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अप्रेषित पत्र | Apreshit Patra Book PDF Download Free by Mahatria Ra

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥अप्रेषित पत्र PDF | Apreshit Patra
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 2.7 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖131
Last UpdatedAugust 26, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category, ,

जिंदगी के बहुत सारे फलसफो को अपने में समेटे यह किताब मन की शांति पाने, परिवार में प्यार बढ़ाने और तरक्की करने के तरीके बताती है। इसमें रोजमर्रा की जिदगी के उदाहरण देते हुए खुशी, सफलता, ध्यान, ईश्र्वर जैसे विषयों के बारे में एक नई और सुलझी हुई सोच जाहिर की गई है।
टी. टी. रंगराजन का अनपोस्टेड लेटर मूल पुस्तक का हिंदी संस्करण है, जिसे शुरू में अंग्रेजी में प्रकाशित किया गया था। पुस्तक लेखक द्वारा सभी मनुष्यों में आंतरिक चेतना को जगाने का एक प्रयास है। पुस्तक में कहा गया है कि मनुष्यों में आत्म-जागरूकता जीवन में उनके उत्थान और वंश के समानुपाती होती है। यह जीवन के तथ्यों को सबसे सरल शब्दों में प्रस्तुत करता है और एक ऐसे स्वर और भाषा में लिखा गया है जो आसानी से समझ में आता है। पुस्तक में जीवन के सभी क्षेत्रों को शामिल किया गया है, और कहा गया है कि लोग सभी क्षेत्रों में बेहतर योगदान दे सकते हैं, बशर्ते वे अपनी आत्म-जागरूकता की भावना को बढ़ाएं। पुस्तक को मानव मानस से जो स्पष्ट है उसे निकालने और रोजमर्रा के मुद्दों के समाधान खोजने के लिए प्रत्येक व्यक्ति के पास आवश्यक व्यावहारिक ज्ञान लाने के इरादे से तैयार किया गया है। संक्षेप में, लेखक अपनी कृति के माध्यम से प्रत्येक पाठक में आत्मा को जगाने का प्रयास करता है।

पुस्तक का कुछ अंश

इस पुस्तक का कोई भी पृष्ठ खोलिए। जिज्ञासु की जिज्ञासा शांत करने के लिए एक उत्तर वहाँ इंतज़ार करता मिलेगा। यह पुस्तक में आपको समर्पित करता हूँ। ये आप ही के प्रश्न थे जिनके उत्तर मेरे माध्यम से प्रकट हुए हैं। इस प्रकार, आप इस पुस्तक के सह-लेखक हैं। इसके पृष्ठों में आप ऐसे समाधान पाएँगे जो आपको मनुष्य की अंतरात्मा की विस्तृत, अंतहीन संभावना को पहचानने में सक्षम बनाएँगे। यह पुस्तक आपके लिए है, जो अपने सभी प्रयासों आध्यात्मिक, भावनात्मक व भौतिक में प्रचुरता की चाह रखते हैं। आप ऐसे कारगर उपाय खोज लेंगे जो आपको जीवन में अधिकतम से भी अधिक की ओर ले जाएँगे.
मेरे जीवन ने मुझे जीना सिखाया है रूपांतरण के लिए मेरे पास आने वाले जिज्ञासुओं ने किसी न किसी रूप में मेरा भी रूपांतरण किया है। मेरा हर शिष्य मेरा गुरु रहा है। जीवन के प्रति अपनी इस समझ व बोध को मैं संरक्षित कर देना चाहता हूँ। पुस्तकें दरअसल छपे हुए पृष्ठों में संरक्षित कर दिए गए शब्द ही तो हैं। इसीलिए 'अप्रेषित पत्र' नामक यह पुस्तक आपके हाथ में है। इसके माध्यम से मैं आपके दिलोदिमाग तक पहुँचना चाहता हूँ। कृपया मुझे आने दीजिए.
आइंस्टाइन ने अपना पूरा जीवन लगाकर इस विश्व को कुछ सिद्धांत दिए और तब से विश्व की काया पलट होती चली गई। एडीसन के जीवन ने विश्व की जीवन शैली ही बदल डाली। महात्मा गाँधी और नेल्सन मंडेला ने एक नई संस्कृति को जन्म दिया। मिल्टन व टैगोर ने काव्य की परिभाषा बदल दी। त्यागराज ने संगीत को पुनः परिभाषित किया। ज़ाकिर हुसैन ने तबले को नया मुक़ाम दिया। रॉजर बैनिस्टर और एडमंड हिलेरी ने मानव क्षमता को नए अर्थ दिए। सुकरात, अरस्तु और प्लेटो ने दुनिया की सोच ही बदल डाली। हर इंसान में केवल अपना उत्थान करने की ही क्षमता नहीं होती, बल्कि मानवता की समूची चेतना का उत्थान करने की शक्ति भी होती है। मुझसे पहले अनेक लोगों ने मानव चेतना के विकास में अपनी भूमिका निभाई है और हम सब उसका लाभ भी उठा रहे हैं। लेकिन हम ख़ुद कौन सी भूमिका निभाने जा रहे हैं? मेरा यह विनम्र प्रयास उसी दिशा में है... अपने पाठकों में एक नई सोच पैदा करना।

