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एटॉमिक हैबिट्स | Atomic Habits Hindi PDF Download Free : PDF Books by James Clear

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Nameएटॉमिक हैबिट्स | Atomic Habits
लेखक / Author
आकार / Size8 MB
कुल पृष्ठ / Pages256
Last UpdatedApril 30, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category

लोग सोचते हैं कि जब आप अपने जीवन को बदलना चाहते हैं, तो आपको कुछ बड़ा सोचने की ज़रूरत होती है, लेकिन दुनिया के ख्याति प्राप्त आदतों के विशेषज्ञ जेम्स क्लियर ने एक अन्य तरीक़ा खोज निकाला है। उनका मानना है कि वास्तविक बदलाव सैकड़ों छोटे-छोटे निर्णयों के संयुक्त प्रभाव से आता है। छोटे निर्णयों में वे दो पुश-अप प्रतिदिन करने, पांच मिनट पहले जागने और मात्र एक पृष्ठ ज़्यादा पढ़ने जैसी बातों का उदाहरण देते हैं, जिन्हें वे एटॉमिक हैबिट्स कहते हैं। अपनी इस क्रांतिकारी किताब में क्लियर बताते हैं कि आख़िर कैसे छोटे-छोटे बदलाव जीवन को बदल देने वाले नतीजों में तब्दील हो जाते हैं। वे कुछ आसान तकनीकें बताते है जिससे किसी के जीवन में अस्त-व्यस्तता कम हो जाती है और जीवन अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। इन तकनीकों में वे आदतों को क्रमबद्ध करने की भुलाई जा चुकी कला, दो मिनट के नियम की अप्रत्याशित शक्ति और गोल्डी लॉक्स ज़ोन में प्रवेश करने की तरकीब का उल्लेख करते हैं। आधुनिक मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस के गहन शोध के आधार पर वे व्याख्या करते हैं कि ये छोटे बदलाव क्यों मायने रखते हैं। साथ ही वे उन ओलिंपिक स्वर्ण पदक विजेताओं, शीर्ष सीईओ और विख्यात वैज्ञानिकों की प्रेरक कहानियां भी बताते हैं, जिन्होंने उत्पादक, उत्प्रेरित और प्रसन्न बने रहने के लिए छोटी आदतों के विज्ञान को अपनाया है।

 

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पुस्तक का कुछ अंश

 

मेरी कहानी

हाईस्कूल में द्वितीय वर्ष के अंतिम दिन की बात है। मेरे चेहरे पर बेसबॉल का बैट लगा। मेरे क्लासमेट ने इसे तेज़ी से घुमाया और वह हाथ से छूट गया और हवा में उड़ते हुए मेरी ओर आया। मैं सँभलता, उससे पहले ही वह मेरी आँखों के बीचों-बीच लगा। टक्कर के क्षणों को लेकर मेरी कोई स्मृति नहीं है।
बैट इतनी तेज़ी से मेरे चेहरे पर लगा कि उसने मेरी नाक को ख़राब करके उसे यू के आकार में कर दिया। इस टक्कर से मेरे दिमाग़ के कुछ नरम ऊतक मेरी खोपड़ी के भीतर चले गए। एकदम ही मेरे सिर में सूजन उभर गई। एक क्षण से भी कम समय में मेरी नाक टूट चुकी थी, खोपड़ी में हड्डियाँ टूटी थीं और आँखों के दोनों सॉकेट हिल चुके थे।
जब मैंने आँखें खोली, तो देखा कि लोग मेरी ओर मदद के लिए भाग रहे थे। मैंने नीचे देखा, तो कपड़ों पर लाल धब्बे देखे। मेरे एक क्लासमेट ने अपनी शर्ट निकालकर मुझे दी। मैंने नाक से बह रहे ख़ून को रोकने का प्रयास किया। मैं अचंभित और दुविधा में था, मुझे पता ही नहीं था कि मैं कितने गंभीर रूप से जख़्मी था।
मेरे टीचर ने अपनी भुजा मेरे कंधे के नीचे रखी और हमने दूर नर्स के रूम तक चलना शुरू किया। पूरे मैदान को पार करके और पहाड़ी के नीचे नर्स के ऑफ़िस के लिए वापस स्कूल लौटे। अनके हाथों ने सीधा रखने के लिए मुझे सहारा दिया। हम धीरे-धीरे वहाँ गए। किसी ने महसूस नहीं किया कि हर मिनट क़ीमती था।
जब हम नर्स के कमरे में आए, तो नर्स ने मुझसे कई सवाल पूछे।
“कौनसा वर्ष चल रहा है?”
मेरा ज़वाब था ‘1998’, जबकि वह 2002 का वर्ष था।
‘अमेरिका के राष्ट्रपति कौन हैं?’
मैंने कहा, ‘बिल क्लिंटन’, जबकि सही उत्तर था, जॉर्ज बुश।
“आपकी माँ का नाम क्या है?”
‘ओह’, मैं अचकचा गया। इसमें दस सेकंड निकल चुके थे।
‘पैटी’, मैंने सामान्य तरह से कहा, जबकि मैं यह देख नहीं सका कि मुझे अपनी ही माँ का नाम याद करने में दस सेकंड लग गए।
यही अंतिम प्रश्न मुझे याद है। मेरा शरीर मस्तिष्क की सूजन झेल नहीं सका, एम्बुलेंस के पहले ही मैं होश खो चुका था। कुछ ही मिनट बाद मुझे स्कूल से स्थानीय हॉस्पिटल ले जाया गया।
वहाँ पहुँचने के बाद मेरे शरीर ने धीरे-धीरे काम करना बंद कर दिया। मुझे निगलने एवं साँस लेने में परेशानी होने लगी। कुछ ही देर में साँस बंद हो गई। डॉक्टरों ने तेज़ी से मुझे ऑक्सीज़न दी। उन लोगों ने यह भी फ़ैसला लिया कि स्थानीय हॉस्पिटल मेरे मामले को देखने के लिए सुसज्जित नहीं है और उन्होंने हेलिकॉप्टर बुलाकर मुझे सिनसिनाटी के बड़े हॉस्पिटल में ले जाने का आदेश दिया।
मुझे आपातकालीन कक्ष के दरवाज़ों से निकाल कर हेलिपैड की ओर ले जाया गया। एक नर्स ने मुझे आगे की ओर धकेला, तो स्ट्रेचर ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर हिलता-डुलता हुआ चलता रहा, दूसरी नर्स ने हाथ से मेरी साँस को पंप किया। मेरी मम्मी कुछ देर पहले ही हॉस्पिटल में आई थीं और हेलिकॉप्टर में मेरे पास आ गईं। मैं बेहोश था और खु़द साँस नहीं ले पा रहा था। उन्होंने ही उड़ान में मेरा हाथ थामे रखा
मेरी मम्मी ही मुझे हेलिकॉप्टर में ले गईं, मेरे पापा घर गए और उन्होंने मेरे भाई-बहन को यह जानकारी दी। वे जब मेरी बहन को बताने लगे, तब उनके आँसू निकल पड़े कि वे उस रात मेरी बहन की कक्षा आठ की ग्रेजुएशन सेरेमनी से वंचित रह जाएँगे। मेरे भाई-बहन को परिजन और मित्रों के यहाँ छोड़ने के बाद वे सिनसिनाटी में मेरी मम्मी के पास आ गए।
जब मैं और मेरी मम्मी हॉस्पिटल की छत पर हेलिकॉप्टर से उतरे, तो बीस डॉक्टर और नर्स दौड़ते हुए हेलिपैड पर आए और मुझे भीतर ले गए। तब तक मस्तिष्क में सूजन इतनी अधिक हो गई थी कि मैं बार-बार सदमे के बाद की स्थिति में जकड़ जाता था। मेरी अस्थियों को जोड़ना था, लेकिन सर्जरी की स्थिति नहीं थी। मुझे तीसरे दिन एक और बार जकड़न की शिकायत के चलते चिकित्सकीय परीक्षण के लिए कोमा में लाते हुए वेंटिलेटर पर रख दिया गया।
मेरे मम्मी-पापा इस हॉस्पिटल से अपरिचित नहीं थे। दस वर्ष पहले जब मेरी बहन को तीन वर्ष की आयु में ल्यूकेमिया बताया गया था, तब वे इसी इमारत के भूतल पर उसे लाए थे। तब मैं पाँच वर्ष का ही था। मेरा भाई छह माह का ही था। ढाई वर्ष के किमोथैरेपी के उपचार व मेरुदंड, बोन मैरो की बायोप्सी के बाद मेरी बहन कैंसर से मुक्त हो गई और हँसते-खेलते वहाँ से निकल आई। दस वर्ष के सामान्य जीवन के बाद मेरे मम्मी-पापा उसी जगह अपने एक और बच्चे को लेकर आ गए थे।
