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शेयर मार्केट गाइड / Share Market Guide PDF Download Free Hindi Book by Sudha Shrimali

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Nameशेयर मार्केट गाइड / Share Market Guide
लेखक / Author
आकार / Size15.8 MB
कुल पृष्ठ / Pages177
Last UpdatedMarch 13, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category,

शेयर मार्केट विषय पर बाजार में कई पुस्तकें उपलब्ध हैं, परंतु लेखिका ने इस पुस्तक के द्वारा वित्तीय क्षेत्र के जटिल पहलुओं को स्पष्‍ट एवं सीधी-सरल भाषा में समझाने की कोशिश की है। शेयर बाजार की कार्य-प्रणाली, कमोडिटी मार्केट, म्यूच्युअल फंड्स तथा बाजार में प्रयोग की जानेवाली मुहावरेदार भाषा को व्याख्या सहित समझाया गया है। अच्छे ब्रोकर के चुनाव के लिए अपने सुझाव भी रखे हैं। पाठक की सुविधा के लिए बाजार को प्रभावित करनेवाले कारकों की व्याख्या, बाजार की ऐतिहासिक गिरावटों का जिक्र, असेट अलोकेशन एवं निवेश के लोकप्रिय तरीकों की चर्चा इस पुस्तक की विशेषता है।

प्रस्तुत पुस्तक न केवल नए शुरुआती निवेशकों के लिए अपितु डिग्री कोर्स, अकेडेमिक सर्टिफिकेशन तथा प्रोफेशनल एग्जामिनेशन के छात्रों के लिए भी अच्छी गाइड बुक का कार्य करेगी।
मुझे विश्‍वास है कि यह पुस्तक वित्तीय क्षेत्र की जानकारी चाहनेवालों की जिज्ञासाओं, संदेहों तथा प्रश्‍नों का निराकरण करेगी। संभावित निवेशक इस पुस्तक के द्वारा जानकारी प्राप्‍त करके वित्तीय बाजार में बेहतर विश्‍वास के साथ उतर सकेंगे। अंत में सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि यह पुस्तक हिंदी में लिखी जाने के कारण देश के अनगिनत नियमित हिंदी पाठकों तक अपनी पहुँच बनाने में सफल होगी।
—आनंद राठी
(भूमिका से)

पुस्तक का कुछ अंश

जानिए शेयर बाजार को
शेयर क्या है?
पूँजी बाजार (कैपिटल मार्केट) में निवेश करने के कई तरीके हैं, जैसे—शेयर, बांड्स, डिबेंचर, म्यूचुअल फंड या निवेश की अन्य प्रतिभूतियाँ (सिक्यूरिटीज) इत्यादि। प्रत्येक प्रकार के निवेश की कुछ विशेषताएँ, लाभ तथा उद्देश्य व कारण होते हैं। निवेश के इन विभिन्न तरीकों में शेयर द्वारा शेयर बाजार में किया गया निवेश सर्वाधिक लोकप्रिय व आम है। शेयर का हिंदी में अनुवाद करें तो इसका अर्थ होता है—बाँटना। वास्तव में यह प्रक्रिया बाँटने की ही है। दरअसल शेयर किसी कंपनी में आंशिक भागीदारी (स्वामित्व) प्राप्त करने का तरीका है। किसी कंपनी के शेयर खरीदने का तात्पर्य है कि व्यक्ति उस कंपनी का आंशिक हिस्सेदार बन रहा है। इस प्रकार के निवेश में कंपनी की हिस्सेदारी से जुड़े फायदे हैं तो कंपनी के व्यापार से जुड़े खतरे भी शामिल होते हैं। कंपनी के शेयर खरीदना तथा बेचना निवेश की गतिविधियाँ हैं। वह निवेशक, जो किसी कंपनी का शेयर खरीद लेता है, तब वह उस कंपनी का ‘शेयर होल्डर’ कहलाता है। दूसरे शब्दों में, शेयर की खरीदारी को ‘इक्विटी की खरीदारी’ भी कहा जाता है तथा शेयर होल्डर को इक्विटी होल्डर या इक्विटी शेयर होल्डर भी कहा जाता है। तो यदि आप शेयर की जगह ‘इक्विटी’ व ‘स्क्रिप्स’ शब्द सुनें तो भ्रमित होने की जरूरत नहीं है; क्योंकि तीनों का अर्थ एक ही है। शेयर को हमेशा कंपनी के साथ जोड़कर समझा जाना चाहिए।
शेयरों के लेन-देन की प्रक्रिया
