दशानन (राम-रावण कथा खण्ड-2) | Dashanan Hindi PDF Download : Free Books By Sulabh Agnihotri

पुस्तक का विवरण (Description of Book of दशानन राम-रावण कथा खण्ड-दो | Dashanan (Ram-Ravan Katha) PDF Download) :-

नाम 📖दशानन राम-रावण कथा खण्ड-दो | Dashanan (Ram-Ravan Katha) PDF Download
लेखक 🖊️   सुलभ अग्निहोत्री / Sulabh Agnihotri  
आकार 2.39 MB
कुल पृष्ठ282
भाषाHindi
श्रेणी, ,
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रामकथा को अलौकिकता के दायरे से निकालकर, मानवीय क्षमताओं के स्तर पर परखने की शृंखला का नाम है ‘राम-रावण कथा’। इस शृंखला के प्रथम खण्ड, ‘पूर्व-पीठिका’ में पाठकों ने राम-रावण कथा के प्रमुख पात्रों और उनकी उत्पत्ति का परिचय प्राप्त किया। इस खण्ड में कथा आगे बढ़ती है। जिस कथा से हममें से अधिकांश लोग परिचित हैं, उसमें रावण की उपस्थिति प्राय: राम के वनवास के उपरान्त ही दृष्टिगत होती है। रामकथा में खलनायक के रूप में अवतरित होने से पूर्व, रावण का व्यक्तित्व और उसकी उपलब्धियाँ क्या हैं, इसका ज्ञान हमें प्राय: नहीं है; आगे की कथा में कभी-कभार प्रसंगवश कोई उल्लेख आ गया तो आ गया, अन्यथा हम रावण को, राम से उसका वैर होने के बाद से ही जानते हैं। ‘दशानन’, रावण के उसी प्राय: अज्ञात इतिहास की कथा है। इस खण्ड में भी राम उपस्थित हैं; रामकथा के अन्य पात्र भी उपस्थित हैं... किन्तु उन्हें अपेक्षाकृत बहुत कम ‘स्पेस’ मिला है। इसका सहज कारण यह है कि कथा, कालक्रमानुसार प्रगति कर रही है, और रावण, नि:स्संदेह राम से पूर्ववर्ती है। रावण के उत्थान की सम्पूर्ण कथा तो राम के कर्मभूमि में प्राकट्य से पूर्व की ही है; राम के आविर्भाव के साथ ही उसका पराभव आरम्भ हो जाता है। बस इसीलिए इस खंड में ‘दशानन’ की कथा है। अगला खण्ड श्रीराम को समर्पित होगा; क्योंकि राम के महर्षि विश्वामित्र के साथ जाने से लेकर, चन्द्रनखा (सूर्पणखा) से टकराव तक का काल तो एक प्रकार से रावण के विश्राम का ही काल है।

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पुस्तक का कुछ अंश

लेखकीय

किसी भी पौराणिक आख्यान पर आधारित कथानक के साथ एक बहुत बड़ी दिक्कत होती है जन-आस्थाओं की। जन-मानस की आस्था उन कथानकों के नायक को अपने आराध्य का दर्जा दिये होती है, और खलनायक से अत्यंत घृणा कर रही होती है। जन-मन की इस आस्था को परिमार्जित करने का प्रयास तो किया जा सकता है, किन्तु उससे अधिक छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।
हमारे सारे पौराणिक आख्यानों के नायक अलौकिक चरित्र हैं; कुछ भी अकल्पनीय करना उनके लिये सहज ही होता है, साथ ही ये सब के सब आख्यान मुख्यतः काव्य-रूप में हैं। अतिशयोक्ति, अत्युक्ति काव्य के अलंकार हैं, और अलंकार के रूप में अति की सीमा को तोड़ते हुए इन वर्णनों को, जनमानस की आस्था सार्वभौमिक सत्य के रूप में स्वीकार कर चुकी होती है। उपन्यास रूप में जब हम इन्हीं चरित्रों को अलौकिकता के दायरे से निकालकर उन्हें मानवीय क्षमताओं के स्तर पर परखने का प्रयास करते हैं, तो ये अलंकार हमारे मार्ग का सबसे बड़ा रोड़ा होते हैं।
हनुमान जी द्वारा बाल्यकाल में सूर्य को फल समझकर मुख में रख लेने की घटना अथवा शेषनाग के फन पर टिकी पृथ्वी की संकल्पना हो, आज इस प्रकार की कथाओं को मात्र आस्था ही स्वीकार कर सकती है। अपनी चेतना को आस्था के बंधन से मुक्त कर ऐसे प्रकरणों को पढ़ते समय आप सिर्फ मुस्कुरा सकते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, बालि और सुग्रीव की उपस्थिति समुद्र मंथन के समय भी है। बालि के तारा से विवाह की कथा भी अद्भुत है। समुद्र मंथन से जब अप्सरा तारा प्रादुर्भूत हुई, तो बालि और सुषेण दोनों उसे प्राप्त करने को लालायित हो गये। दोनों, दौड़कर उसके अगल-बगल खड़े हो गये, ताकि कोई और न उसे प्राप्त कर ले। अब प्रश्न यह था कि इन दोनों प्रत्याशियों में से तारा किसे दी जाये? इसका हल निकाला भगवान विष्णु ने। उन्होंने तर्क दिया कि विवाह के समय कन्या की दाहिनी ओर उसका पति खड़ा होता है और बायीं ओर पिता। अब क्योंकि बालि, दाहिनी ओर खड़ा है, अतः वह उसका पति होगा, और सुषेण क्योंकि बायीं ओर है, अतः वह उसका पिता होगा। ऐसे प्रसंगों की कमी नहीं है हमारे पौराणिक कथानकों में।
वाल्मीकि रामायण भी अतिशयोक्तियों से भरी पड़ी है। एक उदाहरण देना चाहूँगा। वेदवती प्रकरण के उपरान्त रावण जब दिग्विजय अभियान पर निकलता है, तो दुष्यन्त, सुरथ, गाधि, पुरुरवा आदि बिना लड़े ही उससे पराजय स्वीकार कर लेते हैं; अति तब होती है जब इन चारों के उपरान्त उसका अयोध्या नरेश अनरण्य से युद्ध होता है। युद्ध में अनरण्य मृत्यु को प्राप्त होते हैं। अब प्रश्न उठता है कि अयोध्या नरेश तो दशरथ हैं, तो ये अनरण्य कौन हैं? इसके उत्तर के लिये आइए बालकाण्ड में राम के विवाह के प्रसंग में।
विवाह के समय वशिष्ठ जब इक्ष्वाकु वंश का शाखोच्चार (वंश परिचय) करते हैं, तो यह क्रम सामने आता है-
सर्वप्रथम ब्रह्मा, ब्रह्मा से मरीचि, मरीचि से कश्यप, कश्यप से विवस्वान, विवस्वान से वैवस्वत मनु और मनु से इक्ष्वाकु।
अब इक्ष्वाकु से आगे का क्रम देखिये-
इक्ष्वाकु-कुक्षि-विकुक्षि-बाण-अनरण्य
यहाँ हैं अनरण्य, इक्ष्वाकु के बाद चौथे... और अब अनरण्य से दशरथ तक की स्थिति भी देख लीजिये-
अनरण्य-पृथु-त्रिशंकु-धुन्धुमार-युवनाश्व-मान्धाता-सुसन्धि-भरत- असित-सगर-असमंज-अंशुमान-दिलीप-भगीरथ-ककुत्स्थ-रघु-प्रवृ; कल्माषपादद्ध-शंख-सुदर्शन-अग्निवर्ण-शीघ्रग-मरु-प्रशुश्रुक- अम्बरीष-नहुष-ययाति-नाभाग-अज-दशरथ।
अब आप ही निर्णय करें, कि अनरण्य, दशरथ से कितनी पीढ़ी पहले हैं।
थोड़ा और विश्लेषण करते हैं- जब विश्वामित्र, दशरथ से राम को माँगने आते हैं, तब दशरथ अपनी आयु साठ हजार वर्ष बताते हैं।[adinserter block="1"]
मुझे समझ नहीं आया कि आचार्य चतुरसेन ने ‘वयं रक्षामः’ में किस प्रकार दशरथ और अनरण्य का युद्ध करवा दिया। इसे मेरी दिखावे की विनम्रता के रूप में न लें... वास्तविक सत्य यही है कि विद्वता के मामले में मैं आचार्य चतुरसेन के सामने भुनगा भर भी नहीं हूँ; वयं रक्षामः में उन्होंने जो अत्यंत विशद शोध किया है; भले ही उसमें आत्मश्लाघा ;अपनी नहीं, अपनी संस्ड्डति और सभ्यता कीद्ध की मात्रा अधिक हो, वह अतुलनीय है; वह भी तब, जब उनके काल में ‘इन्टरनेट’ का माध्यम उपलब्ध नहीं था, जिसके माध्यम से आप अपनी डेस्क पर बैठे-बैठे दुनिया भर के तथ्य एकत्र कर लेते हैं, जानकारियाँ जुटा लेते हैं।
बहरहाल, मेरे सामने कोई चारा नहीं था, सिवाय इसके कि मैं रावण का आर्यावर्त में प्रवेश कराये बिना ही उसे देवलोक ले जाऊँ, और मैंने वही किया। दशरथ से 29 पीढ़ी ऊपर के अनरण्य से युद्ध करवाना किसी भी भाँति संभव नहीं था। इसी प्रकार मैं दुष्यंत, सुरथ और पुरुरवा से भी रावण की भेंट नहीं करवा सकता था... गाधि से तो एक बार यह संभव भी हो सकता था। कान्यकुब्जेश्वर गाधि, विश्वामित्र के पिता थे।
उस समय व्यक्ति की आयु हजारां-लाखों साल होती थी, इसे मैं कैसे भी स्वीकार नहीं कर सकता। यह मैं अपने तर्क के आधार पर नहीं कह रहा, यह मैं हमारी धर्मप्राण जनता के हृदयों में सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त ग्रन्थों के आधार पर ही कह रहा हूँ।
हमारे सबसे प्राचीन साहित्य वेद हैं। उनके बाद उपनिषद्। इनकी सूरत हममें से अधिकांश ने भले ही न देखी हो किन्तु हम सबको उन पर अत्यंत गर्व है। हम मानते हैं कि वेद और उपनिषद् समस्त ज्ञान का स्रोत हैं। वाल्मीकी रामायण में भी वेदों की महिमा सर्वत्र व्याप्त है, तो ये वेद-उपनिषद् भी ‘जीवेम् शरदः शतं’ की ही बात करते हैं। हजारों लाखों साल जीने की नहीं।
मनुस्मृति, जिसे हिन्दू धर्म का संविधान होने का दर्जा प्राप्त है, में भी महाराज मनु ने सतयुग में आदमी की आयु 400 साल, त्रेता में 300 साल, द्वापर में 200 साल और कलियुग में 100 साल निर्धारित की है। ज्ञातव्य है कि मनु महाराज को हम अपना आदि पुरुष मानते हैं। ऊपर दिये गये इक्ष्वाकु वंश के क्रम में मनु, इक्ष्वाकु के पिता हैं।
दुर्गा सप्तशती में भी हम सब हिन्दुओं की अगाध आस्था है; उसके ‘कवच’ खण्ड का 47 वाँ श्लोक देखिये-
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ।।
यह स्वयं शिवजी, मार्कण्डेय ऋषि को बता रहे हैं; यहाँ भी सौ वर्षों की ही बात हो रही है।
जैसा कि मैंने प्रथम खंड ‘पूर्व-पीठिका’ की भूमिका में कहा था, इस कथा के प्रायः सभी सूत्र मैंने वाल्मीकीय रामायण से ही लिये हैं। कुछ स्थानों पर परिवर्तन करना पड़ा है। जहाँ वाल्मीकीय रामायण में सूत्र नहीं मिलते, वहाँ अन्य ग्रन्थों से सूत्र प्राप्त करने का प्रयास किया गया है।[adinserter block="1"]
स्वयं वाल्मीकीय रामायण; गीता प्रेस द्वारा प्रकाशितद्ध में भी अनेक स्थलों पर विसंगतियाँ हैं। ये विसंगतियाँ निश्चित रूप से प्रक्षेपों के कारण ही हैं। एक उदाहरण दे रहा हूँ-
उत्तरकाण्ड के पंचम सर्ग के 41वें और 42वें श्लोकों में राका, पुष्पोत्कटा, कैकसी और कुम्भीनसी ये चार सुमाली की पुत्रियाँ वर्णित की गयी हैं। इसके विपरीत उत्तरकाण्ड के ही पच्चीसवें सर्ग के 22वें, 23वें और 24वें श्लोंकों में कुम्भीनसी को माल्यवान की पुत्री अनला की पुत्री बताया गया है। मैंने इस दूसरे वर्णन को ही ग्रहण किया है।
अंत में एक तथ्य और स्पष्ट कर दूँ कि यह वाल्मीकि रामायण का अनुवाद कदापि नहीं है। वहाँ से मात्र सूत्र लिये हैं, और उन सूत्रों के आधार पर कथा मेरी अपनी कल्पना की उपज है। और अधिक स्पष्ट कह दूँ तो उपरोक्त सूत्रों के आधार पर कथा रूप में जो भी नियति ने या प्रड्डति ने या दैव ने या परमेश्वर ने अथवा राम ने मुझसे लिखवा दिया, वह मैंने लिख दिया है। मैं कोई विद्वान नहीं हूँ, इसलिये विद्वता प्रदर्शन का तो प्रश्न ही नहीं है। भाषा तत्सम प्रधान रखना विवशता थी, क्योंकि जिस काल की कथा है, उस काल की भाषा में तत्सम शब्दावली की प्रधानता आवश्यक है, विशेषकर विशिष्ट जनों के संवादों में। सामान्यजन की भाषा में तद्भव हो सकते हैं, देशज हो सकते हैं, किन्तु विदेशी नहीं। फिर भी अनेक स्थानों पर विदेशी शब्दों का प्रयोग हो गया है, किन्तु यह प्रयोग प्रायः संवादों के अतिरिक्त ही है।
आपको इस घटनाक्रम में देवों की सक्रियता या उनकी भूमिका अजब सी प्रतीत हो सकती है। ऐसा प्रतीत हो सकता है कि मैं नारद और देवों की भूमिका को बढ़ाकर राम के पुरुषार्थ का महत्त्व कम करने का प्रयास कर रहा हूँ किन्तु ऐसा कदापि नहीं है। राम हम सभी के आराध्य हैं। वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड का सत्रहवाँ सर्ग पूरा का पूरा देवों की भूमिका का ही विवरण देता है। उसके अनुसार, ब्रह्मा के परामर्श पर रावण के विनाश हेतु राम-रूप में अवतरित होने वाले विष्णु की सहायता के लिये, देवताओं ने वानरियों, अप्सराओं, किन्नरियों, नाग कन्याओं, ऋक्ष स्त्रियों आदि के गर्भ से सभी विद्याओं में निष्णात, अतुल तेजस्वी लाखों पुत्र उत्पन्न किये। यह ठीक उस समय की घटना है, जब दशरथ, यज्ञ से प्राप्त खीर अपनी रानियों में वितरित कर चुके थे। मुझे लगता है इतना सूत्र पर्याप्त है यह मानने के लिये कि वानर सैन्य को तैयार करने में देवों की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। शेष कथा तो आप पढ़ने जा ही रहे हैं ...
