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एक मुलाकात – जवाहरलाल नेहरू के साथ | Ek Mulakat – Jawaharlal Nehru Ke Sath Book PDF Download Free Hindi by Dr. Rajeev Pundir

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥एक मुलाकात - जवाहरलाल नेहरू के साथ PDF | Ek Mulakat - Jawaharlal Nehru Ke Sath
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 2 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖107
Last UpdatedAugust 15, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category,

किसी भी विश्वविद्यालय में अपने पठन-पाठन से सम्बंधित सुविधाओं को लेकर छात्र-आन्दोलन होना एक सामान्य सी बात है । लेकिन, यदि आप पाएं कि इन छात्र-आन्दोलनों के बीचों-बीच सत्ता-विरोधी ही नहीं अपितु भारत-विरोधी नारों के स्वर गूंजने लगें हैं तो आपके मन में चिंता के साथ-साथ यह जानने की उत्सुकता भी होने लगती है कि इन राष्ट्र- विरोधी नारों के मूलभूत कारण क्या हैं ? यह पुस्तक इन्हीं ऐतिहासिक, राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक कारणों की खोज करने का एक छोटा सा प्रयास है – ताकि भारत की युवा पीढ़ी को भ्रमित होने से बचाया जा सके और समय रहते इस तरह की गतिविधियों पर अंकुश लगाया जा सके।

पुस्तक का कुछ अंश

आभार
“यदि आप लिख सकते हैं तो लिखिए, यदि आप बोल सकते हैं तो बोलिए, यदि आप चिल्ला सकते हैं तो चिल्लाइए और यदि आप इन तीनों में से कुछ नहीं कर सकते तो जो बोल रहा है उसके साथ खड़े हो जाइए!”
मैं जब भी आदरणीय श्री पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ को सुनता हूँ तो उनके भाषण में मुझे उपरोक्त वाक्य हर बार सुनने को मिलता है जिसने मुझे ये पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित किया। भारत राष्ट्र को जगाने के लिए जो कार्य वो कर रहें हैं अद्भुत है, अविस्मरणीय है। एक लेखक होने के नाते मैं उनके इस कार्य में यदि सागर में एक नन्ही सी बूँद के जितना भी योगदान कर सकूँ तो ये मेरा सौभाग्य होगा। इस प्रेरणा के लिए मैं उनका हृदय से आभारी हूँ – उन्हें मेरी ओर से कोटि कोटि नमन।
इस पुस्तक को मूर्त रूप देने के लिए मैं राजमंगल प्रकाशन अलीगढ़, उत्तर प्रदेश, का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद!
मैं अपने पाठकों का भी हृदय से आभारी हूँ जिनका सतत प्रोत्साहन मुझे अनवरत रूप से लिखने को प्रेरित करता है – आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद!
मेरा कोई भी कार्य मेरे परिवार के सहयोग के बिना संपन्न नहीं होता। इस पुस्तक को भी मेरी पत्नी श्रद्धा ने कई बार पढ़ा और
बीच बीच में सकारात्मक सुझाव दिए तथा अंत में सम्पादन भी किया जिसके लिए मैं उसका भी हृदय से धन्यवाद करता हूँ।
डॉ राजीव पुंडीर
ॐ नम: शिवाय
बरसों बाद उसे गहरी नींद आई थी...