शेयरों की खरीद-बिक्री दो तरीकों से की जाती है—वे कंपनियाँ, जो स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हैं, उनके शेयर स्टॉक एक्सचेंज में खरीदे या बेचे जाते हैं। निवेशक ब्रोकर के माध्यम से स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध शेयरों की खरीद तथा बिक्री कर सकता है। दूसरे तरीके में निवेशक अन्य शेयर होल्डर से अथवा सीधे कंपनी से शेयरों को खरीद सकता है। जब कंपनी पहली बार अपने शेयर आम निवेशकों के समक्ष प्रस्तुत करती है और निवेशकों को शेयर खरीदने का मौका उपलब्ध कराती है तो उसे ‘इनीशियल पब्लिक ऑफर’ कहते हैं। उसके बाद आने वाले सारे ऑफर पब्लिक इश्यू कहलाते हैं। निवेशकों को खरीदने के लिए प्रस्तुत किए जानेवाले शेयर या तो कंपनी द्वारा जारी किए गए नए शेयर हो सकते हैं या कंपनी अपने हिस्से के शेयरों का कुछ भाग पब्लिक के लिए प्रस्तुत कर सकती है। इस प्रकार ‘शेयर’ कंपनी द्वारा आम निवेशक से पूँजी उगाहने का एक औजार है।
शेयर क्यों जारी किए जाते हैं?
चूँकि कंपनी को अपने बिजनेस के लिए बड़ी मात्रा में धन की आवश्यकता होती है और यह आवश्यकता चुनिंदा लोगों द्वारा पूरी नहीं की जा सकती। अतः कंपनी अपना बिजनेस फैलाने तथा व्यापार चलाने के लिए कॉरपोरेट स्ट्रक्चर बनाकर, बड़ी संख्या में लोगों को शामिल कर उन्हें शेयर बेचती है तथा पूँजी हासिल करके अपने उद्देश्यों को पूरा करती है। किसी सूचीबद्ध पब्लिक लिमिटेड कंपनी के शेयरों को खरीदना निवेशक के लिए अच्छा चुनाव साबित होता है; क्योंकि इसके सदस्यों की संख्या 50 से अधिक होती है तथा इसके शेयरों की बिक्री पर कोई प्रतिबंध नहीं होता है। निवेशक अपनी इच्छा व विवेक के अनुसार किसी कंपनी के शेयर खरीदकर अच्छी कीमत आने पर बाद में उन्हें बेच सकता है। इस प्रकार वह लाभ कमा सकता है या निवेश के किसी भी विकल्प में यह धन लगा सकता है। जब तक निवेशक शेयर होल्ड करता है, तब तक वह शेयर पर दिए गए डिविडेंड का अधिकारी होता है। शेयरों से जुड़े खतरों में यह शामिल होता है कि यदि कोई कंपनी अपना व्यापार समेटती है तो शेयरधारकों को सबसे अंत में भुगतान किया जाता है। नियमतः ऐसी अवस्था में कंपनी अपनी सारी देनदारियाँ चुकता करने के बाद बचे हुए धन को शेयरधारकों को बाँटती है। व्यावहारिक तौर पर अधिकांश मामलों में देनदारी चुकता करने के बाद कंपनी के पास कोई धन नहीं बचता तथा तब शेयरधारकों (शेयर होल्डर्स) को कंपनी से कुछ नहीं मिलता।
किसी शेयरधारक की कंपनी में सीमित जिम्मेदारी होती है—अर्थात् उसके द्वारा खरीदे गए शेयरों की एवज में जो धन वह कंपनी को चुकाता है, उसके अतिरिक्त किसी भी स्थिति में कंपनी उससे अतिरिक्त धन की माँग नहीं कर सकती। इस प्रकार कंपनी बंद होने की स्थिति में इक्विटी शेयर होल्डर्स को सबसे ज्यादा नुकसान होता है, क्योंकि उसे पैसा वापस नहीं मिलता।
दैनिक निवेश तथा दैनिक शेयर व्यवसाय में दूसरे तरह की जोखिम (रिस्क) रहती है। प्रायः यह संभव है कि जब कोई व्यक्ति किसी दर (रेट) पर कंपनी के शेयर खरीदता है, फिर यदि शेयर बाजार में गिरावट आ जाए तो उसके शेयरों की कीमत घट जाती है। इन दरों पर शेयर बेचने पर निवेशकों को नुकसान होता है। इसके विपरीत, शेयरों की कीमत में वृद्धि होने पर शेयर बेचे जाएँ तो लाभ होता है।
शेयर कितने प्रकार के होते हैं?