दूसरा खण्ड रावण पर ही केन्द्रित क्यों है? इसके पीछे सिर्फ इतना है कि कथा कहने की कलाबाजी मुझे नहीं आती, इसलिये कथा सीधे-सादे ढंग से कालक्रमानुसार आगे बढ़ रही है। श्रीराम, जब कर्मक्षेत्र में अवतरित हुए तब तक रावण अपने समस्त पराक्रम दर्शा चुका था। वह त्रिलोक-विजय कर चुका था... तो कालक्रमानुसार जो पहले हुआ था, उसका ही वर्णन पहले होगा। बस इसीलिये यह खण्ड रावण पर केन्द्रित है।
अगला खण्ड निस्संदेह श्रीराम को ही समर्पित होगा। श्रीराम के विश्वामित्र के साथ ताड़का-वध के लिये सिद्धाश्रम प्रस्थान से लेकर सीताहरण तक का कालखण्ड राम की सक्रियता और रावण की निष्क्रियता का कालखण्ड है, इसलिये उसमें सर्वत्र राम ही राम होंगे।[adinserter block="1"]
तीसरा खण्ड अभी निश्चित नहीं है, फिर भी संभवतः ‘राम : सप्तम विष्णु का अभ्युदय’ नाम से होगा।
यहाँ पर वीनस केसरी जी का आभार करना सबसे आवश्यक है। उनके नियमित आग्रहों के फलस्वरूप ही यह पुस्तक आपके हाथों में है, अन्यथा तो शायद मैं अभी दो-चार साल इसे पूरा न कर पाता। मैं उन सबका भी आभारी हूँ, जिन्होंने पुस्तक के प्रथम खंड ‘पूर्व-पीठिका’ को पढ़ा और किसी भी माध्यम से मुझे अपनी राय से अवगत कराया, इसकी खूबियों और कमियों पर प्रकाश डाला। ... और आप सबका भी, जो अब इस दूसरे खंड ‘दशानन’ को पढ़ने जा रहे हैं।
आभार के सर्वाधिक अधिकारी हैं चि0 गौरव शुक्ल; मेरे भतीजे, जिनके कारण ही मैं पुस्तक का प्रथम खंड वीनस को भेज पाया था। गौरव न होते तो मेरी यह रामकथा फेसबुक पर जितनी आई थी, उससे अधिक शायद कभी प्रकाश में नहीं आ पाती। मैं तो रामकथा को भूलकर, अपनी पत्रिका ‘पर्तों की पड़ताल’ में व्यस्त हो गया था।
तो आइये, कथा से जुड़ते हैं ....
हाँ, अपनी अमूल्य राय से अवश्य अवगत कराइयेगा! पाठकों की सम्मतियाँ ही तो लेखक का मार्गदर्शन करती हैं।
आपका-
सुलभ अग्निहोत्री

अनुक्रम

0. पूर्व पीठिका
1. रावण की लंका वापसी
2. अभियान का आरम्भ
3. जमदग्नि के आश्रम में
4. मंगला नये पथ पर
5. बालि का राज्याभिषेक
6. कुमार गुरुकुल में
7. सार्थ जीवन
8. अंगद जन्म
9. युद्धं देहि
10. षड़यंत्र
11. सुग्रीव की लापरवाही
12. वैजयन्तपुर में
13. मेघनाद का विद्यारम्भ
14. गंधर्वराज मित्रावसु
15. चित्रांगदा
16. पराजय
17. इन्द्र
18. नारद किञष्कधा में
19. मिथिला
20. कुमारों का अभ्यास
21. पुनः लंका में
22. तूफान से पूर्व शांति
23. दिग्विजय का आरंभ
24. मरुत्त विजय
25. नारद का परामर्श
26. जाबालि-शम्बूक सम्वाद
27. यम-विजय
28. नाग और निवातकवच
29. विश्वामित्र के आश्रम में
30. कालकेय
31. वरुण-विजय
32. विश्वामित्र की शरण में
33. चन्द्रनखा
34. कुम्भीनसी
35. मेघनाद की उपलब्धियाँ
36. चन्द्रनखा को दण्डकारण्य का राज्य
37. वशिष्ठ-नारद संवाद
38. वशिष्ठ जाबालि संवाद
39. अर्जुन का अंत
40. सीता
41. आखेट
42. प्रतिशोध का आरम्भ
43. नारद देवलोक में
44. अंतिम अभियान की तैयारी
45. वशिष्ठ का प्रस्ताव
46. प्रयाण
47. रनिवास
48. रम्भा से रमण
49.  इंद्र-विजय
50. स्वागत
51. इन्द्रजित
52. नई विपत्ति
53. पिता के पास
54. दुन्दुभि और मायावी
55. नारद-जनक
56. चित्रांगदा का क्षोभ
57. दुन्दुभी
58. युवराज मेघनाद
59. टकराव
60. मायावी
61. ऋष्यमूक पर्वत पर
62. अंगद
63. प्रहस्त मेघनाद
64. नारद-विश्वामित्र संवाद
65. भविष्य के संकेत
66. विश्वामित्र के साथ
67. दशानन
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पूर्व-पीठिका

‘‘ऐ! कौन हो तुम लोग? क्योंकर प्रविष्ट हुए यहाँ? अविलम्ब बाहर निकलो हमारी आम्रवाटिका से।’’ यह एक पन्द्रह वर्ष की किशोरी थी, जो अपनी कमर पर दोनों हाथ रखे क्रोध से चिल्ला रही थी।
इस चपला नाम की इस किशोरी की आम्रवाटिका में सौ-डेढ़ सौ घुड़सवारों के एक दल ने डेरा डाल दिया था, जिससे उसकी वाटिका को पर्याप्त क्षति पहुँची थी। आगन्तुक रक्षपति मालवान, सुमाली और उनके दल के सदस्य थे। कुछ समय पूर्व इन लोगों ने देवराज इन्द्र को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था, परंतु इन्द्र की प्रार्थना पर विष्णु ने आकर इन लोगों को स्वर्ग से खदेड़ दिया था, विष्णु के हाथों माल्यवान आदि के छोटे भाई माली का वध भी हो गया था। समस्त सेना भी नष्ट हो गयी थी। इस समय ये बचे-खुचे लोग विष्णु से बचने के लिये छिपते-छिपाते भाग रहे थे।
यह जानने पर कि आगंतुक रक्ष हैं, चपला का क्रोध और बढ़ गया। उस समय आर्य समुदाय, दैत्यों, दानवों, रक्षों आदि से अकारण अत्यधिक घृणा करता था। विवाद में अपनी ही गलती से दुर्घटनावश चपला, भयंकर रूप से आहत हो गयी। इस दुर्घटना के कारण उसका चेहरा सदैव के लिये बदसूरत हो गया, कमर झुक गयी, लँगड़ाकर चलने के कारण उसकी गति मंथर हो गयी। यही चपला, कालांतर में कैकेयी की धाय माँ मंथरा के नाम से जानी गयी।
दशरथ की माता इन्दुमती का निधन जब दशरथ शिशु थे, तभी हो गया था। पिता अज, अपनी पत्नी को अत्यंत प्यार करते थे। जैसे ही दशरथ बीस वर्ष के हुए, उन्होंने साम्राज्य का दायित्व उन्हें सौंपकर अन्न-जल त्याग दिया, और मृत्यु का वरण किया। कम आयु में मिली सत्ता के परिणाम स्वरूप दशरथ उद्धत स्वभाव के हो गये थे। अयोध्या के महामात्य जाबालि और आमात्य सुमंत्र ने गुरुदेव वशिष्ठ के सम्मुख दशरथ के विवाह के लिये उत्तर कोशल की राजकुमारी कौशल्या के नाम का प्रस्ताव किया। गुरुदेव बहुत पहले कौशल्या से मिले थे, और वे उससे अत्यंत प्रभावित हुए थे, उन्हें यह प्रस्ताव सर्वोत्तम प्रतीत हुआ। किन्तु उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल ;अयोध्याद्ध में सम्बन्ध मधुर नहीं थे। भानुमान ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। आहत दशरथ ने बलात कौशल्या का अपहरण कर लिया, और गुरुदेव के निर्देशानुसार विधान पूर्वक उससे विवाह किया।
इसी बीच एक दिन मित्रों के साथ आखेट के लिये गये दशरथ के हाथों भूलवश एक मुनिकुमार, श्रवण की हत्या हो गयी। मृत पुत्र के साथ उसके वृद्ध और अंधे माता-पिता ने भी चितारोहण कर लिया। मरने से पूर्व श्रवण की माता ने दशरथ को अंत समय में पुत्र-वियोग का शाप दे दिया।
सुमाली, विष्णु के भय से भूमिगत हो गया था और उचित समय की प्रतीक्षा कर रहा था। एक दिन उसने सुना कि पितामह ब्रह्मा ने अपने पौत्र विश्रवा के पुत्र कुबेर को लोकपाल बनाकर लंका सौंप दी है। लंका, वस्तुतः सुमाली की ही बसायी हुई थी, उसके कुबेर के हाथ चले जाने का उसे बहुत दुःख हुआ; किन्तु निराशा के मध्य उसे एक आशा की किरण भी दिखायी दे गयी। विश्रवा की पहली पत्नी देववर्णिनी, अपने पुत्र कुबेर के साथ लंका में ही रहने लगी थी। सुमाली ने विचार किया कि यदि वह यौवन कि दहलीज पर पाँव रखती अपनी सर्वगुण-सम्पन्न सुन्दरी पुत्री कैकसी का विवाह विश्रवा के साथ करवाने में सफल हो जाये तो उससे उत्पन्न, सन्तान रक्षतेज और ब्रह्म तेज दोनों से सम्पन्न होगी, साथ ही ब्रह्मा के परिवार से होने के कारण उस पर ब्रह्मा का वरदहस्त भी रहेगा। जिस भाँति ब्रह्मा ने कुबेर को लोकपाल बना दिया है उसी प्रकार वह उस सन्तान को भी अवश्य ही कोई महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करेंगे। यह विचार आते ही वह कैकसी को सब कुछ भलीभाँति समझाकर विश्रवा के आश्रम के निकट छोड़ आया। कैकसी ने अपनी सेवा से अन्ततः विश्रवा की पत्नी का पद प्राप्त ही कर लिया।[adinserter block="1"]
विश्रवा के साथ संयोग से कैकसी को तीन पुत्र रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण तथा एक कन्या चन्द्रनखा प्राप्त हुई। कैकसी, सुमाली के कहने से रावण को तीन वर्ष की अवस्था में ही उसके पास छोड़ गयी। विश्रवा को उसने यह कहकर समझा लिया कि दो छोटे-छोटे बालकों की अकेले देखभाल में कठिनाई होती है। इसी भाँति कुम्भकर्ण को भी वह एक दिन उसके मातामह; नानाद्ध के पास छोड़ गयी। विभीषण को ले जाने से विश्रवा ने यह कहकर रोक दिया, कि एक पुत्र को तो आश्रम में ही रहने दो, यदि अधिक कठिनाई हो तो मायके से किसी को सहायता के लिये बुला लो। इस प्रकार विभीषण की बाल्यावस्था अपने पिता के सान्निध्य में व्यतीत हुई। दूसरी ओर रावण और कुम्भकर्ण को बालपन से ही सुमाली ने अपनी योजना के अनुसार रक्ष-संस्ड्डति के अनुरूप प्रशिक्षित किया। विभीषण के बारह वर्ष का होने पर कैकसी, विभीषण और चन्द्रनखा को भी पिता के ही पास ले आयी। सुमाली, विष्णु के भय से अभी भी सामने आने की स्थिति में नहीं था। उसने रावणादि को सैन्य प्रशिक्षण के साथ ही योग में भी प्रशिक्षित करना आरम्भ कर दिया, ताकि वे योगसमाधि के द्वारा ब्रह्मा से सम्पर्क कर सकें और उनकी ड्डपा प्राप्त कर सकें।
देव, दैत्य और दानव परस्पर सौतेले भाई थे। देव या आदित्य, ऋषि कश्यप की पहली पत्नी अदिति के पुत्र थे, दैत्य, कश्यप की दूसरी पत्नी दिति के, और दानव तीसरी पत्नी दनु के। सौतेले भाइयों में प्रायः ही परस्पर किसी न किसी कारण वैमनस्य रहता है, इनमें भी था। आर्य देवों के पक्ष में रहते थे।