अथक परिश्रम के बाद उसने दिल्ली स्थित एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी, Centre for Historical Studies में प्रवेश पा लिया था। ये पहेली भी उसे आज तक समझ नहीं आई थी कि जो विषय उसे दसवीं-बाहरवीं तक बिलकुल नीरस और बेकार लगता था, बी. ए. पास करते करते न जाने कब उसका पसंदीदा विषय बन गया और धीरे-धीरे इस विषय में उसकी रूचि बढ़ने लगी। एम.ए. करते करते उसने ठान लिया था कि इसी विषय में आगे भी पढ़ना है, पहले एम. फिल. करना है और फिर हो सका तो पीएच. डी. भी करेगा। लोगों ने उसे बहुत समझाया था कि इस विषय में कोई भविष्य नहीं है, लेकिन न जाने क्यूँ उसे लगता था कि बिना इतिहास को ठीक से जाने उसका वर्तमान बर्बाद हो रहा है, भविष्य तो बाद में देखा जाएगा।
सोते-सोते अचानक उसने अनुभव किया कि जैसे बहुत सारे चील- कौवों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया है। और उनकी तीखी कांव-कांव उसके इर्दगिर्द मंडराने लगी। नींद में थोड़ा खलल पड़ा, उसकी आँखों में थोड़ी सी हरकत हुई और उसने करवट बदल दी। चील कौवों की वो डरावनी आवाज़ें कुछ देर के लिए धीमी पड़ीं, फिर रुक गईं और वह फिर से गहरी नींद के आगोश में समा गया। लेकिन कुछ देर बाद ही वो शांति फिर से भंग हो गई। वही आवाज़ें फिर से उसके चहुँ ओर मंडराने लगीं। इस बार उनकी तीव्रता पहले से बहुत ज़्यादा थी। लगता था कि उसके बहुत पास भयंकर युद्ध हो रहा है और वह उस युद्ध के बीचों-बीच आपस में टकराती तलवारों के मध्य निहत्था और असहाय खड़ा हुआ है। हालांकि वह अभी भी गहरी नींद में ही था परन्तु उसके मस्तिष्क ने अनुभव किया कि ये आवाज़ें चील-कौवों की न होकर मनुष्यों की हैं। फिर से उसकी आँखों में हल्की सी हरकत हुई, आँखों के गोले जो सोते समय न जाने कहाँ छुप गए थे, फिर से सामने आकर ठहर गए। अब उसका मस्तिष्क पहले की अपेक्षा अधिक जागृत हुआ और उसने महसूस किया कि ये आवाज़ें निश्चित रूप से मनुष्यों के चीखने चिल्लाने की ही हैं, चील-कौवों की नहीं। धीरे-धीरे कुछ नारे उसके कानों से गुज़र कर उसके दिमाग़ में घुसने लगे –
हमें चाहिए - आज़ादी...
हम छीन के लेंगे - आज़ादी...
साड्डा हक़ - एत्थे रख...
हम क्या मांगें - आज़ादी...
इसे भी चाहिए - आज़ादी...
मुझे भी चाहिए - आज़ादी...
नारे इतनी ज़ोर से लगाये जा रहे थे कि उसकी आँखें खुल गईं। कमरे में घना अँधेरा था। ये कौन हैं जो आज़ादी के नारे लगा रहे हैं? उसने सोचा।

नारे लगातार उसके दिमाग़ पर हथौड़े की तरह प्रहार कर रहे थे। उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है? “तो क्या वह 1947 के पहले वाले काल खंड में पहुँच गया है?” उसके मन में एक विचार कौंधा और झट से उसने अँधेरे में अपना मोबाइल फ़ोन ढूंढा और उसका स्विच ऑन कर दिया। ध्यान से तारीख पढ़ी तो 2016 एकदम साफ़ साफ़ नज़र आया और उसने तसल्ली की एक गहरी सांस ली।
और फिर सुनाई देने लगे वही आज़ादी के नारे – तेज़ और तेज़ बहुत तेज़ – वो सब जो वह बीते दिन में देख चुका था – यूनिवर्सिटी में लड़के लड़कियों के बड़े से झुण्ड में जिसमें स्टूडेंट यूनियन का प्रेसिडेंट भी था, वही नारे लगा रहे थे और वह दूर खड़ा होकर बस देखता रहा था। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि भारत को आज़ाद हुए करीब सत्तर साल होने वाले थे फिर ये लोग किस से आज़ादी मांग रहे हैं और क्यूँ? क्या कुछ लोगों को लगता है कि वो अभी भी ग़ुलाम हैं? और अगर हैं तो किसके? कमाल है, कुछ लोगों को अभी भी आज़ादी चाहिए...मगर किस से?
यूनिवर्सिटी में वह नया था। उसकी इच्छा हुई कि वह किसी से पूछे, मगर हिम्मत नहीं हुई। उसने मेस में शाम का भोजन किया और बिना किसी से बात किए अपने कमरे में सोने चला आया – उस नींद में – उस गहरी नींद में सोने के लिए जिसका उसे बरसों से इंतज़ार था।
लेकिन अब फिर से वही नारे!