इक्विटी शेयर को आम भाषा में केवल ‘शेयर’ कहा जाता है। विभिन्न प्रकार के शेयरों की अलग-अलग विशेषताएँ होती हैं। अतः इनके प्रकार को समझना आवश्यक है, ताकि निवेशक अपनी जरूरत तथा विवेक के अनुसार उनका चयन कर सके। भारत में निवेशकों को दो प्रकार के शेयर विकल्प उपलब्ध हैं—इक्विटी शेयर तथा प्रीफरेंस शेयर।
इक्विटी शेयर होल्डर या साधारण शेयर (ऑर्डिनरी शेयर)
प्राइमरी तथा सेकंडरी मार्केट से निवेशक जो शेयर हासिल करता है, वह ‘साधारण शेयर’ कहलाता है। इस प्रकार का शेयरधारक कंपनी का आंशिक हिस्सेदार होता है तथा कंपनी के नफे-नुकसान से जुड़ा रहता है। साधारण शेयरधारक ही इक्विटी शेयर होल्डर होते हैं। शेयरों की संख्या के अनुपात में कंपनी पर इनका मालिकाना अधिकार होता है। कंपनी की नीति बनानेवाली जनरल मीटिंग में इन्हें वोट देने का अधिकार होता है। इसी प्रकार, ये कंपनी से जुड़े रिस्क तथा नफा-नुकसान के हिस्सेदार भी होते हैं। यदि कंपनी अपना व्यवसाय पूर्ण रूप से समाप्त करती है, तब कंपनी अपनी सारी देनदारी चुकता करने के बाद बची हुई पूँजी संपत्ति को इन साधारण शेयरधारकों को उनकी शेयर संख्या के अनुपात से वितरित करती है।
प्रिफरेंस शेयर (तरजीह शेयर)
साधारण शेयर के विपरीत कंपनी चुनिंदा निवेशकों, प्रोमोटरों तथा दोस्ताना निवेशकों को नीतिगत रूप से प्रिफरेंस शेयर (तरजीह आधार पर) जारी करती है। इन प्रिफरेंस शेयरों की कीमत साधारण शेयर की मौजूदा कीमत से अलग भी हो सकती है। साधारण शेयर के विपरीत प्रिफरेंस शेयरधारकों को वोट देने का अधिकार नहीं होता। प्रिफरेंस शेयरधारकों को प्रतिवर्ष निश्चित मात्रा में लाभांश (डिविडेंड) मिलता है। प्रिफरेंस शेयरधारक साधारण शेयरधारक की अपेक्षा अधिक सुरक्षित होते हैं, क्योंकि जब कभी कंपनी बंद करने की स्थिति आती है तो पूँजी चुकाने के मामले में प्रिफरेंस शेयरधारकों को साधारण शेयरधारकों से अधिक तरजीह दी जाती है। कंपनी अपनी नीति के अनुसार प्रिफरेंस शेयरों को आंशिक अथवा पूर्ण रूप से साधारण शेयर में परिवर्तित भी कर सकती है। जब कोई कंपनी बहुत अच्छा बिजनेस कर रही है तो उसके साधारण शेयरधारक को ज्यादा फायदा होता है।
प्रिफरेंस शेयरधारक को लाभ में से सबसे पहले हिस्सा मिलता है; लेकिन इन्हें कंपनी का हिस्सेदार नहीं माना जाता है। लाभ के आधार पर प्रिफरेंस शेयर तीन तरह के होते हैं—
1. नॉन क्यूमुलेटिव प्रिफरेंस शेयर (असंचयी अधिमानित शेयर)—यदि कंपनी किसी कारणवश पहले वर्ष लाभ नहीं कमाती है और इसकी जगह दूसरे वर्ष में लाभ कमाती है तो इस स्थिति में निवेशक दोनों वर्ष में लाभ प्राप्त करने का दावा नहीं कर सकता है।
2. क्यूमुलेटिव प्रिफरेंस शेयर (संचयी अधिमानित शेयर)—यदि कंपनी किसी वजह से पहले वर्ष लाभ नहीं कमाती और दूसरे वर्ष में लाभ की स्थिति में आती है तो इस स्थिति में निवेशक दोनों वर्ष लाभ प्राप्त करने का दावा कर सकता है।
3. रिडीम्ड क्यूमुलेटिव प्रिफरेंस शेयर (विमोचनशील अधिमानित शेयर)—इस तरह के शेयरधारक को उसकी पूँजी निश्चित समय के बाद लाभांश (डिविडेंड) के साथ लौटा दी जाती है। इस प्रकार के शेयरधारक का कंपनी से जुड़ाव पूरी तरह अल्पकालिक होता है और कंपनी की इच्छा पर निर्भर करता है।
