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अक्षरों के साये / Aksharon Ke Saaye PDF Download Free Hindi Book by Amrita Pritam

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Nameअक्षरों के साये / Aksharon Ke Saaye
लेखक / Author
आकार / Size3 6 MB
कुल पृष्ठ / Pages128
Last UpdatedMarch 10, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category

अमृता प्रीतम की आत्मकथा एक अंतर्यात्रा - अक्षर जो कागजों पर उतरते रहे वे सबके सामने है- इसलिए मुझे और कुछ नहीं कहना पड़ता है। मैं सारी ज़िंदगी जो लिखती रही, सोचती रही, वह सब देवताओं को जगाने का प्रयत्न था, उन देवताओं को जो इंसान के भीतर सो रहें हैं।

पुस्तक का कुछ अंश

मौत के साये
जब मैं पैदा हुई, तो घर की दीवारों पर मौत के साये उतरे हुए थे...
मैं मुश्किल से तीन बरस की थी, जब घुटनों के बल चलता हुआ मेरा छोटा भाई नहीं रहा। और जब मैं पूरे ग्यारह बरस की भी नहीं थी. तब मां नहीं रही। और फिर मेरे जिस पिता ने मेरे हाथ में कलम दी थी वे भी नहीं रहे...
और मैं इस अजनबी दुनिया में अकेली खड़ी थी—अपना कहने को कोई नहीं था। समझ में नहीं आता था—कि ज़मीन की मिट्‌टी ने अगर देना नहीं था, तो फिर वह एक भाई क्यों दिया था? शायद गलती से कि उसे जल्दी से वापिस ले लिया और कहते हैं—मां ने कई मन्नतें मान कर मुझे पाया था, पर मेरी समझ में नहीं आता था कि उसने कैसी मन्नतें मानीं और कैसी मुराद पाई? उसे किस लिए पाना था अगर इतनी जल्दी उसे धरती पर अकेले छोड़ देना था...
लगता—जब मैं मां की कोख से आग की लपट–सी पैदा हुई—तो ज़रूर एक साया होगा—जिसने मुझे गाढ़े धुएं की घुट्टी दी होगी...
बहुत बाद में —उल्का लफ्ज़ सुना, तब अहसास हुआ कि सूरज के आस पास रहने वाली उल्का पट्‌टी से मैं आग के एक शोले की तरह गिरी थी और अब इस शोले के राख होने तक जीना होगा...
आने वाले वक्त का साया
जब छोटी–सी थी, तब सांझ घिरने लगती, तो मैं खिड़की के पास खड़ी—कांपते होठों से कई बार कहती—अमृता ! मेरे पास आओ।
शायद इसलिए कि खिड़की में से जो आसमान सामने दिखाई देता, देखती कि कितने ही पंछी उड़ते हुए कहीं जा रहे होते...ज़रूर घरों को—अपने—अपने घोसलों को लौट रहे होते होंगे...और मेरे होठों से बार—बार निकलता—अमृता, मेरे पास आओ ! लगता, मन का पंछी जो उड़ता–उड़ता जाने कहां खो गया है, अब सांझ पड़े उसे लौटना चाहिए...अपने घर–अपने घोसले में मेरे पास...
वहीं खिड़की में खड़े–खड़े तब एक नज्म़ कही थी—कागज़ पर भी उतार ली होगी, पर वह कागज़ जाने कहां खो गया, याद नहीं आता...लेकिन उसकी एक पंक्ति जो मेरे होठों पर जम-सी गई थी—वह आज भी मेरी याद में है। वह थी—‘सांझ घिरने लगी, सब पंछी घरों को लौटने लगे, मन रे ! तू भी लौट कर उड़ जा !
कभी यह सब याद आता है—तो सोचती हूं—इतनी छोटी थी, लेकिन यह कैसे हुआ—कि मुझे अपने अंदर एक अमृता वह लगती—जो एक पंछी की तरह कहीं आसमान में भटक रही होती, और एक अमृता वह जो शांत वहीं खड़ी रहती थी और कहती थीं—अमृता! मेरे पास आओ!
