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मदर इंडिया | Mother India PDF Download Free in Hindi by Katherine Mayo

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥मदर इंडिया PDF | Mother India
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 3 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖137
Last UpdatedJuly 13, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category,

कैथरीन मेयो की किताब ‘मदर इंडिया’ विश्व विख्यात कृति है। इसके प्रकाशन ने भारत, ब्रिटेन और अमेरिका में खलबली मचा दी। दुनिया में बहुत कम किताबें हैं, जो इतनी लोकप्रिय और विवादास्पद भी हुई हों। न्यूयाॅर्क, सैन फ्रांसिस्को, लंदन और कलकत्ता में इसके खिलाफ प्रदर्शन हुए। न्यूयाॅर्क के टाउनहॉल के बाहर इसकी प्रतियां जलाई गईं। ब्रिटेन की संसद और भारत की केंद्रीय असेंबली में इस पर बहसें हुईं। भारत की केंद्रीय असेंबली में इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई। इस किताब ने अपने समय की विश्व प्रसिद्ध मशहूर हस्तियों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इनमें पेरियार, गांधी, रवीन्द्र नाथ टैगोर, विंस्टन चर्चिल (ब्रिटेन के प्रधानमंत्री), सरोजनी नायडू, रूडयार्ड किपलिंग और एनी बेसेंट आदि शामिल हैं। डॉ. आंबेडकर ने अपनी रचनाओं में कई जगह इस किताब का जिक्र किया है। इस किताब का अनुवाद विभिन्न यूरोपीय भाषाओं में हुआ। भारत में इसका बांग्ला, तमिल, तेलगु, मराठी, उर्दू और हिंदी में अनुवाद हुआ। 1950 के दशक तक इसके अलग-अलग संस्करणों की 3 लाख 95 हजार 678 प्रतियां बिक गई थीं। इस किताब के समर्थन और विरोध में 50 से अधिक किताबें और पंफलेट लिखे गए। भारत में ‘मदर इंडिया’ नाम से फिल्म भी बनी, जो इसी से प्रेरित थी। इस किताब की लोकप्रियता का आलम यह है कि इसके नए-नए संस्करण प्रकाशित होते रहे, लेकिन लंबे समय से हिंदी में यह अनुपलब्ध थी।

