आजीवन रोगों की चपेट में रहें, इसी में तो उनका लाभ है, कंपनियां चलेंगी तो वे मालामाल होंगे।

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