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जम्मू-कश्मीर की अनकही कहानी / Jammu Kashmir Ki Ankahi Kahani

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जम्मू-कश्मीर की सियासत की पृष्ठभूमि

कश्मीर का इतिहास बहुत पुराना है। प्रचीन स्रोतो के अनुसार यह कश्यप ऋषि से प्रारंभ होता है। शायद भारत में कश्मीर ही ऐसा क्षेत्र है, जिसका विधिवत् इतिहास लिखा गया है। कल्हण की राजतरंगिणी इसी प्रकार का ग्रंथ है।
जम्मू का इतिहास भी उतना ही पुराना है। खोजबीन करने पर महाभारत काल तक तो उसके सूत्र पकड़े ही जा सकते हैं। लद्दाख, गिलगित और बल्तीस्तान के इतिहास तो हिमालय के इतिहास से ही जुड़े हुए हैं। जितना पुराना हिमालय, उतना ही पुराना इन क्षेत्रों का इतिहास। लेकिन इन पाँचों क्षेत्रों को आपस में मिलाकर नई बनी रियासत जम्मू-कश्मीर का इतिहास उतना पुराना नहीं है। ये सब कल की बातें हैं। इस रियासत को गढ़ने का श्रेय महाराजा गुलाब सिंह को जाता है। 1822 में महाराजा गुलाब सिंह जम्मू की गद्दी पर बैठे। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लद्दाख, गिलगित और बल्तीस्तान । छोटी-बड़ी रियासतों को जोड़ते हुए वे एक बहुत बड़े राज्य के स्वामी बन गए। लाहौर में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद अंग्रेजों के साथ हुए पंजाब के युद्धों में रणजीत सिंह की सेना अस्त-व्यस्त हो गई और रणजीत सिंह के साम्राज्य का कश्मीर भी अंग्रेजों के हाथ में आ गया। 1846 में यह कश्मीर भी जम्मू रियासत में शामिल किया गया तो उस जम्मू-कश्मीर रियासत का उदय हुआ, जो पूरे भारतवर्ष में दूसरी सबसे बड़ी रियासत मानी जाती थी। भारतवर्ष में अंग्रेजों के खिलाफ जिस वर्ष 1857 में स्वतंत्रता की पहली लड़ाई शुरू हुई, उसी वर्ष महाराज गुलाब सिंह का निधन हो गया। गुलाब सिंह की इस रियासत में इतिहास का एक और अध्याय तब लिखा गया जब 1931-32 में अंग्रेजों सरकार ने गुलाब सिंह के उत्तराधिकारी महाराजा हरि सिंह के खिलाफ षड्यंत्र रचने प्रारंभ किए। अंग्रेज मानते थे कि हरि सिंह की सहानुभूति कहीं-न-कहीं भारत के स्वतंत्रता समर्थकों के साथ है। इन अंग्रेजी षड़यत्रों में जाने-अनजाने मुसलिम कॉन्फ्रेंस और बाद में नेशनल कॉन्फ्रेंस की भी किसी-न-किसी रूप में भूमिका नई शोध सामग्री से स्थापित होती जा रही है। 1947 में अंग्रेज भारत
से चले गए। देश को विभाजन की त्रासदी झेलनी पड़ी। लेकिन इस घटना क्रम में देश की 550 से भी ज्यादा….

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