'आज' आपको ईश्वर की ओर से उपहार में मिला है।

किसी चीज़ के पीछे छिपी भावना को पहचान लेने से वह चीज़ उपहार बन जाती है। और उस भावना को न पहचानने से उपहार भी केवल एक चीज बनकर रह जाता है। एक कलम तब उपहार बन जाती है, जब आप उस भावना को पहचान लेते हैं, जिस भावना से वह आपको दी गई है। जब आप अपने लालन-पालन में रची-बसी अपने माता-पिता की भावना को पहचान लेते हैं, तब आपको अपना बचपन उपहार जैसा लगने लगता है। शिक्षा तब उपहार बन जाती है, जब आप उस शिक्षक की भावना को पहचान लेते हैं, जिसने अपना ज्ञान आपमें उड़ेल दिया है। आपका जीवन स्तर तब उपहार बन जाता है जब उसके उत्थान के पीछे आप अपने नियोक्ता की भावना को पहचान लेते हैं और संस्थान में हो रहा विकास और वृद्धि तब उपहार बन जाते हैं, जब अपने कर्मचारियों द्वारा की गई मेहनत में आप उनकी भावना को पहचान लेते हैं।
कोई चीज़ उपहार नहीं होती, बल्कि उपहार तो एक दृष्टिकोण है उस चीज़ के पीछे छिपी भावना पर ध्यान देने का दृष्टिकोण | इस अर्थ में 'आज' एक उपहार ही है। जिस तरह हर उपहार किसी न किसी स्रोत से आता है, उसी तरह 'आज' रूपी बहुमूल्य उपहार भी आपको या तो ईश्वर की तरफ से भेंट में मिला है या इसका यह अर्थ है कि आप अपना पिछला दिन जी चुके हैं। कल रात जो लोग सोए थे, उनमें से हर व्यक्ति आज सुबह जाग नहीं सका है। लेकिन आप तो सचमुच जागे हैं, यानी ऊपर विराजमान कोई शक्ति अभी आपको इस योग्य मानती है कि आपको एक और 'आज' दिया जाए। आपको ये चौबीस घंटे दिए जाने के पीछे की उस दैवीय भावना को पहचानें यह जान लें कि आपका 'आज' ईश्वर की ओर से आपको दिया गया एक उपहार है। यह समझ लें कि उपहार के साथ किया गया दुर्व्यवहार उसके दाता के प्रति किया गया दुर्व्यवहार होगा। अपने जीवन का बर्बाद किया गया एक भी दिन इस उपहारदाता के साथ किया गया दुर्व्यवहार है, विश्वासघात है जब आप किसी उपहार का महत्व जान जाते हैं, केवल तभी आप उसका मूल्य समझ सकते हैं। 'आज' को महत्व दें और इसे मूल्यवान बनाएँ।