अब कह सकती हूं—ज़िंदगी के आने वाले कई ऐसे वक्तों का वह एक संकेत था—कि एक अमृता जब दुनिया वालों के हाथों परेशान होगी, उस समय उसे अपने पास बुलाकर गले से लगाने वाली भी एक अमृता होगी—जो कहती होगी—अमृता, मेरे पास आओ!
हथियारों के साये
तब—जब पिता थे. मैं देखती कि वे प्राचीन काल के ऋषि इतिहास और सिक्स इतिहास की नई घटनाएं लिखते रहते, सुनाते रहते। घर पर भी सुनाते थे, और बाहर बड़े–बड़े समागमों में भी लोग उन्हें फूलों के हार पहनाते थे—उनके पांव छूते थे...
उनके पास खुला पैसा कभी नहीं रहा, फिर भी एक बार उन्होंने बहुत–सी रकम खर्च की, और सिक्स इतिहास की कई घटनाओं के स्लाइड्स बनवाए—जो एक प्रोजेक्टर के माध्यम से, दीवार पर लगी बड़ी–सी स्कीन पर दिखाते, और साथ–साथ उनकी गाथा— अपनी आवाज़ में कहते, लोग मंत्र–मुग्ध से हो जाते थे...
एक बार अजीब घटना हुई। उन्होंने एक गुरुद्वारे की बड़ी–सी दीवार पर एक स्कीन लगा कर वे तस्वीरें दिखानी शुरू कीं, आंगन में बहुत बड़ी संगत थी, लोग अकीदत से देख रहे थे, कि उस भीड़ में से दो निहंग हाथों में बर्छे लिए उठ कर खड़े हो गए, और ज़ोर से चिल्लाने लगे—यहां सिनेमा नहीं चलेगा...
मैं भी वहीं थी, पिता मुझ छोटी–सी बच्ची को भी साथ ले गए थे। और मैंने देखा—वे चुप के चुप खड़े रह गए थे। एक आदमी उनके साथ रहता था, उस सामान को उठा कर संभालने के लिए, जिसमें प्रोजेक्टर और स्लाइड्‌स रखने निकालने होते थे...
पिताजी ने जल्दी से अपने आदमी से कुछ कहा— और मुझे संभाल कर, मेरा हाथ पकड़ कर, मुझे उस भीड़ में से निकाल कर चल दिए...
लोग देख रहे थे, पर खामोश थे। कोई कुछ नहीं कह पा रहा था—सामने हवा में—दो बर्छे चमकते हुए दिखाई दे रहे थे...
यह घटना हुई कि मेरे पिता ने खामोशी अख्तियार कर ली। सिक्स इतिहास को लेकर, जो दूर–दूर जाते थे, और भीगी हुई आवाज़ में कई तरह की कुरबानियों का जिक्र कहते थे, वह सब छोड़ दिया...
एक बाद बहुत उदास बैठे थे, मैंने पूछा—क्या वह जगह उनकी थी? उन लोगों की?
कहने लगे—नहीं, मेरी थी। स्थान उसका होता है, जो उसे प्यार करता है...मैं खामोश कुछ सोचती रही, फिर पूछा— आप जिस धर्म की बात करते रहे, क्या वह धर्म उनका नहीं है?
पिता मुस्करा दिए—कहने लगे— धर्म मेरा है, कहने को उनका भी है, पर उनका होता तो बर्छे नहीं निकालते...उस वक्त मैंने कहा था— आपने यह बात उनसे क्यों नहीं कही? पिता कहने लगे—किसी मूर्ख से कुछ कहा–सुना नहीं जा सकता...
वह बड़ा और काला बक्सा फिर कभी नहीं खोला गया। उनकी कई बरसों की मेहनत, उस एक संदूक में बंद हो गई—हमेशा के लिए...