आँखें खुलने के बाद नारे तो गायब हो चुके थे मगर उसके मस्तिष्क में एक अज़ीब सी बेचैनी ने जन्म ले लिया था। उसने एक पूरा गिलास भर कर गटागट पानी पिया, फिर से सोने की कोशिश की, मगर नींद अब कोसों दूर जा चुकी थी। बहुत देर तक करवटें बदलीं लेकिन उस बेचैनी ने थमने का नाम तक न लिया। जब वह बहुत परेशान हो गया तो उसने एक बार फिर से आँखें खोलीं, ऊपर देखा तो पंखे के चलने की आवाज़ सुनाई दी। फिर भी उसे लगा कि कमरे में और अधिक देर तक रहा तो उसका दम घुट जाएगा। उसने अपना फोन उठाया और पहले उस जगह गया जहाँ दिन में नारे लगाये जा रहे थे लेकिन अब वहां कोई न था – चारों तरफ़ शांति छाई थी।
और वह कमरे से बाहर हॉस्टल से दूर खुले आसमान के नीचे यूनिवर्सिटी के पार्कों में टहलने लगा। घूमते-घूमते वह एक पेड़ के पास पहुँचा। उसे दूर से देखकर ही लग रहा था कि वहां पेड़ के पास कोई पहले से ही कोई बैठा है। इस समय कौन हो सकता है? कोई विद्यार्थी या कोई शिक्षक? हो सकता है दिन में लगाए हुए नारों ने इस व्यक्ति को भी उसी प्रकार व्यथित किया हो जैसे स्वयं उसको कर दिया है? उसने सोचा चलकर देखना चाहिए। और वह धीरे-धीरे चलते हुए उस पेड़ के पास पहुँच गया।
रात अँधेरी तो थी लेकिन पार्क में लगे बिजली के खम्बों पर जो ट्यूब लाइट्स लगी थीं उनमें से एक दो जलकर अपने धुंधले प्रकाश से उस घने अँधेरे को पीछे धकेलने का प्रयास कर रही थीं। उसी धुंधलके में उसने उस व्यक्ति की तरफ़ देखा। पहले उसे लगा कि ये चेहरा कुछ जाना-पहचाना है। फिर उसने सोचा कि इस समय यहाँ कौन हो सकता है जिसे वह जानता हो। दूसरे ही क्षण फिर से लगा कि नहीं, है तो कुछ जाना-पहचाना ही। और अपना भ्रम मिटाने के लिए वह उस व्यक्ति के और निकट पहुँच गया। उसने ध्यान से देखा तो उसको अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने महसूस किया कि वह अचानक ही उखड़ी हुई नींद से जागकर आया है और हो सकता है उसकी आँखें अभी पूरी तरह से न खुलीं हों, उसने अपने दोनों हाथों से अपनी आँखों को मला, फिर से आँखें खोलीं – और वह चकित रह गया – जो देखा वो अद्भुत था, अविश्वसनीय था और आश्चर्यजनक था। उसने निश्चित हो गया कि व्यक्ति तो वही था – दूर से भी और पास से भी – कोई भ्रम नहीं। और उसके मुँह से निकला - “अरे! पण्डित जी आप?”
“हाँ, मैं – जवाहर लाल नेहरू...” उस व्यक्ति ने कहीं दूर देखते हुए धीरे से उत्तर दिया।
अब विद्यार्थी को पूर्ण विश्वास हो गया था कि ये व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ही हैं – स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जिन्हें लोग चाचा नेहरू के नाम से भी जानते हैं। वही प्रधानमन्त्री जिनके जन्म दिन 14 नवम्बर को बाल-दिवस मनाया जाता है। और वही एकमात्र प्रधानमंत्री जिन्हें प्रबुद्ध लोग विज़िनरी प्रधानमंत्री कह कर संबोधित करते हैं। लेकिन उनकी मृत्यु तो सन् 1964 में हो चुकी है फिर वो यहाँ कैसे हो सकते हैं? उसने देखा कि नेहरू जी एक गंभीर मुद्रा में हैं और कुछ सोच रहे हैं। पहले उसने उनको डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा लेकिन जब से उसने उनकी लिखी हुई किताब The Discovery of India पढ़ी है उसके अंतस में उनसे मिलने की उत्कट इच्छा ने जन्म ले लिया था। उस किताब को पढ़कर बहुत सारे सवालों ने उसके मन में घर बना लिया था जिसका निराकरण नेहरू जी से मिलकर ही हो सकता था। और वह आज स्वयं उसके सामने बैठे हैं तो इस सुनहरे मौके का लाभ तो उठाना ही चाहिए, ये सोचकर उसने धीरे से पूछा, “आदरणीय, लेकिन आपकी मृत्यु तो सन् 1964 मई 27 को हो चुकी है, फिर आप यहाँ?”
