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अधिकतम से भी अधिक | Adhiktam Se Bhi Adhik Book PDF Download Free by Mahatria Ra

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥अधिकतम से भी अधिक PDF | Adhiktam Se Bhi Adhik
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 38.6 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖181
Last UpdatedAugust 25, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category,

अधिकतम से भी अधिक को पढ़कर आशा, अधिकता और संभावनाओं की कई राहें खुल जाती हैं। अपने जीवनभर के शोध से अर्जित किए ज्ञान को लेखक ने इस किताब में अपने पाठकों से साझा किया है। सफलता और खुशहाली के मार्ग की ओर जीने की सामान्य तकनीकों के द्वारा वे हमारा मार्गदर्शन करते हैं और हमारे जीवन में छोटी बड़ी चीज़ों की महत्ता का एहसास कराते हैं। निश्चितता और अनिश्चितता के बीच संशय में पड़े हर व्यक्ति को संतुलन बनाने और अपने अस्तित्व के विकास हेतु यह किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए।

पुस्तक का कुछ अंश

आप क्या बनना चाहते हैं? कोई ख़ास या कोई आम इंसान?

यह निर्णय आपको अभी लेना है। आप जीवन में किसी भी आम इंसान की तरह बनना चाहते हो, या जीवन में कोई ख़ास इंसान बनना चाहते हो? अगर आप जीवन में एक साधारण मनुष्य बनना चाहते हो, तो भीड़ का हिस्सा बन जाओ। भीड़ में ही खो जाओ। यद्यपि, अगर आप जीवन में कुछ बनना चाहते हो तो भीड़ से परे हट कर खड़े होने का साहस दिखाओ। अगर आप सब लोगों की तरह जियोगे, तो उन लोगों जैसे ही बन जाओगे। अगर आप सब लोगों जैसा नहीं बनना चाहते, तो आपको यह करना होगा, जो किसी ने नहीं किया। एक अलग रास्ते पर चलो और आप अपने लिए एक नई मंजिल पा लोगे।
वह अपने चेहरे पर खिल रही मुस्कुराहट को रोक नहीं पा रहा था। जैसे उसकी खुशी संभाले न संभल रही हो। अब से दो घंटे बाद के वे क्षण, उसके लिए कितने विशेष होंगे। हवा में जैसे उन्हीं आने वाले पलों की महक थी। अव्यक्त चेन्नई से उड़ान भर रहा था। वह अब से दो घंटे बाद पुणे में, एक ऐसे व्यक्ति से मिलेगा, जो उसके जीवन में गहरा प्रभाव डालने वाले व्यक्तियों में से एक रहा है।
'पहली बार' की यादें तो हमेशा ही खास होती हैं और ये हमारे दिल में एक खास जगह भी रखती है। अव्यक्त को पुणे में ही घर से बाहर रहने का पहला अनुभव मिला। पुणे में ही उसे अपनी पहली नौकरी मिली। उसने अपना पहला चेतन पुणे में ही कमाया। उसने अपने माता-पिता व भाई के लिए पहला उपहार भी पुणे से ही खरीदा था। पुणे ने ही ये द्वार खोले, जो अंततः अव्यक्त के लिए प्रख्यात करियर बने पुणे के साथ अव्यक्त की बहुत-सी 'पहली यादें' जुड़ी थीं। कई तरह से, पुणे अव्यक्त के लिए घर से दूर एक घर की तरह ही था। अव्यक्त उड़ान भरते समय बहुत प्रसन्न था ऐसा बिल्कुल नहीं लगा कि यह किसी दूसरे शहर में जा रहा था। ऐसा लग रहा था मानो उसे स्वर्ग में बार-बार जाने के लिए, बीज़ा देने के साथ ही सभी टिकटों का भुगतान भी कर दिया गया। हो।