बाद में—जब हिंदुस्तान की तक्सीम होने लगी, तब वे नहीं थे। कुछ पूछने– कहने को मेरे सामने कोई नहीं था...कई तरह के सवाल आग की लपटों जैसे उठते—क्या यह ज़मीन उनकी नहीं है जो यहां पैदा हुए? फिर ये हाथों में पकड़े हुए बर्छे किनके लिए हैं? अखबार रोज़ खबर लाते थे कि आज इतने लोग यहां मारे गए, आज इतने वहां मारे गए...पर गांव कस्बे शहर में लोग टूटती हुई सांसों में हथियारों के साये में जी रहे थे...
बहुत पहले की एक घटना याद आती, जब मां थी, और जब कभी मां के साथ उनके गांव में जाना होता, स्टेशनों पर आवाज़ें आती थीं—हिंदू पानी, मुसलमान पानी, और मैं मां से पूछती थी—क्या पानी भी हिन्दू मुसलमान होता है ?— तो मां इतना ही कह पाती—यहां होता है, पता नहीं क्या क्या होता है...
फिर जब लाहौर में, रात को दूर—पास के घरों में आग की लपटें निकलती हुई दिखाई देने लगीं, और वह चीखें सुनाई देतीं जो दिन के समय लंबे कर्फ्यू में दब जाती थीं...पर अखबारों में से सुनाई देती थीं—तब लाहौर छोड़ना पड़ा था...
थोड़े दिन के लिए देहरादून में पनाह ली थी—जहां अखबारों की सुर्खियों से भी जाने कहां–कहां से उठी हुई चीखें सुनाई देतीं...रोज़ी–रोटी की तलाश में दिल्ली जाना हुआ—तो देखा—बेघर लोग वीरान से चेहरे लिए—उस ज़मीन की ओर देख रहे होते, जहां उन्हें पनाहगीर कहा जाने लगा था...अपने वतन मैं—बेवतन हुए लोग...

चलती हुई गाड़ी से भी बाहर के अंधेरे में मिट्‌टी के टीले इस तरह दिखाई देते—जैसे सारी ज़मीन पर कब्रें बिछी हुई हैं...
बहती हुई हवा इस तरह थी—जैसे अंधेरे का विलाप हो! उस समय वारिस शाह का कलाम मेरे सामने आया, जिसने हीर की लंबी दास्तान लिखी थी—जो लोग घर–घर में गाते थे। मैं वारिस शाह से ही मुखातिब हुई...
उठो वारिस शाह—
कहीं कब्र में से बोलो
और इश्क की कहानी का —
कोई नया वरक खोलो...
पंजाब की एक बेटी रोई थी
तूने लंबी दास्तान लिखी
आज तो लाखों बेटियां रोती हैं
तुम्हें—वारिस शाह से—कहती हैं...
दर्दमंदों का दर्द जानने वाले
उठो! और अपना पंजाब देखो!
आज हर बेले में लाशें बिछी हुई हैं
और चनाब में पानी नहीं
...अब लहू बहता है...
पांच दरियाओं के पानी में
यह ज़हर किसने मिला दिया
और वही ज़हर का पानी
खेतों को बोने सींचने लगा...
पंजाब की ज़रखेज़ ज़मीन में
वही ज़हर उगने फैलने लगा
और स्याह सितम की तरह
वह काला ज़हर खिलने लगा...
वही ज़हरीली हवा
वनों–वनों में बहने लगी
जिसने बांस की बांसुर–
ज़हरीली नाग—सी बना दी...
नाग का पहला डकं मदारियों को लगा
और उनके मत्रं खो गए...
फिर जहां तहां सब लोग–
ज़हर से नीले पड़ने लगे...
देखो ! लोगों के होठों से
एक ज़हर बहने लगा
और पूरे पंजाब का बदन
नीला प़डने लगा...