देवों में देवराज इन्द्र के छोटे भाई ने अपनी अलग भी एक महत्त्वपूर्ण पहचान बनाई थी। उस काल में ब्रह्मा, शिव और विष्णु, सृष्टि की सर्वाधिक प्रभावशाली शक्तियों के रूप में स्थापित हो गये थे। इन तीनों में ब्रह्मा और शिव तो यह प्रयत्न करते थे कि वे देव, दैत्य और दानवों के मसले में पक्षपात से रहित रहें, किन्तु विष्णु, इन्द्र के भाई होने के नाते खुलकर देवों के पक्ष में खड़े होते थे। देव, बहुत बार दैत्यों और दानवों से पराजित हुए, किन्तु विष्णु ने हर बार अपनी कूटनीति से हारी हुई बाजी देवों के पक्ष में जीत ली; सुमाली के प्रकरण में भी तो यही हुआ था।
इन्द्र, सत्तालोभी होने के साथ-साथ विलासी भी था। उसका मानना था कि देवराज होने के नाते सृष्टि की प्रत्येक सर्वश्रेष्ठ वस्तु पर उसका अधिकार है। एक दिन इन्द्र, अप्सराओं के साथ विलास में मग्न था, कि सूर्यदेव का आगमन हो गया। सूर्य देव की सारथी आरुणि, अनन्य सुन्दरी थी। इन्द्र उस पर आसक्त हो गया, और अन्ततः उसके और आरुणि के संयोग से बालि का जन्म हुआ। कालांतर में सूर्य और आरुणि के संयोग से सुग्रीव का जन्म हुआ। दोनों ही शिशु, पालन-पोषण के लिये महर्षि गौतम और उनकी पत्नी देवी अहल्या को सौंप दिये गये।[adinserter block="1"]
महर्षि गौतम, भारतीय षड्दर्शन में से एक, न्याय दर्शन के प्रणेता थे। ऋषि होने के साथ-साथ वे महान आयुध-विज्ञानी भी थे। अहल्या उनसे आयु में बहुत छोटी थीं। वस्तुतः अहल्या को बालपन में ब्रह्मा ने पालन-पोषण के लिये गौतम को सौंपा था। उसकी गिनती पंचकन्याओं में होती थी; अर्थात् वह सृष्टि की सबसे श्रेष्ठ पाँच कन्याओं में एक थी। बड़ी होने पर अनेक महारथी, अहल्या से विवाह के इच्छुक थे। इन्द्र भी इनमें से एक थे, किन्तु ब्रह्मा ने गौतम से ही अहल्या को स्वीकार करने का निवेदन किया। गौतम ने निवेदन स्वीकार कर लिया, और उनकी पालिता अहल्या, उनकी पत्नी बन गयी। गौतम से अहल्या ने सदानंद और अंजना दो संतानों को जन्म दिया। सदानंद, मिथिला नरेश विदेहराज जनक के यहाँ राजपुरोहित हो गया। अंजना के विवाह हेतु गौतम ने वानर श्रेष्ठ, केसरी का चयन किया। केसरी, किञष्कधा नरेश ऋक्षराज के सेनापति थे। वे शिव के अनन्य भक्त थे। उन्होंने महाराज से अनुमति लेकर किञष्कधा को छोड़ दिया और तीर्थों में भ्रमण करने लगे। वे विवाह नहीं करना चाहते थे, किन्तु गौतम के आग्रह से विवश होकर उन्हें राजी होना पड़ा।
दशरथ के जब बहुत दिनों तक कोई संतान नहीं हुई, तो कौशल्या ने उनसे दूसरा विवाह करने का आग्रह किया, और इस हेतु उसने कैकय नरेश अश्वपति की षोडशी कन्या कैकेयी के नाम का प्रस्ताव किया। दशरथ ने बहुत आनाकानी की; अपनी और कैकेयी की आयु के अन्तर का हवाला दिया, किन्तु कौशल्या के आग्रह के समक्ष उन्हें झुकना पड़ा, और कैकेयी, दशरथ की दूसरी पत्नी के रूप में अयोध्या आ गयी। इस विवाह में अश्वपति ने एक शर्त रख दी थी, कि दशरथ के उपरान्त कैकेयी का पुत्र ही अयोध्या का राजा बनेगा।
कैकेयी के साथ उसकी धाय माँ मंथरा भी अयोध्या आ गयी। कैकेयी अत्यंत सुंदरी होने के साथ ही साथ स्वाभिमानी, युद्धकुशल और विदुषी थी। कौशल्या से उसे भगिनीवत स्नेह प्राप्त हुआ। फलतः उन दोनों के मध्य आम सौतों के विपरीत अत्यंत स्नेह के स्थाई संबंध स्थापित हो गये। कुछ काल बाद इन्द्र ने दैत्यराज शंबर के साथ युद्ध में सहयोग के लिये दशरथ का आवाहन किया। युद्ध में कैकेयी भी दशरथ के साथ गयी, और उसने अपने प्राणों की बाजी लगाकर दशरथ की प्राण रक्षा की। इस उपकार के बदले दशरथ ने उससे दो इच्छित वर माँगने का आग्रह किया। कैकेयी, अयोध्या में पूर्ण संतुष्ट थी, अतः उसने दशरथ से वे वर सुरक्षित रखते हुए कहा, कि जब आवश्यकता होगी माँग लूँगी।
रावण, सुमाली की अपेक्षाओं पर खरा उतर रहा था। वह सभी क्षेत्रों में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर रहा था। उसके विपरीत कुम्भकर्ण अतिमानवीय शक्ति का स्वामी होते हुये भी आलसी था। विभीषण क्योंकि बहुत समय तक पिता के पास रहा था, अतः वह आर्य संस्कारों से प्रभावित था। रावण ने अपनी तपस्या से योगसमाधि द्वारा ब्रह्मा से सम्पर्क स्थापित करने में सफल हुआ। ब्रह्मा को सम्पर्क होते ही इन सबसे अपने सम्बन्ध का ज्ञान हो गया। [adinserter block="1"]वह इनके सामने प्रकट हुए। जब इन्होंने उन्हें दण्डवत प्रणाम किया, तो उन्हें लगा जैसे उनके हाथ ब्रह्मा के पैरों पर न पड़कर सिकता ;बालूद्ध पर पड़े हों। वे चकित तो हो गये, तब ब्रह्मा ने बताया कि उन्हें स्वयं ब्रह्मलोक से वहाँ तक आने में समय लगता, अतः उन्होंने उनसे अविलम्ब मिलने की इच्छा से अपनी त्रिआयामी छवि प्रक्षिप्त की है। ब्रह्मा ने प्रसन्नतापूर्वक सबसे अपनी इच्छा बताने का प्रस्ताव किया। रावण ने अमर होने की इच्छा प्रकट की, तो ब्रह्मा ने बताया कि अमर तो सृष्टि में कोई नहीं है, वे स्वयं भी नहीं हैं। इतना अवश्य है कि योग के माध्यम से और कुछ औषधियों के प्रयोग से आयु को अविश्वसनीय सीमा तक बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि वर और शाप कोई ऐसी शक्तियाँ नहीं हैं कि मुँह से निकला और हो गया। कोई भी व्यक्ति प्रसन्न होने पर किसी को वही दे सकता है जो उसके पास है। इसी प्रकार ऐसा भी नहीं होता कि कोई क्रुद्ध होकर शाप दे और सामने वाला भस्म हो जाये।
इस पर रावण ने कहा कि उसे युद्ध में देव, दैत्य, यक्ष, नाग, गंधर्व आदि कोई भी न मार सके। ब्रह्मा ने कहा कि तुम मनुष्यों को तो भूल ही गये? इस पर कुम्भकर्ण ने कहा कि मनुष्यों को तो हम खेल-खेल में ही मसलकर रख देंगे। ब्रह्मा ने रावण को ऐसी यौगिक क्रियायें सिखायीं, जिनके द्वारा वह अपनी शारीरिक और मानसिक सामर्थ्य में अत्यधिक वृद्ध करने में समर्थ हुआ। उन्होंने उसे अद्यतन शस्त्रास्त्रों का ज्ञान भी दिया। उन्होंने यह भी वचन दिया कि जैसे ही वे देव असुर आदि से उसके प्राणों का संकट देखेंगे वे स्वयं उपस्थित होकर अथवा अपनी त्रिआयामी छवि प्रक्षिप्त कर प्रतिपक्षी को विवश कर देंगे। सृष्टि में उनके वचनों का अनादर कोई भी नहीं कर सकता।
कुम्भकर्ण ने इच्छा प्रकट की, कि उसकी खूब सोने की अभिलाषा पूर्ण हो। ब्रह्मा ने कहा कि खूब खाया करो, स्वतः ही खूब नींद आयेगी। उन्होंने उसे भी ऐसी यौगिक क्रियायें और औषधियाँ बतायीं, जिनके द्वारा वह जो कुछ भी जितना कुछ भी खाये सब पचाने में समर्थ हो गया।
विभीषण ने मात्र ईश्वर में सदैव अनुरक्ति बनी रहने की इच्छा प्रकट की। ब्रह्मा ने बताया कि यह अनुरक्ति तो तुममें प्रड्डति से ही है।
चन्द्रनखा ने विश्व के सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी होने की इच्छा प्रकट की। ब्रह्मा ने कहा कि तुम तो वैसे ही विश्व की सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी कन्या हो। उन्होंने उसे भी ऐसी क्रियायें और औषधियाँ बतायीं जिनके प्रयोग से वह अपने सौन्दर्य को और बढ़ाने और स्थायी रखने में समर्थ हो गयी।
अयोध्या के महामात्य जाबालि, किसी हद तक चार्वाक दर्शन के अनुयायी थे। वे महान ज्ञानी, न्यायप्रिय और सत्यवक्ता थे। उनका मानना था कि स्वर्ग-नर्क सब यहीं है, मृत्यु के बाद कुछ नहीं है। अच्छे कर्म करने चाहिये, स्वर्ग के लोभ से नहीं, अपितु इसलिये कि वे करणीय हैं। बुरे कर्मों से बचना चाहिये, किन्तु नर्क के भय से नहीं, अपितु इसलिये क्योंकि वे बुरे हैं, उनसे दूसरों को कष्ट होता है। वे सांसारिक सुखों को त्यागने के पक्षधर भी नहीं थे। वे सुखों का उपभोग करते हुये न्यायपूर्वक समष्टि का हितसाधन करने का प्रयास करते हुये जीवन-यापन के पक्षधर थे। कभी-कभी महाराज दशरथ उनकी स्पष्टवादिता से खिन्न भी हो जाते थे, किन्तु वे यह भी जानते थे कि जाबालि से अधिक उनका हितैषी कोई नहीं है। इन्हीं कारणों से वे जाबालि के विचारों का पूरा सम्मान करते थे। आरंभ में कुछ स्वार्थी ब्राह्मणों के बहकावे में आकर कैकेयी से जाबालि को समझने में भूल हुई, किन्तु शीघ्र ही उसे सच-झूठ का ज्ञान हो गया, और वह भी उनका वैसे ही सम्मान करने लगी, जैसे महाराज करते थे।[adinserter block="1"]
रावण को ब्रह्मा द्वारा सुरक्षा का वचन देने का ज्ञान जैसे ही इन्द्र को हुआ, वह चिन्तित हो उठा। ञचतित देवराज को ढाँढ़स बँधाते हुए देवर्षि नारद ने कहा कि एक बार तो रावण से पराजय स्वीकार करनी ही होगी। उन्होंने इन्द्र से रावण के विनाश हेतु एक दीर्घकालीन योजना पर कार्य करने की सलाह दी। उन्हें ज्ञात था कि रावण के जीते जी उसे पराजित किया नहीं जा सकता और ब्रह्मा के वचन के चलते उसका वध भी सम्भव नहीं है। उस पर प्राणघातक आघात की संभावना बनते ही ब्रह्मा हस्तक्षेप कर देंगे। ऐसी स्थिति में मनुष्यों के माध्यम से ही रावण के विनाश की अपेक्षा की जा सकती है। देवराज के यह कहने पर कि सभी आर्य सम्राट तो रावण से अभी से भयभीत हैं, नारद ने कहा कि सम्राटों पर नहीं, आम मानवों पर भरोसा करना पड़ेगा।