अव्यक्त यही सोचने लगा कि वह कहाँ से कहाँ आ गया था। वह अपनी पहली पुणे यात्रा याद करने लगा, जो उसने रेलगाड़ी के दूसरे दर्जे में की थी। जब वह पहली बार पुणे आया तो टिकट के लिए अस्सी रुपए देने के बाद, उसकी जेब में केवल बीस रुपए बचे थे। उसके पास तीन जोड़ी कपड़ों के अलावा बड़े माप के जूते थे जो रिश्ते के एक भाई से उधार लिए गए थे, जिन्हें पहनते समय आगे की ओर पुराने अखबार ठूसने पड़ते थे। अव्यक्त का परिवार बदतर हालात से गुजर रहा था और परिवार का बड़ा बेटा होने के नाते अव्यक्त ने निर्णय लिया कि वह अपने परिवार का दायित्व अपने सिर ले लेगा जबकि उसकी आयु मात्र उन्नीस वर्ष थी और यह स्नातक के अंतिम वर्ष का छात्र था। वह एक सॉफ्टवेयर प्रशिक्षण संस्थान में नौकरी करने जा रहा था।
और आज वह एक दशक बाद, एक हवाई जहाज में उड़ान भर रहा था, जिसका किराया ही उस दौरान मिलने वाले सालाना वेतन से कहीं अधिक था। कितना कुछ बदल गया था। दरअसल, सब कुछ ही बदल गया था। अव्यक्त पुणे में जिस इंसान से मिलने जा रहा है, यह उसके लिए इतने मायने क्यों रखता है? पीटर अव्यक्त का पहला बॉस था। अव्यक्त अक्सर अपने दोस्तों से कहता, "मैं जब पुणे गया तो एक लड़का था और पीटर ने मुझे सही मायनों एक पुरुष बना दिया। जब मैं पहली बार पीटर से मिला, तो मैं एक अनुभवहीन, अप्रभावशाली और अव्यवस्थित कर्मचारी था। उन्होंने मुझे एक अनुभवी, प्रभावशाली, व्यवस्थित संगठित व परिपक्व व्यवसायी बना दिया। मैं जो भी हूँ, वह पीटर की वजह से हूँ।"

अव्यक्त ने जब अपने करियर की शुरुआत की तो वह अभी एक किशोर ही था। संस्थान की कक्षाओं में आने वाली लड़कियों को देखते ही, अक्सर उसका ध्यान भटक जाता। वह प्राय: ऑफ़िस में गच्चा दे कर फिल्में देखने जाता। उसके पास 'हमेशा अपने काम से किए गए समझौतों के लिए बहाने और सफाइयाँ होती। यह जीवन से नाराज था, क्योंकि उसका मानना था कि ज़िंदगी ने उसके किशोर कंधों पर इतनी जिम्मेवारियां डाल दी कि वह अपनी किशोरावस्था का आनंद तक नहीं ले सका। यह कुंठित था कि उससे जवानी की मौज-मस्ती छीन ली गई थी हालात ने उसे एक नौकरी करने पर मजबूर कर दिया था पर उसका दिल हमेशा इसके खिलाफ आवाज उठाता रहता। उसे एहसास होता कि उसे उन्नीस साल का लड़का बने रहने की इजाजत नहीं दी गई थी।
क्या तुम अनिवार्य रूप से, एक आम उन्नीस साल के लड़के की परिभाषा में ढलना चाहते हो? जीवन में केवल दो ही विकल्प हैं: अपनी पसंद और नापसंद को जीवन के उद्देश्य के अनुसार ढाल लो; या, जीवन के उद्देश्य को अपनी पसंद और नापसंद के अनुसार ढाल लो। अगर तुम जीवन में कुछ बनना चाहते हो, अगर भीड़ से परे हट कर दिखना चाहते हो, अगर ऐसा इंसान बनना चाहते हो, जिसकी लोग मिसालें दें तो तुम्हारे लिए एक ही विकल्प बचता है। तो, क्या तुम उन्नीस साल का एक आम लड़का बनना चाहते हो या उन्नीस साल का एक ऐसा लड़का बनना चाहते हो, जिसे उसी उम्र के दूसरे लड़के प्रेरणास्त्रोत की तरह देखें?