नेहरू जी ने उसकी तरफ़ नज़र उठाई, फिर अपने सिर पर हल्की सी खुजली की और बोले, “मेरे जैसे लोगों की मृत्यु नहीं होती – हम इतिहास के पन्नों में हमेशा से ज़िंदा हैं और रहेंगें...”
विद्यार्थी ने महसूस किया कि उनकी वाणी में दृढ़ता के साथ-साथ थोड़ा अहंकार भी था – और हो भी क्यूँ ना – वो एक पढ़े-लिखे विद्वान् क्रांतिकारी थे जिन्होंने भारत को आज़ाद कराने में अहम भूमिका निभाई थी। उनके सामने विद्यार्थी नतमस्तक हो गया। साथ ही साथ उनके सामने विद्यार्थी अपने आपको बहुत छोटा महसूस कर रहा था। उनके आगे कुछ बोलने की, कुछ पूछने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। मगर वह इस सुनहरे मौके को किसी कीमत पर भी गंवाना नहीं चाहता था। उसने अपनी सभी ऊर्जाओं को एकत्र किया, थोड़ी हिम्मत जुटाई और धीरे से बोला, “मान्यवर, आपसे मिलने की बहुत इच्छा थी, कोटि कोटि धन्यवाद उस परमपिता परमेश्वर का जो आज ये इच्छा पूर्ण हुई – मैं हृदय से आपको नमस्कार करता हूँ...” और युवक ने श्रद्धा पूर्वक दोनों हाथ जोड़कर सिर झुका कर उनको नमस्कार किया।
नेहरू जी ने जैसे कुछ सुना ही नहीं। बस तटस्थ होकर बैठे रहे, और उसके नमस्कार का उत्तर भी नहीं दिया। विद्यार्थी ने बुरा भी नहीं माना – बुरा भी क्यों मानता, उनसे मिलने की उसकी इच्छा पूरी हो गई थी और उसे कुछ नहीं चाहिए था – वैसे भी वो बहुत बड़े विशाल व्यक्तित्व के आदमी थे और वो एक अदना सा विद्यार्थी!
“आप कहाँ रहते हैं?” बहुत संकोच से विद्यार्थी ने नेहरू जी से प्रश्न किया।
“कहाँ रहते हैं? मतलब? मैं यहीं रहता हूँ, इसी यूनिवर्सिटी में...” नेहरू जी ने तपाक से उत्तर दिया। शायद वो विद्यार्थी के सवाल से कुछ नाराज़ भी हो गए थे।
“नाराज़ मत होइए मान्यवर...मेरा वो मतलब नहीं था...ये तो यूनिवर्सिटी ही आपके नाम पर है, आप मालिक हैं, जहाँ चाहे रह सकते हैं...मैं बस जानना चाहता था कि यूनिवर्सिटी में आप कहाँ रहते हैं?” विद्यार्थी ने बड़ी विनम्रता से अपनी बात रखी।
“मुझे समझ नहीं आ रहा है...तुम पूछना क्या चाहते हो?” नेहरू जी ने उसके ऊपर एक तीखी दृष्टि डालते हुए कहा।
“बस यही कि जैसे मैं हॉस्टल में रहता हूँ, यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में, आप कहाँ रहते है...किस भवन में?” विद्यार्थी ने उन्हें समझाते हुए विस्तार से अपनी बात रखी। हालांकि उसको आश्चर्य भी था और अंदर से थोड़ा खिन्न भी कि इतनी सी बात भारत के पहले प्रधानमन्त्री को समझ नहीं आ रही थी, या फिर वो जानबूझकर नासमझी का नाटक कर रहे थे।
“लेकिन क्यों जानना चाहते हो कि मैं कहाँ रहता हूँ?” नेहरू जी ने उसकी आँखों में झांकते हुए पूछा।
नेहरू जी की पैनी धारदार दृष्टि उस मद्धम रोशनी में भी तलवार की तरह चमक उठी, और एक शीतलहर विद्यार्थी की पीठ से रेंगती हुई दोनों पैरों से बिजली तरह गुज़र कर उसके पंजों से होती हुई नीचे की धरती में समा गई। नेहरू जी ने तुरंत भांप लिया कि विद्यार्थी असहज हो चला है। उन्होंने उसे सामान्य स्थिति में लाने के लिए कहा, “डरो मत, मैं कोई भूत तो नहीं हूँ, बैठ जाओ...”