महर्षि अगस्त्य का आश्रम गंगा और सोन के मलद और कारुष क्षेत्र में था। इस क्षेत्र का शासक सुकेतु नामक यक्ष था। ताड़का, उसकी सुन्दरी और अत्यंत शक्तिशाली पुत्री थी। सुकेतु ने एक अत्यंत पराक्रमी सुन्द नामक दैत्य से ताड़का का विवाह किया था। विवाह के उपरांत सुन्द वहीं बस गया था। सुन्द के नाम पर ही उस क्षेत्र का नामकरण सुन्दरवन पड़ा। ताड़का के दो पुत्र थे- मारीच और सुबाहु। दोनों बालपन की शैतानियों में केवल खेल के लिये ही ऋषियों का यज्ञ विध्वंस कर दिया करते थे। ऐसी ही एक स्थिति में बालकों को सबक सिखाने के उद्देश्य से अगस्त्य ने दोनों बालकों को कुटिया में बन्द कर दिया। सुन्द और ताड़का जब उन्हें खोजते हुए आये, तो बालकों को बन्द देख क्रोधित सुन्द ने ऋषि पर आक्रमण कर दिया। ऋषि ने अपनी मानसिक शक्ति का प्रयोग करते हुये सुन्द को सम्मोहित कर, यज्ञकुण्ड को ही उसकी चिता बना दिया। ताड़का भी क्रोध में जब मना करने पर भी नहीं मानी तो ऋषि ने उसपर मंत्रावेष्टित अक्षत फेंक दिया। उनके आघात से ताड़का बुरी तरह घायल हो गयी। उसका मुख अक्षतों के आघात से अनेक दागों से भर गया। वह सुन्दरी से अत्यंत भयानक हो गयी।
सुमाली ने रावणादि के सबल होते ही सबसे पहले लंका पर पुनः आधिपत्य करने की योजना बनायी, किन्तु वह अभी युद्ध नहीं चाहता था। वह जानता था कि ऋषि लोग त्यागी प्रवृत्ति के होते हैं, और अपने निकटस्थ व्यक्तियों से भी त्याग की ही अपेक्षा करते हैं। उसने अपने दस, सात माल्यवान के, चार माली के पुत्रों, और रावण व कुम्भकर्ण के साथ लंका की ओर प्रस्थान किया। प्रस्थान से पूर्व ही उसने रावण का लंकेश्वर के रूप में अभिषेक कर दिया। रावण द्वारा कुबेर के सम्मुख लंका पर अपना दावा प्रस्तुत करने पर विवाद अवश्यंभावी था। उसने रावण को सलाह दी, कि वह प्रयास करे कि यह विवाद निर्णय के लिये उसके पिता महर्षि विश्रवा के पास पहुँचे। उसे विश्वास था कि विश्रवा, सुमाली का उत्तराधिकारी होने के नाते जब लंका पर अपना दावा प्रस्तुत करेगा, तो वे यह देखते हुए कि कुबेर समर्थ है, वह अन्य कहीं भी नवीन नगर का निर्माण कर सकता है, रावण के दावे को अपना समर्थन देंगे और कुबेर से अपेक्षा करेंगे कि वह लंका रावण को दे दे। ऐसा ही हुआ। रावण, लंकेश्वर बन गया। कुबेर ने नयी नगरी बसाने और लंका से अपना व्यापार समेटने के लिये छह महीने का समय माँगा, जो रावण के लिये भी अच्छा ही था। इस बीच वे लोग लंका की स्थितियों को और प्रशासन की व्यवस्थाओं को समझ सकते थे। कुबेर ने कैलाश के निकट अलकापुरी नाम से अपनी नयी नगरी बसा ली।[adinserter block="1"]
इसी बीच दानवों के महान अभियंता मय दानव ने अपनी सर्वगुण सम्पन्न कन्या मन्दोदरी का रावण से विवाह का प्रस्ताव किया। प्रस्ताव उचित था। रावण के राज्याभिषेक के साथ ही यह विवाह भी सम्पन्न हो गया। कुछ ही काल बाद कुम्भकर्ण का वज्रज्वाला, और विभीषण का सरमा के साथ विवाह हो गया।
नारद की योजनानुसार देवों ने विन्ध्य के दक्षिण में आदिवासी क्षेत्रों में अपने गुरुकुल स्थापित कर उन्हें युद्ध के लिये प्रशिक्षित करना आरम्भ कर दिया। अगस्त्य, इस अभियान का नेतृत्व करने के लिये अपना सुन्दरवन आश्रम छोड़कर विन्ध्य के दक्षिण में आ गये थे।
काशी की राजकुमारी सुमित्रा के रूप की प्रशंसा चारों ओर फैल रही थी। दशरथ का चंचल मन उसकी ख्याति सुन उसे पाने को मचल उठा। दशरथ ने काशी के चारों ओर घेरा डाल दिया, और काशीनरेश से सुमित्रा का हाथ माँगा। विवश काशीनरेश ने सुमित्रा से परामर्श करने का समय माँगा। वे चिन्तित, प्रासाद वापस लौटे। वे दशरथ को मना करना चाहते थे, भले ही इसके लिये काशी को दशरथ का कोपभाजन ही क्यों न बनना पड़े। सुमित्रा विदुषी थी, परिस्थिति को समझकर उसने अपने पिता को सलाह दी, कि उसका भाग्य तो उसी समय तय हो गया था, जब दशरथ ने उसे पत्नी बनाने का सोचा। यदि दशरथ को मना कर, युद्ध भी किया जाये, तब भी उसकी सुरक्षा नहीं हो पायेगी। काशी, अयोध्या की तुलना में अत्यंत छोटा राज्य है, वह दशरथ का सामना नहीं कर पायेगा। इस स्थिति में काशी मिट्टी में मिल जायेगा, और तब दशरथ, सुमित्रा के साथ काशी की और कितनी कन्याओं को ले जायेगा, इसकी गणना नहीं हो सकती। अंततः सुमित्रा और दशरथ का विवाह हो गया।
महर्षि गौतम भी क्योंकि महान आयुध विशेषज्ञ थे, उनका भी सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से एक दिन इन्द्र उनके आश्रम पहुँचे। ऋषि की अनुपस्थिति में उनकी अहल्या से भेंट हुई। वे अहल्या पर पहले से ही आसक्त थे। इन्द्र, आश्रम से वापस हो गये, किन्तु वासना के वशीभूत रात में वेश बदलकर छुपते हुए पुनः आ गये। अहल्या को भी यह जानकर सुखद ही लगा कि स्वयं देवराज उस पर अनुरक्त हैं। ... और वह हो गया जो नहीं होना चाहिये था। रात्रि के अन्तिम प्रहर में इन्द्र जब छुपते हुए आश्रम से निकले तभी गौतम का भी आगमन हो गया। गौतम को विस्मय हुआ कि इन्द्र, वेश बदले हुए क्यों हैं, और छुपने का प्रयास क्यों कर रहे हैं? उन्होंने योग द्वारा सारा वृत्तांत जान लिया। क्रोधावेश में उन्होंने इन्द्र पर अपने दण्ड से वार कर दिया, जिससे उसके अण्डकोष विदीर्ण हो गये। किन्तु इन्द्र सौभाग्य से समय रहते अपने विमान से वापस स्वर्ग पहुँच गया, और वहाँ अश्विनी कुमारों ने उसका उपचार कर दिया।[adinserter block="1"]
आश्रम में पहुँचकर गौतम ने अहल्या को बहुत भला-बुरा कहा और उसका परित्याग कर दिया। उन्होंने उद्घोष किया कि जो भी अहल्या से किसी भी प्रकार का संबंध रखेगा, वह उनका व्यक्तिगत शत्रु हो जायेगा। आश्रम को ‘अपवित्र हो गया’ कहकर वे समस्त आश्रम वासियों और गौवों सहित नया आश्रम बनाने हेतु प्रस्थान कर गये। अब समस्या थी अल्पवय बालि और सुग्रीव की। तभी समाधान भी मिल गया। किञष्कधापति ऋक्षराज सन्तानहीन थे। वे कुछ दिन पूर्व ही इसका समाधान माँगने महर्षि के पास आये थे। पता करने पर वे मिथिला में ही मिल गये। बालि और सुग्रीव उन्हें सौंप दिये गये। ऋक्षराज ने उन्हें ईश्वर का प्रसाद मानते हुए अपने पुत्रों के रूप में स्वीकार किया।
तीर्थों में पत्नी अंजना संग प्रवास करते केसरी को एक दिन अंजना ने बताया कि वह गर्भवती है। उसने इच्छा प्रकट की, कि प्रसव अपने घर में ही होना चाहिये, अतः दोनों ने किञष्कधा के लिये प्रस्थान किया।
बालि-सुग्रीव भी अंजना के ही समान गौतम द्वारा पालित थे, और अब वे ऋक्षराज के पुत्र थे। इस नाते अंजना को भी उन्होंने पुत्री की भाँति स्वीकार किया। केसरी की अनुपस्थिति में भी महाराज ने उनका सेनापति पद बरकरार रखा था। वे पुनः अपने दायित्व का निर्वहन करने लगे। उचित समय पर अंजना ने पुत्र को जन्म दिया गया। वह अत्यंत सुगठित देहयष्टि का था, इसलिये उसे वज्रांग ;वज्र के समान अंगों वालाद्ध नाम दिया गया, जो बिगड़कर बजरंग बन गया।
दशरथ अभी तक सन्तानहीन थे, इससे वे अत्यंत व्यथित रहा करते थे। एक दिन नारद अचानक अयोध्या पहुँच गये। उन्होंने दशरथ को बताया कि उन्हें चार पुत्रों का योग है। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी मुँहबोली पुत्री शान्ता के पति ऋष्यशृंग ऋषि पुत्रेष्टि यज्ञ के द्वारा उनकी कामना की पूर्ति करेंगे। शान्ता, दशरथ के अनन्य मित्र, अंगनरेश रोमपाद और कौशल्या की बड़ी बहन वर्षिणी की पुत्री थी। बातों-बातों में नारद, कैकेयी के कानों में यह भी फूँक गये कि रावण के पराभव में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहेगी। सारे आर्यों की भाँति कैकेयी भी अनार्यों के प्रति अच्छी राय नहीं रखती थी। उसकी धाय माँ मन्थरा की तो बरबादी के मूल में सुमाली था। वह तो समस्त रक्ष जाति से ही अत्यंत घृणा करती थी, और सतत अपनी घृणा कैकेयी के मन में भी रोपने का प्रयास करती रहती थी।
दशरथ और कौशल्या ने स्वयं जाकर ऋष्यशृंग को आमंत्रित किया। यज्ञ सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ और कौशल्या से राम, कैकेयी से भरत तथा सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ।[adinserter block="1"]
कुमारों के जन्म के समय उन्हें आशीर्वाद प्रदान करने नारद भी आये, और तीनों रानियों को यह सूत्र दे गये कि उनका राम, भविष्य में रावण का विनाश करेगा, किन्तु इसके लिये उसे एकाकी प्रयाण करना पड़ेगा। इस तथ्य ने रानियों को चिन्ता में डाल दिया। किन्तु नारद, समय आने पर अधिक बताने की कहकर टाल गये। कुमार, धीरे-धीरे प्रगति करने लगे। सुमित्रा अपने बड़े पुत्र लक्ष्मण के मन में राम के साथ अभिन्न-भाव रोपने का प्रयास कर रही थी ताकि राम के रावण अभियान हेतु प्रस्थान करते समय कम से कम एक भाई तो उसके साथ अवश्य ही रहे।
अयोध्या के एक श्रेष्ठी मणिभद्र की छह वर्षीय पुत्री मंगला को अचानक वेद पढ़ने की हठ सवार हो गयी। उसका बड़ा भाई वेद गुरुकुल में पढ़ रहा था। सेठ ने उस समय उसे बहला दिया, किन्तु मंगला की हठ बढ़ती ही गयी। उसे बहुत समझाया गया कि लोक में स्त्रियों और शूद्रों का अध्ययन वर्जित है। इसमें कई वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन मंगला ने गुरुकुल में अध्ययनरत अपने भाई वेद पर दबाव बनाया कि वह पता करे कि किस ग्रन्थ में स्त्रियों और शूद्रों का वेदाध्ययन वर्जित किया गया है। इसी संदर्भ में वेद ने गुरुदेव वशिष्ठ से बात की। उस समय महामात्य जाबालि भी उपस्थित थे। उन्होंने मंगला को अपने यहाँ अध्ययन के लिये आने का प्रस्ताव दिया। ञकतु यह प्रस्ताव किसी काम नहीं आया। मंगला की माता किसी भी सूरत में अनुमति देने को तैयार नहीं हुई। उन्होंने भी मंगला के लिये वर खोजकर तत्काल उसका विवाह करने का हठ ठान लिया। बात बढ़ गयी। मंगला की माता ने यहाँ तक कह दिया कि यदि यह विवाह के लिये तैयार नहीं होती तो कहीं भी मरे जाकर, मेरे घर में इसके लिये कोई स्थान नहीं है। उसी रात मंगला ने घर छोड़ दिया।