4. कन्वर्टिबल प्रिफरेंस शेयर (परिवर्तनशील अधिमानित शेयर)—इस प्रकार के शेयर निश्चित अवधि के पश्चात् इसी कंपनी के किसी अन्य वित्तीय इंट्रूमेंट में बदल दिए जाते हैं।
शेयरों का संचालन
बैलेंस शीट में शेयर
विभिन्न प्रकार के शेयरों की चर्चा के साथ यह समझना आवश्यक है कि वास्तव में ये किस प्रकार संचालित (ऑपरेट) होते हैं। यदि किसी कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट उठाकर देखें तो शेयर से जुड़े कई शब्द (टर्म) दिखाई देंगे। आइए, इन शब्दों को समझने की कोशिश करते हैं।
शेयर कैपिटल
बैलेंस शीट में इक्विटी शेयर देनदारीवाले कॉलम में दर्ज होते हैं, क्योंकि यह राशि कंपनी पर शेयरधारकों की देनदारी है, नियमतः कंपनी बंद होने की स्थिति में यह राशि शेयरधारकों को चुकता की जानी चहिए। चूँकि यह राशि आय अथवा खर्च का हिस्सा नहीं है, अतः इसे हानि अथवा लाभ के खाते में नहीं दरशाया जाता, बल्कि देनदारी खाते में ‘शेयर कैपिटल’ के नाम से दर्ज किया जाता है।
ऑथराइज्ड शेयर कैपिटल
बैलेंस शीट में शेयर से जुड़ा एक और नाम होता है—ऑथराइज्ड शेयर कैपिटल (आधिकारिक शेयर पूँजी)। यह कंपनी की कुल पूँजी का वह अधिकतम हिस्सा है, जो कंपनी शेयर जारी करके अर्जित कर सकती है। इसकी सीमा पूरी होने पर कंपनी और अधिक शेयर जारी नहीं कर सकती, जब तक कि उसकी सीमा में वृद्धि नहीं की जाए। कंपनी के मेमोरेंडम में कंपनी के उद्देश्यों के साथ ही उस कंपनी की ऑथराइज्ड कैपिटल पहले से तय की गई होती है।
दूसरा महत्त्वपूर्ण बिंदु है कि शेयर की फेस वेल्यू (मौलिक कीमत) कितनी है। शेयर की फेस वैल्यू 10 रुपए, 5 रुपए, 2 रुपए या 1 रुपए हो सकती है। इसके बाद इश्यूड शेयर कैपिटल आता है, अर्थात् बैलेंस शीट बनाते समय तक कंपनी कितने शेयर जारी कर चुकी है। ऑथराइज्ड शेयर कैपिटल तथा इश्यूड शेयर कैपिटल का अंतर यह दर्शाता है कि कंपनी मेमोरेंडम के तहत और कितने शेयर जारी कर सकती है।
ज्यादातर मामलों में इश्यूड शेयर कैपिटल कम रखा जाता है, क्योंकि कंपनी एक बार में ही अपनी पूरी सीमा (ऑथराइज्ड शेयर कैपिटल) को खत्म नहीं करना चाहती। इसलिए कुछ भाग ही उपयोग में लिया जाता है। कंपनी की बैलेंस शीट में इन आँकड़ों के अलावा पिछले वर्ष के आँकड़े भी कोष्ठक में रहते हैं। इससे यह अनुमान लगाने में आसानी रहती है कि गत एक वर्ष में कितना परिवर्तन आया।
सबस्क्राइब्ड कैपिटल
इश्यूड शेयर का वह भाग, जो निवेशक द्वारा लिया जाता है या सबस्क्राइब्ड किया जाता है, सबस्क्राइब्ड कैपिटल कहलाता है। जब इश्यू किए गए सभी शेयर निवेशकों द्वारा ले लिये जाते हैं, तब इश्यू व सबस्क्राइब्ड कैपिटल समान होंगे। इससे शेयरों की कुल संख्या का अनुमान होता है कि कितने शेयर इश्यू किए गए और निवेशकों ने कितने लिये। शेयर कैपिटल का अंतिम स्वरूप पैडअप शेयर कैपिटल होता है। अर्थात् जारी किए गए शेयरों के तहत बैलेंस शीट बनाते समय तक कंपनी को कितनी शेयर कैपिटल मिल चुकी है।
बोनस व राइट शेयर
बैलेंस शीट में कंपनी द्वारा जारी किए गए बोनस शेयरों की संख्या का उल्लेख होता है। इससे यह पता चलता है कि कंपनी के शेयर कैपिटल में कितना हिस्सा शेयर बेचकर अर्जित किया गया है तथा कितना हिस्सा निवेशकों को बोनस शेयर जारी करके शेयर कैपिटल में शामिल किया गया है। बोनस शेयर शेयरधारकों को मुफ्त में जारी किए जाते हैं।
बोनस शेयर क्यों जारी किए जाते हैं?