जब मैं कोमा में चला गया, तब हॉस्पिटल ने एक पादरी और एक सामाजिक कार्यकर्ता को मेरे मम्मी-पापा की मदद के लिए भेजा। यह वही पादरी था, जो दस वर्ष पूर्व मेरी बहन के भर्ती होने के समय आया था।
दिन ढल कर रात हो चुकी थी। मुझे कई मशीनें जीवित रख रही थीं। मेरे मम्मी-पापा हॉस्पिटल के गद्दों पर कुछ पल के लिए सो जाते थे और थकान के चलते लेट जाते थे, लेकिन चिंता के मारे फिर उठ जाते थे। मेरी मम्मी ने मुझे बाद में बताया, “यह मेरे जीवन की सबसे ख़राब रात थी।”
मेरी सेहत में सुधार होना
मुझ पर ईश्वर की कृपा हुई और अगले दिन सुबह मेरी साँस लौटी, तब डॉक्टरों ने राहत ली और मुझे कोमा से बाहर निकाल लिया। अंततः जब मुझे होश आया, तो मैंने देखा कि मेरे सूँघने की शक्ति नहीं रही है। तब एक नर्स ने परीक्षण के दौरान मुझसे कहा कि सेब के रस के बॉक्स में ज़ोर से सूँघिए। ऐसा करने से मेरी गंध लेने की शक्ति लौट आई, लेकिन तब सब चकित रह गए कि जैसे ही मैंने साँस लेकर खींची, तो मेरी आँखों के सॉकेट के फ्रेक्चर में तेज़ी से हवा पहुँचने से मेरी बाईं आँख बाहर आ गई। आँखों का गोल भाग किसी सॉकेट से फूल कर बाहर आ गया था, जिसे ख़तरनाक ढंग से पलकों और मेरे मस्तिष्क से जुड़ी ऑप्टिक तंत्रिका ने पकड़ रखा था।
तब नेत्र विशेषज्ञ ने कहा कि जैसे ही मैं धीरे से साँस छोड़ूँगा, तो आँखें वापस अपनी अवस्था में आ जाएँगी, लेकिन यह कह नहीं सकते कि इसमें कितना समय लग जाएगा। हफ़्ते के बाद मेरी शल्य-क्रिया होनी थी, जिससे मुझे ठीक होने में कुछ और समय लग जाता। मैं ऐसा लग रहा था, मानो बॉक्सिंग के मैच में ग़लत स्थान पर खड़ा हूँ। हम घर लौट आए और मेरी नाक तब भी टूटी हुई थी, चेहरे पर क़रीब आधा दर्जन अस्थियाँ टूटी थीं और बाईं आँख फूली हुई।
बाद के महीने बहुत कठिन थे। मुझे लगने लगा था कि मेरे जीवन में सब कुछ थम गया है। हफ़्तों तक मुझे सब कुछ दो दिखाई देता था। मैं सीधे नहीं देख पाता था। एक माह से अधिक समय लगा, लेकिन मेरी आँख धीरे-धीरे ठीक हो गई। मेरे देखने की समस्या को ठीक होने में आठ माह लग गए, तब मैं कार चला सका। शारीरिक उपचार में मुझसे बुनियादी एक्सरसाइज़ कराई गई, जैसे सीधी लकीर पर चलना। मैं दृढ़ था कि मेरी चोट मुझे अवसाद में न भर दे, लेकिन कुछ पल थे, जिसमें मैं निराश होता था, जबकि कुछ में उत्साह से भर जाता था।
एक वर्ष बाद जब मैं बेसबॉल के मैदान पर लौटा, तो यह जानकार मुझे पीड़ा हुई कि कितनी और मेहनत अभी मुझे करनी होगी। यह खेल मेरे जीवन का प्रमुख हिस्सा रहा था। मेरे पापा ने सेंट लुइस कार्डिनल के लिए माइनर लीग बेसबॉल खेला था। मेरा भी सपना इसे पेशेवर तरीक़े से खेलने का था। महीनों के पुनर्वास के पश्चात मेरी सबसे अधिक इच्छा मैदान पर लौटने की थी।
लेकिन बेसबॉल में मेरी वापसी आसान नहीं थी। जब सीज़न शुरू हुआ, तो मैं एकमात्र जूनियर था, जिसे यूनिवर्सिटी की बेसबॉल टीम से हटा दिया गया था। मुझे हाईस्कूल के द्वितीय वर्ष की टीम के साथ खेलने के लिए जूनियर यूनिवर्सिटी भेजा गया। मैं चार वर्ष की उम्र से खेल रहा था और एक ऐसा व्यक्ति, जिसने अपना पूरा समय और प्रयास किसी खेल में लगाया हो, उसे इस तरह से अलग करना अपमानजनक था। मुझे आज भी वह दिन अच्छी तरह याद है, जब यह हुआ था। मैं अपनी कार में बैठकर रोने लगा और रेडियो को किसी अच्छे गाने के लिए ट्यून करने लगा, जो मुझे बेहतर महसूस करा सके।
वर्षभर के आत्म संदेह के बाद मैं यूनिवर्सिटी टीम में सीनियर के रूप में शामिल हो सका, लेकिन मैं मैदान में बहुत ही कम जा सका। कुल मिलाकर हाईस्कूल यूनिवर्सिटी बेसबॉल की मैंने 11 पारियाँ खेलीं, जो मुश्किल से किसी एक गेम से थोड़ी सी ज़्यादा थीं।
हाईस्कूल में मेरे ख़राब करियर के बाद भी मैं यह विश्वास कर रहा था कि मैं एक महान खिलाड़ी बन सकता हूँ। मैं जानता था कि यदि हालात सुधारने हैं, तो इसके लिए मुझे ही कोशिश करनी होगी। चोट लगने के दो वर्ष बाद निर्णायक मोड़ तब आया, जब मैं डेनिसन यूनिवर्सिटी से जुड़े कॉलेज में जाने लगा। यह नया आरंभ था। यही वह स्थान था, जहाँ मैंने पहली बार समझा कि छोटी आदतों में कितना विस्मयकारी सामर्थ्य रहता है।
आदतों के बारे में मैंने कैसे सीखा
डेनिसन यूनिवर्सिटी जाना मेरे जीवन का सर्वोत्तम फ़ैसला था। मुझे बेसबॉल टीम में स्थान मिला, हालाँकि मैं सबसे नीचे रोस्टर में फ्रेशमैन के रूप में था, तो भी रोमांचित था। हाईस्कूल के मेरे वर्षां में उथल-पुथल के बावजूद मैं कॉलेज में एथलीट बन गया था।
बेसबॉल टीम में मेरी जल्द शुरुआत होने वाली नहीं थी, तो मैंने जीवन को व्यवस्थित करने पर ध्यान देना शुरू कर दिया। मेरे मित्र देर रात तक जगते थे और वीडियो गेम्स खेलते थे। मैंने रात को जल्द सोने की आदत बना ली। कॉलेज छात्रवास की अस्त-व्यस्त दुनिया में, मैं अपने कमरे को साफ़-सुथरा और व्यवस्थित रखता था। ये छोटे सुधार थे, लेकिन इन्होंने मुझे अपने जीवन पर नियंत्रण रखना सिखा दिया। मैं दोबारा आत्मविश्वास का अनुभव करने लगा। यह बढ़ता आत्मविश्वास मेरी क्लॉस में भी दिखा। मेरे अध्ययन की आदतें सुधर गईं और फर्स्ट ईयर में मुझे लगातार ए-ग्रेड्स मिलीं।
आदत - एक दिनचर्या या व्यवहार है, जो नियमित रूप से प्रदर्शित होती है। ज़्यादातर मामलों में यह स्वतः ही हो जाता है। जैसे-जैसे मैं हर सेमेस्टर पास करता गया, वैसे-वैसे मैं छोटी-छोटी आदतों को निरंतर जोड़ता गया। ये आदतें अंततः मुझे ऐसे परिणामों की ओर ले गईं, जो उस समय अकल्पनीय थे, जब मैंने शुरुआत की थी। उदाहारण के लिए, जीवन में पहली बार मैंने हर हफ़्ते कई दफ़ा लाइट वेट लिटिंग करने को अपनी आदत में शामिल कर लिया। बाद के वर्षों में यह सिलसिला जारी रहा। इस दौरान मेरी छह फ़ीट चार इंच की काया 170 पाउंड (77 kg) से बढ़कर 200 पाउंड (91 kg) की हो गई।
जब द्वितीय वर्ष के सत्र की शुरुआत हुई, तो मुझे एक भूमिका पिचिंग स्टाफ (बेसबॉल में) में मिल गई। जूनियर रहते हुए मैं टीम कैप्टन चुना गया और सीज़न पूरा होने पर मैं ऑल कॉन्फ्रेंस टीम के लिए चुना गया, लेकिन मेरे सीनियर सीज़न ख़त्म होने तक मेरे सोने, अध्ययन और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग की आदतों ने वास्तव में सकारात्मक परिणाम देना शुरू कर दिया था।
