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सपनों की उड़ान | Sapanon Ki Udaan Book PDF Download Free by Rajendra Bharud

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥सपनों की उड़ान PDF | Sapanon Ki Udaan
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 1.7 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖99
Last UpdatedSeptember 14, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category,

इस पुस्तक को पढ़कर ग्रामीण और देहाती इलाकों में रहने वाले छात्रों का आत्मविश्वास बढ़े; उनके मन में बसी हीनता कम हो और उनकी जिजीविषा और दृढशक्ति विस्तृत हो; यही लेखक का अभीष्ट है। असंख्य संकटों और प्रतिकूलताओं के तूफान में किसी दीपस्तंभ के समान दृढ रहते हुए अपनी संतान के जीवन को दिशा और प्रकाश देनेवाली राजेंद्र की अशिक्षित परंतु सुसंस्कृत माँ और मौसी सबसे अधिक प्रशंसा की पात्र हैं। सुसंस्कृतता; गुणवत्ता; सफलता; इनपर केवल बड़े शहरों में और अंग्रेजी स्कूलों में पढ़नेवाले संपन्न और धनवान छात्रों का अधिकार नहीं है; अपितु जिनके मन में इच्छाशक्ति; मेहनत; लगन; धैर्य; आत्मविश्वास और प्रकृति के प्रति अपनी अपार श्रद्धा की ज्योत प्रज्वलित होती है; वहाँ सभी स्वप्न साकार होते हैं। आप कहाँ जन्म लेते हो; आपके माता-पिता अमीर हैं या गरीब; आप शहर में रहते हो या गाँव में; अंग्रेजी; निम्न अंग्रेजी; सी.बी.एस.ई. माध्यम में पढ़ते हो या अपनी मातृभाषा में? इन बातों का आपकी सफलता एवं असफलता से कोई संबंध नहीं है। आपके विचार; स्वभाव एवं जी तोड़कर मेहनत करने का जज्बा; इन्हीं पर आपका भविष्य निर्भर होता है। युवा IAS अधिकारी राजेंद्र भारुड का संघर्षमय; किंतु सफल जीवन-यात्रा 'सपनों की उड़ान' भरने का जीता-जागता प्रमाण है।

पुस्तक का कुछ अंश

4 मई, 20121 उस दिन संघ लोकसेवा आयोग (यू.पी.एस.सी.) के परीक्षा-परिणाम घोषित होनेवाले थे। सवेरे से मैं बेचैन था। दिल थामकर प्रतीक्षा कर रहा था। मोबाइल हाथ में थामे इंटरनेट पर बार-बार आँखें गड़ाए रहता था। वैसे तो अधिकृत सूचना यही थी कि परिणाम शाम को घोषित होंगे और यह दोपहर का वक्त था, तल्खी भरा। लेकिन दिल है कि मानता न था। चरम उत्सुकता के कारण एक-एक पल भारी पड़ रहा था मन में भाँति भाँति के विचारों का तूफान जैसे घुमड़ रहा था। परीक्षा परिणाम सामने आ जाने तक दिल को सुकून मिलने की कोई गुंजाइश नहीं आती थी। अंततः झुंझलाकर मैं खटिया पर टिक गया। मुँदी आँखों के भीतर एक अरति हुए बवंडर के थपेड़ों को झेलते हुए तनिक राहत पाने का प्रयास करता रहा। सपने संजोने की जुर्रत मैंने कैसे की, पता नहीं। जिस परिवेश में मैं पला-बढ़ा, वहाँ सपनों के लिए तो कोई जगह थी ही नहीं आनेवाला हर दिन जैसे तैसे गुजरता था बस! हालात ही ऐसे थे कि मर-मर के जीना पड़ता था। समूची इनसानियत पर सवालिया स्याही पुती होने का तीव्र एहसास दिलानेवाले माहौल में भी मैं स्वप्न देख सका। अपनी प्रबल इच्छाशक्ति के बूते उसे मैं सँजो सका। यकीन नहीं होता, पर यह हकीकत है।
धुले जिले का सामोडा गाँव। वहाँ की भील बस्ती में एक निर्धन परिवार में मेरा जन्म हुआ। मेरे पैदा होने से पहले ही पिताजी चल बसे थे। यानी कि पिता का सहारा तो मुझे कभी नसीब ही नहीं हुआ। परिवार में अन्य कोई पुरुष व्यक्ति नहीं था, जो हमारी देखभाल कर सके। तथापि दो जाँबाज और खुद्दार औरतें जरूर थीं— मेरी माँ और मेरी मौसी। इनके अलावा मेरा एक भाई, एक बहन और तबेले में एक भैंस बस, यही थे मेरे हमसफर। हमारे परिवार में किसी के पढ़े-लिखे होने का तो कोई सवाल ही नहीं था बल्कि मैं यदि यों कहूँ कि पढ़ाई लिखाई के मामले में हमारी भिलाटी (भीलों की बस्ती) की पाटी बिल्कुल कोरी थी, तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अलबत्ता भूले-भटके एकाध छोकरा फटीचर कमीज और पैबंद लगी निक्कर पहने, काँधे पर मटमैला थैला लटकाए दबे-सहमे अंदाज में मानो अपने बिछुड़े कुनबे की थाह पाने के चक्कर स्कूल की तरफ जाता नजर आता था। इस तरह के ऊजड़ एवं गँवारू परिवेश में बुद्धि से तनिक चालाक होने के बावजूद, मेरा हुलिया इससे अलग तो नहीं था मेरे कई बालसखा पढ़ाई में मुझसे काफी तेज थे। किंतु सफलता के रूढ़ पैमाने के हिसाब से मैं उन सभी से काफी आगे निकल गया। इसकी वजह यह भी कि मैंने एक सपना सँजोया और उसे साकार करने में मुस्तैदी से डटा रहा।