महानता से एक शाम की दूरी

भले ही हमारा जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवार में क्यों न हुआ हो, परंतु हम एक औद्योगिक क्रांति के साथ इस जीवनकाल में ही महान ऊँचाइयों तक पहुँच सकते हैं। भले ही हमारा जन्म निरक्षर माता-पिता के यहाँ क्यों न हुआ हो, परंतु हमारी मृत्यु एक विश्व विख्यात विद्वान के रूप में हो सकती है। भले ही हमें बचपन में अनुपयुक्त क्यों न माना जाता रहा हो, परंतु हम आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श उदाहरण बन सकते हैं। हम क्या हैं और क्या रहे हैं, उसका इस बात से कोई लेन-देन नहीं है कि हम क्या बन सकते हैं। हम अपने लिए जो भी चुनाव करते हैं, वही बन सकते हैं।स्कूल ने हाल ही में नैशनल क्विज़ चैंपियनशिप के फाइनल में जीत हासिल की है। स्कूल में सभी के लिए एक भावुक पल था ये पिछले साल बहुत थोड़े से अंतर से हारे थे। स्कूल में सभी की आंखें नम थीं, तब भी और अब भी बस कारण अलग-अलग थे निव्या दोनों ही दलों में थी स्कूल की असेंबली में, प्रिंसिपल ने जीत का जश्न मनाने के लिए, निव्या को दो शब्द कहने के लिए आमंत्रित किया। निव्या माइक के आगे खड़ी हुई. पहले उसने अपने साथियों को देखा, फिर प्रिंसिपल की ओर मुड़ी और अचानक रोने लगी। अनेक छात्र व अध्यापक समझ सकते थे कि उसके मन में क्या चल रहा था और वहाँ कई आँखें नम थीं। यह केवल निव्या के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे स्कूल के लिए जीत के क्षण थे।

निव्या ने खुद को संभालने के बाद कहा, "पहले में प्रिंसिपल महोदया को उनके प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद देती है। वे इस तरह काम करती है मानो हममें से प्रत्येक को अपने चुने गए क्षेत्र में, सबसे ऊपर देखना ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य हो मैं अपने माता-पिता को भी धन्यवाद देना चाहती हूँ कि उन्होंने अपनी 'मर्जी' मुझ पर थोपने की बजाय, मुझे अपनी पसंद से पढ़ाई के अलावा दूसरी गतिविधियाँ चुनने की पूरी आजादी दी। यदि मैं अपने अध्यापको को धन्यवाद न दूँ तो में अपने कर्तव्य पालन में चूक जाऊँगी, जो बार-बार मेरे लिए इसी मंत्र को दोहराते रहे हैं कि, 'निव्या तुम इसे कर सकती हो।' प्रायः वे मुझ पर इतना भरोसा रखते आए हैं, जितना शायद मैं भी अपने आप पर नहीं कर पाती थी। मैं जानती हूँ कि जब पिछले साल हम हारे थे तो मैने क्या अनभव किया था और आज सफलता का यह अनुभव उससे कितना अलग है। सभी कारकों से परे, केवल एक ही व्यक्ति इस कायाकल्प के लिए उत्तरदायी है। अगर आज हमारे स्कूल को एक राष्ट्रीय पहचान मिली है, तो यह सब ..।" निव्या की आँखें भीड़ में यहाँ यहाँ किसी को खोजने लगीं और अव्यक्त पर आ टिर्की ।
अव्यक्त एक ट्रेनी था, जिसे पिछले ही वर्ष गणित पढ़ाने के लिए स्कूल में रखा गया था। यद्यपि 250 अध्यापकों के उस विशाल सागर में कुछेक अध्यापक ही अव्यक्त को नाम से जानते थे, परंतु वह अपने छात्रों में बहुत लोकप्रिय था। वह अपने पढ़ाए जाने वाले विषय के कारण नहीं बल्कि जीवन के दूसरे पहलुओं पर चर्चा के लिए भी जाना जाता था। अव्यक्त चालीस मिनट की कक्षा में से तीस मिनट अपने विषय को देता और बाकी बचे समय में छात्रों से बातचीत करते हुए उन्हें मानव जीवन के विविध पहलुओं के लिए प्रेरित करता। दरअसल अध्यापकों के बीच लोकप्रिय न होने का एक कारण यह भी था कि यह पारंपरिक अध्यापन पद्धतियों को तोड़ रहा था और यह उन्हें रुचिकर नहीं लगता था। ये चिल्लाते, "तुम अभी अनाड़ी हो, जरूरत से ज्यादा जोश में आकर बहुत से नए नुस्खे मत आजमाओ। ये सब कोई काम नहीं आते। तुम सिलेबस भी पूरा नहीं करा पाओगे।"

परंतु, जरा इस बारे में भी विचार करें। कभी भी, कोई भी विशेषज्ञ पारंपरिक तंत्रों या पुरानी पद्धतियों के प्रयोग से, किसी तंत्र में क्रांति नहीं ला पाया है। यही लोग क्रांतिकारी बदलाव लाने में सफल हो पाते हैं, जो किसी भी तंत्र की परिधि से बाहर आकर काम करते हैं और एक नया नजरिया रखते हैं तंत्र के सार भाग पर काम करने वालों की तुलना में, वही लोग अधिक सफल हो पाते हैं, जो उससे बाहर रह कर काम करते हैं।

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