दरअसल, बोनस शेयर का संबंध कैपिटलाइजेशन ऑफ रिजर्व से है। इसलिए पहले हम कैपिटलाइजेशन ऑफ रिजर्व क्या है, इसे समझते हैं। दरअसल, जब कोई कंपनी अपने व्यवसाय के दौरान वित्तीय वर्ष में लाभ अर्जित करती है, तब कंपनी नियमित खर्चे निकालकर, देनदारियाँ निकालकर, लाभांश निकालकर बची हुई राशि भविष्य में विस्तार के लिए रिजर्व रखती है। साल-दर-साल इस प्रकार कंपनी का अवितरित लाभ इकट्ठा होकर रिजर्व के रूप में कंपनी के पास रहता है। कंपनी अपनी नीतियों के अनुसार सरकारी कानूनों के तहत बोनस इश्यू जारी करके इस रिजर्व पूँजी के कुछ भाग का कैपिटलाइजेशन (पूँजीकरण) करती है। इस प्रक्रिया में तत्कालीन शेयरधारकों को उनके शेयर के अनुपात में बोनस शेयर जारी किए जाते हैं। इसे बोनस इश्यू कहते हैं। इस प्रक्रिया में कंपनी का रिजर्व फंड इक्विटी में परिवर्तित होता है। वस्तुतः यह मात्र एक बुक एंट्री है। बोनस शेयरों पर कोई कीमत नहीं वसूली जाती है तथा शेयरधारकों की संख्या भी अपरिवर्तित रहती है।
इस प्रकार शेयरधारकों का आनुपातिक स्वामित्व भी अपरिवर्तित रहता है। हाँ, यह हो सकता है कि बोनस शेयर जारी करने के पश्चात् कंपनी के शेयरों की बाजार की कीमत में कुछ गिरावट आए, जो बोनस इश्यू के अनुपात में होती है।
साधारणतया कंपनी प्रतिवर्ष अपने लाभांश (डिविडेंड) की दर बनाए रखती है। शेयरधारकों को बोनस इश्यू मिलने के बाद ज्यादा डिविडेंड मिलता है तथा कालांतर में बाजार में शेयरों की कीमत फिर अपना स्थान बना लेती है। इस प्रकार शेयरधारकों को काफी लाभ होता है।

2.
प्राथमिक बाजार (प्राइमरी मार्केट)
शेयर मार्केट में प्रवेश कैसे करें?