गले से गीत टूट गए
चर्खे का धागा टूट गया
और सखियां — जो अभी अभी यहां थी
जाने कहां कहां गई...
हीर के मांझी न — वह नौका डुबो दी
जो दरिया में बहती थी
हर पीपल से टहनियां टूट गई
जहां झूलों की आवाज़ आती थी...
वह बांसुरी जाने कहां गई
जो मुहब्बत का गीत गाती थी
और रांझे के भ़ाई बंधु
बांसुरी बजाना भूल गए...
ज़मीन पर लहू बहने लगा—
इतना—कि कब्रें चूने लगीं
और मुहब्बत की शहज़ादियां
मज़ारों में रोने लगीं...
सभी कैदों में नज़र आते हैं
हुस्न और इश्क को चुराने वाले
और वारिस कहां से लाएं
हीर की दास्तान गाने वाले...
तुम्हीं से कहती हूं–वारिस!
उठो! कब्र में से बोलो
और इश्क की कहानी का
कोई नया वरक खोलो...
तब अजीब वक्त सामने आया—यह नज्म़ जगह—जगह गाई जाने लगी। लोग रोते और गाते। पर साथ ही कुछ लोग थे, जो अखबारों में मेरे लिए गालियां बरसाने लगे, कि मैंने एक मुसलमान वारिस शाह से मुखातिब होकर यह सब क्यों लिखा? सिक्ख तबके के लोग कहते कि गुरु नानक से मुखातिब होना चाहिए था। और कम्युनिस्ट लोग कहते कि गुरु नानक. से नहीं — लेनिन से मुखातिब होना चाहिए था...
यह सब होता रहा—पर कई नज़्में—मुझ पर जैसे बादलों सी घिरतीं और बरस जातीं—उस वक्त पंजाब की कहानी लगी
तकदीर उठी– रकाब में पैर रखा
पोठोहार को घोड़े के पैरों में कुचलती
पूरे पंजाब को देखने लगी...
उसके घोड़े की आवाज़ सुन कर
धरती आकाश चौंक गए
भारत—मां का दिल कांपने लगा
अब मेरी आबरू का क्या होगा...
क्या किसी ने वह बेटा नहीं जना
जो इस घोड़े की लगाम पकड़ ले!
क्या कोई मदारी नहीं
जो काले नाग को कील ले!
ऊंचे लंबे खेत थे – हरे भरे
खलवाड़े में आग किसने लगा दी
आग की लपटों पर–
लोग सान चढ़ने लगे...
पांच दरियाओं के पानी
गर्म तेल से बहने लगे...
खेतों के बीज हाथों से छूट गए
हांडियां पकाती हुई कलछियां फूट गई
कुएं में मटकी की रस्सी टूट गई
कलाइयों की चूड़िया–टूट गई...
इस पेड़ का क्या होगा?
इस छाया का क्या होगा?
नफरत के कीड़े – तो जड़ में लगे हैं
और राही – रास्ता भूलने लगे हैं...
कैसी हवा चलने लगी –
राजा ! तू कैसा राज करेगा
कि आने वाली सदी तक
एक राख–सी उड़ने लगी...
राजा! तू कैसा राज करेगा–
सिर पर कोई आकाश न रहा
पैरों के नीचे ज़मीन न रही...
मैं अक्षरों में भी भीगती रही–
आसुंओं में भी भीगती रही
लिखती रही...
उस मज़हब के माथे पर से
यह खून कौन धोएगा...
जिसके आशिक – हर गुनाह
मज़हब के नाम से करते
राहों पर कांटे बिछाते हैं
ज़बान से ज़हर उगलते
जवान खून को बहाते हैं
और खून से भरे हाथ
मज़हब की ओट में छिपाते हैं...
तहज़ीब की लाश –
बाज़ार में रुलने लगी
और हर गुनाह की बात –
मज़हब के माथे पर लगने लगी...