सपनों की एक विशेषता यह होती है कि उन्हें सैंजोते रहो, तो मानो सपनों की झरी सी बरसने लगती है; सपने जीवन में उमंग भर देते हैं। स्वप्न पूर्ति की डॉवाँडोल स्थिति हमें हर बार उद्वेलित करती है, झकझोरती है, जगाती है और हमें मुस्तैद रखकर जीवन खुशगवार बना देती है। यही तो होती है जिंदगी। ऐसे ही एक सपने का पहला तिसरा मेरे हाथ तब लगा जब मैं सरकारी नौकरी में दाखिल हुआ। एम.बी.बी.एस. का तमगा मेरे गले में लटकने लगा। उस पेशे से भले ही मैं जुड़ा नहीं, पर उपाधि तो मैंने प्राप्त कर ही ली। दरअसल मेरे सपने का यह पहला पड़ाव था, मंजिल कुछ और थी।
माँ का जन्मग्राम जामन्यापाड़ा था, जो सामोडा से लगभग पंद्रह कोस की दूरी पर था। दरअसल वह गाँव तो क्या बीस-पच्चीस परिवारों की एक बस्ती थी। वैसे तो उनके घरों को 'घर कहने की कोई सूरत ही नहीं थी। वे जैसे-तैसे वहाँ सिर छुपाते थे, बस! मिट्टी की चार दीवारें, ईख की खोई और सूखे पत्तों से बना छप्पर खेतिहर मजदूर इन झोपडियों में रहते थे। इनमें से कुछ मजदूरों की अपनी जमीन तो थी, पर बारिश के ही भरोसे उन्हें अपनी तकदीर आजमानी पड़ती थी। अतः केवल उसी के सहारे गुजर-बसर की उम्मीद तो नहीं की जा सकती थी। बस्ती के कुछ लोग जंगल से महुआ के फूल बीन लाते और उससे दारू बनाते थे, तो कुछ लोग छोटा-मोटा काम कर दिहाड़ी कमा लेते थे। ऐसे ही एक अत्यंत अभावग्रस्त परिवार में माँ का जन्म हुआ।
मेरी माँ का जन्मनाम था 'कमलाबाई' पर घर में चूँकि वह छुटकी थी, सो सभी उसे 'धाकलीबाई 'ही पुकारते थे। माँ के बड़े भाई का नाम था, पूनम यानी 'पून्या 'और मँझली बहन थी, बायजाबाई नानी का नाम था, चाफाबाई। उसकी छह बहनें और एक भाई थे। उसका ब्याह मलगाँव के पांडू से हुआ था, जो मेरे नाना थे। पर शादी के कुछ ही दिनों बाद मेरे नानी नाना दोनों नानी के पीहर यानी जामन्यापाड़ा में रहने के लिए आ गए संभवतया अकाल की वजह से उन दिनों खानाबदोशी का यह एक प्रमुख कारण हुआ करता था। अंततः अकालग्रस्तता के चलते नानी-नाना ने जामन्यापाड़ा से अपना बोरिया-बिस्तर समेटा और अपने सभी बच्चों समेत सामोडा आ गए थे। सिर्फ जामन्यापाडा ही क्यों, उसके आस-पास की कई बस्तियाँ अकाल की चपेट में तबाह हो गई थीं। वहीं के चिपी नामक गाँव का एक युवक बंडू भी अपने परिवार समेत रोजी-रोटी की जुगत में सामोड़ा की शरण में आया था। एक अरसे बाद कमलाबाई का विवाह इसी बंडू से हुआ। और ये बंडू भारुड़ ही मेरे पिता हैं। उनके चार भाई और दो बहनें थीं। चिपी गाँव में उनकी दो एकड़ जमीन तो थी, किंतु पानी के अभाव में उसमें कड़ी दरारें आ गई थीं। इस वजह से वहाँ का जमीन जुमला छोड़-छाड़कर पूरा परिवार सामोडा में आ चुका था और वे मजदूरी कर जैसे-तैसे आजीविका चला रहे थे।

सामोडा गाँव की बगल से ही जामखेली नदी बहती थी इसी नदी के किनारे माँ और पिताजी के परिजनों ने एक पटेल की जमीन पर लंगड़ डाला और झोंपडियाँ बनाई। इस बीच पास-पड़ोस के गाँवों से काफी लोग रोजी रोटी के चक्कर में वहाँ आकर जमने लगे थे। वे सभी एक-दूसरे के नजदीकी या दूर के रिश्तेदार ही थे। अपना बोरिया-बिस्तर हर दिन पीठ पर लादे यायावरी करनेवाले घुमंतू लोग चलते-चलते एडिया घिस गई, पर यायावरी नहीं रुकी उनकी।
मेरी माँ मुखिया (पटेल) के घर कपड़े बरतन करती थी। मुखिया को गाँववाले मालिक कहा करते थे। नानाजी किसी के खेत में पहरूए का काम करते थे और उनके बच्चे यानी मेरी माँ, मामा और मौसी दिहाड़ी पर चार पाँच रुपए कमा लिया करते थे। शाम को घर लौटते वक्त घास का पुलिंदा अथवा जलावन का गट्ठर अपने सिर पर ढोकर लाते थे और मुखिया उसे खरीदता था उससे हुई आमदनी भी वे नानाजी को सौंपते थे, दस्तूर भी यही था। आमदनी का कुछ हिस्सा नानाजी की दारू की प्यास बुझाने के काम आता था और बाकी हिस्से से चूल्हा जलता था।

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