अब यदि अपने चारों ओर लोगों के मुँह से शेयर बाजार से पैसे को दो गुना-तीन गुना बनाने की कहानियाँ सुनकर आप भी शेयर बाजार में धन लगाना चाहते हैं तो ठहर जाइए; क्योंकि इस तरह आस-पास से जुटाई गई, पढ़ी गई सूचनाओं व दोस्तों के कहे अनुसार यदि आपने तुरंत अपना डी-मैट अकाउंट खुलवाकर शेयर खरीद लिये या आई.पी.ओ. में पैसे लगा बैठे तो हो सकता है कि आपको अपने लगाए हुए पैसे का एक-चौथाई ही वापस मिले और आप हताशा में अपने दैनिक काम-काज से भी हाथ धो बैठें! ऐसा कहकर न तो हम शेयर बाजार के प्रति आपके मोह को कम करना चाहते हैं और न ही उसे हौआ बनाकर आपको डरा रहे हैं। मुख्य बात यह है कि हर वह निवेशक (इनवेस्टर), जो शेयर बाजार में निवेश कर भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था में भागीदार होना चाहता है, वह पूरी तरह जागरूक हो। उसे न सिर्फ शेयर मार्केट से पैसे को दोगुना कैसे किया जाता है, इसका तकनीकी व आधारभूत ज्ञान हो, अपितु वह शेयर बाजार के जोखिम से भी पूरी तरह अवगत हो; क्योंकि आज का भारतीय बाजार अब सट्टा बाजार नहीं है। यहाँ सभी चीजें वैज्ञानिक तरीकों से पूरी होती हैं, भले ही वह प्राथमिक बाजार हो या द्वितीयक बाजार। कंपनी के प्राइमरी मार्केट के द्वारा पैसे उगाहने से लेकर सूचीबद्ध होने के बाद शेयरों की सेकंडरी मार्केट में खरीद-बिक्री की पूरी प्रक्रिया स्टॉक एक्सचेंज के नियम व कानून के तहत संचालित होती है। सरकारी एजेंसी ‘सिक्यूरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड’ (सेबी) की निगरानी में सभी एक्सचेंज कार्य करते हैं। इसलिए यदि आप शेयर बाजार की कार्य-प्रणाली को पूरी तरह समझकर अपना पैसा लगाएँगे तो यह तय है कि आप पैसा गँवाएँगे तो नहीं। यदि इस ज्ञान के साथ आप अपनी सूझ-बूझ का इस्तेमाल करेंगे तो शेयर बाजार से कमाना भी मुश्किल नहीं होगा।
तो यदि आप मन बना चुके हैं कि आपको शेयर बाजार में निवेश करना है तो सबसे पहले आपको अपना डी-मैट अकाउंट खुलवाना होगा; क्योंकि अब बिना डी-मैट अकाउंट के आप शेयरों का लेन-देन नहीं कर सकते हैं। पहले फिजिकल शेयर स्टॉक सर्टिफिकेट के रूप में निवेशकों के पास होते थे; लेकिन अब न सिर्फ शेयरों का लेन-देन डी-मैट शेयर के रूप में हो गया है, बल्कि जिन निवेशकों के पास पुराने शेयर सर्टिफिकेट के रूप में पड़े हैं, उन्हें भी सेबी ने निर्देश दिया है कि वे जल्द-से-जल्द इन शेयरों को डीमैटिरियलाइज्ड फॉर्म में बदल लें।
वे लोग, जो शेयर बाजार में प्रवेश करना चाहते हैं, और वे जिनके पास पुराने शेयर सर्टिफिकेट फिजीकल फॉर्म में पड़े हैं, दोनों ही तरह के निवेशकों के लिए सबसे पहले डी-मैट अकाउंट खुलवाना अति-महत्त्वपूर्ण कार्य है।
प्राथमिक बाजार (प्राइमरी मार्केट) क्या है?
जब कोई कंपनी अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए नए शेयर या डिबेंचर जारी करके सीधे निवेशकों से धन की उगाही करती है तो ऐसा वह कंपनी प्राथमिक बाजार के तहत करती है। कंपनी नए इनीशियल पब्लिक ऑफर प्राथमिक बाजार में लाकर नए शेयर/डिबेंचर जारी करती है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्राइमरी मार्केट वह जगह है, जहाँ सिक्यूरिटीज (प्रतिभूतियों) को अस्तित्व में लाया जाता है (जैसे आई.पी.ओ. के द्वारा)। प्राथमिक बाजार के विपरीत द्वितीयक बाजार (सेकंडरी मार्केट) में विभिन्न कंपनियों द्वारा पहले से जारी किए गए शेयर/डिबेंचर या अन्य सिक्यूरिटीज का लेन-देन होता है।
कैपिटल (पूँजी) का क्या अर्थ है?