कुबेर ने लंका रावण को सौंप तो दी थी, किन्तु लंका का समस्त कोष और व्यापार उसी के साथ चला गया था। कुशल वणिक और शीर्षस्थ अधिकारी भी उसी के साथ चले गये थे। सुमाली ने रावण को लंका की प्रजा के साथ निकटता बढ़ाने को प्रेरित किया और स्वयं अपनी कूटनीति के सहारे लंका के साम्राज्य विस्तार और कोषनिर्माण के कार्य में जुट गया। उसने लंका के दक्षिणी सागर से गुजरने वाले कुबेर के पोतों पर दृष्टि रखनी आरंभ कर दी। उसने दक्षिण पूर्वी द्वीपों में अपने कूटचर स्थापित करना आरंभ किया साथ ही दक्षिण भारत में भी गुपचुप अपनी सैनिक चौकियाँ भी स्थापित करना आरंभ किया। इस सबका रावण को कोई संज्ञान ही नहीं था। ... और फिर उसने कुबेर के पोतों को लूटना आरंभ कर दिया। इस संबंध में सुमाली का तर्क था कि कुबेर ने जब लंका रावण को सौंप दी तो उसका कोष भी सौंप देना चाहिये था, पूरा नहीं तो आधा तो सौंपना ही चाहिये था।[adinserter block="1"]
कुबेर जो जब संज्ञान हुआ तो उसने दूत के माध्यम से प्रतिरोध किया, किन्तु सुमाली साफ मुकर गया। रावण को तो सुमाली पर अगाध विश्वास था ही। समस्या का अंत रावण द्वारा कुबेर पर आक्रमण से हुआ। इस बीच सुमाली ने पर्याप्त सैन्यबल एकत्र कर लिया था। उधर कुबेर योद्धा कम और व्यापारी अधिक था। रावण विजयी हुआ। उसने कुबेर से उसका पुष्पक विमान छीन लिया।
उस क्षेत्र के प्राड्डतिक सौन्दर्य से रावण अभिभूत था। वह सुमाली आदि के साथ पुष्पक पर भ्रमण के लिये निकल पड़ा। आगे जाकर एक स्थान पर पुष्पक अटक गया, पता चला कि यह शिव के कारण हुआ है। रावण, शिव से युद्ध के लिये उद्यत हो गया। शिव ने उसे बच्चों की तरह खिलवाड़ करते हरा दिया। रावण, शिव की असीमित शक्ति से अत्यंत प्रभावित हुआ; वह उनका भक्त बन गया, और उसने शिव से उनकी स्मृति के रूप में चमत्कारी चन्द्रहास खड्ग प्राप्त किया।
उस क्षेत्र के सौन्दर्य और शिव के व्यक्तित्व से सम्मोहित रावण ने शेष सबको वापस लंका भेज दिया और स्वयं आत्मञचतन के लिये वहीं वन में रुक गया। उसने सुमाली से कहा कि ठीक एक वर्ष बाद वे उसे लेने वहीं आ जायें। वहाँ उसका एक अत्यंत सुंदरी युवती वेदवती से परिचय हुआ। उसने वेदवती की एक ञसह के आक्रमण से रक्षा की।
वेदवती, बृहस्पति के पुत्र ऋषि कुशध्वज की कन्या थी। इसी वन में उनका छोटा सा कुटीरनुमा आश्रम था। उसके पिता का विचार था कि वेदवती के योग्य वर, सृष्टि में विष्णु के अतिरिक्त कोई नहीं हो सकता। पिता के विश्वास के चलते वेदवती ने भी मान लिया था कि वह विष्णु की वाग्दत्ता है। वह विष्णु को प्राप्त करने हेतु तपस्या करने लगी। अनेक लोगों ने वेदवती को प्राप्त करने का प्रयास किया, किन्तु उसके पिता ने मना कर दिया। इसी कारण एक दिन सुन्द नामक एक दैत्य ने उनकी हत्या कर दी। वेदवती की माता उन्हीं की चिता में सती हो गयीं। तबसे वेदवती यहीं रह रही थी, और विष्णु को प्राप्त करने हेतु तपस्या कर रही थी।
उस विजन वन में ये दो ही प्राणी थे। दोनों में घनिष्ठता बढ़ने लगी और फिर एक दिन एक और दुर्घटना के उपरांत दोनों में सम्बन्ध स्थापित हो ही गया। किन्तु इस घटना से वेदवती को अत्यंत आघात पहुँचा। उसे लग रहा था कि उसने विष्णु के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष से संबंध स्थापित कर पाप किया है। वह चितारोहण कर लेना चाहती थी। उसे रावण से प्रेम था, किन्तु उसका विश्वास बाधा बना हुआ था। तभी पता चला कि वह गर्भवती है। रावण ने उसे किसी प्रकार प्रसव तक रुकने को मना लिया। प्रसव के उपरान्त वह कैसे भी नहीं रुकी, और चितारोहण कर ही लिया।[adinserter block="1"]
रावण, वेदवती की चिता के पास नवजात कन्या को लिये अर्धविक्षिप्त सा बैठा था, तभी सुमाली उसे लिवाने आ गया। उसकी पैनी दृष्टि ने तत्काल भाँप लिया कि कन्या के लक्षण, पितृकुल के लिये अत्यंत अनिष्टकारी हैं। वह उससे छुटकारा पाने का उपाय सोचने लगा। रावण की स्थिति देखते हुए कन्या के साथ कुछ भी नहीं किया जा सकता था। बहुत विचार करने के उपरान्त कन्या को रावण से अलग करने का उपाय उसे सूझ गया। उसने रावण को समझाया कि वेदवती, विष्णु से विवाह करना चाहती थी। उसने अन्तिम समय कहा भी था कि उसकी तपस्या व्यर्थ नहीं जायेगी, वह स्वयं विष्णु को नहीं प्राप्त कर सकी तो अब उसकी यह कन्या उसे प्राप्त करेगी। किन्तु रावण के, देवों से जो शत्रुता के सम्बन्ध स्थापित हो गये हैं, उनके चलते रावण यदि शत्रुता भुला दे तो भी, विष्णु कभी भी उसकी कन्या को स्वीकार नहीं करेगा। अतः इसका विष्णु से सम्बन्ध एक ही सूरत में हो सकता था कि इसे किसी विधि से किसी ऐसे व्यक्ति के पास पहुँचा दिया जाये जिसके विष्णु से अच्छे संबंध हों, और यह उसके पास उसकी कन्या के रूप में पल कर बड़ी हो। किसी को भी इस बात की भनक तक न लगे कि यह रावण की कन्या है।
रावण की समझ नहीं आ रहा था कि यह कैसे संभव हो सकता है? तब सुमाली ने उसे बताया कि कल प्रातः मिथिला नरेश जनक यज्ञ के लिये भूमि पर हल चलाने वाले हैं। वह कन्या को उसी भूमि में इस प्रकार स्थापित कर देगा कि वह अवश्य ही जनक को प्राप्त हो जाये। जनक की ख्याति राग- द्वेष से मुक्त, धर्मप्राण राजा के रूप में थी, उन्हें विदेहराज कहा जाता था। रावण भी उनका सम्मान करता था। उनके नाम पर उसने सहमति दे दी।
अब आगे ....[adinserter block="1"]

1. रावण की लंका वापसी

महाराज जनक, जहाँ पूजन के लिये हल चलाने वाले थे, कन्या को सावधानी से वहीं स्थापित कर सुमाली रावण को लेकर वापस लंका लौट आया। कन्या को स्थापित करने में उसने पूरी सावधानी बरती थी। एक बड़ी सी मंजूषा में नीचे रुई की परत बिछाकर उसी में बालिका को लिटा दिया था। मंजूषा के ढकने में कई छिद्र कर दिये थे, ताकि पर्याप्त वायु, मंजूषा में प्रवेश कर सके। छिद्र करते समय उसने यह भी ध्यान रखा था कि उनसे यदि मिट्टी झड़े तो बालिका के मुख पर न गिरे। यथास्थान पहुँचकर सुमाली ने कन्या को एक बार पुनः रुई की बत्ती की सहायता से जलमिश्रित गोदुग्ध का पान कराया था, और फिर जब देखा था कि अनुष्ठान हेतु लोगों का आगमन होने लगा है, तो उसने कन्या को मंजूषा में लिटाकर पहले से खोद रखे एक गढ़े में उसे रख दिया था, और गढ़े को मिट्टी से ढक दिया था। उसने यह ध्यान भी रखा था कि अधिकांश छिद्र खुले रहें। मंजूषा दिखती भी रहे तो कोई चिंता नहीं थी, वह तो चाहता ही यही था कि मंजूषा शीघ्रातिशीघ्र सीरध्वज जनक की दृष्टि में आ जाये। फिर वह पास ही एक पेड़ के पीछे तब तक छिपा रहा था, जब तक जनक के हल की नोक मंजूषा से टकरा नहीं गयी थी। इस पूरे समय के दौरान उसके हृदय में झंझावात चलता रहा था। चाहता तो वह यही था कि अभी कन्या का गला घोंटकर उसका काम तमाम कर दे; उसे आभास था कि यह कन्या भविष्य में विनाश का कारण बनेगी; किन्तु रावण की वर्तमान मनस्थिति उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं दे रही थी। उसे विश्वास था कि रावण तनिक सा चैतन्य होते ही कन्या की सुध अवश्य लेगा, और तब यदि उसके सामने कन्या की हत्या की बात खुल गयी, तो विनाश अभी आ जाएगा। ‘चलो, एक बार पुनः सही ... समय की प्रतीक्षा करो सुमाली। रावण के अपने पुत्रों में व्यस्त होते ही इस कन्या से पीछा छुड़ाने का भी कोई उपाय खोजा जाएगा। अभी यह उसकी आँखों के सामने से हटी जा रही है, यही बहुत है।’ उसने सोचा था और सिर झटक कर वापस रावण को लेने चल दिया था।
* * *
रावण को लंका वापस आए छह माह से अधिक समय हो गया था, किन्तु अभी भी वह अन्यमनस्क अवस्था में ही था। उसके मस्तिष्क में अभी भी झंझावात चल रहा था। मेघनाद को देखकर उसे अनायास अपनी पुत्री की याद आ जाती थी, और उसका मन भर आता था। कैसी होगी वह? जनक ने उसे स्वीकार किया होगा अथवा नहीं? उसके पास कोई मार्ग नहीं था यह सब जानने का। वह अक्सर कई-कई मुहूर्त (1 मुहूर्त = 48 मिनट) तक बैठा शून्य में ताका करता, और वेदवती के साथ व्यतीत किए समय को दुबारा जीता रहता। ऐसी स्थिति में मंदोदरी के छेड़ने पर कभी वह आवेश में आकर चिल्ला पड़ता था, तो कभी उदास छलछलाई आँखों से उसे देखने लगता था ... चुपचाप।
मंदोदरी को उसने सब कुछ सच-सच बता दिया था। मंदोदरी को सुनकर झटका लगा था, किन्तु उसने स्वयं को सॅंभाल लिया था। सम्राटों के लिए तो यह एक सामान्य बात थी। अभी तो यह पहली वेदवती थी; भविष्य में और कितनी वेदवती अभी आने वाली थीं, दैव ही जानता था। अपने सारे आक्रोश और सारे दुःख को भीतर ही भीतर चुपचाप पीकर वह पूरा प्रयास कर रही थी, रावण को सामान्य मनःस्थिति में लाने का। अपने अन्दर का क्षोभ उसने रत्ती भर भी प्रकट नहीं होने दिया था। वह निरंतर यही विचार किया करती थी, कि क्या करे जिससे रावण इस हताशा से उबर पाये। वैद्यराज भी यही कहते थे कि प्रतीक्षा के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है... मातामह भी यही कहते थे। कब तक प्रतीक्षा करे वह?