विद्यार्थी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उनके सामने बैठ जाए। मगर भारत के भूतपूर्व प्रधानमन्त्री की आज्ञा की अवहेलना करना भी ठीक नहीं और फिर अभी उसका उनसे वार्तालाप करने का उद्देश्य भी तो पूर्ण नहीं हुआ था। बहुत सारे सवाल, जो उसे परेशान करते थे, या रातों में आराम से सोने नहीं देते थे या फिर सोते हुए को जगा देते थे, उन सबका निराकरण भी ज़रूरी था जो उनके सिवाय कोई नहीं कर सकता था। उसने हिम्मत की और धीरे से उनकी बगल में पड़े पत्थर पर बैठ गया।
नेहरू जी ने उसकी पीठ थपथपाई और पूछा, “तुम्हें ये जिज्ञासा क्यों है कि मैं कहाँ रहता हूँ?”
विद्यार्थी की एकदम से उत्तर देने की हिम्मत नहीं हुई। कुछ क्षण चुप रहा। फिर सामने देखते हुए बोला, “मुझे आपसे बहुत सारी बातें करनी हैं, बहुत सारे प्रश्न पूछने हैं...उनका निराकरण जब तक नहीं होगा, मैं परेशान रहूँगा, न मैं चैन से जी सकूंगा और न ठीक से सो सकूंगा...”
“अरे! ऐसे कौन से सवाल हैं? मैं कभी कभी यहाँ आता हूँ, कुछ देर बैठता हूँ, फिर चला जाता हूँ सोने के लिए – आज बहुत दिनों के बाद यहाँ आया हूँ, पूछो क्या पूछना चाहते हो?” नेहरू जी ने उसकी ओर देख कर कहा।
विद्यार्थी अब सहज हो गया था। उसने हिम्मत जुटाई और जैसे ही प्रश्न पूछने के लिए अपना मुँह खोला, उसके होंठ कंपकंपाये और फिर स्थिर हो गए। अचानक ही उन्हें एक शोर सुनाई दिया। धीरे-धीरे आवाज़ें स्पष्ट होने लगीं और भारत माता की जय के नारों ने उन्हें चारों तरफ़ से घेर लिया। विद्यार्थी प्रसन्न हुआ और उसने भी उन नारों का साथ देने के लिए अपनी मुट्ठी भींचकर हाथ ऊपर उठाया और ज़ोर से भारत माता की जय का नारा लगाया।
और नेहरू जी के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं।
भारत माता की जय के नारों के साथ-साथ उस युवक ने भी उन आवाज़ों के सुर में अपना सुर मिला दिया, और अब वो भूल गया था कि नेहरू जी से उसे कुछ सवाल करने हैं। उसको भारत माता की जय के नारों में खोया देख नेहरू जी ने एक लम्बी गहरी सांस ली और वहां से उठकर चलने लगे। उनको उठता देख युवक को होश आया और वह उचक कर उनके सामने खड़ा हो गया। नेहरू जी ने कुछ क्रोधित होकर उसकी तरफ़ देखा और बोले, “सामने से हटो, रास्ता मत रोको...”
विद्यार्थी सकपका गया। वह नेहरू जी को नाराज़ करना नहीं चाहता था। उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा, “महोदय, मेरी इतनी औकात कहाँ कि आपका रास्ता रोकूँ – बस मुझे कुछ प्रश्नों के उत्तर चाहिए जो केवल और केवल आप ही दे सकते हैं...” और उसने प्रार्थनापूर्ण मुद्रा में अपनी आँखें नीचे कर लीं।
“देखो, इतना समय मेरे पास नहीं होता कि तुम मुझे अनदेखा करके मेरे ही सामने भारत माता की जय के नारे लगाने लगो,” नेहरू जी ने अपनी नाराज़गी जताते हुए उसकी ओर तीखी दृष्टि डाली।
युवक वैसे ही हाथ जोड़कर पत्थर की मूर्ति की तरह उनके सामने खड़ा रहा। कुछ क्षण बीते, उसके होठों में हरकत आई और बोला, “क्षमा चाहता हूँ श्रीमान्, ग़लती हो गई – मगर मेरे प्रश्न...”
उसका वाक्य अभी पूर्ण भी न हुआ था कि नेहरू जी ने एक टेढ़ी नज़र उसके चेहरे पर फेंकते हुए कहा, “तुम्हें पता भी है ये भारत माता क्या होता है – इसका मतलब बता सकते हो?”