पुस्तक का कुछ अंश:-

कैथरीन मेयो की बहुचर्चित पुस्तक ‘मदर इंडिया’ का अनुवाद आपके हाथों में देकर आज मैं अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूं। 1927 में प्रकाशित इस अंग्रेजी-पुस्तक ने हिंदू भारत में खलबली मचा दी थी। हिंदुत्व, हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति पर गर्व करने वाले नेता ऐसे बिलबिलाए थे, जैसे हजार बिच्छुओं ने एक साथ डंक मार दिए हों। महात्मा गांधी सहित लगभग सभी हिंदू नेताओं ने मिस मेयो की ‘मदर इंडिया’ का खंडन किया था और लाला लाजपत राय को भी उसके विरोध में किताब लिखनी पड़ी थी। असल में मिस मेयो की किताब ‘मदर इंडिया’ सामाजिक विषमता, अंधी परंपराओं, भयानक अशिक्षा और गरीबी में जकड़े भारत की वह नंगी तस्वीर दिखाती है, जिसे देखकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति विचलित हो सकता है।
बाबा साहब डॉ. आंबेडकर की रचनाओं में ‘मदर इंडिया’ का अनेक स्थानों पर संदर्भ आया है। उन रचनाओं से ही मुझे उसके बारे में पता चला। संयोग से बाबा साहब की रचनावली बीती सदी के अंतिम दशक में अंग्रेजी में आई थी। उसी दशक में दिल्ली के ‘प्राइस लो पब्लिकेशंस’ ने ‘मदर इंडिया’ का 1997 में पुनर्मुद्रण किया। लेकिन, मुझे इसका पता एक साल बाद लगा। अत: 24 नवंबर 1998 को ‘मदर इंडिया’ की एक प्रति मेरे हाथ में आई। जैसे ही मैंने इसे पढ़ा और इसे हिंदी में लाने का मन बनाया। तो दिक्कत यह सामने आई कि उन दिनों मुझ पर पत्रकार बनने का भूत सवार था और पत्रकारिता कुछ दूसरा काम करने के लिए दम मारने का भी समय नहीं देती। मैंने अपनी इच्छा अपने बेटों से व्यक्त की, पर वे भी अपनी व्यस्तताओं के कारण इसमें रुचि नहीं ले पा रहे थे। इसलिए उन्हें भी समय नहीं मिल सका। अंतत: मुझे ही इसके लिए अपनी सुविधा के अनुसार समय निकालना पड़ा। किन्तु, यह समय मुझे 20 साल बाद 2017 के आरंभ में मिला। जब मैंने आधी से ज्यादा किताब का अनुवाद कर लिया, तो उस पर एक टिप्पणी मैंने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखी; जिसे पढ़कर विद्वान साथी ओमप्रकाश कश्यप ने मुझे अवगत कराया कि हिंदी में उसका अनुवाद 1928 में ही हो गया था और उसी वर्ष हिंदी में उसका जवाब भी छप गया था। मेरे अनुरोध पर उन्होंने मुझे दोनों पुस्तकों की पीडीएफ फाइलें मेल कर दीं। अनुवाद की पीडीएफ फाइल अधूरी निकली। उसमें केवल 18वें अध्याय ‘दि सैक्रेड काउ’ तक का ही अनुवाद मिला, जबकि उस समय मैं 22वें अध्याय ‘रिफॉर्म्स’ का अनुवाद कर रहा था। किताब में उपसंहार को मिलाकर 30 अध्याय हैं।
पुराने हिंदी अनुवाद में उमा नेहरू की 27 पृष्ठों की लंबी प्रस्तावना है, शायद वही अनुवादक भी हैं, और लगभग 150 पृष्ठों में ‘मदर इंडिया’ की लेखिका मिस मेयो से ‘दो बातें’ भी की गई हैं। इन 150 पृष्ठों में मिस मेयो की जितनी भी भर्त्सना की जा सकती थी, वह की गई है। इसका प्रकाशन ‘हिंदुस्तान प्रेस’ इलाहाबाद से हुआ था। ‘मदर इंडिया’ का जवाब गुरुकुल विश्वविद्यालय, कांगड़ी (अब गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार) की श्रीमती चंद्रावती लखनपाल ने लिखा था; जिसका प्रकाशन संवत 1985 में ‘गंगा पुस्तक माला’, लखनऊ से हुआ था। मुझे इन दोनों पुस्तकों से ‘मदर इंडिया’ के प्रतिरोध को समझने में काफी मदद मिली।


निस्संदेह ‘मदर इंडिया’ का तीखा जवाब दिया गया था। पर, उस तीखे जवाब में भी मिस मेयो के दिए गए विवरण को नकारने का साहस कोई नहीं कर सका है। उमा नेहरू ने तो अपने अनुवाद की प्रस्तावना में यहां तक लिखा–
‘इससे भी बड़ी गलती यह होगी कि हम इस पुस्तक का संपूर्ण रीति से प्रचार न करें। यदि इसमें हमारी वास्तविक दशा चित्रित है, तो इसे पढ़ना और दूसरों से पढ़वाना हमारा धार्मिक कर्तव्य होना चाहिए। यदि इस पुस्तक में अत्युक्तियां और झूठ है, तो उससे पश्चिमी संसार धोखा भले ही खाए, हम स्वयं उससे धोखा नहीं खा सकते। अपने दोषों से घृणा करना इन्हें दूर करने की पहली सीढ़ी है। और जो लोग अपने दोष देखने से घबराते हैं, वे दवा न खाने वाले बीमार के समान अपने रक्त से स्वयं अपने रोग का पालन करते हैं।’ [1]
श्रीमती चंद्रावती लखनपाल भी ‘मदर इंडिया का जवाब’ में अपने ‘दो शब्द’ में यह कहना नहीं भूलीं–
‘इसमें संदेह नहीं कि यूरोप और अमेरिका में शराब, व्यभिचार, चोरी, डाके तथा अत्याचार दिनोंदिन बढ़ रहे हैं। परंतु, मैं स्पष्ट शब्दों में उद्घोषित कर देना चाहती हूं कि यह सब कुछ कह देना ‘मदर इंडिया’ का असली जवाब नहीं है। मिस मेयो की बहुत-सी बातें झूठ हैं। झूठ ही नहीं, गंदी तथा नीचतापूर्ण हैं। परंतु, क्या इस पुस्तक के पन्नों को पलटे जाने पर कोई इस बात से इनकार कर सकता है कि उसकी कई बातें सच्ची भी हैं और यह लिखते हुए छाती फटती है कि बिलकुल सच्ची हैं। मैं चाहती हूं कि भारतवर्ष के एक-एक व्यक्ति के हाथ में यह पुस्तक पहुंचे। और सबको मालूम हो जाए कि हमें बदनाम करने के लिए, जहां मिस मेयो ने झूठ बोलने में भी कसर नहीं छोड़ी है; वहीं कहीं-कहीं सच बोलने में कसर नहीं छोड़ी। पाठक वृंद, इन शब्दों की गूंज में पुस्तक के पन्ने पलटिए और अपने समाज की गंदगी को भस्म कर देने के लिए आंखों से चिनगारियां निकालते चलिए। यही ‘मदर इंडिया’ का असली जवाब है।’ [2]
‘आंखों से चिनगारियां निकालते चलिए’- इस वाक्य पर गौर करें। मिस मेयो ने ‘मदर इंडिया’ में गरीबों, अछूतों, शूद्रों और स्त्रियों की बदहाली तथा राजाओं, सामंतों और ब्राह्मणों के शोषण-तंत्र का जो वर्णन किया है; उसे पढ़कर शोषितों की आंखों से भी चिनगारियां निकलेंगी और शोषकों की आंखों से भी। पर, दोनों की चिनगारियों की अंतर्वस्तु में बुनियादी फर्क होगा।