शिखर पर पहुँचने का कोई आसान रास्ता नहीं होता।

जब आप अपनी गाड़ी लेकर सड़क पर निकलते हैं तो आपको ट्रैफिक जाम तो झेलना ही पड़ेगा। अगर आप स्वास्थ्य चाहते हैं, तो आपको स्वाद का लालच तो छोड़ना ही पड़ेगा। आय होगी तो आयकर भी चुकाना ही पड़ेगा। जीवन में आप जो कुछ भी चुनते हैं, उसके साथ जुड़ी सुविधा और दुविधा, उसके फ़ायदे और नुकसान, उसके सुख और दुख भी साथ चले आते हैं। बिना काँटों वाली गुलाब की झाड़ी ढूंढने में आप अपना समय व्यर्थ ही नष्ट करेंगे। जब आप सिक्के का एक पहलू चुनते हैं तो उसका दूसरा पहलू भी आप स्वतः ही चुन चुके होते हैं। एक कष्टरहित, दुखरहित जीवन की इच्छा न करें। महात्माओं को भी कष्ट और दुख से रहित सौभाग्यशाली जीवन प्राप्त नहीं हुआ। ऐसा कोई जीवन होता ही नहीं है।
इच्छाएँ जितनी बड़ी होंगी, समस्याएँ उनसे भी बड़ी होंगी। जब आप चहलकदमी करना चाहते हैं तो शायद ही कोई समस्या हो, लेकिन जब आप मैराथन में दौड़ना चाहते हैं तो स्पष्ट है कि आपके सामने ऐसे कई मुद्दे आ खड़े होंगे, जिनसे आपको निपटना पड़ेगा। जब आप केवल अपना वजूद बनाए रखना चाहते हैं, तो आपके सामने कुछ छोटे मोटे मुद्दे ही आएँगे। लेकिन जब आप अपनी भीतरी शक्ति के उच्च स्तर पर जीना चाहते हैं, तब आपको बड़े-बड़े मुद्दों से दो चार होना पड़ेगा। किसी छड़ी का एक सिरा उठा लेने से उसका दूसरा सिरा भी आप उठा चुके होते हैं। यदि आप तराशे जाने के लिए तैयार हैं, तभी आप पूजनीय मूर्ति बन सकते हैं। शिखर पर पहुँचने का कोई आसान रास्ता नहीं है और जो शिखर पर पहुँचे हैं, वे आसानी से नहीं पहुँचे हैं। आखिर इतिहास पढ़ने वालों और इतिहास रचने वालों में फर्क तो होता ही है।

प्रश्न यह नहीं है कि किसी मामले में दोष किसका है, बल्कि यह है कि प्रश्न किसके जीवन का है! बजाय इसके कि आप ख़ुद को वैसा ही स्वीकार कर लें, जैसे आप हैं। और संसार को बदलने की कोशिश करें, बेहतर यह होगा कि आप संसार को वैसा ही स्वीकार कर लें, जैसा वह है और उसे देखने का आपना दृष्टिकीण बदल लें। जीवन को इस संसार की वजह से ख़ूबसूरत होने दें। जीवन को इस संसार के बावजूद ख़ूबसूरत होने दें।
जीवन शतरंज के खेल की तरह है और यह खेल आप ईश्वर के साथ खेल रहे हैं। आपकी हर चाल के बाद, अगली चाल वो चलता है। आपकी चाल आपकी 'पसंद' कहलाती है और उसकी चाल 'परिणाम' कहलाती है। आपकी परीक्षा ली जाती है....आपको चुनौती दी जाती है....आपको कोने में धकेल दिया जाता है। और फिर, जब वह देखता है कि आप आपना खेल बखूबी खेल रहे हैं तो वह आपको बाज़ी जीतने देता है और इस तरह खुद भी जीत जाता है।

भले ही आप पर कोई विश्वास न करे, आपको खुद पर विश्वास रखना होगा भले ही किसी को विश्वास न हो कि आप कर सकते हैं, लेकिन आपको यह विश्वास रखना होगा कि आप कर सकते हैं। और आप खुद पर तभी विश्वास कर सकते हैं जब आप खुद से प्रेम करते हों। तो भले ही आपसे कोई प्रेम न करे, आपको ख़ुद से प्रेम करना होगा। वास्तव में जब आप ख़ुद से प्रेम करना सीख जाते हैं, तभी यह संसार आपसे प्रेम करना शुरू करता है। कुल मिलाकर इस बात से बहुत कम अंतर पड़ता है कि संसार आपको कैसे देखता है, लेकिन इस बात से बहुत अतंर पड़ता है कि आप ख़ुद को कैसे देखते हैं।

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