उन दिनों जनरल शाह नवाज़ अगवा हुई लड़कियों को तलाश रहे थे, उनके लोग, जगह–जगह से टूटी बिलखती लड़कियों को ला रहे थे– और पूरा–पूरा दिन– ये रिपोटें उन्हें मिलती रहतीं। मैंने कुछ एक बार उनके पास बैठ कर बहुत सी वारदातें सुनीं। ज़ाहिर है कि कई लड़कियां गर्भवती हालात में होती थीं...
उस लड़की का दर्द कौन जान सकता है–जिसके बदन की जवानी को ज़बर से मां बना दिया जाता है...एक नज़्म लिखी थी – मज़दूर! उस बच्चे की ओर से – जिसके जन्म पर किसी भी आंख में उसके लिए ममता नहीं होती, रोती हुई मां और गुमशुदा बाप उसे विरासत में मिलते हैं...
मेरी मां की कोख मजबूर थी–
मैं भी तो एक इन्सान हूं
आजादियों की टक्कर में
उस चोट का निशान हूं
उस हादसे का जख़्म जो मां के माथे पर लगना था
और मां की कोख को मजबूर होना था ...
मैं एक धिक्कार हूं–
जो इन्सान की जात पर पड़ रही...
और पैदाइश हूं – उस वक्त की
जब सूरज चांद –
आकाश के हाथों छूट रहे थे
और एक–एक करके
सब सितारे टूट रहे थे...
मैं मां के जख़्म का निशान हूं
मैं मां के माथे का दाग हूं
मां–
एक जुल्म को कोख में उठाती रही
और उसे अपनी कोख से
एक सड़ांध आती रही
कौन जान सकता है
एक जुल्म को, पेट में उठाना
हाड–मांस को जलाना
पेट में जुल्म का फल
रोज–राज़ बढ़ता रहा...
और कहते हैं –
आज़ादी के पेड़ को –
एक बौर पड़ता रहा...
मेरी मां की कोख मजबूर थी
हिन्दुस्तान का बंटवारा इतिहास की छाती का जख़्म बनता गया। कोई नहीं जान पाएगा– कि देश की कितनी लड़कियों के सपने कत्ल कर दिए गए थे...तब मैंने तवारीख नाम की एक लंबी नज़्म लिखी थी, जिसका एक अंश, उस लड़की की आवाज़ है, जो हजारों लड़कियों की तरह, कहीं खो गई थी...
मैं नसीब जली – पंजाब की बेटी
मैं बोल कर क्या कहूंगी –
मेरी ज़बान तो काट दी गई
हाथ भी बंध गए, पैर भी बंधे हुए
और माथे पर किस्मत–
काले नाग–सी बैठी हुई...
एक तूफान आया
यह बदन बाकी है
पर नसीब डूब गया...
अरे रहगुज़र
उस पार, कोई मिले तो कहना
अब मेरे घुटने टूट गए
मां झियों के हाथों
पतवार छूट गए–
अब नहीं जानती– मैं कहां हूं...
मां का एक आगंन था–
जाने कहां गया...
न बाबुल न भाई
न मेहंदी – न डोली
मैं कैसी ब्याही...
बस इतना जानती
कि इसी बहाने धरती पर
धर्म और ईमान बिकता है
यहां देश की नार1 बिकती है...