जब मुझे हेलिकॉप्टर में हॉस्पिटल ले जाया गया था और कोमा में रखा गया था, उस घटना के छह वर्ष बाद मुझे डेनिसन यूनिवर्सिटी में शीर्ष पुरुष एथलीट चुना गया और मेरा नाम ईएसपीएन ऐकडेमिक ऑल अमेरिका टीम में था। पूरे देश में यह सम्मान मात्र तैंतीस खिलाड़ियों को दिया गया था। जब तक मैं ग्रेजुएट हुआ, तब तक मेरा नाम स्कूल की रिकॉर्ड बुक्स में आठ श्रेणियों में दर्ज किया जा चुका था। इसी वर्ष मुझे यूनिवर्सिटी का सर्वोच्च ऐकडेमिक सम्मान, प्रेसिडेंट मेडल भी मिला।
सुनने में यदि यह आपको डींगें मारने जैसा लगता है, तो मुझे उम्मीद है कि आप मुझे माफ़ कर देंगे। सच कहूँ तो मेरे खेल करियर में ऐसा कुछ उल्लेखनीय या ऐतिहासिक नहीं था। पेशेवर खिलाड़ी के रूप में मैं खेल नहीं पाया, हालाँकि उन वर्षों को मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि मैंने कुछ ऐसा अर्जित कर लिया था, जो दुर्लभ था। मैंने अपनी क्षमता को पूर्ण रूप से विकसित कर लिया; और मैं मानता हूँ कि इस पुस्तक में जो विचार हैं, वे क्षमताओं को पूर्ण विकसित करने में आपकी मदद भी करेंगे।
हम सभी जीवन में चुनौतियों का सामना करते हैं। चोट लगना मेरे जीवन की चुनौतियों में से एक था, लेकिन उसके अनुभव ने मुझे एक अहम पाठ सिखा दिया। पहले जो बदलाव छोटे और कम महत्त्व के लगते हैं, उन्हें वर्षां करते रहने पर वे जुड़कर उल्लेखनीय परिणाम देते हैं। हम सभी नुक़सान झेलते हैं, लेकिन लंबी अवधि में हमारे जीवन की गुणवत्ता अक्सर हमारी आदतों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। उन्हीं आदतों से आप वही परिणाम प्राप्त करते हैं, लेकिन बेहतर आदतों से कुछ भी संभव है।
हो सकता है कि कुछ लोग रातों-रात आश्चर्यजनक सफलता पा लेते हों। मैं उनमें से किसी को नहीं जानता, मैं भी उनमें से नहीं हूँ। कोमा से लेकर ऐकडेमिक ऑल अमेरिकन तक मेरी यात्रा में एक ही नहीं, अनेक अहम क्षण थे। विकास बहुत धीरे-धीरे हुआ, छोटी-छोटी जीतों और छोटी-छोटी महत्त्वपूर्ण बातों का सिलसिला चला। मैंने प्रगति का एक ही मार्ग अपनाया और वह था छोटे से शुरू करना। कुछ वर्ष बाद जब मैंने अपना स्वयं का कारोबार शुरू किया; तब व इसके बाद और इस पुस्तक के लेखन में भी मैंने यही रणनीति अपनाई।
कैसे और क्यों मैंने यह पुस्तक लिखी
मैंने अपने आलेख नवंबर 2012 में jamesclear.com पर लिखना आरंभ किए। कई वर्षों तक मैंने अपने व्यक्तिगत प्रयोग के नोट्स बनाकर रखने की आदत बनाए रखी थी और अब अंततः मैं उन्हें सार्वजनिक रूप से साझा करने को तैयार था। हर सोमवार और गुरुवार को मैं नया आलेख लिखता था। कुछ ही महीनों में लिखने की यह आसान आदत मुझे मेरे पहले एक हज़ार ईमेल सब्सक्राइबर्स दे गई और 2013 के अंत तक यह संख्या तीस हज़ार से ज़्यादा हो चुकी थी।
मेरी ईमेल लिस्ट 2014 में एक लाख सब्सक्राइबर्स से ज़्यादा की हो गई। इंटरनेट पर यह सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले न्यूज़लेटरों की सूची में शुमार हो गया। दो वर्ष पूर्व जब मैंने लिखना शुरू किया था, तब मुझे पाखंडी जैसा अनुभव हो रहा था, लेकिन अब मैं आदतों का विशेषज्ञ बनता जा रहा था। यह एक नया तमगा था, जो मुझे उत्साहित कर रहा था, लेकिन साथ ही मैं असहज भी अनुभव कर रहा था। मैंने कभी ख़ुद को इस विषय का महारथी नहीं माना, बल्कि ऐसा व्यक्ति माना, जो अपने पाठकों के साथ-साथ ही प्रयोग कर रहा है।
मेरे सब्सक्राइबर जब 2015 में दो लाख तक पहुँच गए, तो मैंने पेंगुइन रेंडम हाउस से उस पुस्तक को लिखने का करार किया, जो आप पढ़ रहे हैं। जैसे ही मेरे पाठक बढ़ गए, वैसे ही मेरे कारोबार के अवसर भी बढ़ गए। मुझे शीर्ष कंपनियों में आदत बनने के विज्ञान, व्यवहार में बदलाव और सतत सुधार के बारे में बोलने के लिए ख़ूब बुलाया जाने लगा। अमेरिका और यूरोप में कई सम्मेलनों में मैंने मुख्य वक्ता के तौर पर भाषण दिए।
2016 से मेरे आलेख बड़े प्रकाशनों जैसे टाइम, आन्ट्रप्रनर और फ़ोर्ब्स में नियमित रूप से आने लगे। आश्चर्यजनक रूप से उस वर्ष मेरे लेख 80 लाख लोगों ने पढ़े। मेरे कार्यों के बारे में एनएफ़एल, एनबीए और एमएलबी की टीमों के कोच पढ़ने लगे और अपनी-अपनी टीमों के साथ इसे बाँटने लगे।
2017 के प्रारंभ में मैंने हैबिट्स एकेडेमी को शुरू किया। यह उन संगठनों और लोगों के लिए प्रशिक्षण का प्रमुख मंच बन गई, जो बेहतर आदतें बनाने में रुचि रखते थे।1 फ़ॉर्चून 500 कंपनियाँ और तेज़ी से बढ़ रहे स्टार्ट-अप्स ने अपने अधिकारियों और स्टाफ को ट्रेनिंग के लिए यहाँ भेजना शुरू किया। कुल दस हज़ार लीडरों, मैनेजरों, कोचों और शिक्षकों ने हैबिट्स एकेडेमी से ग्रेजुएशन किया। उनके साथ मेरे कार्य अनुभवों ने भी मुझे अविश्वसनीय रूप से यह सिखा दिया कि वास्तविक दुनिया में आदतें काम करें, इसके लिए किन-किन बातों की ज़रूरत होती है।
जब यह पुस्तक 2018 में ख़त्म होने को आई, तो jamesclear.com पर हर माह लाखों की तादाद में विज़िटर्स आ रहे थे और लगभग पाँच सौ हज़ार मेरे साप्ताहिक ईमेल न्यूज़लैटर को सब्सक्राइब कर चुके थे। यह संख्या मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा थी। जब मैंने यह शुरू किया था, तो मुझे पता भी नहीं था कि ऐसा संभव है।

यह पुस्तक आपको कैसे फ़ायदा देगी

उद्यमी और निवेशक नवल रविकांत ने कहा है, “कोई महान पुस्तक लिखने से पहले आपको ख़ुद पुस्तक बनना पड़ता है।” मैंने उन विचारों को जाना, जिनका उल्लेख इसमें किया गया है, चोट से बाहर निकलने के लिए मुझे छोटी आदतों पर आश्रित होना पड़ा, ताकि जिम में मज़बूत हो सकूँ, मैं मैदान में अच्छे स्तर का प्रदर्शन कर सकूँ, लेखन कार्य कर सकूँ, एक सफल कारोबार चलाऊँ और सहजता से एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित हो सकूँ। छोटी आदतों ने मेरी क्षमताओं को उकेरा, और चूँकि आपने यह पुस्तक हाथ में ली है, इसलिए मेरा अनुमान है कि आप भी अपने भीतर निहित क्षमताओं को पूर्ण रूप से विकसित करना चाहेंगे।
बाद के पेजों में मैं हर पायदान पर आपको बेहतर आदतें बनाने की योजना बताऊँगा। कुछ दिन या हफ़्तों के लिए नहीं, बल्कि जीवनभर के लिए। विज्ञान यद्यपि उन सब बातों को सही मानता है, जो मैंने लिखी है, लेकिन फिर भी यह मात्र अकादमिक शोध-पत्र नहीं है। यह काम में लागू होने वाला उपयोगी लेखन है। आदतों को कैसे बनाना है और कैसे बदलना है, उसके बारे में आपको व्यावहारिक सलाह दी गई है। मैंने इसके पीछे का विज्ञान भी इस तरीक़े से समझाया है, जिसे समझना और अपनाना आसान है।