27 जनवरी 1867 को अमेरिका के रिजवे, पेंसिल्वेनिया में जन्मीं मिस कैथरीन मेयो वर्ष 1924-25 में भारत आई थीं। वह मूलत: इतिहासकार थीं। एक इतिहासकार के रूप में उन्होंने पूरे भारत की यात्रा की। प्रांत-प्रांत घूमकर वहां के गांवों को देखा। आम जनता के जीवन, रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज, शिक्षा, स्कूलों-कॉलेजों, अस्पतालों, स्त्रियों और शूद्रों के हालात का पूरे तथ्यों के साथ अध्ययन किया। उन्हें सबसे अधिक दुःख भारत की स्त्रियों और अछूत जातियों की स्थिति को देखकर हुआ था। अपने अध्ययन और अनुभवों के आधार पर उन्होंने ‘मदर इंडिया’ किताब लिखी, जो 1927 में प्रकाशित हुई। कहते हैं कि उन्होंने भारतीय महिलाओं की दुर्दशा से द्रवित होकर ही किताब का नाम ‘मदर इंडिया’ रखा था। इसके प्रकाशित होते ही जहां ब्रिटिश क्षेत्रों में इसका स्वागत हुआ, वहीं भारत में इसकी घोर निंदा हुई और इसे नस्लवाद तथा इंडोफोबिया की दृष्टि से देखा गया। मेयो ने अनेक महत्वपूर्ण किताबें लिखी थीं। परंतु, सर्वाधिक चर्चा में वे ‘मदर इंडिया’ से ही आई थीं, जिसने उन्हें भारत में कुख्यात और विदेशों में विख्यात कर दिया था। हिंदुओं द्वारा की जा रही आलोचना का सबसे बड़ा कारण यह था कि मिस मेयो ने हिंदू धर्म और संस्कृति पर हमला किया था। निस्संदेह, मेयो की किताब ने भारतीय लोगों के बारे में अमेरिकी लोगों के दिमाग पर नकारात्मक प्रभाव डाला था। पर, दुर्भाग्य से उस कालखंड में यही भारत का सच भी था। इसका जबरदस्त प्रभाव यह हुआ कि भारत में 50 से भी अधिक आलोचनात्मक पुस्तकों और पम्फलेटों का प्रकाशन हुआ और उसने इसी नाम से एक फिल्म के निर्माण को भी प्रेरित किया, जबकि भारत और न्यूयॉर्क में मिस मेयो के पुतलों के साथ उनकी किताब को भी जलाया गया। महात्मा गांधी ने इसकी आलोचना करते हुए लिखा–
‘मेरी नजर में यह एक नाली इंस्पेक्टर की रिपोर्ट है, जिसका उद्देश्य यह दिखाना है कि भारत में कितनी नालियां हैं और उनमें कितनी गंदगी भरी हुई है। इस किताब में उस गंदगी की बदबू का ही ग्राफिक विवरण है। अगर मिस मेयो यह स्वीकार करतीं कि वे भारत में गंदगी देखने आई थीं, तो हमें उनसे ज्यादा शिकायत नहीं होती। किन्तु, हमें दुःख है कि उन्होंने अपने गलत निष्कर्षों से हर क्षेत्र में भारत को एक गंदा देश चित्रित किया है।’
मिस मेयो की ‘मदर इंडिया’ के खंडन में जितनी पुस्तकें लिखी गईं, उनमें कांग्रेस के लाला लाजपत राय की ‘अनहैप्पी इंडिया’, दलीप सिंह सौंद की ‘माय मदर इंडिया’ और धान गोपाल मुकर्जी की ‘अ सन ऑफ मदर इंडिया आन्सर्स’ पुस्तकें मुख्य हैं। 1957 में हिंदी फिल्म ‘मदर इंडिया’ भी मिस मेयो की ‘मदर इंडिया’ की प्रतिक्रिया में ही बनी थी।