उन्हीं दिनों मैंने एक उपन्यास लिखा था – ‘पिंजर’, जिसकी कहानी बंटवारे से पहले शुरू होती है, और बंटवारे के उस मुकाम पर आती है – जब दोनों सरकारें, अपनी–अपनी उगवाशुदा लड़कियां ढूंढ रहे हैं – और उस कहानी की पूरो वह है, जो बंटवारे से पहले उठा ली गई थी, एक निजी दुश्मनी के हाथों, और जिसे मां बाप ने वापिस लेने से इनकार कर दिया था...वह एक घटना थी, लेकिन बंटवारे के समय ऐसी घटना घर–घर में होने लगी थी– अब उठाई हुई लड़कियों के मां–बाप उन्हें ढूढ रहे थे। पूरो अपनी भाभी को तलाशती है, जो बंटवारे के समय उठा ली गई थी, और जब भाई के हाथ उस सौंपती है, तो उस वक्त पूरो के मां बाप उसे भी लेने को तैयार हैं–लेकिन पूरो अपने बच्चे को बांहों में लिए कहती है–“:नहीं, अब तो जो भी लड़की, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, जो भी ठिकाने पर पहुंच रही है, समझना पूरो की आत्मा ठिकाने पर पहुंच रही है...”
1 नारी
अक्षरों के साये–1
मैं बहुत छोटी थी, जब मां नहीं रही–तो रात को जब मैं छत पर सोती, लगता–चांद पर मेरी मां का नाम लिखा हुआ है...
चांद की छाती पर पड़े हुए जिन दो अक्षरों के साये दिखाई देते, वे दो अक्षर र और ज थे। मेरी मां का नाम राज था, और उन्हीं दो अक्षरों का साया मुझे चांद में दिखाई देता रहा...
उठती हुई जवानी के साथ, उन्हीं दो अक्षरों में एक अक्षर और मिल गया. न और मुझे लगता, जिसके नाम के तीन अक्षरों का साया चांद पर दिखाई देता है, वह राजन जरूर कहीं इस दुनिया में होगा, जो कभी मुझे मिलेगा...
जिस तरह गीली मिट्‌टी पर से गुज़रने वाले के पैरों के निशान वहां पड़े हुए दिखाई देते हैं, ठीक उसी तरह मुझे चांद में उसका नाम दिखाई देता– और मैं सोचती – वह कभी मुहब्बत बन कर जाने किन राहों से गुज़रता हुआ, मेरी ज़िदगी में आएगा...
मैं ज़िदगी भर अक्षरों को कागज़ पर उतारती रही– लेकिन अहसास वही बना रहा कि सारे अक्षर चांद पर से गिरते हैं। इसीलिए एक बार कहा–
खामोशी के पेड़ से मैने
ये अक्षर नहीं तोड़े
ये तो जो पेड़ पर से झड़े थे–
मैं वही अक्षर चुनती रही...
इसी तरह एक बार वही बात कुछ अलग सूरत में आई...
मेरी खामोशी की गली से
अक्षरों के साये गुजरते रहे
रात की दहलीज़ पर–
तारे दुआ करते रहे...
चांद की मटकी से जब–
कतरे से कुछ गिरते रहे
रात की दहलीज़ पर–
तारे दुआ करते रहे...
बहुत सालों बाद। 1990 में, जब जालंधर दूरदर्शन ने मेरी जिंदगी और रचना पर एक फिल्म बनाई थी, उसमें पहले अलफाज़ मैंने यही कहे थे– चांद पर अक्षरों के साये दिखाई देने वाले...
काल–सर्प का साया
कई घटनाएं सामने आईं तो सितारों का इल्म रखने वालों ने जो कहा, उससे मैं जान पाई कि मैं जन्म से काल–सर्प योग में लिपटी हुई हूं...काल–सर्प योग तब बनता है–जब जन्म कुण्डली के सारे ग्रह, राहु और केतु के दरम्यान घिरे हुए होते हैं। बहुत से ग्रंथ इसका जिक्र करते हैं लेकिन ब्यौरे में नहीं जाते। सिर्फ एक पुस्तक मेरे हाथ में आई थी, पंडित माणिक चंद जैन की, जिसमें वे कुछ ब्यौरे से कहते हैं, कि यह कड़ा योग सिर्फ बलवान आत्माओं का होता है, पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसी आत्माओं का– जो इसे झेल लेते हैं। कमज़ोर आत्माएं तो इससे टूट जाती हैं...

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