किसी भी कंपनी को अपना व्यवसाय चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती है और यह धन उस कंपनी की ‘कैपिटल’ कहलाता है। कंपनी इसे दो प्रकार से हासिल करती है—शेयर जारी करके तथा उधार लेकर। धन की वह अधिकतम मात्रा जो कंपनी नियमानुसार शेयर जारी करके हासिल कर सकती है, कंपनी की ऑथराइज्ड कैपिटल (अधिकृत पूँजी) कहलाती है। इस ऑथराइज्ड कैपिटल में से कंपनी शेयर जारी करके जो पूँजी हासिल करती है, वह उस कंपनी की शेयर कैपिटल कहलाती है। कंपनी यह शेयर कैपिटल एक ही बार या विभिन्न चरणों में प्राथमिक बाजार में उतरकर, शेयर जारी करके हासिल कर सकती है। किसी भी समय पर, उस समय तक कंपनी द्वारा शेयर जारी करके हासिल की गई पूँजी को ‘पैडअप कैपिटल’ कहा जाता है।
ऑथराइज्ड कैपिटल का वह हिस्सा, जिसे कंपनी शेयर के द्वारा धन लेकर हासिल कर चुकी है, कंपनी का इश्यूड कैपिटल कहलाता है।
कई बार जब कंपनी नए शेयर जारी करती है तो शेयरधारकों के लिए यह आवश्यक नहीं होता कि वे शेयरों की पूरी पूँजी एक साथ चुकाएँ। इसमें शेयरों की कुल पूँजी का कुछ हिस्सा भविष्य की आवश्यकताओं के लिए कंपनी बाद में लेती है। इस प्रकार, नए जारी शेयरों की कुल पूँजी का वह हिस्सा, जो कंपनी अभी आंशिक रूप से इकट्ठा कर रही है, कॉल्ड-अप कैपिटल कहलाता है।
पैडअप कैपिटल
किसी कंपनी की कुल पूँजी (टोटल कैपिटल) कई चीजों से मिलकर बनती है, जैसे कि प्रमोटरों द्वारा निवेश की गई पूँजी, लोन के द्वारा अर्जित की गई पूँजी तथा शेयर जारी करके अर्जित की गई पूँजी इत्यादि। इसमें कंपनी द्वारा शेयर जारी करके अर्जित की गई पूँजी को ‘पैडअप कैपिटल’ कहा जाता है।
कैपिटल इश्यू किसे कहते हैं?
जब कभी कंपनी पूँजी उगाहने के लिए शेयर जारी करती है तो उसे ‘कैपिटल इश्यू’ कहते हैं। यह कैपिटल इश्यू नए इश्यू, प्रीमियम इश्यू या राइट इश्यू के रूप में हो सकता है।
प्रीमियम इश्यू क्या है?
जब कंपनी नए शेयरों की कीमत फेस वैल्यू से ऊपर रखकर जारी करती है तो ऐसे इश्यू को ‘प्रीमियम इश्यू’ कहते हैं। शेयर की फेस वैल्यू से ऊपर रखी गई कीमत उस शेयर पर प्रीमियम कहलाती है। जैसे यदि कोई कंपनी प्राथमिक बाजार में नया पब्लिक इश्यू लाती है तथा उसका प्राइस बैंड 75 से 85 रुपए रखती है, जबकि प्रति शेयर फेस वैल्यू 10 रुपए है। इस प्रकार, इस इश्यू में प्रति शेयर प्रीमियम 65 से 75 रुपए है। इस इश्यू में प्रति शेयर प्रीमियम का निर्धारण कई कारकों से किया जाता है, जैसे कि तत्कालीन शेयरों की बुक वैल्यू क्या है, प्रति शेयर लाभ कितना है, (ई.पी.एस.—‘अर्निंग पर शेयर’) तथा गत तीन वर्षों में शेयर की औसत बाजार कीमत कितनी है इत्यादि।
ओवर सबस्क्राइब्ड इश्यू किसे कहते हैं?
कोई भी पब्लिक इश्यू निर्धारित शेयर मात्रा के लिए जारी किया जाता है। जब इस इश्यू के लिए मिलनेवाले आवेदन-पत्र कंपनी द्वारा जारी निर्धारित शेयर मात्रा से अधिक संख्या में प्राप्त होते हैं तो उसे ‘ओवर सबस्क्राइब्ड इश्यू’ कहा जाता है। ऐसी स्थिति में कंपनी एक नीति बनाकर लॉटरी सिस्टम द्वारा आवेदकों को शेयर आवंटित करती है। जब शेयर बाजार अच्छे दौर (बुलफेज) में होता है, उस समय अच्छी व नामी कंपनियों के पब्लिक इश्यू ओवर सबस्क्राइब्ड होते हैं। ऐसे में जो निवेशक अधिक शेयर संख्या के लिए आवेदन करते हैं, उसकी शेयर प्राप्त करने की संभावनाएँ ज्यादा होती हैं।
ऐट पार व अबोव पार क्या है?