इससे समझा जा सकता है कि मिस मेयो की ‘मदर इंडिया’ ने भारत के हिंदू जगत को किस कदर विचलित कर दिया था।
आज 90 साल के बाद ‘मदर इंडिया’ को हिंदी में लाने का उद्देश्य ‘कहो गर्व से हम हिंदू हैं’ का नारा लगाने वाले हिंदू राष्ट्रवादियों की आंखों का जाला हटाना है। ताकि वे देख सकें कि क्या सचमुच हिंदू संस्कृति में दलितों, स्त्रियों और आदिवासियों के लिए गर्व करने योग्य कुछ है?
कहीं-कहीं इतिहास को समझने के लिए मैंने अपने मित्र, इतिहास के प्रोफेसर ओमप्रकाश गुप्ता (ओमराज) की सहायता ली है, जिसके लिए मैं उनका आभारी हूं। अनुवाद में अपने पुत्र मोग्गल्लान भारती, (असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीतिशास्त्र, डॉ. आंबेडकर विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) से भी यदा-कदा सहायता प्राप्त की है, जिसके लिए मैं उसे भी धन्यवाद देता हूं। इस कार्य के लिए मैं दलित चिंतक और लेखक एस.आर. दारापुरी (पूर्व आईपीएस अधिकारी) का भी आभारी हूं, जिन्होंने ‘मदर इंडिया’ का अनुवाद करने के लिए मुझे सबसे अधिक प्रोत्साहित किया था। उन्होंने मुझे उसके प्रकाशन की समस्या से भी निश्चिंत रहने को कहा था। उनका कहना था कि एक बार काम हो जाए, तो प्रकाशक भी मिल ही जाता है।
काम पूरा हो जाने के बाद उसका पुनर्निरीक्षण भी जरूरी था। मैं इसका पुनर्निरीक्षण मोग्गल्लान से कराना चाहता था, पर अपनी पीएचडी थीसिस में अत्यंत व्यस्त होने के कारण वह संभव नहीं हो सका। अन्तत: इस कार्य को भी मुझे ही अपने हाथ में लेना पड़ा। इसमें काफी समय लगा। कारण? आलोचना, पत्रकारिता और अन्य सृजन भी साथ-साथ चलता रहा। इस प्रकार इसके पूर्ण निष्पादन में एक वर्ष से भी ज्यादा का समय व्यय हुआ। प्रकाशन के लिए फारवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन से बात हुई। उन्हें कुछ अध्याय भेजे गए, जिनका अवलोकन करने के पश्चात वे इसके प्रकाशन के लिए सहर्ष तैयार हो गए। पर फिर व्यवधान आया। मुझे इसका अनुवादकीय लिखना था। दूसरे कामों की वजह से इसका लिखना भी कई महीनों तक टलता रहा। फिर इस दृढ़ संकल्प के साथ कि इसे इसी वर्ष 2017 में निपटाना ही है, 21 दिसंबर को यह काम भी समाप्त किया।
अब मैं प्रसन्न हूं कि यह पुस्तक आपके हाथों में है। इसके लिए मैं फारवर्ड प्रेस और प्रमोद रंजन का अत्यंत आभारी हूं।

- कँवल भारती
21 दिसंबर 2017

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[1] मिस मेयो की 'मदर इंडिया’, श्रीमती उमा नेहरू, 1928. हिंदुस्तान प्रेस, इलाहाबाद, पृष्ठ -13
[2] मदर इंडिया का जवाब, चंद्रावती लखनपाल, सं. 1985 वि., गंगा पुस्तक माला, लखनऊ, पृष्ठ-6,7

 

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