मैंने जिन क्षेत्रों का वर्णन किया है, वे हैं बायोलॉजी, न्यूरोसाइंस, फिलासॉफी, सायकोलॉजी और कई अन्य। ये क्षेत्र कई वर्षों से हमसे क़रीब से जुड़े हैं। मैंने आपको उन उत्कृष्ट लोगों के विचारों का संकलन दिया है, जो लंबे समय से इन पर काम कर रहे हैं, साथ ही वैज्ञानिकों द्वारा हाल ही की गई नई खोजों को भी बताया है। मैं आशा करता हूँ कि मेरा योगदान ऐसे विचारों का पता लगाना है, जो सबसे ज़्यादा महत्त्व के हों और उनसे इस तरीक़े से जुड़ा जा सके, जो अत्यंत ही सरल हों। इन पन्नों में आपको जो भी अच्छा लगे, तो उसका श्रेय आप उन विशेषज्ञों को दे सकते हैं, जिन्होंने मुझसे पहले काम किया है। कोई मूर्खतापूर्ण बात लगे, तो यह मेरी ओर से की गई ग़लती मानिए।
इस पुस्तक की रीढ़ चार क़दमों की आदतें हैं - संकेत, ललक, प्रतिसाद और पुरस्कार। वही व्यवहार में परिवर्तन के चार नियम भी हैं, जो इन चार क़दमों से निकलते हैं। सायकोलॉजी की पृष्ठभूमि वाले पाठक, इन शब्दावलियों को ऑपरेंट कंडीशनिंग (सीखने की प्रक्रिया) से जान सकते हैं, जिसे सबसे पहले 1930 के दशक में बी. एफ. स्किनर ने उद्दीपन, प्रतिसाद और पुरस्कार के तौर पर प्रतिपादित किया था। संकेत, रूटीन और पुरस्कार के रूप में ये चार्ल्स डुहिग की हाल ही में लिखी पुस्तक द पावर ऑफ हैबिट से चर्चित हुए।
व्यवहार के मनोविज्ञान को स्किनर जैसे वैज्ञानिकों ने समझ लिया था कि यदि आप सही तरह से पुरस्कार और दंड देते हैं, तो आप लोगों से किसी ख़ास शैली में काम करा सकते हैं, लेकिन स्किनर के मॉडल ने यह बेहतर तरह से समझाया कि बाहरी उकसावे किस तरह से आदतों को प्रभावित करते हैं, हालाँकि इसमें यह अच्छा विवरण नहीं था कि किस तरह से हमारे विचार, आभास और मान्यताएँ हमारे व्यवहार को प्रभावित करती हैं। भीतर की अवस्थाएँ जैसे हमारा मूड और भावनाएँ अहम हैं। हाल के दशकों में वैज्ञानिकों ने हमारे विचार, आभास और व्यवहार के बीच संबंध को तय करना आरंभ किया है। यह शोध भी इन पेजों में शामिल कर लिया जाएगा।
मैं जो ढाँचा कुल मिलाकर पेश कर रहा हूँ, वह संज्ञानात्मक और व्यवहारवादी मनोविज्ञान का एकीकृत मॉडल है। मैं मानता हूँ कि यह मानवीय व्यवहार के पहले मॉडलों में से एक है, जो सटीक तरीक़े से बाहरी उक़सावे और आंतरिक भावनाओं की हमारी आदतों पर पड़ने वाले प्रभाव को बताता है। जर्हां कुछ भाषा आप समझते होंगे, वहीं मुझे विश्वास है कि आपको व्यवहार परिवर्तन के चार नियमों का वर्णन और उनके अनुप्रयोगों से आदतों के बारे में सोचने का नया मार्ग मिलेगा।
मानवीय व्यवहार हमेशा बदलता रहता है; हर परिस्थिति में, हर पल में, लेकिन यह पुस्तक उस बारे में है, जो बदलता नहीं है। यह मानव व्यवहार के मूल सिद्धांतों के बारे में है। ये ऐसे सिद्धांत हैं, जिन पर आप वर्षों चल सकते हैं। इन विचारों से आप कारोबार, परिवार और जीवन खड़ा कर सकते हैं।
बेहतर आदतें बनाने का कोई एक मार्ग नहीं है, लेकिन यह पुस्तक आपको वह सर्वश्रेष्ठ उपाय बता रही है, जो मैं जानता र्हूं - एक ऐसा दृष्टिकोण जो प्रभावी रहेगा, जिससे यह फ़र्क़ नहीं पड़ेगा कि आप कहाँ से शुरू करना है या आप क्या बदलना चाहते हैं। मैंने जो तरीक़े अपनाए, वे सभी के लिए प्रासंगिक हैं, जो हर पायदान पर सुधार चाहते हैं, फिर भले ही उनके लक्ष्य सेहत, पैसा, उत्पादकता, संबंधों या इन सभी पर केंद्रित हों। जब तक मानव व्यवहार का प्रश्न है, तब तक यह पुस्तक आपका मार्गदर्शन करेगी।
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1 इच्छुक पाठक ज़्यादा जानकारी के लिए habitsacademy.com पर जा सकते हैं।
मूल सिद्धांत
क्यों छोटे बदलाव बड़ा असर दिखाते हैं
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छोटी-छोटी आदतों की चमत्कारिक ताक़त
ब्रिटिश साइकलिंग की क़िस्मत 2003 में एक दिन बदल गई। ग्रेट ब्रिटेन में प्रोफ़ेशनल साइकलिंग को संचालित करने वाली इस संस्था ने हाल ही में नया परफॉर्मेंस डायरेक्टर डेव ब्रेल्सफोर्ड को रख लिया था। यह वह समय था, जब ग्रेट ब्रिटेन में प्रोफ़ेशनल साइकलिस्ट क़रीब सौ वर्षों से साधारण दर्जे को झेल रहे थे। ब्रिटिश साइकलिस्ट्स ने 1908 से लेकर अब तक सिर्फ़ एक बार ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीता था, जबकि साइकलिंग की सबसे बड़ी स्पर्धा टूर डी फ्रांस में बहुत ही ख़राब प्रदर्शन किए थे। 110 वर्ष में किसी भी ब्रिटिश साइकलिस्ट ने टूर डी फ्रांस में जीत हासिल नहीं की थी।
वास्तव में ब्रिटिश साइकलिस्ट्स का प्रदर्शन इतना निराशाजनक रहा था कि यूरोप के शीर्ष साइकल निर्माताओं में से एक ने तो टीम को साइकल बेचने तक से मना कर दिया था, क्योंकि उन्हें डर था कि यदि अन्य प्रोफ़ेशनल्स देखेंगे कि ब्रिटिश साइकल खिलाड़ी उनके गियर को प्रयोग में लेते हैं, तो उनकी बिक्री घट सकती है।
ब्रेल्सफोर्ड को ब्रिटिश साइकलिंग को नए मार्ग पर लाने के लिए रखा गया था। एक रणनीति के प्रति उनकी कड़ी प्रतिबद्धता उन्हें पूर्व के कोचों से अलग करती थी। वे इस रणनीति को ‘छोटी-छोटी जीत या फ़ायदे का संग्रह’ कहते थे। यह दर्शन इस बात पर आधारित है कि आप जो कुछ भी करें, उस हर बात में मामूली सुधार की तलाश करते रहें। ब्रेल्सफोर्ड कहते थे, “पूरा सिद्धांत इस बात पर आधारित है कि यदि साइकल चलाने के लिए जो भी प्रयास किया जा रहा है, उसे टुकड़ों में बाँटकर आप देखेंगे और फिर उनमें एक फ़ीसदी सुधार भी करेंगे, तो आप जब समग्र रूप से इसे अमल में लाएँगे, तो बहुत ज़्यादा बदलाव कर चुके होंगे।”
ब्रेल्सफोर्ड और उनके कोचों ने मामूली बदलावों से शुरुआत की, जिसकी एक प्रोफ़ेशनल साइकलिंग टीम से आशा की जाती है। उन्होंने साइकल की सीट को फिर से डिज़ाइन कराया, ताकि यह अधिक सुविधाजनक हो सके एवं टायरों पर अल्कोहल रगड़ दिया, ताकि वे अच्छी पकड़ से चल सकें। उन्होंने साइकल चालकों से इलेक्ट्रिकली हीटेड पेंट्स पहनने को कहा, ताकि मांसपेशियों का तापमान आदर्श रहे, साथ ही बायोफीडबैक सेंसर के प्रयोग से यह र्जांचा कि प्रत्येक एथलीट एक ख़ास वर्कआउट के दौरान किस स्थिति में रहता है। टीम ने विंड टनल (एक विशेष सुरंग, जिसमें लगातार हवा चलती है। इसमें कई वाहनों का भी परीक्षण होता है) में विभिन्न कपड़े पहनकर परीक्षण किया और आउटडोर में साइकल चलाने के लिए प्रयुक्त सूट्स की बजाय इंडोर रेसिंग सूट्स का प्रयोग किया, जो हल्के और ज़्यादा एयरोडायनामिक साबित हुए।