जब किसी शेयर की कीमत उसकी फेस वैल्यू के बराबर हो, तब यह शेयर ‘ऐट पार’ कहलाता है। ऐसी अवस्था में शेयर पर प्रीमियम शून्य होता है तथा शेयर की पार वैल्यू ही शेयर की फेस वैल्यू होती है। उदाहरण के लिए यदि शेयर की फेस वैल्यू 10 रुपए या 100 रुपए है तो यह इनकी बिक्री की 10 रुपए या 100 रुपए पर की जाएगी।
जब शेयर की कीमत उसकी फेस वैल्यू से ज्यादा होती है, अर्थात् उस शेयर पर प्रीमियम होता है, ऐसी अवस्था को ‘अबोव पार’ कहते हैं।
शेयर होल्डर किसे कहते हैं?
कोई भी व्यक्ति या संस्था, जिसका साधारण शेयर या प्रिफरेंस शेयर पर मालिकाना अधिकार होता है, वह ‘शेयर होल्डर’ कहलाता है। शेयरों के मालिकाना सबूत के तौर पर शेयर सर्टिफिकेट्स जारी किए जाते हैं, जो आजकल इलेक्ट्रॉनिक रूप में होते हैं।
शेयर होल्डर्स की इक्विटी क्या है?
कंपनी में किसी भी समय उसकी कुल पूँजी में से कंपनी की सारी देनदारियाँ निकालने के पश्चात् बचा हुआ भाग ‘शेयर होल्डर्स की इक्विटी’ कहलाता है। यह भाग उस कंपनी का ‘नेट वर्थ’ होता है। इस नेट वर्थ में कंपनी द्वारा जारी किए गए कुल शेयरों की फेस वैल्यू, अतिरिक्त धन, कैपिटल सरप्लस तथा अवितरित डिविडेंड शामिल होते हैं।
विभिन्न प्रकार के इश्यू
प्राथमिक बाजार में चार तरह के इश्यू से निवेशक रुबरु होता है—
आई.पी.ओ. (इनीशियल पब्लिक ऑफर)
जब गैर-सूचीबद्ध कंपनी (अनलिस्टेड कंपनी) नए शेयर जारी करने के लिए पूँजी बाजार में प्रस्ताव लेकर आती है या ऐसी कंपनी, जो अपनी सिक्यूरिटीज (शेयर्स) पहली बार आम जनता के लिए बाजार में प्रस्तुत करती है तो इस प्रकार के प्रस्ताव को ‘इनीशियल पब्लिक ऑफर’ (आई.पी.ओ.) कहते हैं। आई.पी.ओ. की प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह कंपनी सेबी द्वारा शेयर मार्केट में सूचीबद्ध कर दी जाती है। कंपनी आई.पी.ओ. दो तरीके से जारी कर सकती है—बुक बिल्डिंग रूट तथा फिक्स्ड प्राइस रूट—
बुक बिल्डिंग रूट में कंपनी अपने नए शेयरों के लिए एक प्राइस बैंड तय करती है। निवेशक अपनी इच्छा के अनुसार उस प्राइस बैंड की सीमा में आवेदन करते हैं। इस प्राइस बैंड की ऊपरी और निचली कीमत में अधिकतम अंतर 20 प्रतिशत तक हो सकता है। बुक बिल्डिंग प्रोसेस पूरा होने के पश्चात् शेयर की प्राइस तय की जाती है।
फिक्स्ड प्राइस रूट में कंपनी अपने शेयर की एक निश्चित कीमत प्रस्तुत करती है (फेस वैल्यू पर प्रीमियम लगाकर)। इसमें निवेशक को पहले से शेयर की कीमत पता होती है। सरल शब्दों में कहें, तो किसी कंपनी द्वारा पूँजी उगाही के लिए प्राथमिक बाजार (प्राइमरी मार्केट) में आम जनता के लिए जो प्रारंभिक प्रस्ताव लाया जाता है, उसे ‘इनीशियल पब्लिक ऑफर’ कहते हैं। इसमें संस्थागत निवेशक व रिटेल निवेशक दोनों आवेदन कर सकते हैं।


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