ञचतित सुमाली भी था। रावण के मातुल भी ञचतित थे। वे बहुधा सुमाली से इस विषय में प्रश्न किया करते थे, कि इस प्रकार कैसे चलेगा? ऐसी पराजित मानसिकता से रावण किस प्रकार उनके स्वप्नों को साकार कर पाएगा। सुमाली के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं होता था; वह बस प्रतीक्षा कर रहा था। उसे विश्वास था कि हृदय पर लगे आघात के उपचार के लिए समय से श्रेष्ठ कोई वैद्य नहीं होता; वही रावण का भी उपचार करेगा। यूँ, लंका के राजवैद्य अपनी ओर से सारे प्रयास कर रहे थे। अपने पुत्रों को भी सुमाली शांत रहकर प्रतीक्षा करने का ही उपदेश देता रहता था।
* * *[adinserter block="1"]
उस दिन भी मेघनाद को देख रावण का मन भर आया। उसे अनायास वेदवती की कन्या का स्मरण हो आया। मातामह बता तो रहे थे कि वह जनक के हाथों में पहुँच गयी है। जनक ने उसे स्वयं स्वीकार किया होगा अथवा अन्य किसी को दे दिया होगा? पुनः यही सब प्रश्न उसके मस्तिष्क को मथने लगे। सुमाली ने उसे विश्वास दिलाया था कि जनक ने उसे स्वयं ही स्वीकार किया होगा; किन्तु निश्चित जानने का कोई साधन अभी उसके पास नहीं था।
वह बहुत देर तक मेघनाद के साथ बतियाता रहा। अभी से कितनी समझदारी की बातें करता था वह, जैसे किसी प्रख्यात गुरुकुल का श्रेष्ठ वटुक ;ब्रह्मचारी बालक, प्रायः गुरुकुल के छात्रों के लिये प्रयुक्त होता है।द्ध हो। वेदवती की कन्या तो इससे चार-पाँच वर्ष छोटी होगी। काश! वह उसे भी साथ ला सकता, भाई-बहन की जोड़ी बन जाती। मेघनाद भी बहन को पाकर प्रसन्न ही होता। किंतु मन्दोदरी... क्या वह भी प्रसन्न होती? क्या वह उसे स्वीकार कर पाती? क्या वह उसे माँ की ममता दे पाती?
मन्दोदरी उसके साथ ही थी। रावण को फिर विचारों में खोया देखकर वह बोल पड़ी -
“महाराज तो जाकर जैसे हमें बिलकुल भूल ही गये थे; सब लौट आये किन्तु आप जैसे कहीं खो गये थे ... और अब आये हैं, तो भी पता नहीं कहाँ खोये रहते हैं !” उसकी आँखें गीली हो गयी थीं।
मंदोदरी का स्वर सुनकर रावण सचेत हुआ। बोला -
“अरे, मन हल्का न करें महारानी! शिव से भेंट के बाद मन अनायास भक्ति-रस में डूब गया था, तो सोचा आओ थोड़ी सी साधना ही कर लें; लंका का सम्राट् बनने के बाद से साधना का, अपने अभ्यंतर में झॉंकने का अवकाश ही नहीं प्राप्त हुआ था, और उसके बाद जो घटा, वह तो रावण आपको बता ही चुका है। रावण जानता है कि वह आपके और मेघनाद के साथ अन्याय कर रहा है, किन्तु क्या करे, उसका स्वयं पर नियन्त्रण ही नहीं है। वह अपनी भावनाओं के द्वारा अवश कर दिया गया है।” कहते-कहते रावण की आँखों की कोर भी गीली हो गयी।
पिता को माता के साथ वार्तालाप में व्यस्त होते देख, मेघनाद निस्पंद कक्ष से निकल गया। मंदोदरी ने एक बार उसे जाते देखा, और फिर उस पर से दृष्टि हटाकर पूछा-
“व्यथित क्यों होते हैं महाराज? महाराज जनक ने निश्चय ही उस कन्या को अपनी पुत्री के समान अपनाया होगा।” उसने अपने स्वर को भरसक संयत बनाये रखा, साथ ही वह रावण का सिर अपने वक्ष से सटाकर उसके बालों में उँगलियाँ फिराने लगी।[adinserter block="1"]
“क्या कहूँ मंदो ..!” रावण ने अनायास अपना सिर उसके सीने में धँसाते हुए कहा- “सीरध्वज के विषय में जो कुछ सुना है, उसके अनुसार तो ऐसा ही होना चाहिए किन्तु ...” उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।
मंदोदरी, पूर्ववत् उसके सिर को सहलाती रही। उसके हृदय में पता नहीं कैसा कुछ हो रहा था... किन्तु इस ‘कैसा कुछ’ को प्रश्रय देने से अधिक आवश्यकता अभी सम्राट को दिलासा देने की थी। वह धीरे से बोली-
“महाराज! विधि का लिखा कोई नहीं मेट सकता; मंदोदरी के नाथ सकुशल लौट आये, मंदोदरी इसी से संतुष्ट है, विधाता का धन्यवाद करती है।”
“महारानी, रावण लौट तो आया है, किंतु आधा-अधूरा है, उसे पुनः पूर्णता आप ही प्रदान कर सकती हैं।”
“मैं जान रही हूँ महाराज, किंतु मैं यह भी जानती हूँ कि आप अति शीघ्र अपने जीवन के चरमोत्कर्ष को प्राप्त करेंगे; बस एक निवेदन करना चाहती हूँ, यदि आप अनुमति दें ...”
“आप अनुमति माँगकर रावण को लज्जित कर रही हैं महारानी!” रावण कुछ शिकायत भरे स्वर से बोला “निस्संकोच कहिये जो भी कहना है।”
“वेदवती के पिता ने कहा था न कि विष्णु के समक्ष सभी तुच्छ हैं, केवल विष्णु ही उसे वरण करने योग्य हैं, इसीलिये तो वह विष्णु की आराधना में प्रवृत्त हुई थी।”
‘हाँ ।’
“तो आप जब स्वयं को विष्णु से भी श्रेष्ठ सिद्ध कर देंगे, तभी आप के मन को शांति मिलेगी; अभी आपकी अंतश्चेतना को कहीं न कहीं यह प्रतीत हो रहा है कि आपने उसके साथ रमण कर उसकी तपस्या को खंडित कर दिया, और इसीलिये उसने चितारोहण कर लिया। कहीं न कहीं आपका अंतर्मन भी विष्णु को आपसे श्रेष्ठ स्वीकार कर रहा है, स्वयं को विष्णु से हीन मान रहा है। जब तक आप अपनी इस भावना से नहीं उबर पाते, तब तक आपके अंदर अपराध-बोध सा बना ही रहेगा।”
“संभवतः आप सत्य कह रही हैं महारानी।”[adinserter block="1"]
“संभवतः नहीं, मंदोदरी पूर्णतः सत्य कह रही है महाराज, किन्तु आप मुझे महारानी नहीं, मंदो ही कहिए, आपके मुँह से वही अच्छा लगता है।” मंदोदरी ने वैसे ही रावण के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए ञकचित इठलाकर कहा।
मंदोदरी के इस हास से रावण के अधरों पर भी अनायास क्षीण सी स्मित की रेखा दौड़ गयी। उसने अपना सिर उठाकर अपनी मंदो की आँखों में देखते हुए कहा- “चलो ऐसा ही सही।” मंदोदरी के द्वारा सब कुछ सहज रूप से स्वीकार कर लेने से उसे थोड़ी सान्त्वना मिली थी... हृदय का बोझ कुछ कम हो गया था।
“आप स्वयं को विष्णु से भी श्रेष्ठ सिद्ध करने का उद्योग अभी से आरंभ करें, और जिस दिन आप यह कर देंगे, उस दिन आपकी आत्मा से एक अनुचित कार्य करने का बोझ भी हट जायेगा।” अपनी बात जारी रखे हुए मंदोदरी कह रही थी- “आपको लगेगा कि वेदवती की मूर्खता थी, जो उसने अपने पिता के कहने मात्र से यह मान लिया कि विष्णु ही सर्वश्रेष्ठ हैं।”
“महारानी, क्या कह रही हैं?आप वेदवती को मूर्ख कह रही हैं?”
“नहीं महाराज, मैं उसे मूर्ख नहीं कह रही, मैं तो उसे अत्यंत निश्छल, अत्यंत सरल नारी मान रही हूँ , जिसने, जो उसके पिता ने कह दिया, उसे आँखें मूँदकर हृदयस्थ कर लिया; अपनी बुद्ध का, अपनी आत्मा का, अपने प्रेम का ... सबका दलन कर दिया।” मंदोदरी एक क्षण को रुकी, फिर मुस्कुराकर बोली- “किंतु महारानी नहीं, मंदो !”
“निश्छल तो वह निस्संदेह थी मंदो,” कहते हुए रावण ने अब उसे अपने वक्ष में खींच लिया। “मन और आत्मा से पूर्णतः निर्मल; अद्वितीय सुन्दरी होने पर भी उसे अपने सौन्दर्य पर रत्ती भर भी दंभ नहीं था, पूर्णतः निष्कपट, सरल सहज ...”
“यही तो मैं भी कहना चाह रही हूँ महाराज; अच्छा बताइये ... क्या आप इस सत्य को नकार सकते हैं कि उसने आपसे प्रेम नहीं किया था?”
“किया था मंदो, सम्पूर्ण निष्ठा से किया था। अन्तर्तम की गहराइयों से किया था।”
“फिर तो आप यह भी मानेंगे कि विष्णु से उसे प्रेम नहीं था, मात्र पिता की धारणा के चलते ही वह विष्णु का वरण करना चाहती थी; अपितु अधिक सही होगा यदि कहा जाये कि पिता की महत्त्वाकांक्षा को ओढ़े हुए सर्वश्रेष्ठ का वरण करना चाहती थी, और उसके पिता के अनुसार सर्वश्रेष्ठ विष्णु ही हैं।”
“यही है! यही है! आपने परिस्थिति का पूर्णतः सत्य निरूपण किया है।”[adinserter block="1"]
“तो महाराज, इस पराजित मनःस्थिति से बाहर निकलिये, और त्रिलोक को बता दीजिये कि सर्वश्रेष्ठ विष्णु नहीं, आप हैं। विष्णु तो छल-छद्म के सहारे अपना वर्चस्व स्थापित किये हैं। वे तो देवों के सहयोग और कूटनीति के सहारे श्रेष्ठ बने हुए हैं। वे तो भीरु ऋषियों और आर्यों के कारण ही महान कहलाते हैं... महान वे नहीं आप हैं।”
“यही होगा मंदो ... नहीं महारानी! आज आप मेरी गुरु बन गईं। आज तो आपको प्रणाम करने का मन कर रहा है।” कहते हुए रावण ने मंदोदरी के कंधों को पकड़कर उसे सीधा करना चाहा, किंतु मंदोदरी ने अपनी दाहिनी भुजा की पकड़ उसकी पीठ पर और कस ली, साथ ही अपना सिर उसके वक्ष में और गहरे धँसाने का प्रयास सा करती हुई बोली-
“क्या कह रहे हैं? क्या आप मंदोदरी को उसकी ही दृष्टि में गिरा देना चाहते हैं? क्या आप उसके पातिव्रत को खंडित कर देना चाहते हैं?” कहकर उसने एक बार सिर उठाकर रावण की आँखों में झाँका और पुनः अपना सिर उसके वक्ष में छुपा लिया। रावण ने भी उसे कसकर भींच लिया। उसके चेहरे की म्लानता धुल गयी थी और उस पर पुनः तेज चमकने लगा था।
“नाथ! अपने मातामह का खोया गौरव आपको ही पुनः प्राप्त करना है। रक्षों के तेज को समस्त भूमंडल में आपको ही प्रसारित करना है; आप यदि यूँ हताशा में डूबे रहेंगे तो रक्षों का तेज तो रसातल में चला जायेगा, मातामह के समस्त स्वप्न खंडित हो जायेंगे, और लंका का जनमानस, जो आपकी ओर आस्थावान दृष्टि से ताक रहा है, वह भी हताश हो जायेगा। यह म्लानता, यह हताशा लंकेश्वर के मुख पर शोभा नहीं देती। लंकेश्वर का आनन तो सदैव तेजोमय ही होना चाहिये।” मंदोदरी रावण की बाहों में सिमटी हुई ही थोड़ा सा सिर उठाकर उसके कानों में फुसफुसाती हुई सी कह रही थी- “आपके पास ब्रह्मतेज है, जिसके सम्मुख सृष्टि के समस्त तेज हीन हैं; योग और ध्यान पर आपका निर्बाध अधिकार है; मात्र स्वयं शिव ही आपसे श्रेष्ठ हैं। आप तो अपनी हताशा पर क्षणमात्र में विजय प्राप्त कर सकते हैं। ... और महाराज सबसे बड़ी बात यदि आप ही इस हताशा के सागर में उतराते रहे तो मंदोदरी का क्या होगा? एकमेव आपके अतिरिक्त उसका और क्या अवलंब है?”
“महारानी, आप सच्चे अर्थों में अर्धांगिनी हैं; आपने रावण को पुनर्जन्म प्रदान किया है। आप भरोसा रखिये, रावण स्वयं को विष्णु से भी श्रेष्ठ सिद्ध कर दिखायेगा; वह स्वयं को सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर दिखायेगा।”
मंदोदरी ने कुछ नहीं कहा, बस अपने तप्त अधर रावण के अधरों पर रख दिये। वल्लरी, सुदृढ़ तरु के साथ लिपट गयी। हताश रावण में पुनः शौर्य का संचार होने लगा। मंदोदरी, अधरों पर अधर रखे हुए ही फुसफुसाई -
“महारानी नहीं मंदो ... एकांत में सदैव मंदो!”
“मंदो ! ... रावण की मंदो ...!!”[adinserter block="1"]
कुछ देर दोनों एक दूसरे में खोए रहे, फिर एकाएक मंदोदरी ने अपना सिर उठाया और रावण के कानों में फुसफुसाते हुए बोली-
“किन्तु महाराज, इस अभियान पर निकलने से पूर्व एक और अत्यावश्यक दायित्व है, जिसका आपको निर्वहन करना है।”
“वह क्या मंदो?”