“जी...”
“बोलो...” और नेहरू जी ने एक प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे इस प्रकार देखा जैसे कोई परीक्षक मौखिक परीक्षा लेते समय एक विद्यार्थी को देखता है, और विद्यार्थी सहम जाता है, उसके मुँह से शब्द बाहर नहीं निकलते, दिल घबराने लगता है और माथे पर पसीना की बूँदें छलकने लगती हैं।
कुछ-कुछ वैसा ही इस विद्यार्थी को भी महसूस होने लगा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये तो सबको पता है कि हम भारत माता किसे कहते हैं? प्रश्न बहुत सरल है, फिर इसमें ऐसा क्या है? कौन सा भेद है जो उसे नहीं पता। उसने कुछ देर सोचा और जब उसे कोई भेद नज़र नहीं आया तो उसने उत्तर दिया, “जी, ये धरती हमारी माता है...”
“मैं पूरी धरती की नहीं, भारत माता के बारे में पूछ रहा हूँ...” नेहरू जी ने और स्पष्ट किया।
“जी हाँ, भारत देश की सीमाएं धरती के जिस टुकड़े को अपनी गोद में समाये हुए है उसे ही हम भारत माता कहते हैं...” विद्यार्थी ने अपनी उंगली से हवा में भारत का नक्शा खींचते हुए जवाब दिया।
“नहीं, तुम्हें नहीं पता...और तुम ही नहीं ये पूरा देश जाहिल, अनपढ़, गंवारों से भरा पड़ा है। आज़ादी से पहले जब मैं अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराने के लिए लड़ रहा था तो मैंने पूरे देश का भ्रमण किया, गाँव-गाँव शहर-शहर घूमा...मुझे बड़ा आश्चर्य होता था कि जहाँ भी जाता था, जो लोगों की भीड़ मेरा स्वागत करने के लिए आती थी वो मेरी नहीं भारत माता की जय के नारे लगाती थी। सुनते-सुनते मेरे कान पक गए थे, और एक दिन यही प्रश्न मैंने उस भीड़ से भी किया था – मगर अफ़सोस! मेरा सवाल सुनकर सब चुप हो गए, कोई उत्तर न दे सका। वो ऐसे खड़े रहे जैसे उन्हें सांप सूंघ गया हो। पूरी भीड़ में सन्नाटा पसर गया था। वो कभी मुझे और कभी एक-दूसरे की ओर देखने लगे थे। मैं समझ गया था कि ये अनपढ़ जाहिल लोग हैं – इन्हें कुछ नहीं पता, बस एक भेड़ चाल है...” नेहरू जी कहते-कहते रुके, एक नज़र विद्यार्थी पर डाली और फिर से कहना शुरू किया, “मैंने उन्हें एक मौका और दिया और फिर से पूछा कि बताओ ये भारत माता क्या है कौन है? तुम लोग किसकी जय चाहते हो? इस बार एक आदमी ने, शायद जाट था, साहस किया – और उस दिन उसका भी वही उत्तर था जो आज तुम्हारा है। न जाने कब से ये सिलसिला चलता आ रहा है...इन सोये हुए लोगों को जगाना होगा – तो मैंने उन्हें भारत माता का मतलब समझाया*…” और ये कहकर उन्होंने सिगरेट का पैकेट और माचिस अपने कुरते की जेब से निकाले, एक सिगरेट सुलगाई और एक गहरा कश लेकर धुंआ आसमान की तरफ़ छोड़ दिया। *The Discovery of India Page No 53.