लेकिन वे इतने पर ही नहीं रुके। ब्रेल्सफोर्ड और उनकी टीम ने अनदेखे और अनपेक्षित क्षेत्रों में भी एक फ़ीसदी का सुधार करने का प्रयास जारी रखा। उन्होंने कई तरह के मसाज़ लोशन का प्रयोग करके देखा कि कौनसा तेज़ी से मसल्स को ठीक करता है। इसके लिए उन्होंने एक सर्जन रखा, जिसने साइकल चालकों को हाथ धोने का सबसे बढ़िया तरीक़ा सिखाया, ताकि वे ठंड की चपेट में आने से बच जाएँ। उन्होंने यह भी बताया कि हर साइकल खिलाड़ी को रात में सोने के लिए किस तरह का तकिया और गद्दा लेना चाहिए। यहाँ तक कि उन्होंने टीम का ट्रक भी भीतर से सफ़ेद रंग से पेंट करा लिया, ताकि धूल के मामूली कणों को भी देखा जा सके, जो पहले नज़र नहीं आते थे, जबकि उसके कारण अच्छे से तैयार की हुई साइकल की गति भी ख़राब हो सकती थी।
इस तरह के सैकड़ों अन्य छोटे-छोटे सुधार किए गए, तो परिणाम इतनी तेज़ी से आए कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।
ब्रेल्सफोर्ड के पद र्संभालने के पाँच साल बाद ही ब्रिटिश साइकलिंग टीम का 2008 के बीजिंग ओलिंपिक में दबदबा रहा, जिसमें उसने सड़क और ट्रैक साइकलिंग स्पर्धाओं में 60 फ़ीसदी स्वर्ण पदक जीते। चार वर्ष बाद जब ओलिंपिक का आयोजन लंदन में किया गया, तो ब्रिटिश साइकल खिलाड़ियों ने नौ ओलिंपिक रिकॉर्ड्स और सात विश्व रिकॉर्ड्स क़ायम किए।
उसी वर्ष ब्रेडली विगिंस पहले ब्रिटिश साइकलिस्ट बने, जिन्होंने टूर डी फ्रांस में जीत दर्ज की। अगले वर्ष उनकी ही टीम के अन्य साथी क्रिस फ्रूम ने यह रेस जीती और 2015, 2016 और 2017 में भी वे ही जीते। छह वर्ष में ब्रिटिश साइकलिस्ट्स ने र्पांच मर्तबा टूर डी फ्रांस में जीत दर्ज की।
ब्रिटेन के साइकलिस्ट्स दस वर्ष की अवधि 2007 से 2017 के बीच 178 विश्व चैम्पियनशिप और 66 ओलिंपिक अथवा पैरालिंपिक स्वर्ण पदक जीत चुके थे, साथ ही उन्होंने पाँच बार टूर डी फ्रांस में जीत हासिल की थी, जो साइकलिंग के इतिहास में सबसे ज़्यादा सफल दौर माना जाता है।2
यह होता कैसे है? कैसे सामान्य एथलीट्स की एक टीम ऐसे मामूली बदलावों से विश्व चैम्पियन बनकर खड़ी हो जाती है, जो पहली बार देखने पर इतने मामूली लगते हैं कि उनसे बहुत से बहुत थोड़ा सा अंतर पड़ सकता है? क्यों छोटे-छोटे सुधार एकत्र होकर इतने उल्लेखनीय नतीजे दे सकते हैं और किस प्रकार से आप यह नज़रिया अपने जीवन में लागू कर सकते हैं?
क्यों छोटी आदतें बड़ा बदलाव करती हैं
दैनिक जीवन में किसी निर्णायक क्षण के महत्त्व का आकलन बढ़ा-चढ़ाकर करना और छोटे-छोटे सुधारों को कम समझना बहुत ही आसान है। हम यही मानते हैं कि बड़ी सफलता में ज़्यादा प्रयास ज़रूरी हैं। भले ही वह वज़न घटाने का मामला हो, कारोबार बढ़ाना हो, पुस्तक लिखना हो, चैम्पियनशिप जीतना हो या किसी मक़सद को प्राप्त करना हो। हम अपने आप पर इतना दबाव डालते हैं, ताकि किसी तरह से कुछ ऐसा बदलाव हो सके कि हर कोई इस बारे में बात करे।
इन सबके बीच एक फ़ीसदी सुधार विशेष रूप से कोई मायने नहीं रखता, कभी-कभी तो इस पर कोई ध्यान तक नहीं देता, लेकिन यह लंबे समय के लिए बहुत अर्थपूर्ण हो सकता है। छोटा सुधार लंबे समय में असाधारण अंतर दिखा सकता है। इसका गणित इस प्रकार से काम करता है - यदि आप प्रतिदिन एक फ़ीसदी भी पहले से बेहतर होते हैं, तो पूरे एक वर्ष में 37 गुना बेहतर बन सकते हैं। इसके विपरीत यदि आप एक वर्ष तक हर दिन एक फ़ीसदी बदतर होते जाते हैं, तो आप शून्य के क़रीब हो जाएँगे। भले ही छोटी जीत से शुरुआत हो या छोटी हार से, यह एकत्र होकर कई गुना हो जाती है।
आदतें आत्मसुधार का चक्रवृद्धि ब्याज होती हैं। जिस प्रकार से धन चक्रवृद्धि ब्याज में कई गुना बढ़ता है, उसी प्रकार से आपकी आदतों का प्रभाव बार-बार करने पर बढ़ता जाता है। भले ही वे किसी दिन मामूली बदलाव के रूप में दिखती हों, लेकिन कई महीनों और वर्षों में इनका प्रभाव ज़बरदस्त हो सकता है। जब आप दो, पाँच या कदाचित दस वर्ष बाद पीछे की ओर देखते हैं तो आपको स्पष्ट दिखता है कि अच्छी आदतों के मूल्य क्या हैं और बुरी आदतों के लिए क्या क़ीमत चुकानी होती है।
हर दिन एक फ़ीसदी बेहतर होना
एक वर्ष में प्रतिदिन 1 फ़ीसदी ख़राब होना। 0.99365 = 00.03
एक वर्ष में प्रतिदिन 1 फ़ीसदी बेहतर होना। 1.01365 = 37.78
 
चित्र 1: छोटी आदतों के प्रभाव लंबे समय में दिखते हैं। उदाहरण के लिए यदि आप प्रतिदिन एक फ़ीसदी बेहतर होते हैं, तो एक वर्ष बाद आप 37 गुना बेहतर हो सकेंगे।
जीवन में प्रतिदिन इस अवधारणा को महसूस करना कठिन होता है। हम अक्सर छोटे बदलावों को इसलिए नकार देते हैं, क्योंकि वे उस पल इतने उल्लेखनीय नहीं दिखाई देते। यदि आप आज थोड़ा भी पैसा बचाते हैं, तो आप करोड़पति नहीं हो जाते हैं। यदि तीन दिन जिम जाएँगे, तो भी आप बैडोल ही रहेंगे। यदि आप हर रात एक घंटा मेंडारिन पढ़ते हैं, तो आप भाषा नहीं सीख पाते हैं। हम कुछ बदलाव करते हैं, लेकिन नतीजे तेज़ी से नहीं दिखते और फिर हम पुराने ढर्रे पर ही लौट आते हैं।
दुर्भाग्य से बदलाव की धीमी गति भी हमें बुरी आदतों की ओर प्रवृत्त करती है। यदि आज आपने सेहत को लाभ न पहुँचाने वाला भोजन खाया है, तो इससे ज़्यादा फ़र्क़ नहीं होगा। यदि आप देर रात तक काम करते हैं और अपने परिवार की उपेक्षा करते हैं, तो वे आपको माफ़ कर देंगे। यदि आप एक दिन अपना प्रोजेक्ट टालते हैं, तो उसे पूरा करने के लिए बाद में एक दिन अधिक लगेगा। एक फ़ैसले को आसानी से ख़ारिज किया जा सकता है
लेकिन जब आप ख़राब फ़ैसलों से एक फ़ीसदी ग़लती हर दिन करते हैं, और छोटी ग़लतियाँ दोहराते चले जाते हैं साथ ही छोटे-छोटे बहानों को सही ठहराते हैं, तो हमारा यही चयन अंत में बढ़कर ख़राब नतीजा दे सकता है। यह कई ग़लतियों का संचय होता है - एक फ़ीसदी गिरावट के कारण ही बाद में समस्या होती है।
अपनी आदतों में बदलाव से जो प्रभाव होता है, वह किसी विमान को अपने मार्ग से कुछ ही डिग्री बदलने के समान होता है। सोचिए कि आप लॉस एंजेलिस से न्यू-यॉर्क जा रहे हैं। यदि पायलट एलएएक्स (लॉस एंजेलिस अंतरराष्ट्रीय विमानतल) से चलते हुए ही 3.5 डिग्री दक्षिण की ओर मुड़ जाता है, तो न्यू-यॉर्क की बजाय आप वॉशिंगटन डीसी में उतरेंगे। उड़ान भरते समय इतने मामूली बदलाव की ओर शायद ध्यान न जाता होता हो। भले ही विमान का अगला भाग कुछ फीट ही मुड़ा हो, लेकिन यह अंततः अमेरिका में ही आपको सैकड़ों मील दूर उतारेगा।3
इसी प्रकार से दैनिक जीवन की आदतों में मामूली बदलाव आपके जीवन को किसी और दिशा में ले जाता है। एक फ़ीसदी बेहतर या एक फ़ीसदी बदतर उस पल भले ही उल्लेखनीय न लगे, लेकिन कालांतर में यह भारी बदलाव दिखा सकता है कि आप क्या हैं और आप क्या हो सकते थे। सफलता प्रतिदिन की आदतों का उत्पाद है; जीवन में केवल एक बार बदलाव का नहीं।
इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि आप अभी कितने सफल या असफल हैं, लेकिन फ़र्क़ इससे पड़ता है कि आपकी आदतें आपको सफलता के मार्ग पर डाल रही हैं या नहीं। आपको अपने वर्तमान नतीजों की बजाय अपने वर्तमान मार्ग पर अधिक ध्यान देना चाहिए। यदि आप करोड़पति हैं और आप हर महीने जो कमा रहे हैं, उससे अधिक ख़र्च कर रहे हैं, तो आपका रास्ता ठीक नहीं है। यदि आपके ख़र्च करने की आदतें बदलती नहीं हैं, तो अंत अच्छा नहीं रहेगा। इसके विपरीत आप हर महीने कुछ न कुछ बचा रहे हैं, तो आप वित्तीय रूप से स्वतंत्र या स्वायत्त होने के मार्ग पर आगे बढ़ रहे होते हैं- भले ही आप जितना चाहते हैं, उससे धीमी गति से चल रहे हों।
आपके परिणाम आपकी आदतों का ही संकलन होते हैं। आपकी वित्तीय आदतों का परिणाम आपकी नेटवर्थ है। खाने की आदतें ही आपके वज़न का निर्धारण करती हैं। आपके सीखने की आदतों का परिणाम ही आपका ज्ञान है। आपकी सफ़ाई की आदतों का नतीजा अलग दिखता है। आप जो दोहराते हैं, वह आपको प्राप्त होता है।
यदि आप अपनी भविष्यवाणी करना चाहते हैं कि आप जीवन में कहाँ पहुँचेंगे, तो आपको छोटे फ़ायदों और छोटे नुक़सानों दोनों का एक वक्र बनाना होगा, तो आप देखेंगे कि किस तरह से आपके दैनिक जीवन की पसंद-नापसंद दस या बीस वर्ष में आपको क्या परिणाम देगी। क्या आप हर माह की कमाई से कम ख़र्च कर रहे हैं? क्या आप हर हफ़्ते जिम जा रहे हैं? क्या आप पुस्तकें पढ़कर हर दिन कुछ नया सीख रहे हैं? इस तरह के छोटे-छोटे संघर्ष आपका भविष्य अपने आप बता देंगे।
सफलता और असफलता के अंतर को समय बहुत बढ़ा देता है। आप जीवन को जो भी दे रहे हैं, वह गुणित होकर सामने आएगा। अच्छी आदतें समय को आपका दोस्त बना देंगी। ख़राब आदतें समय को शत्रु बना देंगी।
आदतें दुधारी तलवार हैं। बुरी आदतें आसानी से आपको ख़त्म कर सकती हैं, जिस तरह से अच्छी आदतें आपको बेहतर बना सकती हैं। इसलिए इसे समझना बहुत महत्त्वपूर्ण है। आपका जानना आवश्यक है कि किस प्रकार से आदतें काम करती हैं और अपनी पसंद के अनुसार कैसे इन्हें बनाया जाए, ताकि आप इस दोधारी तलवार की एक धार से बच सकें।
प्रगति वास्तव में होती कैसी है?
सोचिए कि आपके सामने टेबल पर बर्फ़ का क्यूब रखा है। कमरे में इतनी ठंडक है कि आप अपनी साँस को देख सकते हैं। यह तापमान पच्चीस डिग्री है। कमरा धीरे-धीरे गरम होने लगता है…
छब्बीस डिग्री।
सत्ताइस डिग्री।
अट्ठाइस डिग्री।
आपके सामने रखी टेबल पर बर्फ़ का क्यूब अभी भी है।
उनतीस डिग्री।
तीस।
इक्कत्तीस।
अब तक, कुछ नहीं हुआ।
फिर बत्तीस डिग्री। बर्फ़ पिघलने लगती है। इससे पहले एक-एक डिग्री बढ़ने से इतना अंतर नहीं पड़ा था, लेकिन इस एक डिग्री ने बड़ा परिवर्तन कर दिया।
आपकी आदतें आपके लिए संयोजित हो सकती हैं या फिर विरोध में खड़ी हो सकती हैं
सकारात्मक संयोजन
नकारात्मक संयोजन
उत्पादकता वाले अवयव
किसी एक दिन में एक अतिरिक्त कार्य पूरा करना एक छोटा सा करतब हो सकता है, लेकिन पूरे करियर के लिए यह बहुत मायने रखेगा। पुराने काम को स्वतः कर पाने के प्रभाव या किसी नए कौशल में निपुण होना भी उल्लेखनीय होता है। बिना सोचे आप जितने भी काम र्संभालते हैं, आपका मस्तिष्क दूसरे क्षेत्रों में ध्यान केंद्रित करने को तैयार हो जाता है।
तनाव के अवयव
ट्रैफ़िक जाम की कुंठा। पालन-पोषण के दायित्व का भार। दो वक़्त की ज़रूरतों को पूरा करने की चिंता। थोड़ा अधिक ब्लड प्रेशर का तनाव। तनाव के ये कारण हैं, जो ख़ुद ही सँभल सकते हैं, लेकिन जब ये कई वर्षों तक बने रहते हैं, तो सेहत के लिए गंभीर हो सकते हैं।
ज्ञान के अवयव
कोई एक बात सीख लेने से आप विद्वान नहीं बन जाते हैं, लेकिन जीवन भर सीखने की प्रवृत्ति से आपमें बदलाव आ जाता है। हर पुस्तक जो पढ़ रहे हैं, वह आपको कुछ नया ही नहीं सिखाती है, बल्कि पुराने ढर्रे पर सोचने के तरीक़ों में भी बदलाव लाती है। जैसा कि वॉरेन बफे कहते हैं, “ज्ञान इसी तरह से कार्य करता है। यह चक्रवृद्धि ब्याज के समान बढ़ता जाता है।”
नकारात्मक विचारों के अवयव
जितना अधिक आप यह सोचते हैं कि आप किसी काम के नहीं हैं, मूर्ख हैं या सुंदर नहीं हैं, उतना अधिक आप जीवन को उसी रूप में देखने लगते हैं। इस तरह से आप विचारों में अवरुद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार से जब आप दूसरों के बारे में सोचते हैं, तब भी यही होता है। एक बार जब आप लोगों को क्रोधी, अन्यायी या स्वार्थी के रूप में देखने लगते हैं तो इसी तरह के लोग हर स्थान पर दिखने लगेंगे।
संबंधों के अवयव
लोग आपके ही व्यवहार का पलटकर जवाब देते हैं। जितना आप दूसरों की मदद करेंगे, अन्य लोग उतनी अधिक आपकी मदद करना चाहेंगे। थोड़ा अच्छा बनकर बात करने से उसके नतीजे आपको दिखने लगते हैं और मज़बूत संबंध बन जाते हैं।
क्रोध के अवयव
बहुत कम ऐसा होता है कि दंगे, विरोध, आंदोलन किसी एक घटना का नतीजा हों। जब तक छोटे-छोटे आक्रोश, हर दिन का बिगाड़ धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, फिर एक घटना घट जाती है और आक्रोश जंगल की आग के जैसा फैल जाता है।
सफलता के पल अक्सर पूर्व के कामों के परिणाम ही होते हैं, जो बड़े बदलाव के लिए संभावनाएँ तैयार करते हैं। यह स्थिति हर जगह देखने को मिल जाएगी। कैंसर अपने जीवन का 80 फ़ीसदी भाग तो पता चले बिना ही बिताता है, लेकिन फिर कुछ ही माह में शरीर को ख़त्म कर देता है। बाँस पहले पाँच वर्षों में बढ़ा हुआ नहीं दिखता है, क्योंकि वह ज़मीन के भीतर जड़ें जमाता रहता है और अगले छह हफ़्ते में नब्बे फ़ीट तक बढ़ जाता है।
इसी प्रकार से आदतें भी तब तक कोई फ़र्क़ नहीं डालती हैं, जब तक कि आप एक अहम सीमा को पार नहीं कर जाते और नए स्तर नहीं पा लेते। किसी अनुसंधान या तलाश के आरंभ और मध्य में अक्सर निराशा की खाई होती है। आप सीधी रेखा में प्रगति की आशा करते हैं और पहले दिन, एक हफ़्ते और यहाँ तक कि कई माह तक जब बदलाव अप्रभावी दिखते हैं, तो आप कुंठित हो सकते हैं। ऐसा नहीं लगता है कि आप कहीं जा रहे हैं। यह किसी भी संयोजन प्रक्रिया का प्रमाण होता है; सर्वाधिक शक्तिशाली परिणामों में विलंब होता है।