“मेघनाद अब बड़ा हो रहा है।”
“सो तो है।”
“अब उसकी वयस् विधिवत् अध्ययन आरम्भ करने की हो गयी है।”
“मातामह हैं तो उसके लिए।”
“मातामह!” मंदोदरी सहज हास्य के साथ बोली- “उनके पास प्रशासनिक कार्यों से अवकाश ही कहाँ होता है।”
“क्यों...! उन्होंने ही तो हम भाइयों को प्रशिक्षित किया है।” रावण की आँखों में आश्चर्य था।
“उन्होंने जब आप भाइयों को प्रशिक्षित किया था तब वे लंका के महामहिम नहीं थे, अब हैं। आपकी अनुपस्थिति में सारा दायित्व तो उनके ऊपर ही होता है।”
बात सही थी। रावण सोचने लगा।
“तो ... तो ... तो विभीषण क्या करता है? वह तो कोई विशेष प्रशासनिक दायित्व नहीं निभाता; वह यह दायित्व ग्रहण कर सकता है, मैं अभी उसे निर्देशित करता हूँ।”
“उसे अपने ही कर्मकांड से अवकाश नहीं मिलता, फिर उस पर जनमानस में लंकेश्वर की छवि निर्मित करने का दायित्व भी तो है।”
“तो क्या हुआ? यह दायित्व भी उसे निर्वहन करना ही होगा, मैं ...”
“यह स्थाई हल नहीं है लंकेश्वर!” रावण की बात बीच में ही काटती हुई मंदोदरी बोली- “अभी आरंभिक स्तर पर विभीषण यह दायित्व सँभाल सकता है, किन्तु भविष्य के लिए यह पर्याप्त नहीं होगा। ज्ञानी होना और योग्य गुरु होना दोनों भिन्न बातें हैं; फिर विभीषण को यदि यह दायित्व सौंपा गया तो वह मेघनाद को भी अपने समान ही कर्मकाण्डी बना देगा। वह उसे भी रक्ष-संस्ड्डति के स्थान पर उसी पाखण्डी आर्य-संस्ड्डति में दीक्षित कर देगा। मेघनाद लंकेश्वर का पुत्र है, उसके लिए उसकी प्रतिष्ठा के अनुरूप ही गुरु की भी आवश्यकता है, जो उसे सर्वश्रेष्ठ में ढाल सके।”
“संभवतः पुत्र की माता किसी योग्य गुरु का चयन कर चुकी हैं?” रावण ने सस्मित कहा।
‘जी।’[adinserter block="1"]
‘कौन?’ रावण ने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुए पूछा।
“दैत्यगुरु आचार्य शुक्र।”
“अत्यंत श्रेष्ठ।” रावण ने उत्साहपूर्वक मंदोदरी के कपोल पर चुम्बन अंकित करते हुए कहा- “इससे श्रेष्ठ चयन तो हो ही नहीं सकता। महान शुक्राचार्य की अनुमति प्राप्त करने का दायित्व मैं अभी मातामह को सौंपता हूँ।”
“महाराज, एक सुसमाचार और है जो आपके संज्ञान में आना चाहिए।”
“वह क्या मंदो?”
“आपकी अनुपस्थिति में चन्द्रनखा का विवाह हो गया है।”
“मेरी प्रतीक्षा नहीं कर सकती थी चन्द्रनखा?”
“उन्हें विश्वास नहीं था कि आप कब तक वापस लौट पायेंगे, और उधर विद्युत के पिता का संदेशा आ गया था; उन्होंने उसे अविलम्ब बुलाया था, अतः शीघ्रता में उन्होंने गंधर्व विवाह कर लिया, हमें भी सूचना उनके विवाह के उपरान्त ही प्राप्त हुई।”
“वह कोई महत्त्वपूर्ण विषय नहीं है, किन्तु है कौन वह जिसे हमारी चन्द्रनखा ने अपने वर के रूप में चयनित किया है?”
“कालकेय है, विद्युज्जिव्ह।”
‘हूँ ऽ ऽ ऽ।’
“अपनी भगिनी को आशीर्वाद और शुभकामनायें नहीं देंगे जाने से पूर्व?”
“अवश्य दूँगा, किन्तु जब दोनों एक साथ होंगे तब; अब कब आयेगा वह?”
“यह तो नहीं ज्ञात; उसके जाने के उपरान्त उससे कोई सम्पर्क नहीं हुआ अभी तक।”
कुछ काल दोनों शांत बैठे रहे। मंदोदरी ने पुनः रावण की गोद में सिर रख लिया था।
“नाथ, एक सुसमाचार... अपितु दो सुसमाचार और हैं।”
“वे क्या?”
“भइया कुंभकर्ण को पुत्र की प्राप्ति हुई है, उनके पुत्र का नाम उन्हीं के नाम पर कुम्भ रखा गया है।”
“अरे! यह तो अत्यंत शुभ समाचार है, और दूसरा?”
“सरमा भी गर्भवती है।”
“यह भी उत्तम है।”[adinserter block="1"]
“अब शान्त मन से कुम्भ को आशीर्वाद दे आइयेगा, और एक बार सरमा को भी आशीर्वाद अवश्य प्रदान कीजियेगा, उसे अच्छा लगेगा।”
“निस्संदेह, लंका की महारानी के आदेश का पालन होगा।” कहते हुए रावण मुस्कुरा उठा।
2. अभियान का आरम्भ
“पिताऽ! पिताऽऽ!” वज्रमुष्टि, अधीरता से पुकारता हुआ सुमाली के कक्ष में प्रविष्ट हुआ।
“क्या हुआ वत्स? इस भाँति अधीर क्यों हो रहे हो?”
“पिता! रावण ...”
‘लंकेश्वर।’ सुमाली उसकी बात काटता हुआ तीव्र स्वर में बोला।
“जी, पिता..., लंकेश्वर विश्व-विजय के अभियान पर निकलने को उद्यत हो रहे हैं।”
“इस अवस्था में?” सुमाली एक बड़े से काष्ठ-पत्रक पर कुछ मानचित्र सा बना रहा था, वज्रमुष्टि की बात सुन कर चौंक पड़ा। “उनकी मनःस्थिति ऐसी है कि वे अभी किसी अभियान पर जा सकें।”
फिर जैसे वह अपने ही ओठों में बुदबुदाया- “इतने बड़े अभियान पर, सूझी क्या है उसे? वह भी ऐसी अर्धविक्षिप्त सी अवस्था में।”
वज्रमुष्टि को भी कुछ समझ नहीं आ रहा था, वह तो मानो आतंकित सा अपने पिता पर निर्निमेष दृष्टि जमाए खड़ा था।
“तुमसे किसने कहा? स्वयं लंकेश्वर ने?” सुमाली ने स्वयं को सँभालते हुए पूछा।
“नहीं... प्रहस्त को लंकेश्वर ने बुलवाया था, इसी विषय में विचार करने हेतु; वही जाते-जाते मुझे आप तक सूचना पहुँचाने की कहता हुआ गया है।”
“चलो हम भी चलते हैं; कहाँ होंगे ये लोग, सभा कक्ष में?” सुमाली ने अपना सामान समेटते हुए कहा।
“नहीं, लंकेश्वर महारानी मंदोदरी के कक्ष में हैं, वहीं उन्होंने प्रहस्त को बुलवाया था।”
* * *
सुमाली बड़ी आशंकित-आतंकित सी अवस्था में गया था। कैकसी और अनला भी उसके साथ थीं, सुमाली को सूचना देते समय वज्रमुष्टि का स्वर इतना तीव्र था कि भीतर उन्होंने भी सुना था और वे अपनी उत्कंठा दबा नहीं पाईं थीं। सुमाली सोचता जा रहा था- क्या रावण अपने अवसाद से बाहर आ गया है, अथवा यह त्रिलोक विजय अभियान भी उसी अवसाद का कोई विड्डत रूप है।
इन तीनों को देखते ही रावण उठ खड़ा हुआ।[adinserter block="1"]
“मातामह! हम तो आपके प्रासाद की ओर ही आ रहे थे, आपने क्यों कष्ट किया?”
“तो क्या हुआ वत्स? क्या हम तुम्हारे या महारानी के प्रासाद में नहीं आ सकते?”
“कैसी बात करते हैं मातामह; रावण लंका का सम्राट है, किन्तु महामहिम तो आप ही हैं।” कहते हुए रावण ने झुककर सुमाली के, और फिर मौसी और माँ के चरणों में प्रणाम किया। मंदोदरी ने भी उसका अनुकरण किया।
अभिवादन की औपचारिकता के उपरांत रावण स्वयं ही बोला-
“मातामह! रावण त्रिलोक में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के अभियान हेतु प्रस्तुत है, आपके आशीष और मार्गदर्शन की आकांक्षा है।”
“मेरा आशीष तो सदैव ही तुम्हारे साथ है; इस वृद्ध की साँसें तो लंकेश्वर को त्रिलोकेश्वर बनते देखने की प्रतीक्षा में ही अटकी हैं, मैं....”
“मातामह, ऐसी अशुभ बात क्यों करते हैं।” सुमाली की बात बीच में ही काटते हुए रावण बोला- “रावण तो चिरकाल तक आपके स्नेह की छाया में ही जीवन व्यतीत करना चाहता है।”
“आवागमन तो प्रड्डति का अटूट नियम है वत्स; जिसने जन्म लिया है, उसे एक न एक दिन जाना भी है... याद नहीं, तुम्हारे पितामह ने ही कहा था कि अमर कोई भी नहीं है।”
“कुछ भी हो, किन्तु आपकी मृत्यु की चर्चा रावण को सह्य नहीं है।”
कैकसी और अनला ने भी उसका समर्थन किया।
“अच्छा छोड़ो इस बात को,” सुमाली मुख्य विषय पर आते हुए बोला- “क्या रूपरेखा बनाई है तुमने अभियान की?”
“रूपरेखा क्या बनानी है मातामह; रावण में पुरुषार्थ है ... और अब महारानी की ड्डपा से विजय की दुर्दम्य अभिलाषा भी उत्पन्न हो गयी है; पितामह के वरदान और महाप्रभु शिव के इस चंद्रहास के होते किसकी सामर्थ्य है जो रावण के सम्मुख टिक सके? सीधे अमरावती की ओर जायेगा, क्षीरसागर की ओर जायेगा।”
सुमाली का जी चाहा कि अपना सिर पीट ले रावण की मूर्खता पर। इन्द्र और विष्णु पर कहीं इस प्रकार विजय पायी जा सकती है? इन्द्र से तो फिर भी एक बार पार पाया जा सकता है, किन्तु विष्णु ... कितना बड़ा कूटनीतिज्ञ है, कितना बड़ा प्रपंची है, यह सुमाली ही जानता है। निस्संदेह रावण अभी अपने अवसाद से बाहर नहीं आया है, और यह त्रिलोक विजय अभियान भी उसी अवसाद का ही एक रूप है। सँभालना होगा इसे अन्यथा सारा खेल बिगाड़ देगा। वह प्रसन्न था कि रावण उस अवसन्न अवस्था से बाहर आ गया था, किन्तु यह अवस्था भी तो चिन्ताजनक ही थी। उसकी चिन्ता बढ़ गयी थी, परन्तु उसने अपने मनोभावों की एक रेखा भी अपने चेहरे पर नहीं आने दी। प्रकटतः वह बोला-
“नहीं पुत्र!” उसे जब भी रावण से अपनी बात मनवानी होती थी तो इसी भाँति सम्बोधन करता था। “इतना महत्त्वाकांक्षी अभियान अविचारित अवस्था में आरंभ नहीं किया जा सकता, मैं कदापि इसकी अनुमति नहीं दे सकता।”
“फिर? फिर आपका क्या आदेश है? यह निश्चित जान लीजिए कि रावण स्वयं को त्रिलोक में सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करके ही रहेगा; स्वयं को विष्णु से भी श्रेष्ठ सिद्ध किये बिना उसे चैन नहीं मिलेगा।”[adinserter block="1"]
“लंकेश्वर के पुरुषार्थ पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है; पितामह के वरदान पर भी कोई प्रश्न नहीं है, न ही शिव के चन्द्रहास पर कोई प्रश्न है; किन्तु बड़े युद्ध, मात्र एक योद्धा के पुरुषार्थ से नहीं जीते जाते; अभी इन्द्र या विष्णु को उकसाने का समय नहीं आया है, पहले निकट के छोटे-छोटे द्वीपों को जय करो, लंका का सैन्य बढ़ाओ; तदुपरांत एक-एक कर भरतखंड के राज्यों को विजित करते हुए अमरावती की ओर अभियान करना होगा।”
“किन्तु मातामह ...”
“कोई किन्तु परंतु नहीं पुत्र, त्रिलोक का अर्थ मात्र इन्द्र ही नहीं है, त्रिलोक में ये सब भी आते हैं।”
“फिर भी मातामह, इन्द्र और विष्णु ...”
