अ+व+धू+त = अवधूत

अ = आशा रहित, आदि से निर्मल तथा जो आनन्द में मग्न रहता है।

व = वासना का त्याग, वक्तव्य दोष रहित तथा जो वर्तमान में ही रहता है।

धू = धूलिधूसिरत अंग (अर्थात विलासिता एवं श्रृंगार रहित)

धूत्तचित्त, (निर्मल जिसका चित्त है) तथा धारणा-ध्यान से जो मुक्त है।

त = तत्व चिन्ता में निमग्न, चिन्ता एवं चेष्टा से रहित, जिसने तम रूपी अहंकार का त्याग किया है।

गुण, हीरे के सदृशा है जिसे विष्ठा में पड़े होने पर भी कोई व्यक्ति उसे नहीं छोड़ता,
उसी प्रकार अपवित्र व्यक्तियों में जो गुण हैं उन्हें ग्रहण कर लेना चाहिए।

घड़े के भीतर का आकाश और बाहर के आकाश में भिन्नता नहीं है किन्तु यह भिन्नता घड़े के कारण होती है कि दोनों भिन्न हैं। जब ब्रह्मवेत्ता योगी का यह शरीर नष्ट हो जाता है तो उसके भीतर का चेतन तत्व उस विश्वात्मा में लीन हो जाता है।

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