यह मूल कारणों में से एक है कि क्यों स्थायी आदतें बनाना इतना मुश्किल होता है। लोग कुछ छोटे बदलाव करते हैं और उन्हें ठोस नतीजा नहीं मिलता है, तो वे इसे रोक देने का फ़ैसला करते हैं। आप सोचते हैं “मैं कई महीने तक हर दिन दौड़ा, तो मैंने अपने शरीर में बदलाव क्यों नहीं देखा?” जब इस तरह के विचार हावी होते हैं, तो अच्छी आदतों को दरकिनार करने का बहाना मिल जाता है, लेकिन अर्थपूर्ण बदलाव के लिए आदतों को लंबे समय तक बनाए रखना होता है, ताकि आप इस पठार को पार कर सकें। इसे मैं अंतर्निहित संभावनाओं का पठार कहता हूँ।
यदि आप देखते हैं कि आप अच्छी आदतों को बनाने और बुरी आदतों को ख़त्म करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप सुधरने की क्षमता खो चुके हैं। अक्सर यह इस कारण से होता है कि आप अब तक अंतर्निहित संभावनाओं का पठार पार नहीं कर पाए हैं। कड़े परिश्रम के बाद भी सफलता हासिल न करने की शिक़ायत करना कमरे को पच्चीस से इक़्तीस डिग्री तक गरम करने के बाद भी बर्फ़ का क्यूब न पिघलने की शिक़ायत करने जैसा ही है। आपका किया हुआ कर्म नष्ट या व्यर्थ नहीं गया है, बल्कि वह जमा होते जा रहा है। जो भी घटता है, वह बत्तीस डिग्री पर होता है।
जब आप अंततः अंतर्निहित संभावनाओं के पठार को पार कर लेते हैं, तो लोग इसे रातों-रात अर्जित की गई सफलता कहते हैं। बाहर की दुनिया केवल वह नाटकीय घटना देखती है, जब आप सफलता प्राप्त करते हैं, वह प्रक्रियाएँ नहीं देखती, जिनसे आप निकले हैं, लेकिन आप जानते हैं कि आपका वह काम ही है, जो आप लंबे समय से कर रहे थे, जिसके कारण आज आप उछाल ले सके हैं, जबकि कभी ऐसा लगता था कि आप किसी तरह की प्रगति नहीं कर रहे हैं।
मानव भूगर्भीय दबाव के समान ही होता है। दो टेक्टोनिक प्लेट्स एक-दूसरे के विपरीत रहकर लाखों वर्षों तक एक-दूसरे को रगड़ती रहती हैं, तनाव धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, फिर एक दिन वे उसी तरह से एक-दूसरे को रगड़ती हैं, जैसे वर्षों से चल रहा था, लेकिन इस बार तनाव बहुत अधिक हो जाता है। भूकंप आ जाता है। एकदम कुछ होने के पहले बदलाव लगातार होता रहता है।
महारत हासिल करने में धैर्य लगता है। एनबीए के इतिहास की सबसे सफल टीम सेंट एंटोनियो स्पर्स ने समाज सुधारक जैकब रीज़ का एक कथन अपने लॉकर रूम में लटका रखा है : “जब मुझे कोई भी मदद करता हुआ नहीं दिखता है, तो मैं पत्थर तोड़ने वालों की ओर देखता हूँ, जो चट्टान पर हथौड़ा चलाते हैं, क़रीब सैकड़ों बार वे चलाते होंगे, तो भी उसमें दरार नहीं आती है। सौ के बाद पहले ही हथौड़े में यह दो टुकड़ों में र्बंट जाती है और मैं जानता हूँ कि यह अंतिम हथौड़ा नहीं होता है, जिसने इसे तोड़ा, बल्कि पहले भी जो चले हैं, उनका भी असर होता है।” सभी बड़ी चीज़ें छोटी शुरुआतों से प्राप्त हो पाती हैं। हर आदत का बीज अकेला, छोटा सा निर्णय रहता है, लेकिन जैसे ही वह फ़ैसला बार-बार आदत के रूप में उभरने लगता है, तो वह मज़बूत होने लगता है। वह जड़ें जमाता है और शाखाएँ निकलने लगती हैं। बुरी आदतों को ख़त्म करना ठीक अपने भीतर बलूत का एक तगड़ा वृक्ष उखाड़ने के समान है। अच्छी आदतों को बनाना ठीक हर दिन एक कोमल सुंदर फूल को उपजाने के समान है।
अंतर्निहित संभावनाओं का पठार
 
चित्र 2 : हम अक्सर सोचते हैं कि प्रगति एक सीधी रेखा में होती जाएगी। हम यह उम्मीद बहुत कम करते हैं कि यह जल्द मिलेगी। वास्तव में हमारे प्रयासों के नतीजे अक्सर देर से ही मिलते हैं। कई माह या वर्षों के बाद हमारे द्वारा पहले किए गए काम का हम वास्तविक मूल्य समझ पाते हैं। यह ‘निराशा की घाटी’ बना देता है, जहाँ लोग हफ़्तों और महीनों मेहनत करने के बाद भी बिना किसी परिणाम के हतोत्साहित महसूस करते हैं, हालाँकि यह काम व्यर्थ नहीं जाता है। यह जमा होने लगता है। हमारे पिछले प्रयासों का पूर्ण मूल्य काफ़ी समय बाद प्राप्त होता है।
लेकिन यह इस बात से तय होता है कि क्या हम उस आदत के प्रति इतनी निष्ठा रखते हैं कि हम अंतर्निहित संभावनाओं के पठार पर आकर सफलता हासिल कर सकें? ऐसे कौन-कौन से कारण हैं, जो लोगों को अवांछित आदतों की ओर ले जाते हैं और दूसरों को अच्छी आदतों के समग्र प्रभाव का आनंद लेने देते हैं?
लक्ष्यों को भूलकर व्यवस्था पर पूरा ध्यान दें
सामान्य बुद्धि मानती है कि हम जीवन में जो अर्जित करना चाहते हैं, जैसे अच्छा शरीर, सफल कारोबार, आराम का जीवन और कम चिंताएँ, ज़्यादा समय दोस्तों और परिवार के साथ बिताना, उसे प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है कि हम विशिष्ट और कार्रवाई योग्य लक्ष्य निर्धारित करें।
कई वर्षों तक मैं भी अपनी आदतों को इसी के अनुसार बनाता रहा। प्रत्येक लक्ष्य था, जिसे प्राप्त करना था। मैंने स्कूल में ग्रेड्स के लिए, जिम में वज़न के लिए, कारोबार में लाभ हासिल करने के लिए लक्ष्य निर्धारित कर लिए। कुछ में तो मैं सफल हो गया, लेकिन अधिकांश में विफल हो गया। धीरे-धीरे मुझे समझ आया कि मेरे नतीजों का मेरे लक्ष्यों से बहुत कम लेना-देना था। लगभग हर चीज़ का लेना-देना उन व्यवस्थाओं से था, जिनका मैंने पालन किया था।
व्यवस्थाओं और लक्ष्यों के बीच क्या फ़र्क़ है? यह एक विशिष्टता है। सबसे पहले मैंने इसे डिलबर्ट कॉमिक के कार्टूनिस्ट स्कॉट एडम्स से सीखा। लक्ष्य हमेशा वे परिणाम होते हैं, जिन्हें आप प्राप्त करना चाहते हैं। व्यवस्थाएँ वे प्रक्रियाएँ हैं, जो आपको नतीजों की ओर ले जाती हैं।
  • यदि आप कोच हैं, तो आपका लक्ष्य केवल चैम्पियनशिप जीतने का होता है। व्यवस्था वह तरीक़ा है, जिसके तहत खिलाड़ियों का चयन होता है, अपने सहायक कोचों को तैयार किया जाता है और अभ्यास किया जाता है।
  • यदि आप उद्यमी हैं, तो आपका लक्ष्य लाखों डॉलर का कारोबार बनाने का होगा। आपकी व्यवस्था प्रोडक्ट आइडिया का परीक्षण करना, कर्मचारी रखना और मार्केटिंग के लिए अभियान चलाना होगी।
  • यदि आप एक संगीतकार हैं, तो आपका लक्ष्य एक नई रचना को तैयार करना होगा। कितनी बार आप अभ्यास करते हैं, कितनी बार आप हिम्मत हार जाते हैं, मुश्किल उपायों से कैसे निपटते हैं, गुरु से फीडबैक लेने की प्रक्रिया आदि आपकी व्यवस्था है।
अब एक रोचक प्रश्न : यदि आप अपने लक्ष्यों की उपेक्षा करके पूरी तरह से व्यवस्था पर ध्यान देते हैं, तो क्या आप सफल हो पाएँगे? उदाहरण के लिए, यदि आप बास्केटबॉल कोच हैं और स्पर्धा जीतने के लक्ष्य की उपेक्षा करके केवल इस बात पर ध्यान देते हैं कि टीम हर दिन किस तरह से अभ्यास कर रही है, तो भी क्या परिणाम मिलेंगे?
