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शेखर : एक जीवनी (भाग -1) उत्थान

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‘शेखर: एक जीवनी’ अज्ञेय का सबसे अधिक पढ़ा गया उपन्यास है. यह हिंदी की एक ऐसी कथा-कृति जिसे इसके प्रकाशित होने के बाद से हर पीढ़ी का प्यार मिला. चाहे वह साहित्य की अभिरुचि वाला छात्र हो या आम पाठक इससे गुजरने के बाद हर कोई जीवन की एक भरी-पूरी छलछलाती नदी में डूबकर निकल आने जैसा अनुभव करता है. उपन्यास का नायक शेखर स्वयं अज्ञेय हैं अथवा कोई और व्यक्ति, यह हमेशा कौतूहल का विषय रहा है. कुछ लोग इसे पूरी तरह उनकी आत्मकथात्मक कृति मानते हैं, लेकिन स्वयं अज्ञेय का कहना है कि यह ‘आत्म-जीवनी’ नहीं है. वे कहते हैं कि ‘आत्म-घटित’ ही आत्मानुभूति नहीं होता, पर-घटित भी आत्मानुभूत हो सकता है. यदि हममें सामर्थ्य है कि हम उसके प्रति खुले रह सकें..शेखर में मेरापन कुछ अधिक है.’

फाँसी
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जिस जीवन को उत्पन्न करने में हमारे संसार की सारी शक्तियाँ, हमारे विकास, हमारे विज्ञान, हमारी सभ्यता द्वारा निर्मित सारी क्षमताएँ या औजार असमर्थ हैं, उसी जीवन को छीन लेने में, उसी का विनाश करने में, ऐसी भोली हृदयहीनता—फाँसी!
फाँसी, क्यों? अपराधी को दंड देने के लिए। पर इससे क्या वह सुधर जाएगा? इससे क्या उसके अपराधों का मार्जन हो जाएगा? जो अमिट रेखा उसके हाथों खिंची है वह क्या उसके साथ मिट जाएगी? फाँसी, दूसरों को शिक्षा देने के लिए। पर यह कैसी शिक्षा है कि जीवन के प्रति आदर-भाव सिखाने के लिए उसी की घोर हृदयहीन उपेक्षा का प्रदर्शन किया जाए। और, इससे भी कभी कोई सीखा है…मुझे तो फाँसी की कल्पना सदा मुग्ध ही करती रही है…उसमें साँप की आँखों सा एक अत्यन्त तुषारमय, किन्तु अमोघ सम्मोहन होता है…एक सम्मोहन, एक निमन्त्रण, जो कि प्रतिहिंसा के इस यंत्र को भी कवितामय बना देता है, जो कि उस पर बलिदान होते हुए अभागे—या अतिशय भाग्यशाली!–को जीवन की एक सिद्धि दे देता है, और उसके असमय अवसान को भी सम्पूर्ण कर देता है…
फाँसी!
यौवन के ज्वार में समुद्र-शोषण। सूर्योदय पर रजनी के उलझे हुए और घनी छायाओं से भरे कुन्तल। शारदीय नभ की छटा पर एक भीमकाय काला बरसाती बादल! इस विरोध में, इस अचानक खंडन में निहित अपूर्व भैरव कविता ही में इसकी सिद्धि है.
सिद्धि कैसी—काहे की? मेरी मृत्यु की क्या सिद्धि होगी—मेरे जीवन की क्या थी?
यवनिका उठती है और गिर जाती है। परदे आते हैं और बदल जाते हैं। किन्तु यवनिका का प्रत्येक आक्षेप, परदे का प्रत्येक परिवर्तन, अपने अवसान में लीन होकर भी, नाटक के प्रवाह में एक बूंद और डाल जाता है, एक बूंद जो स्वयं कुछ नहीं है किन्तु जिसके बिना उस….

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