सिगरेट का धुआं सामने खड़े विद्यार्थी की आँखों में चुभने लगा था। उसने अपने हाथ हिलाए और धुएं को पीछे धकेलने का प्रयास करने लगा। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि भारत के भूतपूर्व प्रधानमन्त्री सिगरेट भी पीते हैं। उसके दिल में ख्याल आया कि वहां से भाग जाए परन्तु उन सवालों का क्या होगा जो उसे उनसे पूछने हैं, और उसने वहां से चले जाने का विचार अपने दिमाग़ से निकाल दिया।
नेहरू जी को इसका आभास नहीं था कि वह युवक उनकी लिखी हुई किताब The Discovery of India पहले ही पढ़ चुका है। वो एक दार्शनिक की भांति विचार मग्न होकर कुछ सोचते हुए चुपचाप सिगरेट पीते रहे। शायद उन्हें इंतज़ार था कि विद्यार्थी उन्हें आगे उत्तर स्पष्ट करने के लिए आग्रह करे तो बोलें।
हालांकि विद्यार्थी को उनका उत्तर पहले से पता था परन्तु वह उस किताब में दिए गए उत्तर से संतुष्ट नहीं था। उसे अपनी शंका का निराकरण चाहिए था और चाहता था कि नेहरू जी ने भारत माता की जो परिभाषा लिखी है वो स्वयं उसे और स्पष्ट करें। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसकी शंकाओं को दूर करने के लिए नेहरू जी कभी स्वयं उसके सामने प्रकट हो जायेंगे। ये सुनहरा मौका है, इसे गंवाना नहीं चाहिए। ये सोचकर उसने पूछा, “हे आचार्य श्रेष्ठ, कृपया बताएं कि अगर ये धरती भारत माता नहीं है तो वो क्या है जिसे हम भारत माता कह सकते हैं?
नेहरू जी ने एक गहरा कश लिया, एक तिरछी नज़र उसकी तरफ़ उछाली और जलती हुई सिगरेट अपने दाएं हाथ की दो उँगलियों में फंसाकर हाथ को हवा में लहराते हुए बोले, “मैं धरती के एक टुकड़े को एक व्यक्ति के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता। मैंने उन्हें समझाया कि ये पेड़-पौधे, ये पहाड़, नदियाँ, ये खेत-खलिहान, ये जंगल सब हमें बहुत प्यारे हैं लेकिन सिर्फ़ इनको भारत माता नहीं कहा जा सकता – वास्तव में इस देश में रहने वाले लाखों-करोड़ों लोग ही भारत माता हैं और उनकी विजय ही भारत माता की विजय है। इसलिए तुम लोग ही भारत माता हो, ये नहीं*...” नेहरू जी ने अपना दायाँ हाथ धरती की ओर नचाते हुए कहा। इस दौरान उनके उस हाथ में फंसी हुई सिगरेट की गरम राख़ झड़-झड़ कर उनके कुरते पर गिरती रही। *The Discovery of India Page No. 53
विद्यार्थी ने देखा कि उस राख़ में छुपी छोटी-छोटी चिंगारियों ने उनके खादी के कुरते को जगह-जगह से जला कर काला कर दिया था और कहीं-कहीं छोटे-छोटे छेद भी हो गए थे। लेकिन वो इससे अनभिज्ञ थे। उन्होंने एक कश और लिया और बोले, “ तुम्हें मालूम है, जब मैंने उन लोगों को समझाया तो उनकी आँखों में एक चमक आ गई जैसे कि उन्होंने कोई महान वस्तु की खोज कर ली हो...*” नेहरू जी ने अपनी बात समाप्त की और उसकी तरफ़ देखा।*The Discovery of India Page No. 54
युवक ने देखा कि उनकी आँखों में भी एक प्रकार की चमक थी और उस चमक के पीछे था एक विद्वान् होने का यकीन था जो शायद अहंकार में बदल गया था।
उनकी सिगरेट से झड़ती गर्म राख़ और उससे उनके कुरते पर पड़ते काले धब्बे भी शायद कहना चाहते थे कि जो कुछ नेहरू जी कह रहे हैं ग़लत है और वो भी उनसे सहमत नहीं हैं।
इसी दौरान विद्यार्थी, जो शुरू में उनके व्यक्तित्व से थोड़ा असहज महसूस कर रहा था और बोलने में हिचकिचा रहा था, अब सहज होने लगा था। यही कुछ बातें थीं जो उसे उनसे पूछनी थी – स्पष्टीकरण ज़रूरी था अन्यथा उसका इस ऊहापोह से निकलना असंभव था। उसने हिम्मत जुटाई और बोला, “आदरणीय, मैं आपके मंतव्य का स्वागत तो करता हूँ लेकिन आपके विचारों से सहमत नहीं हूँ ...”
“सहमत नहीं हो? क्यूँ? जब वो सब लोग सहमत हो सकते हैं तो तुम क्यों नहीं?” और अपनी उँगलियों में फंसी सिगरेट एक झटके से ज़मीन पर फेंक दी। युवक ने देखा कि उनके माथे पर क्रोध की नन्हीं नन्हीं बूँदें छलक आई और तने हुए धनुष की तरह तीन लकीरें प्रकट हो गईं।
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