मैं समझता हूँ, मिलेंगे।
किसी भी खेल में अच्छे स्कोर के साथ ‘फिनिश’ करना एक लक्ष्य होता है, लेकिन स्कोरबोर्ड की ओर देखते हुए खेल पूरा करना हास्यास्पद हो सकता है। हर दिन कुछ बेहतर होना ही वास्तव में जीत का सही तरीक़ा माना जाता है। तीन बार के सुपर बाउल विजेता बिल वॉल्श के शब्दों में, “स्कोर स्वयं अपनी चिंता कर लेगा।” यही बात जीवन के अन्य हिस्सों में भी लागू होती है। यदि आप बेहतर परिणाम चाहते हैं, तो लक्ष्य तय करना भूल जाएँ। व्यवस्था पर ज़्यादा ध्यान दें।
इसके मायने क्या हैं? क्या लक्ष्य बेकार की चीज़ है? बिलकुल नहीं। लक्ष्य दिशा तय करते हैं, लेकिन व्यवस्था प्रगति करने के लिए सबसे उपयुक्त रहती है। समस्याएँ तब बहुत सारी हो जाती हैं, जब आप लक्ष्य के बारे में सोचने में ही बहुत समय बिता देते हैं और अपनी व्यवस्था को सुधारने में पर्याप्त समय नहीं देते हैं।
समस्या#1 : जीतने और हारने वालों के लक्ष्य समान होते हैं
लक्ष्य निर्धारित करना अस्तित्व बचे रहने के पूर्वाग्रह से गंभीर रूप से ग्रस्त होता है। हम उन पर ध्यान देते हैं, जो जीत जाते हैं यानी जो दौड़ में बच जाते हैं। हम यह आकलन ग़लत करते हैं कि महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य ने उन्हें सफल बनाया है। हम उन लोगों को नज़र अंदाज़ कर देते हैं, जिनका लक्ष्य भी जीत का ही होता है, लेकिन वे सफल नहीं हो पाते हैं।
हर ओलिंपिक खिलाड़ी स्वर्ण पदक जीतना चाहता है। हर उम्मीदवार नौकरी चाहता है। यदि सफल और असफल दोनों व्यक्तियों के लक्ष्य समान रहते हैं, तो फिर लक्ष्य विजेताओं को हारने वालों से अलग नहीं करता। टूर डी फ्रांस को जीतने के लक्ष्य ने ब्रिटिश साइकलिस्ट्स को शिखर पर नहीं पहुँचाया था। वे तो हर वर्ष स्पर्धा जीतना चाहते थे, ठीक वैसे ही जैसे कोई अन्य प्रोफ़ेशनल टीम चाहती है। यह लक्ष्य तो हमेशा ही रहा था। अलग परिणाम तभी आ पाया, जब उन्होंने लगातार छोटे-छोटे सुधारां की व्यवस्था लागू की।
समस्या#2 : लक्ष्य प्राप्त करना क्षणिक परिवर्तन मात्र होता है
सोचिए आपका कमरा अस्त-व्यस्त है और आपने उसे साफ़ करने का लक्ष्य रखा है। यदि आप ऊर्जा से भरकर वह करेंगे, तो अभी ही वह साफ़ हो जाएगा, लेकिन यदि आप आलस की वही आदतें जारी रखेंगे, जिनकी वजह से कमरा अस्त-व्यस्त हुआ था, तो कमरे में नई गंदगी पसर जाएगी और फिर आप किसी और प्रेरणा की उम्मीद करने लगेंगे। आपको बार-बार वही परिणाम मिलेंगे, क्योंकि आप उसमें निहित व्यवस्था को बदल ही नहीं सके। आपने किसी लक्षण का उपचार बिना कारण जाने ही किया है।
लक्ष्य को प्राप्त करने से जीवन में क्षणभर के लिए ही बदलाव होता है। सुधार के बारे में यह सहज ज्ञान के विपरीत है। हम सोचते हैं कि हमें अपने नतीजे बदलने की ज़रूरत है, लेकिन नतीजे समस्या नहीं हैं। वास्तव में हमें वह व्यवस्था या प्रणाली बदलनी चाहिए, जो समस्या का कारण है। जब आप परिणाम के स्तर पर समस्या हल करते हैं, तो वह अस्थायी रूप से हो पाती है। बेहतरी के लिए सुधार करना है, तो आपको व्यवस्था के स्तर पर समस्या हल करनी होगी। जो इनपुट्स हैं, उनमें सुधार कर लें, परिणाम ख़ुद सुधर जाएँगे।
समस्या#3 : लक्ष्य आपकी ख़ुशियों को सीमित करते हैं।
किसी लक्ष्य के बारे में अंतर्निहित अनुमान यह रहता है : “एक बार लक्ष्य प्राप्त हो जाए, तो मैं ख़ुश रहूँगा।” लक्ष्य के साथ तब समस्या हो जाती है, जब आपकी मानसिकता बन चुकी होती है कि आप अगले पड़ाव की प्राप्ति तक ख़ुशियाँ नहीं मनाएँगे। मैं इस झंझट में इतनी बार उलझा हूँ कि संख्या मुझे पता नहीं। वर्षों तक खुशियाँ मेरे लिए भविष्य की बात बनकर रह गई थी। मैं ख़ुद को ही वचन देता था कि एक बार मैं बीस पाउंड मांसपेशियाँ और बना लूँ या मेरे कारोबार का उल्लेख न्यू-यॉर्क टाइम्स में हो जाए, तो अंततः मुझे आराम मिलेगा।
यही नहीं, लक्ष्य ‘या तो यह या वह’ का टकराव पैदा करते हैं : या तो आप अपना लक्ष्य प्राप्त करके सफल होते हैं या फिर विफल हो जाते हैं और निराश हो जाते हैं। आप ख़ुद को मानसिक रूप से ख़ुशी की संकुचित सोच में र्बांध लेते हैं। यह ग़लत दिशा है। यह संभव नहीं है कि वास्तविक जीवन में आपका रास्ता वैसा ही हो, जैसा ख़ाका आपने अपने दिमाग़ में शुरुआत के वक़्त बनाया था। सिर्फ़ एक परिदृश्य तक अपनी संतुष्टि को सीमित रखने का कोई मतलब नहीं है, जबकि आपके पास सफलता के कई मार्ग हैं।
व्यवस्था पहले बनाने की मानसिकता तनाव से मुक्ति प्रदान कराती है। जब आप उत्पाद से ज़्यादा प्रक्रिया से प्रेम करने लगते हैं, तो आपको ख़ुश होने के लिए ख़ुद को अनुमति नहीं देनी होती। आप कभी भी ख़ुश हो सकते हैं, क्योंकि प्रणाली या व्यवस्था काम करती जा रही है। और एक प्रणाली या व्यवस्था कई स्वरूपों में सफल हो सकती है। यह ज़रूरी नहीं है कि आपने जो सोचा हो, उसी में सफलता मिले।
समस्या#4 लक्ष्यों का दीर्घकालिक प्रगति से टकराव
अंततः लक्ष्योन्मुखी मानसिकता आप पर ‘उतार-चढ़ाव’ का प्रभाव छोड़ेगी। कई धावक महीनों तक कड़ा परिश्रम करते हैं, लेकिन जैसे ही वे ‘फिनिश लाइन’ को पार करते हैं, वे प्रशिक्षण रोक ही देते हैं। रेस उन्हें और अधिक प्रेरित नहीं करती है। जब आपका सारा परिश्रम किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए होता है, तो उसे प्राप्त करने के बाद क्या रह जाता है? इसी कारण से कई लोग लक्ष्य प्राप्ति के बाद ख़ुद को पुरानी आदतों की ओर मोड़ लेते हैं।


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