“लंकेश्वर से अधिक व्यग्र उसका यह मातामह है, विष्णु पर लंकेश्वर की श्रेष्ठता देखने के लिये, किन्तु थोड़ा धैर्य रखो; अभी तुम पूर्णतः स्वस्थ नहीं हुए हो ... पहले अपनी महत्त्वाकांक्षा की अग्नि में इन राज्यों की समिधा अर्पित करो, ताकि यह अग्नि प्रचण्डतम रूप से भड़क उठे। तदुपरांत विष्णु भी लंकेश्वर के सम्मुख नतमस्तक होगा एक दिन, यह सुमाली का उद्घोष है।”
“तो अभी ...”
“तो अभी, पोत दक्षिण सागर में सन्नद्ध हैं, लंकेश्वर को अभियान पर ले चलने हेतु।”
“दक्षिण सागर में!” रावण ने आश्चर्य से प्रश्न किया। “उधर क्यों?”
“दक्षिण को निष्कंटक कर लेते हैं न पहले, तत्पश्चात् आर्यावर्त में प्रवेश करते हैं।” रावण की मानसिक दशा के प्रति आशंकित सुमाली ने सहज मार्ग प्रस्तुत किया। वह सोच रहा था कि रावण को अभी नहीं पता होगा कि दक्षिण पूर्व के द्वीप तो वह पहले ही वह विजित कर चुका है, वहाँ अपने ही व्यक्ति शासन देख रहे हैं, वे सुमाली के निर्देश पर मात्र प्रतिरोध का दिखावा करेंगे और सहजता से काम हो जाएगा। इस सामरिक नाट्य के अभिनय में रावण की मनोदशा भी सहज हो जाएगी, वह अपने आवेग से बाहर आकर विवेकपूर्ण निर्णय लेने में समर्थ हो जाएगा। किन्तु रावण ने उसकी बात काट दी-
“मातामह! इन सब पर तो दैत्य, दानव, नाग आदि जातियों का ही निवास है, उनसे रावण का क्या विरोध है? रावण को अभीष्ट तो देवों का मानमर्दन करना है, आर्यों का मानमर्दन करना है।”
“करेंगे न पुत्र! तुम्हारे मातामह को भी तो यही अभीष्ट है, किन्तु इधर से निष्कंटक होकर ही उधर प्रस्थान करना निरापद होगा।”
“नहीं मातामह! रावण समय नष्ट नहीं करना चाहता; वह अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए तत्काल प्रस्तुत होना चाहता है।”
“किन्तु पुत्र ...”[adinserter block="1"]
“कोई किन्तु नहीं मातामह; इन द्वीपों को आप देखते रहियेगा, रावण को अपने अभियान पर निकलने दीजिए।”
“पुत्र, तुम अभी अस्वस्थ हो; मन्दोदरी और मेघनाद के साथ कुछ काल व्यतीत करो, पूर्णतः स्वस्थ होकर तब अभियान पर ....”
रावण ने सुमाली की बात पूरी नहीं होने दी। बीच में ही बोला-
“मातामह आशंकित न हों, रावण पूर्ण चैतन्य है, वह सीधे इन्द्र पर आक्रमण नहीं करने जा रहा; वह सब कुछ समझकर ही तद्नुरूप आचरण करेगा, बस अभी व्यवधान मत दीजिए ... जाने की अनुमति दीजिए।”
“तुमने निर्णय कर ही लिया है तो ठीक है, मैं तुम्हें रोक नहीं सकता, फिर भी प्रस्थान से पूर्व कुछ समय मुझे दो; तुम्हारा यह बूढ़ा मातामह, अभियान हेतु तुम्हें कुछ उचित सलाह तो दे ही सकता है।”
“यह उचित है मातामह।”
विवश सुमाली क्या करता? जितना अवसर रावण ने दिया था, उतने का ही पूरा उपयोग करने का निश्चय किया। लंकेश्वर बनने के उपरांत कुछ तो बदल ही गया है रावण, अन्यथा वह कभी अपने मातामह की अवहेलना करने की सोच भी नहीं सकता था। कुबेर विजय के पश्चात् उसने सुमाली की अवहेलना की थी और भयंकर विपदा मोल ले ली थी- सीता के रूप में... अब पता नहीं किस नई विपत्ति को न्योता देकर आए।’
फिर संध्या तक दोनों की मंत्रणा चलती रही। प्रहस्त, वज्रमुष्टि भी साथ रहे। अनला और कैकसी चली गयीं थीं। सुमाली ने रावण को विगत एक वर्ष में बदली हुई परिस्थितियों से यथेष्ट अवगत कराया। कुछ तथ्य छिपा भी लिये। आगे के लिये दिशा-निर्देश दिये। समझाया कि दक्षिणावर्त और आर्यावर्त में कौन मित्र बनाया जा सकता है, कौन नहीं; किस मार्ग से कैसे जाना उचित रहेगा। कोई तात्कालिक संकट आने पर किससे और कहाँ से त्वरित सहायता उपलब्ध हो सकती है। विरुद्-प्रवर्धन, और उनके छोटे-छोटे ग्राम्य-शिविरों के विषय में समझाया। ताड़का के विषय में समझाया।
रावण ने भी वचन दिया कि वह अभी कोई अभियान नहीं छेड़ेगा, कहीं युद्ध की परिस्थिति नहीं आने देगा; मात्र सम्पूर्ण क्षेत्र का आकलन करेगा, मित्रों का अन्वेषण करेगा, और शीघ्र ही लंका वापस लौटेगा।
अंततः जब सुमाली चलने लगा तो मंदोदरी ने आँखों ही आँखों में रावण को कुछ संकेत किया। रावण तुरन्त उस संकेत को समझ गया। वह सुमाली से बोला-
“एक आग्रह है मातामह!”[adinserter block="1"]
“कहो तो पुत्र।”
“मेघनाद का विधिवत् विद्यारम्भ होना है, उसके लिए सर्वश्रेष्ठ गुरु का चयन आपको ही करना होगा।”
“निस्संदेह, यह भी आवश्यक है; मैं इस पर विचार करता हूँ, वैसे तुमने क्या सोचा है इस विषय में?” सुमाली को सान्त्वना मिली थी, यह देखकर कि रावण अन्य विषयों पर भी विचार कर रहा है। इसका अर्थ है कि वह किसी सीमा तक अपनी अन्यमनस्कता से मुक्ति पा चुका है।
“महारानी ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य का नाम सुझाया है।”
“सम्यक्! महारानी ने सम्यक् ही प्रस्ताव किया है।”
“तो अब आप ही आचार्य की सम्मति प्राप्त करने का दायित्व वहन करें।”
“हो जाएगा; शुक्राचार्य भी ऐसा शिष्य पाकर प्रसन्न ही होंगे, मैं अविलम्ब उनसे सम्पर्क करने की चेष्टा करता हूँ।”
अगले दिन प्रातःकाल, रावण ने सबसे विदा लेकर पुष्पक पर एकाकी अपनी यात्रा के लिए प्रस्थान किया।
3. जमदग्नि के आश्रम में
“देवी! नारद का प्रणाम स्वीकार करें।” नारद, आज भार्गव महर्षि जमदग्नि के आश्रम में थे। आश्रम के बाहरी परिसर को पार कर जैसे ही वे कुलपति की कुटिया के निकट पहुँचे, देवी रेणुका के दर्शन हो गये। नारद का स्वर सुनकर देवी चौंककर पीछे घूमीं-
“अहोभाग्य आश्रम के! यह तो स्वयं देवर्षि पधारे हैं। प्रणाम स्वीकार करें देवर्षि।” कहते हुए रेणुका ने मुस्कुराते हुए हाथ जोड़ दिये।
“महर्षि कहाँ हैं देवी?”
“यहीं आश्रम में ही कहीं होंगे, आ जायेंगे; किन्तु आप कुटिया को अपनी चरण-रज तो प्रदान कीजिए।”
“देवी! यदि यहीं विराजें तो?... उन्मुक्त गगन के नीचे; देखिए तो कैसा सुखद समीर प्रवाहित है।”
“जैसी आपकी इच्छा।” कहते हुए रेणुका ने कुटिया की ओर पुकार लगाई- “अरी अम्बिके! तनिक आसन तो ला, देख, देवर्षि पधारे हैं।”
दोनों, अम्बिका द्वारा आसन लाये जाने की प्रतीक्षा करने लगे।
महर्षि जमदग्नि हैहय वंश के कुलगुरु थे। मात्र हैहय ही नहीं उस क्षेत्र के समस्त कुलों के कुलगुरु थे।
आर्यावर्त के पश्चिमी तट पर एक विकट शक्ति थी, जो भविष्य के संग्राम में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती थी। यह शक्ति थी कार्तवीर्य अर्जुन, जिसे सहस्त्रबाहु या सहस्त्रर्जुन के नाम से अधिक जाना जाता है।
अर्जुन के पूर्वज ‘महिष्मत’ ने सप्तसिंधु प्रदेश के दक्षिण-पश्चिम में स्थित सुराष्ट्र, आनर्त, अनूप और अवन्ती क्षेत्र में बसने वाले तालजंघ, शार्यात, यादव, तुंडीकेरा, आनर्त आदि वंशों को अपने बाहुबल से एक सूत्र में बाँधकर विशाल महिष्मत साम्राज्य की स्थापना की थी। उन्होंने इस क्षेत्र से नागों और अन्य आदिम जातियों को खदेड़कर वनों में धकेल दिया था, और आर्यों का वर्चस्व स्थापित किया था। यह अलग बात है कि आर्यावर्त के आर्य अभी इन्हें आर्य स्वीकार करने को तत्पर नहीं थे। यही नहीं, स्वयं इन प्रदेशों के निवासियों को भी अपने आर्य होने में संदेह था। महिष्मत ने ही पावन नर्मदा के तट पर अनूप देश के अन्तर्गत अपने साम्राज्य की राजधानी महिष्मती की स्थापना की थी। इस राजवंश को हैहय वंश के नाम से भी जाना जाता है। हैहयों का इक्ष्वाकुओं के साथ पुराना वैर चला आ रहा था।[adinserter block="1"]
महर्षि भृगु इन सभी वंशों के कुलगुरु थे। उनके उपरांत उनके वंशज परम्परानुसार इन राजवंशों के कुलगुरु के पद पर आसीन होते रहे। भृगु के उपरांत महर्षि ऋचीक इस पद पर आसीन हुए। ऋचीक की पत्नी सत्यवती कान्यकुब्जेश्वर गाधि की पुत्री और विख्यात महर्षि विश्वामित्र की बड़ी बहन थीं। फिर भी दोनों की आयु में बहुत अन्तर था। विश्वामित्र सत्यवती के पुत्र जमदग्नि के समवयस्क थे। सत्यवती के विवाह के उपरांत उनका जन्म हुआ था। इस संबंध में अनेक दंतकथायें प्रचलित हैं, किन्तु उनका यहाँ कोई औचित्य नहीं है। यहाँ बस इतना पर्याप्त है कि विश्वामित्र हमारी इस कथा के एक प्रमुख पात्र हैं। वे हमारे पौराणिक इतिहास के एकमात्र चरित्र हैं, जिन्होंने जन्मतः क्षत्रिय होते हुए भी अपनी तपस्या के बल पर ब्राह्मण पद प्राप्त किया।
जमदग्नि के काल में महाराज ड्डतवीर्य महिष्मती के सम्राट् थे। यहाँ तक सब कुछ ठीक था। राजसत्ता गुरुसत्ता का सम्मान करती थी, गुरु भी राजसत्ता का उचित आध्यात्मिक और राजनैतिक मार्गदर्शन करते थे। दुर्भाग्य से ड्डतवीर्य की मृत्यु अपेक्षाड्डत शीघ्र ही हो गयी, और उनका पुत्र अर्जुन, सम्राट बना। बस, यहीं से सब कुछ उलट-पुलट हो गया।
अर्जुन, बल-पौरुष में अपरिमेय था। वह भगवान दत्तात्रेय का भक्त था। कहते हैं कि उसके एक हजार भुजायें थीं। सहस्त्रबाहु का अर्थ यदि कोई हजार भुजाओं वाला ले, तो उसकी बुद्ध को प्रणाम ही कर सकते हैं। एक स्कन्ध; कंधाद्ध में कोई पाँच सौ भुजायें समायोजित करके दिखा दे ... और फिर उन आपस में उलझी भुजाओं से कोई भी कार्य सम्पादित करके दिखा दे तो ....
सहस्त्रबाहु का सीधा सा तात्पर्य यही है कि उसकी सामर्थ्य किसी अन्य व्यक्ति से हजारों गुना अधिक थी... और यह सत्य भी है।
असीमित सामर्थ्य और परिपक्वता से पूर्व ही प्राप्त हो गयी सत्ता ने अर्जुन की प्रड्डति को दम्भी बना दिया था। अपनी सामर्थ्य और सत्ता के मद में चूर, वह अत्यंत स्वेच्छाचारी हो गया था, सारी मर्यादायें भूल गया था। कुलगुरु के साथ भी उसका व्यवहार उच्छृंखल होने लगा था।
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Q. दशानन राम-रावण कथा खण्ड-दो | Dashanan (Ram-Ravan Katha) किताब के लेखक कौन है?
Answer.   सुलभ अग्निहोत्री / Sulabh Agnihotri  
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